०१८ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (२)

द्वितीय समुल्लासः भाग (2)

दोहा

प्रसव काल बहु कष्ट कर, मातु निबल हो जाय।  

स्वच्छ स्वस्थ युवती कोई, दूध पिलावे धाय।।

चौपाई

स्तन पर माता लेप लगावे,

दुग्ध स्त्रवण जेहि ते रुक जावे।

एक मास इम बर्ते नारी,

द्वितीय मास पुन होय सुखारी।

जब बालक कछु लागे बोलन,

अमृत बैन कान मँह घोलन।

शुद्ध बोल जननी सिखलावे,

स्थान यत्न वर्णन बतरावै।

गुरु लघु मात्रा स्वर गंभीरा,

वाक्य योजना बोल सुधीरा।

गुरु जन का सिखलावे आदर,

नम्र शील अरु सभ्य सुसादर।

सत्संगति में रुचि बढ़ावे,

इन्द्रियजित विद्वान बनावे।

हर्ष शोक अरु लोभ लड़ाई,

रुदन हास्य मत करिये भाई।

भूल न परसे मर्दे शिश्ना,

या ते बढ़े विषय की तृष्णा।

होय नपुंसक वीरज छीना,

कर दुर्गन्धित दुर्बल दीना।

विद्या पंचम वर्ष पढ़ावे,

नागरी वर्णारम्भ करावे।

अन्य देश के वर्ण सिखाए,

एहि विधि सुत को योग्य बनाए।

गुरु पितु मातु भृत्य परिवारा,

यथा योग्य जाने व्यवहारा।

धर्म नीति व्यवहारिक छन्दा,

कण्ठ करे जिंह फँसे न फंदा।

इह विध शिक्षित होवे बाला,

तोड़ सके सब मिथ्या जाला।

भूत प्रेत मिथ्या सब जाने,

किसी धूर्त की बात न माने।

मृत प्राणी सब प्रेत कहावें,

दग्ध देह तक भूत बतावें।

दोहा

मनु शास्त्र में लिखित यह, है मिलता परमान।

प्रेत कहें मृत प्राणि को, भूत दग्ध को जान।।

श्लोक

गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन्।

प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुद्ध्यति।। – मनु. अ. ५ श्लोक ६५

चौपाई

प्रेतहार वह शिष्य कहावे,

जो मृत गुरु की अरथि उठावे।

जब शव जल कर होवे राखी,

भूत कहावे है मनु साखी।

मात पिता शिशुजन के पालक,

करें सचेत सभी निज बालक।

धूरत जन निज जाल फैलावें,

भूत प्रेत की कथा सुनावें।

डाकिन शाकिन रोगन जोगन,

भरम भूत से लूटहिं लोगन।

मूर्छा सन्निपांत परमादा,

अपस्मार अथवा उन्मादा।

तन अरु मन की है सब व्याधि,

भूत प्रेत की झूठ उपाधि।

भरम भूत रोगी को खावें,

ओझे लूटें चैन उड़ावें।

मूढ़ मनुज औषध नहीं सेवें,

धन संपति ओझे हर लेवें।

महा मूर्ख पाखंडी धूरत,

दुष्ट नीच स्वारथ की मूरत।

भंगी पतित मलेछ चमारा,

महा घिनौना पाप पसारा।

कहते आया भैरव वीरा,

कर में दंड पान मुख वीरा।

पवन पूत आये हनुमाना,

सवा मन का रोट चढ़ाना।

लोना सिर पर चढ़ी चमारी,

लेगी सीतला जान तुम्हारी।

ढोलक पीटें थाल बजावें,

तरह तरह के नाच नचावें।

धागे अरु डोरे बंधावें,

अंट संट बकवादी गावें।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)