०१७ स. प्र. कवितामृत द्वितीय समुल्लास (१)

द्वितीय समुल्लासः भाग ()

अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामः

मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद। – शतपथ ब्राह्मण

दोहा

धन्य धन्य वह वंश है, अहो धन्य सन्तान।

गुरु जननी और जनक जिस, मिले ज्ञान की खान।।

चौपाई

प्रेममयी है मूरति माता,

भव भय भंजनि रंजनि त्राता।

गर्भहि ते यौवन पर्य्यन्ता,

दै शिक्षा दुःख सहे अनन्ता।

जननी सम कोई हितु न दूजा,

बड़े भाग्य जिन कीनी पूजा।

शील धर्म आचार सिखावे,

ऐसा गुरु कहाँ कोई पावे।

ऐसो कर्म मात पितु धारें,

संतति के जो चरित सुधारें।

गर्भ पूर्व मध्ये उपरन्ता,

तजे दूष्य भोजन तिय कन्ता।

रूखे सूखे गंधि सड़ाने,

त्यागे प्रतिभा नाशन खाने।

दोहा

रज दर्शन से चार दिन, तजे, न दे ऋतु दान।

पंचम लौं षोडश तिथि, गर्भाधान प्रमान।।

तेरस और एकादशी, दोउ तिथि त्यागन योग।     

इन में धारण गर्भ का, जानहु बहुत अजोग।।

चौपाई

षोडश रात्रि के उपरन्ता,

तजें समागम कामिनी कन्ता।

मास मास इमि उचित समागम,

सुश्रुत चरक बखानें आगम।

गर्भ नारि यदि कर ले धारन,

एक वर्ष पुन भोग निवारन।

भोजन स्वादु स्वच्छ परिधाना,

गर्भवती सेवे सुख पाना।    

राखे सदा प्रफुल्लित हिय को,

दुःखी न रखे सगर्भा तिय को।

बल बुद्धि वर्धक आहारा,

नियमाहार विहार आचारा।

या विधि उत्तम हो सन्ताना,

निरुज निरोगी अरु बलवाना।

जन्म लेय बालक जेहि छन को,

नीर सुगंधित धोवे तन को।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)