०१२ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (९)

प्रथम समुल्लास भाग ()

‘चदि’ आल्हादे ‘चंद्र हु सिद्धि,

चंद्र शब्द की अर्थ प्रसिद्धि।

सुख दाता आनन्द सरूपा,

चन्द्र नाम परमेश अनूपा।  

‘मगि’ गत्यर्थे मंगल नामा,

मंगलकारक वह भगवाना।

‘बुध्’ अवबोधन अर्थ सुहावन,

ज्ञान रूप प्रभु बोध करावन।

‘ईशुचिर्’ है पूतीभावे,

पावन परम पवित्र सुहावे।

जीव शुद्ध हो जाके संगा,

मलिन नीर जिमि मिल कर गंगा।

‘चर’ धातु गति भक्षण योगे,

उपपद अव्यय ‘शनै’ प्रयोगे।

सहज प्राप्त सब मँह धीरज धर,

उस प्रभु को सब कहें शनीचर।

‘रह’ त्यागे सों निर्मित ‘राहु’,

ऋषि कैवल्य रूप तिंन आहु।

सो प्रभु दुष्ट जनन कँह त्यागे,

शरण हीन नर बड़े अभागे।

‘कित्’ निवास अरु रोग निवारण,

केतु करे सब व्याधि विदारण।

वह जग जिसमें नित्य निवासी,

कटे केतु व्याधि की फाँसी।

‘पूज’ धातु के अर्थ लगाने,

‘देवन पूजा संगति दाने।’।

यज्ञ शब्द की होवे सिद्धि,

यज्ञपुरुष देवहि नवनिद्धि।

अखिल वस्तु संयोजक ईश्वर,

पूजनीय व्यापक जगदीश्वर।

‘हू’ सों होता पद निर्माना,

पारब्रह्म होता भगवाना।

दान हेतु वस्तु सब देवहि,

ग्रहण योग्य वस्तु नित लेवहि।

बंध, धातु है बंधन माँहीं,

प्रभु सम बन्धु दूसर नाँहीं।

नियम माँहि बाँधा संसारा,

वह बंधु प्रभु परम पियारा।

मर्य्यादा कृत सब का बंधन,

किस की समरथ करहि उंलघन।

पिता सिद्ध ‘पा’ धातु केरा,

परमपिता परमेश्वर मेरा।

हम सब हैं उसकी सन्ताना,

वह रक्षक सब का भगवाना।

पिता पिताओं का परमेश्वर,

पिता महा जग का सर्वेश्वर।

‘मान करे’ जिमि मात दयालु,

ताँते ‘माता’ प्रभु कृपालु।

‘चर’ गति भक्षण अर्थे आये,

पद ‘आचार्य्य’ सिद्ध हो पाए।

सदाचार को ग्रहण करावे,

गुरु सब सब विद्या सिखलावे।

सो आचार्य प्रभु रखवारा,

वह रक्षक प्राणहुं ते प्यारा।

सत्य धर्म प्रतिपादन कर्ता,

सकल वेद विद्या को धर्ता।

वेद ज्ञान जिस प्रभु ने दीना,

जाको आश्रय मुनिगण लीना।

अग्नि वायु ब्रह्मादिक जेते,

जगद्गुरु कहलाये तेते।

उन गुरुओं का गुरु भगवाना,

वा को परम गुरु हौं माना।

‘अज्’ गति अरु क्षेपण के भावे,

‘जनी’ धातु इक प्रादुर्भावे।

सिद्ध करहिं ‘अज’ धातु दोऊ,

जन्म न ले जो सो ‘अज’ होऊ।

प्रकृति के जो अंग मिलावे,

जीव देह संबंध करावे।

जनमाए पर स्वयं न जनमें,

सो प्रभु ‘अज’ जानहु निज मन में।

‘बृहि’ वृद्धौ ‘ब्रह्मा’ भगवाना,

वाको कारज सृष्टि रचाना।

रचना रच संसार बढ़ाए,

ताँते ब्रह्मा संज्ञा पाए।

सत्य, ज्ञान और ब्रह्म अनन्ता,

वाको नहीं आदि अरु अन्ता।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)