०११ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (८)

प्रथम समुल्लास भाग ()

सो प्रभु सब का जाननहारा,

उसी देव का सकल पसारा।

‘कुबि’ आच्छादन बना कुबेरा,

छाया विश्व माँहि प्रभु मेरा।

‘पृथु’ विस्तारे ‘पृथिवी’ गहिये,

विस्तारक ईश्वर कँह कहिये।

‘जल्’ धातु धातन के अर्था,

दुष्ट हने प्रभु कल समर्था।

अणुओं का करता संवाता,

मिलित अणु को जल विलगाता।

‘का८ाृ’ दीतौ शब्द आकाशा,

दिगदिगन्त प्रभु कीन्ह प्रकाशा।

‘अद्’ भक्षण अर्थहु मँह आवे,

सो परमेश्वर ‘अन्न’ कहावे।

स्थावर जंगम सब संसारा,

सब कहँ ग्रहण करे प्रभु प्यारा।

उसके भीतर विश्व समावे,

उपजे जीवे अरु बिनसावे।

जिमि उपजे कृमि गूलर माँही,

खावें पीवें पुन मन जाहीं।

‘अत्ता’ ‘अन्न’ वही भगवाना,

सोई ‘अन्नाद’ नाम तिस नाना।

अद्यतेऽत्ति भूतानि तस्मादन्नं तदुच्यते। अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्।

अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः।।तैति० उपनि० (अनु० २। १०)

अत्ता चराऽचरग्रहणात्।। (वेदान्तदर्शने अ० १। पा० २। सू० ९)

‘वसु’ निवास वसु शब्द प्रसाधे,

व्यापक वसु कँह विश्व अराधे।

‘रुदिर्’ रुलावन अर्थे ‘रुद्रा-,

विकट रूप प्रभु कोप समुद्रा।

दुष्ट जनन को रुद्र रुलावे,

क्रुद्ध होय सब मार खपावे।

यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति

यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।।

यो कुछ मन मँह जीव विचारे,

वाणी सों पुन वही उचारे।

जिमि बोले तिमि कर्मंन कर्ता,

जैसा करता वैसा भरता।

वैसा काटे जैसा बोए,

फल पाए तब बैठा रोए।

जल रु जीव में रहे नारायण,

सकल विश्व है उसका आयन।

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। ता यदस्यायनं पूर्वं तेननारायणः स्मृतः।। – मनु० (अ० १ । श्लो० १०)

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)