००८ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (५)

प्रथम समुल्लास भाग (५)

ओंकार अर्थ का विचार

चौपाई

‘राट’ ‘वि’ उपसर्ग समीपे,

चमक दमक धात्वर्थ प्रदीपे।

‘क्विप्’ प्रत्यय पुन साथ लगायें,

एहि विधि शब्द विराट् बनायें।।

विविध जगत् प्रभु ने चमकाया,

नाम ‘विराट्’ हेतु अस पाया।

‘अ९चु’ धातु गति पूजा अर्था,

गति मत अग्नि सकल समर्था।।

‘अग्’ ‘अग्नि’ ‘इण’ धातु गत्यर्थक,

अग्नि शब्द प्रसिद्ध समर्थक।

ज्ञान रूप पूजन को स्थाना,

जो सर्वत्र विभु भगवाना।।

सो जाने ‘अग्नि’ परमेश्वर,

गितिन की गति वह सर्वेश्वर।

‘विश्’ प्रवेशन अर्थ प्रसिद्धि,

याते विश्व शब्द की सिद्धि।।

सकल जगत जिस बीच प्रविष्टा,

अथवा जग मँह जो संविष्टा।

ताँते ईश्वर विश्व कहावे,

प९चभूत महँ वही समावे।।

‘अ’ अक्षर सों यह सब नामा,

ग्रहण करें प्रभु सुख को धामा।

ज्योतिष्मान् सूर्य ग्रह तारा,

लटके जाके गर्भ मँझारा।।

उसी गर्भ मँह ग्रह गण जनमें,

करहिं निवास उसी के तन में।     

‘हिरण्यगर्भ’ मँह गगन पसारा,

आदि अन्त नहीं बहुत विस्तारा।।

वा धातु गति गंधे आवहि,

‘वापु’ सिद्ध चहुं दिक धावहि।

सब जग को जो करता धारण,

बली करे पालन अरु मारण।।

तांते वायु प्रभु को बोलें,

जिस के बल भूमण्डल डोलें।

‘तिज्’ धातु सों ‘तैजस’

सिद्धा, तेज रूप ईश्वर परसिद्धा।।

तेजोमय रवि आदि प्रकाशक,

तैजस प्रभु जग तम को नाशक।

यह जो नाम रु अर्थ बखाने,

‘उ’ अक्षर का ग्रहण प्रमाने।।

‘ईश’ धातु से ईश्वर बनता,

वह स्वामी, सब सेवक जनता।

यह ऐश्वर्य उसी का सारा,

उस का राखो सदा सहारा।।

वाके शील रूप अरु ज्ञाना,

धन दाता प्रभु दया निधाना।

‘दो’ धातु से सिद्ध ‘अदित्या’,

नाश हीन अविनाशी नित्या।।

‘ज्ञा’ धातु वाचक अवबोधन,

‘प्राज्ञ’ शबद ईश्वर का बोधन।

जड़ जंगम के जिते व्योहारा,

प्राज्ञ प्रभु सब जानन हारा।।

यह नामार्थ मकार गृहीते,

ओ३म् शब्द के अर्थ प्रतीते।

‘मित्र वरुण’ आदिक प्रभुवाची,

भुप्र के रँग में बुद्धि राचीं।।

काव्यरचना : आर्यमहाकविपंजयगोपालजी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)