००६ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (३)

प्रथम समुल्लास भाग ()

सब से बड़ा महाप्रभु मेरा,

ब्रह्म नाम ताते प्रभु केरा।

ओ३म् नाम ताका है भाई,

अविनाशी, नहीं वह बिनसाई।।

उसका सकल विश्व पर शासन,

सिमरहु वाको करो उपासन।

अन्य देव की उचित न पूजा,

प्रभु समान कोउ देव न दूजा।।

कहें वेद ऋग् यजु अरु सामा,

जिस का एक ओ३म् निज नामा।

सब नामों मँह ओ३म् प्रधाना,

मन महँ करो ओ३म् को ध्याना।।

शेष नाम गौणिक हैं सारे,

अर्थन हेत प्रकरण विचारे।

चार वेद जाको यश गावें,

तपी तपीश्वर जाको ध्यावें।।

ब्रह्मचर्य जाके हित राखें,

‘ओ३म्’ नाम ताको मुनि भाखें।

सब कहँ शिक्षा देने हारा,

सब के भीतर सब से न्यारा।।

जाको रूप स्वयं परकाशा,

योगी जाकी रखते आशा।

दर्शन हेत लगायें समाधि,

जा के जाने मिटे उपाधि।।

परम पुरुष ताको तुम जानो,

मन मंदिर महँ ताहि पछानो।

अग्नि स्वप्रकाश के कारण,

अन्धकार कँह करे निवारण।।

‘मनु’ सँज्ञा विज्ञान स्वरूपा,

इन्द्र नाम भूपन के भूपा।

सकल जगत का पालन कर्ता,

अरु ऐश्वर्य सकल को धर्ता।।

प्राणि मात्र जीवन आधारा,

ताते ‘प्राण’ नाम को धारा।

‘पारब्रह्म’ ब्रह्माण्ड वियापक,

‘ब्रह्म’ नाम तिंहू पुर को मापक।।

‘ब्रह्मा’ ने ब्रह्माण्ड रचाया,

जड़ जंगम सब जगत बनाया।

व्यापक वह ‘विष्णु’ कहलाये,

घट घट व्यापी सृष्टि समाये।।

दुष्ट जनन कँह ‘रुद्र’ रुलावे,

दण्ड पाप का पापी पावे।।

मंगलमय कल्याण को कारक,

शिव संज्ञक प्रभु दुःख निवारक।

‘अक्षर’ वह ईश्वर अविनाशी,

नाम ‘विराट्’ स्वयं परकाशी।।

महाकाल कालहु को काला,

‘कालाग्नि’ कर मृत्यु भाला।

अद्वितीय प्रभु सत को धामा,

इन्द्रादिक सब उसके नामा।।

भौतिक दिव्य पदारथ जेते,

प्रभु से व्याप्त पदारथ तेते।

द्यौ मंडल सब उस की छाया,

दिव्य नाम तांते तिस पाया।।

नाम ‘सुपर्णा’ पालन धर्मा,

पालनहारा अरु शुभ कर्मा।

ताको आतम परम महाना,

‘गरुत्मान्’ नाम इमि जाना।।

‘मातरिश्वा’ वह वायु समाना,

सर्व शक्तिमन्ता बलवाना।

प्राणि मात्र होवें जिस मांही,

भूमि नाम भगवान कहाहीं।।

‘इन्द्र’ नाम से ईश्वर माना,

वेद मंत्र इस में परमाना।

यथा प्राण वश इन्द्रिय देहा,

तिमि ईश्वर के वश जग एहा।।

एहि विधिं बहुत लिखे परमाना,

जिनते सत्य अर्थ कर माना।

सकल नाम ईश्वर के प्यारे,

जान लिहो ऋषि ग्रंथ सहारे।।

आर्ष ग्रन्थ मँह ऋषि विख्यानें,

इन शब्दों से प्रभु प्रमानें।

काव्यरचना : आर्यमहाकविपंजयगोपालजी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)