००५ स. प्र. कवितामृत प्रथम समुल्लास (२)

प्रथम समुल्लास भाग ()

ओं खम्ब्रह्मं।।१।। – यजुर्वेद अध्याय ४०। मन्त्र १७

ओमित्येतदक्षरमुद्रीथमुपासीत।।२।। – छान्दोग्य उपनिषत्।

ओमित्येतक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्।।३।।     – माण्डूक्य।

सर्वें वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि यद्वदन्ति।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।।४।। – कठोपनिषदि।

प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि।

रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम्।।५।।

एतमग्निं वदन्त्येके मनुमन्ये प्रजापतिम्।

इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्।।६।। – मनुस्मृति अध्याय १२ । श्लोक १२२, १२३।

ब्रह्मा विष्णुः रुद्रस्स शिवस्सोऽक्षरस्स परमः स्वराट्।

इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।।७।।     – कैवल्य उपनिषत्।।

इन्द्रंमित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यस्स सुपर्णों गरुत्मान्।

एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।।८।। – ऋग्वेदे मण्डले १। सूक्त १६४। मन्त्र ४६।।

भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री।

पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृंह पृथिवीं मा हिंसीः।।९।। – यजुर्वेद अध्याय १३ । मन्त्र १८।।

इन्द्रो महान रोदसी पप्रथच्छव इन्द्रः सूर्य्यमरोचयत्।

इन्द्रे विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्र स्वानास इन्दवः।।१०।। – सामवेद प्रपाठक ७। त्रिक ८। मन्त्र २।।

प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे।

यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्त्सर्वं प्रतिष्ठितम्।।११।। – अथर्ववेदे काण्ड ११। प्रपा० २४। अ० २ । मं० १।।

चौपाई

यह प्रमाण दीने इस कारण,

शंकाओं का होय निवारण।

ऐसे मन्त्रों में ओंकारा,

उत्तम नाम प्रभु का प्यारा।।

प्रभु का नाम न कोई निरर्थक,

प्रभु सत्ता के सभी समर्थक।

यथा लोक मँह नाम अनेका,

सब रूढ़ी सार्थक कोउ एका।।

भिखमंगे को नाम कुबेरा,

तन का ठिगना नाम सुमेरा।

स्वाभाविक गौणिक कुछ नामा,

कुछ कार्मिक संज्ञा गुणधामा।।

रक्षा करे सो ओ३म् कहावे,

शरण पड़े के प्राण बचावे।

व्यापक प्रभु आकाश समाना,

ताते ‘खं’ यह नाम महाना।।

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)