००१ सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत श्लोक

ओ३म्

श्रीयुत दयानन्दसरस्वतीस्वामिविरचितः

दयाया आनन्दो विलसति परस्स्वात्मविदितः,

सरस्वत्यस्यान्ते निवसति मुदा सत्यशरणा।

तदाख्यातिर्यस्य प्रकटितगुणा राष्ट्रिपरमा,

सकोदान्तः शान्तो विदितविदितो वेद्यविदितः।। १ ।।

सत्यार्थप्रकाशाय ग्रन्थस्तेनैव निर्मितः।

वेदादिसत्यशास्त्राणां प्रमाणैर्गुणसंयुतः।। २ ।।

विशेषभागीह वृणोति यो हितं,

प्रियोऽत्र विद्यां सुकरोति तात्त्विकीम्।

अशेषदुःखात्तु विमुच्य विद्यया,

स मोक्षमाप्रोति न कामकामुकः ।। ३ ।।

न ततः फलमस्ति हितं विदुषो,

ह्यदिकं परमं सुलभन्नु पदम्।

लभते सुयतो भवतीह सुखी,

कपटी सुसुखी भविता न सदा ।। ४ ।।

धर्मात्मा विजयी स शास्त्रशरणो विज्ञानविद्या वरोऽ-

धर्मेणैव हतो विकारसहितोऽधर्मस्सुदुःखप्रदः।

येनाऽसौ विधिवाक्यमानमननात् पाखण्डखण्डः कृत

सत्यं यो विदधाति शास्त्रविहितन्धन्योऽस्तुतादृग्घि सः।। ५।।

१. सत्याश्रय सरस्वती (ज्ञान) जिसके अन्दर हृदय में प्रसन्नतापूर्वक वास करती है तथा जिसके नाम के अन्त में सरस्वती शब्द सुशोभित हो रहा है, ऐसे परमात्मा को स्व आत्मा में देखने (प्राप्त करने) वाले दया के आनन्द दयानन्द सरस्वती जब (इस भारतवर्ष में) वास करते थे, तब सदा प्रसन्न रहनेवाले, मन के स्वामी, इन्द्रियजयी, भूत-भविष्यत् के ज्ञाता की, उसके उदात्त चरित्र को प्रकट करनेवाली जाज्वल्या, अतिश्रेष्ठ ख्याति = कीर्ति सर्वत्र फैली हुई थी।। १।।

२. ऐसे विराट् व्यक्तित्व के द्वारा वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों से युक्त सत्यार्थ के प्रकाश के लिए सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ का प्रणयन किया गया।। २।।

३. हितकारी परमात्मा का जो इस संसार में रहते वरण करता है, ऐसा विशेष प्रतिभा का धनी, परमात्मा का अत्यन्त प्रिय व्यक्ति ही तत्त्वज्ञान को सहजता से प्राप्त करता है तथा यथार्थज्ञान के द्वारा समस्त दुःखों से छूटकर नित्यानन्दस्वरूप मोक्ष को प्राप्त करता है, न कि कामनाओं (सांसारिक) के पीछे भागनेवाला..!! ।। ३।।

४. मोक्ष से अधिक श्रेष्ठ हितकारी फल अन्य कोई नहीं है। सतत परम पुरुषार्थी व्यक्ति ही मोक्षपथ को सरलता से प्राप्त करके इस संसार में सुखी अर्थात् जीवनमुक्त हो जाता है। छली-कपटी कभी भी उत्तम सुख को प्राप्त नहीं कर सकता है।

५. धर्मात्मा, कालजयी, शास्त्रैकशरण, ज्ञान-विज्ञान-पारग उस (दयानन्द) को छल-कपट से मार दिया गया। वस्तुतः सभी दुर्गुणों का आधार अधर्म अत्यन्त दुःखदायी है। जिसने शास्त्रों के प्रमाणों से पाखण्ड का खण्डन किया, तथा वेद-विहित सत्यों की स्थापना की, ऐसे हे दयानन्द तू धन्य है..!!! १.    ये श्लोक सत्यार्थप्रकाश प्रथम संस्करण की मूलप्रति में विषयसूची के पश्चात् लिखे हुए हैं। महर्षि दयानन्द के ऋम्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों में भी इसी प्रकार श्लोक लिखने की शैली मिलती है। ये श्लोक प्रथम और द्वितीय संस्करण में प्रकाशित होने से रह गये थे, इसीलिए यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं।

सत्यार्थ प्रकाश कवितामृत

काव्यरचना : आर्य महाकवि पं. जयगोपाल जी

स्वर : ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’

ध्वनिमुद्रण : श्री आशीष सक्सेना (स्वर दर्पण साऊंड स्टूडियो, जबलपुर)