संगठन सूक्तम्

संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ।
इळस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर।। 1।।

हे प्रभो तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन-वृष्टि को।।


सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।। 2।।

प्रेम से मिलकर चलो बोलो सभी ज्ञानी बनो।
पूर्वजों की भांति तुम कर्तव्य के मानी बनो।।


समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।3।।

हों विचार समान सबके चित्त-मन सब एक हों।
ज्ञान देता हूँ बराबर भोग्य पा सब नेक हों।।


समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।4।।

(ऋग्वेद 10/191/1-4)
हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढें सुख सम्पदा।।


पद्यानुवाद

धर्मयुक्त नेक रहें, मन्त्र एक।
निज विरोध तजें, सम अन्तःकरण हो।। टेक।।
हविष्य समान हो, हृदय तुल्य हो।
मानस समान हो, उदार हो।
ममता साकार हो।। 1।।
प्रस्थापित व्रत आचरण हो, सम विचार हो।
सम ज्ञान हो, समान लक्ष्य अभिमन्त्रित हों।। 2।।
चेष्टा समान हो, निश्चय हो समान।
एक अर्थ जानें, एक बात मानें।। 3।।
मिलकर एक रहें, प्राप्ति समान हो।
विषमता नष्ट हो, समता हो।
उत्तम निवास हो सबका, ममता साकार हो।। 4।।