शार्दूलविक्रीडितम् छन्दः

धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी,

      सत्यं मित्रमिदं दया च भगिनी भ्राता मनःसंयमः।

      शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम्

      ह्येते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् भयं योगिनः।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक १००)

      भावार्थ– धैर्य जिसका पिता है, क्षमा जिसकी माता है, लम्बे काल तक साथ देने वाली शान्ति जिसकी स्त्री है, सत्य जिसका मित्र है, दया जिसकी बहिन है, मन का संयम जिसका भाई है, भूमि ही जिसकी शय्या है, दिशाएं ही जिसके वस्त्र हैं और ज्ञान रूपी अमृत का पान करना ही जिसका भोजन है, हे मित्र ! जिस योगी के ऐसे कुटुम्बीजन हैं, उसे संसार में किससे भय होगा ? अर्थात् किसी से भी भय नहीं होगा।

      यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरा दूरतो,

      यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।

      आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्,

      संदीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः।।

                  (भर्तृहरिकृत – वैराग्यशतक, श्लोक ७९)

       भावार्थ– जब तक यह शरीर स्वस्थ अर्थात् रोगरहित है, जब तक बुढ़ापा दूर है, जब तक सभी इन्द्रियों में शक्ति विद्यमान है और आयु बची हुई है, तभी एक बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिए कि आत्मकल्याण के लिए महान् पुरुषार्थ करे, अन्यथा जैसे घर में आग लग जाने पर कुआं खोदने से कोई लाभ नहीं होता वैसे मृत्यु काल में कुछ भी नहीं हो सकेगा।

      भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं,

      मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।

      शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं,

      सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ३१)

      भावार्थ– विषय भोगों में रोगों का भय है, वंश में आचार भ्रष्टता या सन्तान विच्छेद का भय है, धन में राजा का भय है, मौन रहने में दीनता का भय है, बल प्राप्त करने पर शत्रुओं का भय है, रूप-सौन्दर्य में बुढ़ापे का भय है, शास्त्र पढ़ने पर पराजित होने का भय है, गुण प्राप्त करने में दुष्टों द्वारा व्यर्थ की निन्दा का भय है, शरीर में मृत्यु का भय है, इस प्रकार पृथ्वी पर सारी वस्तुएं भय से युक्त हैं, केवल एक वैराग्य ही निर्भय बनाने वाला है।

      गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलिर्

      दृष्टिर्नश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते।

      वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न सुश्रूषते,

      हा ! कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ९७)

       भावार्थ– शरीर सिकुड़कर झुक गया है, चाल धीमी और डगमगा गई है, दातों की पंक्तियां टूटकर गिर गयी हैं, आंखों से पूरा दिखता नहीं और कानों से सुनाई नहीं देता, मुंह में से लार टपकती रहती है, कुटुम्बीजन बूढ़े की बातों का आदर नहीं करते, जीवन-संगिनी स्त्री भी सेवा नहीं करती। ओ हो !  बुढ़ापा कितना कष्टपूर्ण है कि स्वयं के पाले पोसे पुत्र भी शत्रु के समान व्यवहार करने लगते हैं। फिर भी यह प्रभुशरण नहीं लेता।

      आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्धं गतं,

      तस्यार्द्धस्य परस्य चार्द्धमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः।

      शेषं व्याधिवियोगदुःखसहितं सेवादिभिर्नीयते,

      जीवे वारितरड्गच९चलतरे सौख्यं कुतः प्राणिनाम्।।

                  (भर्तृहरिकृत – वैराग्यशतक, श्लोक ९४)

       भावार्थ– सामान्यरूप से मनुष्य की आयु सौ वर्ष की मानी गई है। इसका आधा भाग अर्थात् पचास वर्ष तो सोने में ही चले जाते हैं। शेष बचा आधे का आधा भाग अर्थात् पच्चीस वर्ष, वह बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में बीत जाता है। शेष पच्चीस वर्ष का समय रोग, वियोग, आजीविका, बच्चों के लालन-पालन आदि दुःखों में बीत जाता है। जल की चंचल तरंगों के समान जीवन में मनुष्य को सुख कहां है? सुख तो ईश्वरोपासना में ही है।

      आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरंगाकुला,

      रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी।

      मोहावर्तसुदुस्तरोऽतिगहना प्रोत्तुंगचिन्तातटी,

      तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगीश्वराः।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ४०)

       भावार्थ– इस संसार में एक आशा नाम की नदी है। यह नदी मनोरथ-इच्छारूपी जल से भरी हुई है। इसमें तृष्णा-लोभ रूपी तरंगें उठ रही हैं। यह राग-द्वेष रूपी मगरमच्छों से परिपूर्ण है तथा तर्क-वितर्क रूपी जल पक्षी इसमें तैर रहे हैं। धैर्यरूपी वृक्षों को उखाड़ने वाली इस नदी में अज्ञान रूपी भंवर उठ रहे हैं। इस नदी के दोनों किनारों पर ऊंचे-ऊंचे चिन्ता रूपी तट हैं। इस नदी को पार करना बहुत कठिन है, परन्तु इस नदी को शुद्ध अन्तःकरण वाले त्यागी, तपस्वी, विरक्त योगी पार करके बन्धनों से छूटकर ब्रह्मानन्द को भोगते हैं।

      आदित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवनं,

      व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभिः कालोऽपि न ज्ञायते।

      दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते,

      पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ७)

       भावार्थ– सूर्य नारायण के उदय और अस्त होने के साथ-साथ प्रतिदिन आयु भी घटती जा रही है और इसी प्रकार दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्ष पर वर्ष बीतते जा रहे हैं, किन्तु सांसारिक कार्यों में निमग्न मनुष्य को समय के व्यतीत होने का कोई भी ज्ञान नहीं हो रहा। जन्म, बुढ़ापा, रोग, कष्ट और मृत्यु आदि भयंकर दुःखों को देखकर कोई भय उत्पन्न नहीं हो रहा, इससे ऐसा लगता है कि सारा संसार (-प्राणी जगत्) मोह-अज्ञान रूपी मदिरा को पीकर मतवाला हो रहा है अर्थात् सब कुछ देख सुनकर भी जीवन के लक्ष्य के प्रति असावधान एवं पुरुषार्थ हीन है।

      भोगाभंगुरवृत्तयो बहुविधास्तैरेव चायं भवस्

      तत्कस्येह कृतं परिभ्रमत रे लोकाः कृतं चेष्टितैः।

      आशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां,

      कामोत्पत्तिवशात् स्वधामनि यदि श्रद्धेयमस्मद्वचः।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ८९)

       भावार्थ– संसार के ये नाना प्रकार के विषय भोग क्षणिक सुख देकर नष्ट होने वाले हैं और जन्म-मृत्यु-रूप बन्धन के भी कारण हैं। अरे मनुष्यों !  इन तुच्छ कार्यों के करने से क्या लाभ होगा? अर्थात् इस कर्म भोग के चक्र में पड़ने से कोई विशेष लाभ नहीं होगा। यदि हमारी बातों पर विश्वास और श्रद्धा हो, तो सांसारिक आशा पाशों को तोड़कर मन को शुद्ध बनाते हुए, तीव्र इच्छा के साथ अपने मन को परमात्मा में स्थिर करो।

      लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः,

      सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।

      सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मण्डनैः,

      सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यद्यस्ति किं मृत्युना।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ५१)

       भावार्थ– मनुष्य के जीवन में यदि लोभवृत्ति विद्यमान है, तो अन्य दुर्गुणों को ढूंढ़ने की क्या आवश्यकता है, यदि चुगलखोरी है, तो अन्य दोषों की गणना क्या करनी? यदि सत्य है, तो तपस्या का क्या प्रयोजन? यदि मन पवित्र है, तो तीर्थ में घूमने से क्या लाभ? यदि सज्जनता है, तो अन्य गुणों की क्या आवश्यकता है? यदि यश फैल रहा है, तो आभूषणों से क्या प्रयोजन? यदि उत्तम विद्या है, तो धन की क्या आवश्यकता है? और यदि अपयश है, तो फिर मृत्यु की क्या आवश्यकता है ?

      को लाभो गुणिसंगमः किमसुखं प्राज्ञेतरैः संगतिः,

      का हानिः समयच्युतिर्निपुणता का धर्मत्त्त्वे रतिः।

      कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा काऽनुव्रता किं धनं,

      विद्या कि सुखप्रवास गमनं राज्यं किमाज्ञाफलम्।।

                     (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ९५)

       भावार्थ-लाभ क्या है ? श्रेष्ठ पुरुषों का संग। दुःख क्या है? मूर्खों का संग। हानि क्या है? समय की बर्बादी या अवसर को खो देना। चतुराई क्या है? धर्म के रहस्यों में लगे रहना। वीर कौन है? इन्द्रियों का विजेता। उत्तम स्त्री कौन स्त्री है? पति की आज्ञा के अनुकूल चलने वाली। धन क्या है? विद्या। सुख क्या है? विदेश में न रहना। राज्य उत्तम कौन-सा है? जिसमें आज्ञाओं का पालन हो।

      दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनश्यति यतिः संगात्सुतो लालनात्,

      विप्रोऽनध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्।

      हीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्,

      मैत्री चाप्रणयात् समृद्धिरनयात्त्यागात्प्रमादाद्धनम्।।

                  (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लोक ३८)

       भावार्थ– गलत सम्मति मानने से राजा, अधिक मेल-जोल से योगी, लाड़ प्यार से पुत्र, अध्ययन न करने से ब्राह्मण, कुपुत्र से कुल, दुष्टों के संग से शील, मद्यपान से लज्जा, देखभाल न करने से खेती, विदेश में अधिक रहने से प्रेम, स्नेह न होने से मैत्री, अनीति से ऐश्वर्य तथा अन्धाधुन्ध व्यय करने से धन नष्ट हो जाता है।

      विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं,

      विद्या भोगकारी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।

      विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता,

      विद्या राजसु पूज्यते न तु धनं विद्याविहीनः पशुः।।

                    (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लोक १९)

       भावार्थ- विद्या मनुष्य की शोभा है, विद्या ही मनुष्य का अत्यन्त गुप्त धन है। विद्या भोग्य पदार्थ, यश और सुख देने वाली है। विद्या गुरुओं का भी गुरु है। विदेश यात्रा में विद्या कुटुम्बीजनों और मित्रों के समान सहायक होती है। विद्या ही सबसे बड़ा देवता है। विद्यायुक्त मनुष्य का ही राजाओं और राज-सभाओं में आदर-सम्मान होता है, धन का नहीं। वास्तव में देखा जाये तो विद्याहीन मनुष्य पशु के तुल्य ही है।

      केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्जवला,

      न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।

      वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते,

      क्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम् ।।

                  (भर्तृहरिकृत – नीतिशतक, श्लोक ७९)

       भावार्थ– चन्द्रमा के समान चमचमाते हुए हीरे-मोती से बने आभूषण, जो हाथों में और गले में धारण किए जाते हैं, वे मनुष्यों को शोभायमान नहीं करते, और न ही स्नान, तैल, इत्र, पुष्पादि से किया हुआ शृंगार तथा सजाए-संवारे हुए बाल मनुष्य को भूषित करते हैं। मनुष्य का सच्चा आभूषण तो शुद्ध सरल, सत्य, सुमधुर वाणी ही है। अन्य सभी आभूषण तो धीरे-धीरे कालक्रम से नष्ट हो जाते हैं। परन्तु वाणी रूपी सच्चा आभूषण तो सदैव जगमगाता रहता है।

      एके सत्पुरुषा परार्थघटकाः स्वार्थान्परित्यज्य ये,

      सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाविरोधेन ये।

      तेऽमी मानुषराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये,

      ये निघ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे।।

                  (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक श्लोक ७९)

       भावार्थ– संसार में वे मनुष्य ‘सत्पुरुष’ हैं। जो अपने स्वार्थ को छोड़कर दूसरों की भलाई के लिए अपने तन-मन-धन को लगा देते हैं। दूसरे प्रकार के मनुष्य ’सामान्य’ कहलाते हैं जो अपने काम न बिगाड़ते हुए दूसरों की भी भलाई करते हैं। तीसरे प्रकार के मनुष्य ‘राक्षस’ कहलाते हैं जो अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए दूसरों के बने बनाए काम को बिगाड़ देते हैं। परन्तु जो लोग बिना किसी स्वार्थ के (अपने लाभ के) व्यर्थ ही दूसरों की हानि करते हैं, ऐसे चौथे प्रकार के मनुष्यों को किस नाम से पुकारा जाए हम नहीं जानते, आप स्वयं ही सोचें।

      कौपीनं शतखण्डजर्ज्जरतरं कन्था पुनस्तादृशी,

      नैश्चिन्त्यं सुखसाध्यभैक्ष्यमशनं निद्रा श्मशाने वने।

      मित्रामित्रसमानतातिविमला चिन्ताऽथ शून्यालये,

      ध्वस्ताशेषमदप्रमादमुदितो योगी सुखं तिष्ठति ।।

                  (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक श्लोक ८८)

      भावार्थ– जिसकी फटी पुरानी लंगोटी में अनेक पैबन्द लगे हैं और गुदड़ी भी ऐसी ही है। जो चिन्ता से रहित है तथा भिक्षा से प्राप्त अन्न को खाकर सुख पूर्वक निर्वाह करता है। श्मशान में या वन में निश्चिन्त होकर सो जाता है। जो मित्र और शत्रुओं के प्रति समान दृष्टि रखता है तथा एकान्त स्थान में राग द्वेष से रहित होकर ईश्वर का चिन्तन करता है। जिसके अभिमान और प्रमाद आदि दोष पूर्णतया नष्ट हो चुके हैं, ऐसा योगी ही संसार में सुख पूर्वक रहता है।

      क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः,

      सोढा दुःसहशीततापपवन-क्लेशा न तप्तं तपः।

      ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितप्राणैः न शम्भोः पदम्,

      तत्तत् कर्म कृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तैः फलैर्वञ्चितम्।।

                     (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक ८)

       भावार्थ– क्षमा किया, किन्तु असमर्थता के कारण, गृहसुख त्यागा, किन्तु विवशता से, सर्दी, गर्मी, आंधी आदि के अतिकष्ट सहे, किन्तु धनोपार्जन-आजीविका के लिए, तपस्या के लिए नहीं, प्राणों को वश में करके धन का तो चिन्तन किया, किन्तु कल्याणकारी शिव का ध्यान नहीं किया। इस प्रकार मुनि जन जो कर्म करते हैं, वे सब हमने किए, किन्तु मुनियों को प्राप्त होने वाले फलों से हम वंचित ही रहे।

      अर्थाः पादरजोपमा गिरिनदीवेगोपमं यौवनम्,

      आयुष्यं जल-लोल-बिन्दु-चपलं फेनोपमं जीवनम्।

      धर्मं यो न करोति निन्दितमतिः स्वर्गार्गलोद्घाटनम्,

      पश्चात्तापयुतो जरापरिगतः शोकाग्निना दह्यते।।

                           (हितोपदेश मित्र. १५३)             

  भावार्थ- धन तो पैरों की धूलि के समान है, यौवन पहाड़ी नदी के वेग के समान है, आयु पानी के प्रवाह के समान है, और जीवन फेन (झाग) के समान है, ऐसा जानते हुए भी जो मूर्ख धर्माचरण नहीं करता, वह पीछे बुढ़ापे में शोक रूपी अग्नि में पश्चाताप करता हुआ जलता है।

      चाण्डालः किमयं द्विजातिरथवा शूद्रोऽथ किं तापसः,

      किं वा तत्त्व विवेकपेशलमतिर्योगीश्वरः कोऽपि किम्।

      इत्युत्पन्नविकल्पजल्पमुखरैः सम्भाष्यमाणा जनैर्,

      न क्रुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः।।

                       (भर्तृहरिकृत – वैराग्यशतक श्लोक ५१)

       भावार्थ– ‘‘यह चाण्डाल है, अथवा ब्राह्मण है ? शूद्र है, या कोई तपस्वी है? अथवा कोई चतुर बुद्धिमान् तत्त्ववेत्ता है, या योगीश्वर है, अथवा कोई धूर्त है?’’ इस प्रकार विभिन्न प्रकार के तर्क वितर्क करने वाले व्यक्तियों पर योगी लोग न तो क्रोध करते हैं और न ही हर्षित होते हैं, किन्तु अपने अध्यात्म मार्ग पर स्वतंत्रता पूर्वक चलते रहते हैं।

      किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्महाविस्तरैः,

      स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविभ्रमैः।

      मुक्त्वैकं भवबन्धदुःखरचनाविध्वंसकालानलं,

      स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषा वणिग्वृत्तयः।।

                   (भर्तृहरिकृत – वैराग्यशतक श्लोक ७३)

भावार्थ– वेदों, स्मृतियों, पुराणों तथा अन्य बड़े-बड़े शास्त्रों को केवल पढ़ते-पढ़ाते रहने से तथा विभिन्न कर्म-काण्डों को करते रहने से स्वर्ग में एक अच्छा घर व भोग्य साधन मिल जाने के अतिरिक्त और क्या विशेष लाभ है ? मनुष्य का मुख्य कार्य तो ईश्वर के आनन्द को प्राप्त करने के लिए हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके समाधि लगाना ही है, जो संसार के समस्त दुःखों के कारण (अविद्या) को जला देने के लिए अग्नि का काम करता है। और सब कार्य तो बनियों के व्यापार के समान है।