शयनकालीन-मन्त्राः

ओं यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।

दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। १।।
हे जगदीश्वर वा राजन् आप की कृपा से जो आत्मा में रहनेवाला वा जीवात्मा का साधन दूर जाने वा मनुष्य को दूर तक ले जाने वा अनेक पदार्थों का ग्रहण करनेवाला, शब्दादि विषयों के प्रकाशक श्रोत्रादि इन्द्रियों को प्रवृत्त करनेहारा, एक, जागृत अवस्था में दूर-दूर भागता है। और जो सोते हुए का उसी प्रकार भीतर अन्तःकरण में जाता है। वह मेरा संकल्प विकल्पात्मक मन अपने और दूसरे प्राणियों के अर्थ कल्याण का संकल्प करनेहारा होवे, किसी की हानि करने की इच्छायुक्त कभी न होवे।

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः।

यदपूर्व यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। २।।
हे परमेश्वर वा विद्वान् जन आप के संग से जिस कर्म, धर्मनिष्ठ, मन का दमन करनेवाले, बुद्धिमान लोग अग्निहोत्रादि वा धर्मसंयुक्त व्यवहार वा योग यज्ञ में और विज्ञान सम्बन्धि और युद्धादि व्यवहारों में अत्यन्त इष्ट कर्मों को करते हैं जो सर्वोत्तम गुण कर्म स्वभाववाला, प्राणिमात्र के हृदय में पूजनीय वा संगत एकीभूत हो रहा है वह मेरा मनन विचार करना रूप मन धर्म करने की इच्छायुक्त होकर अधर्म को सर्वथा छोड़ देवे।

यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्जोतिरन्तरमृतं प्रजासु।

यस्मान्न ऽ ऋते कि९चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। ३।।
हे जगदीश्वर वा परम योगिन् विद्वन् आप के जताने से जो विशेषकर ज्ञान का उत्पादक बुद्धिरूप और भी स्मृति का साधन धैर्यरूप और लज्जादि कर्मों का हेतु जो मनुष्यों के अन्तःकरण में आत्मा का साथी होने से नाशरहित प्रकाशरूप, जिसके बिना कोई भी काम नहीं किया जाता वह मुझ जीवात्मा का सब कर्मों का साधनरूप मन शुद्ध गुणों की इच्छा करके दुष्ट गुणों से पृथक् रहे तथा कल्याणकारी परमात्मा में इच्छा रखनेवाला हो।

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्।

येन यज्ञस्तायते सप्त होता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। ४।।
हे मनुष्यों जिस नाशरहित परमात्मा के साथ युक्त होनेवाले मन से व्यतीत हुआ वर्तमान काल सम्बन्धी और भविष्यत् में होनेवाला यह सब त्रिकालस्थ वस्तुमात्र सब ओर से गृहीत होता अर्थात् जाना जाता है। जिससे सात मनुष्य होता वा पांच प्राण छठा जीवात्मा और अव्यक्त सातवां ये सात लेने-देनेवाले जिसमें हों वह अग्निष्टोमादि वा विज्ञानरूप व्यवहार विस्तृत किया जाता है वह मेरा योगयुक्त चित्त मोक्षरूप संकल्पवाला होवे तथा अविद्यादि क्लेशों से पृथक् रहे।

यस्मिन्नृचः साम यजूँषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।

यस्मिँश्चित्त ँ् सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। ५।।
जिस मन में जैसे रथ के पहिए के बीच के काष्ठ में अरा लगे होते हैं वैसे ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद सब ओर से स्थित और जिसमें अथर्ववेद स्थित है, जिसमें प्राणियों का समग्र, सर्व पदार्थ सम्बन्धी ज्ञान सूत में मणियों के समान संयुक्त है वह मेरा मन वेदादि सत्यशास्त्रों का प्रचाररूप संकल्पवाला होवे।

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयते ऽ भीशुभिर्वाजिन ऽ इव।

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। ६।।
(यजु.३४/१-६)
जो मन जैसे सुन्दर चतुर सारथी गाडीवान् लगाम से घोड़ों को सब ओर चलाता है, वैसे मनुष्यादि प्राणियों को शीघ्र-शीघ्र इधर-उधर घुमाता है और जसे रस्सियों से वेगवाले घोड़ों को सारथी वश में करता वैसे नियम में रखता, जो हृदय में स्थित, विषयादि में प्रेरक वा वृद्धादि अवस्था रहित और अत्यन्त वेगवान् है वह मेरा मन मंगलमय नियम में इष्ट होके सब इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोक के धर्मपथ में सदा चलाया करे।


भावार्थ
हे दयानिधे आपकी कृपा से मेरा मन शुभ विचारों में सदा लगा रहे। मैं सदैव अपने एवं अन्य प्राणियों के प्रति कल्याणकारी विचारों को ही अपनाऊं। हे सर्वान्तर्यामी भगवन्! मुझे बल दो, जिससे मैं अपने अन्दर के कुसंस्कारों पर विजय पाने हेतु सतत युद्ध स्तर पर पुरुषार्थ कर सकूं एवं यज्ञादि परोपकार में अपने मन को लगाते हुए सदैव धर्म करने की इच्छायुक्त होकर अधर्म को सर्वथा छोड सकूं। आप्त ऋषियों के मार्ग पर चलते हुए मैं शुद्ध गुणों की इच्छा करके दुष्ट गुणों से सदा पृथक् रहूं।
हे जगदीश्वर! मेरा मार्ग प्रशस्त कीजिए, जिससे यम नियमादि अष्टाङ्ग योग का पालन करते हुए मैं योग विज्ञान युक्त होकर अविद्यादि क्लेशों से सदा पृथक् रहूं। हे परमविद्वान् परमेश्वर! मैं वेदों को पढ़ता हुआ अविद्या अन्धकार का समूल नाश कर विद्या प्रिय सदैव बना रहूं। हे सर्वनियन्ता प्रभो! अपने मन के द्वारा इन्द्रियों को अधर्माचारण से रोककर सदा धर्म पथ में चला सकूं।
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।


काव्यानुवाद
हों विमल संकल्प मेरे उस सतत गतिशील मन के।
हा शिवम् संकल्प मेरे उस सतत गतिशील मन के।। टेक।।
दूरगामी जागरण में ठीक वैसा जो शयन में।
ज्योतियों ज्योति प्रतिपल चंक्रमण करता भुवन में।
एक वह ही दिव्य देता खोल जो परदे भुवन के।। १।।
यज्ञ क्या युद्धादि सारे संयमी जिसके सहारे।
कर्म करते इन्द्रियां सब व्यर्थ ही जिसके बिना रे।
झिलमिला पीछे रहा जो जीव के प्रति आचरण के।। २।।
पूर्ण है प्रज्ञान से जो धैर्य से अवद्यान से जो।
ज्योति अमृत देह में है ज्ञेय बस अनुमान से जो।
कुछ नहीं सम्भव बिना जिस मूल प्रेरक उत्करण के।। ३।।
भूत भावी का विमल का वश न जिस पर एक क्षण का।
बुद्धि से बुद्धीन्द्रियों से युक्त जीवन के यजन का।
कर रहा विस्तार जिसमें बीज अन्तर्हित सृजन के।। ४।।
वेद जिसमें हैं समाहित ज्यों अरे रथ नाभि आहित।
इन्द्रियों का ज्ञान जिसके हो रहा भीतर प्रवाहित।
वस्त्रवत संवीत जिसके सूत्र चिन्तन के मनन के।। ५।।
ज्यों रथी अभिलषित पथ पर हांकता हय बैठ रथ पर।
त्यों मनुज को जो चलाता डाल कर डेरा सृहृत पर।।
चिरयुवा जो छोड़ देता वेग को पीछे पवन के।। ६।।