ब्रह्मयज्ञः (वैदिक संध्योपासना)

अथ ब्रह्मयज्ञः

3म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। (यजु 36/3)

तूने हमें उत्पन्न किया, पालनकर रहा है तू।

तुझसे ही पाते प्राण हम, दुःखियों के कष्ट हरता है तू।।

तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।

सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान।।

तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया।

ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला।।

प्राण प्रदाता संकट त्राता, हे सुखदाता ओम् ओम्।

सविता माता पिता वरेण्यम्, भगवन् भ्राता ओम् ओम्।

तेरा शुद्ध स्वरूप धरें हम, धारणधाता ओम् ओम्।

प्रज्ञा प्रेरित कर सुकर्म में, विश्वविधाता ओम् ओम्।

ओम् आनन्द ओम् आनन्द, ओम् आनन्द ओम् ओम्।

अथाचमनमन्त्रः

3म् शन्नो देवीरभिष्टय ऽ आपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः।। (यजु. 36/12)

अथेन्द्रियस्पर्शमन्त्राः

ओं वाक् वाक्।।  ओं प्राणः प्राणः।।

ओं चक्षुश्चक्षुः।।  ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्।।

ओं नाभिः।।  ओं हृदयम्।।  ओं कण्ठः।।

ओं शिरः।।  ओं बाहुभ्यां यशोबलम्।।

ओं करतलकरकरपृष्ठे।।

अथेश्वरप्रार्थनापूर्वकमार्जनमन्त्राः

ओं भूः पुनातु शिरसि।। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः।।

ओं स्वः पुनातु कण्ठे।। ओं महः पुनातु हृदये।।  

ओं जनः पुनातु नाभ्याम्।। ओं तपः पुनातु पादयोः।।

ओं सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि।। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र।।

अथ प्राणायाममन्त्राः

ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्। (तैत्ति0 प्रपा0 10/अनु0 27)

       इस मन्त्रपाठ के बाद न्यून से न्यून तीन ब्राह्य प्राणायाम सभी आर्यवीरों को करने हैं।

       इसके लिए सर्वप्रथम आसनपूर्वक सीधे बैठेंगे और श्वांस को पूरा भीतर भर लेंगे। फिर पूरा बाहर निकाल देंगे। फिर बाहर ही उसे रोकना है (अन्दर नहीं लेना है)। घबराहट होने तक रोकना है। इस बीच मूलबन्ध = कमर के नीचे के हिस्से (गुदा इन्द्रिय, मूत्रेन्द्रिय) को ऊपर आकर्षण करना, उड्डीयान बन्ध=पेट को भीतर आकर्षित करना एवं जब तक प्राण रुका रहे, मन में ओ3म् का जप ‘सर्वरक्षक’ इस अर्थ भावना के साथ चलता रहेगा।

अथाघमर्षणमन्त्राः

3म् ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसो ऽ ध्यजायत। ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः।। 1।।

समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो ऽ अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।। 2।।

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।

दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः।। 3।।

(ऋ.म. 10/सू. 190/मं. 1-3)

अथाचमन-मन्त्रः

ओं शन्नो देवीरभिष्टय ऽ आपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु नः।। (यजु. 36/12)

अथ मनसापरिक्रमा-मन्त्रः

3म्। प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः। तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम  इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु। यो3स्मान्द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः।। 1।।

दक्षिणा दिगिन्द्रो ऽ धिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः। तेभ्यो…(पूर्ववत्) ।। 2।।

प्रतीची दिग्वरुणो ऽ धिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः। तेभ्यो…(पूर्ववत्) ।। 3।।

उदीची दिक् सोमो ऽ धिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः। तेभ्यो…(पूर्ववत्)।। 4।।

ध्रुवा दिग् विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः। तेभ्यो… (पूर्ववत्)।। 5।।

ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः। तेभ्यो…(पूर्ववत्)।। 6।। (अथर्व.कां. 3/सू. 27/मं. 1-6)

अथोपस्थान-मन्त्राः

3म् उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्।

देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्।। 1।। (यजु.अ.35 मं.14)

उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।

दृशे विश्वाय सूर्यम्।। 2।। (यजु.33/मं.31)

चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः।

आप्रा द्यावापृथिवी ऽ अन्तरिक्ष  ँ् सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ।। 3।। (यजु.अ. 7 मं. 42)

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत  ँ् शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।। 4।। (यजु.अ.36/मं.24)

अथ गुरुमन्त्रः

3म् भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। (यजु.36/3)

अथ समर्पणम्

हे ईश्वर दयानिधे! भवत्कृपयानेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः।।

अथ नमस्कार-मन्त्रः

3म्। नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। (यजु. 16/41) ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।

संध्या-भावार्थ चिन्तन

       (ओ3म्) यह आप का मुख्य नाम है। इस नाम के साथ आप के सब नाम लग जाते हैं। आप सर्वरक्षक हैं। (भूः) आप प्राणों के भी प्राण हैं, हमारे जीवन के आधार हैं। (भुवः) आप स्वयं दुःखों से रहित और हमें सकल दुःखो से छुडाने हारे हैं। (स्वः) आप स्वयं सुख स्वरूप और अपने उपासकों को सब सुखों के देने हारे हैं। (सवितुः) हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता ! समग्र ऐश्वर्यों के दाता ! प्रकाशकों के भी प्रकाशक ! (वरेण्यम्) आप अति श्रेष्ठ होने से वरण करने योग्य हैं। (भर्गः) आप अविद्या एवं राग-द्वेषादि क्लेशनाशक हैं। (देवस्य) ऐसे आपके अत्यन्त कामना करने योग्य पवित्र एवं शुद्ध स्वरूप तेज का (धीमहि) हम ध्यान करते हैं, धारण करते हैं। (यः) हे परमपिता परमात्मा आप ! (नः) हमारी (धियः) बुद्धियों को (प्रचोदयात्) उत्तम गुणकर्म स्वभाव में प्ररित कीजिए; दुष्ट गुणकर्म स्वभाव से निरन्तर छुड़ाइए।

       हे सर्वप्रकाशक एवं सर्वव्यापक प्रभो ! इस जीवन को चलाने हेतु जिन-जिन भौतिक सुख-साधनों की हमें अपेक्षा है, आप की कृपा से धर्मयुक्त पुरुषार्थ से हम प्राप्त कर सकें तथा इन्हें त्यागपूर्वक भोगते हुए आप की प्राप्ति के लिए, मोक्षानन्द के लिए भी विशेष पुरुषार्थ कर सकें। आप सब ओर से हम पर सुखों की वर्षा कीजिए।

       संध्या के इस दिव्य लक्ष्य को हम सब मिलकर प्राप्त कर सके इसलिए हमारे शरीर स्वस्थ एवं बलवान हों, हमारे मन-बुद्धि-अन्तःकरण एवं इन्द्रियों में आप निर्मलता प्रदान करें जिससे हम इन्हें धर्ममार्ग में सदा चलाते रहें, अधर्म से हटाते रहें।

       हे प्रणाधार, प्राणप्रिय आप भूः प्राणों के भी प्राण, भुवः समस्त दुःखों से छुडानेवाले, स्वः आनन्दस्वरूप, महः सबसे बड़े पूज्य, जनः सकल जगदुत्पादक, तपः दुष्टों के दण्डदाता एवं ज्ञानस्वरूप तथा सत्यम् अविनाशी हैं।

       हे सकल जगत् के उत्पत्तिकर्ता आप ने हम जीवों को कर्मफल भुगाने तथा मोक्षानन्द देने हेतु इतने विशाल ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करके दान में दिया है। बदले में हम से कभी कुछ नहीं चाहा, कभी कुछ नहीं लिया। आप महान् हैं, आप की सृष्टिरचना महान् है, आप के दण्ड-विधान भी महान् हैं। पाप कर्मों को करके उनके दुःखरूप फलों से हम नहीं बच सकते अतः हमारे अन्तःकरण को आप निर्मल बना दीजिए जिससे सारे पाप कर्मों को हम शीघ्र ही छोड़ सकें।

       हे सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामिन् ! हम आप के अन्दर डूबे हुए हैं। आप हमारे दाएं-बाएं, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर सर्वत्र विद्यमान हैं तथा हमें देख-सुन-जान रहे हैं। आप के ही अग्नि, इन्द्र, वरुण, सोम, विष्णु, बृहस्पति आदि अनेक नाम हैं। हे ज्ञानस्वरूप अग्ने आप ऐश्वर्यशाली-ऐश्वर्यदाता इन्द्र हैं। सबसे उत्तम राजा वरुण हैं। शान्ति आदि गुणों से आनन्ददाता सोम हैं। हे सर्वव्यापक विष्णो, आप बड़ों से भी बड़े ब्रह्माण्डों के पालनकर्ता एवं वेदज्ञानदाता बृहस्पति हैं। अपनी सृष्टि रचना के द्वारा तथा अपने पवित्र गुण-कर्म-स्वभावों के द्वारा निरन्तर हमारी रक्षा कर रहे हैं। आप के रक्षक गुणों को हम बार-बार नमन करते हैं। जो प्राणी हमसे अज्ञानवशात् अथवा जिससे हम स्वार्थादि के कारण द्वेष करते हैं, हमारी उन समस्त दुर्भावनाओं को आप के पवित्रतम तेज में जलाकर भस्म कर देते हैं, जिससे परस्पर हम कभी द्वेष न करें किन्तु सदा प्रेमपूर्वक मित्रभाव से वर्तें।

       हे सच्चिदानन्द-अनन्त-स्वरूप ! हम आप की उपासना करते हैं। हे नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव ! हम आप को अपने हृदय मन्दिर में आवाहन करते हैं। हे अद्वितीय-अनुपम- जगदादिकारण ! आप हमारे हृदय में आओ। हे अज-निराकार- सर्वशक्तिमान्-न्यायकारिन् ! अपने दिव्य अस्तित्व का हमें यथावत् भान कराओ। हे जगदीश-सर्वजगदुत्पादकाधार ! अपने पावन संस्पर्श से हमारे अन्दर सुसंस्कारों को उत्पन्न करके उन्हें प्रवृद्ध तथा पुष्ट कराओ। हे सनातन-सर्वमंगलमय-सर्वस्वामिन् ! आप की कृपा से हम भी धार्मिक, न्यायप्रिय, पुरुषार्थी, परोपकारी, विनम्र, सहनशील, राष्ट्रभक्त एवं माता-पिता तथा गुरुजनों के आज्ञाकारी बन सकें। हे अविद्यान्धकार निर्मूलक-विद्यार्क प्रकाशक ! आप की कृपा से हम सभी प्रकार के स्वार्थ एवं संकीर्णताओं से ऊँचे उठ सकें। हे दुर्गुणनाशक-सद्गुणप्रापक-सर्वबलदायक ! हमारे अन्दर छिपे राग-द्वेष-मोह जनित काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, निन्दा, चुगली, अहंकार, आलस्य, प्रमाद आदि सभी दोषों से छुटकारा पाने हेतु सहाय, पुरुषार्थ एवं आत्मिक बल प्रदान करें। हे धर्मसुशिक्षक-पुरुषार्थप्रापक ! दुर्गुणों के परित्याग एवं सद्गुणों को धारण करते हुए आप की कृपा से हम सौ वर्ष तथा उसके बाद भी स्वस्थतापूर्वक जी सकें, आप को देख सकें, आप के विषय में सुन सकें, औरों को भी बता सकें तथा स्वतन्त्र अदीन रहें।

       इसीलिए प्रतिदिन प्रातः सायं पवित्र गायत्री आदि वेद मन्त्रों से हम आपकी स्तुति-प्रार्थना-उपासना करते हैं। हमें आधिदैविक-आधिभौतिक-आध्यात्मिक दुःखों से शीघ्र ही छुड़ा कर इसी जन्म में धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त कराइए।

       आप सुखस्वरूप हैं, आपको हम नमन करते हैं। आप कल्याणकारी हैं, आपको हम नमन करते हैं। आप मोक्षानन्द प्रदाता हैं, आप को बारंबार हम नमन करते हैं।        ओ3म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।