दयानन्द काव्य प्रकाश (सम्पूर्ण)

रचनाकार : ओम प्रकाश आर्य
स्वर : ब्र. अरुणकुमार ”आर्यवीर“
ध्वनिमुद्रण : स्वरदर्पण साऊण्ड स्टूडियो (जबलपुर)

ओ३म् विश्वानि देव् सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव ।।

ओम् नाम सबसे बड़ा, जग का पालन हार।

जो इसका सुमिरन करे, है जाए भव से पार।।

चौबौला :-

है जाए भव से पार, जगत का पूर्ण हितकारी है।

पाप पुण्य का यथा योग्य, फल देय न्यायकारी है।

पूर्ण व्यवस्थित ज्ञान युक्त, यह रची सृष्टि सारी है।

दुष्टों को दे दंड प्रभु तू बड़ा बलंकारी है।।

जगत के पालन कर्ता! दुःख भक्तों के हर्ता !।

दयानंद गाथा गाऊं,

सच्चिदानंद स्वरूप को बार-बार शिर नाऊं।।

वार्ता :- ऋषि दयानंद सरस्वती भारत माता के ऐसे अनमोल रत्न थे, जिन्होंने गुलामी से ग्रसित भारत के सपूतों की अस्मिता को ललकारा। देश का स्वाभिमान की रक्षा के लिए लाखों कष्ट उठाए। मानव निर्माण हेतु वेदों का सन्मार्ग दिखाते हुए आर्य समाज रूपी वट वृक्ष की स्थापना की। उस महामानव (नरपुंगव) की जीवनी का उल्लेख (वर्णन) काव्य गाथा के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

वीर छन्द :-

जगदीश्वर का सुमिरन कर लो, जिसने रचा सकल संसार।

अनुपम रूप भरा सृष्टि में, महिमा जिसकी अपरम्पार।।

सुंदर तन मानव को दीन्हा, दीन्ही बुद्धि विशेष प्रकार।

अमृत ज्ञान दिया वेदों का, जिससे खुले मुक्ति के द्वार।।

वेदों के पथ पर चलने से, सबका शुद्ध होए व्यवहार।

भूल जाए जो इस मार्ग को, वह नर डूब जाए मंझधार।।

ऐसी दशा हुई भारत की, घोर अविद्या का अन्धकार।

पराधीन भारत की जनता, बने विदेशी साहूकार।।

धर्म-कर्म सब नष्ट हो गए, फ़ैल रहा था अत्याचार।

आर्य जाति का पतन हो रहा, पाखण्डों की थी भरमार।।

भाई का भाई दुश्मन था, खून की नदियां रहा बहाय।

घात लगाके घुसे विदेशी, हमको दिया गुलाम बनाए।।

घोर अविद्या अंधकार में, भारत माता रही अकुलाए।

ऐसे विकट समय भारत में लीन्हा जन्म दयानन्द आए।

वार्ता :- स्वामी दयानन्द जी का जन्म संवत १८८१ में गुर्जर प्रदेश के काठियावाड़ प्रान्त के मौरवी राज्य के टंकारा ग्राम में औदिच्य ब्राह्मण कुल में करसन जी के घर बालक मूल शंकर के रूप में हुआ।

दोहा :-

नगर मौरवी के निकट टंकारा एक ग्राम।

गुर्जर प्रान्त में जन्म लिया था दयानंद बलधाम।।

चौपाई :-

दयानंद बल धाम पिता श्री करसन दास तिवारी।

सुख संपति की कमी न घर में फूल रही फुलवारी।।

धर्म कर्म में लीन बन्धुजन पुलकित थे नरनारी।

बचपन में ही पढ़ा वेद वो बना धर्म अधिकारी।।

उम्र चौदह की पाई है। रात्रि शिवतेरस आई है।

पिताजी यूं समझाए

शिवरात्रि के व्रत से प्राणी परम धाम को जाए।

लामिनी :-

सुनत पिता के वचन मूल जी, मन अपने हरषाए हैं।

रात्रि होत ही संग तात के, शिव मंदिर में आए हैं।।

शिव पुराण की कथा पुजारी, सबको रहा सुनाई है।

आधी रात के बाद सभी पर, निद्रा देवी छाई है।।

परन्तु मूल जी के मन मंदिर में उस रात रवानी थी।

प्रभु के दर्शन करूं हृदय में ऐसी अमित निशानी थी।।

वार्ता :- बालक मूल शंकर के निर्मल हृदय पटल पर प्रभु दर्शन की गहरी लगन थी।

गझल कव्वाली :-

जिसको लगन प्रभु नाम की पागल वाही होता।

अपने प्रभु की याद को पलभर नहीं खोता।।

हरदम तड़फ दिल में रहे प्रीतम के नाम की,

जब तलक उस ईश का दर्शन नहीं होता। जिसको..

लेकर मानव जन्म जो उसको नहीं जाना,

उस मनुज का जीवन किसी लायक नहीं होता । जिसको..

सब सो गए मंदिर में ईश्वर नहीं दीखता,

पानी के छींटे मारकर, बालक नहीं सोता। जिसको..

राग धमाल :-

तभी एक घटना घट गई, शिव जी के मंदिर में।

अरे! एक चूहा निकला, शिव जी के मंदिर में।।

चूहा शिव पिंडी पर आया। पूजा का सामान गिराया।

उछल कूद उत्पात मचाया। शिव शंकर को खुब सताया।

अरे! मन बिजली कौंधी, शिवजी के मंदिर में। अरे! एक..

दृष्य देख बालक चकराया। कैसा प्रभु का दर्शन पाया।

तुच्छ जीव नहीं जाए भगाया। चूहे ने शिव को धमकाया।

हृदय में शंका उपजी, शिव के मंदिर में। अरे! एक..

वार्ता :- बालक मूल जी मन ही मन विचार करता है कि शिव कथा में तो शिव जी की अपार महिमा है, लेकिन ये शिव कैसा ?

लामिनी तोड़ :-

मैंने सुना त्रिशूल चलाकर दैत्यों का संहार किया है।

देकर के वरदान एक दिन भस्मासुर को अमर किया है।।

नंदी बैल पर चढ़कर धावे। डमरू का संगीत सुनाए।

भांग धतूरा भोजन खावे। लाल-लाल आँखें चमकाए।

ऐसे बलकारी शंकर का चूहे ने बेहाल किया। देकर के वरदान..

सोए तात को जगा दिया है। सब कुछ उनको बता दिया है।

पत्थर को भगवान बताकर। सबको मुरख बना दिया है।

उस शंकर की खोज करुंगा, जिसने हमें निहाल किया है। देकर के वरदान..

दोहा :-

पत्थर की ये मूर्ति हो न सके भगवान।

चूहे के अपराध को ये न सकी पहचान।

शिव शंकर का रूप है ये मूर्ति पाषान।

तू इसको धिक्कारता ओ बालक नादान।

वीर छंद :-

क्रोधित देख पिता अपने को, बालक घर को आया है।

जो कुछ घटना घटी रात्रि को, माता को बतलाया है।

देख पुत्र की दशा मात ने, जी भर गले लगाया है।

मैं समझाऊं तेरे पिता को, क्यों दिल में घबड़ाया है।।

तोड़ :-

मेरे बेटा रे, मन में भरम अब मत करियो,

तेरे उम्र अभी नादान। मेरे बेटा रे..

वार्ता :- इस चूहे की घटना ने बालक मूल शंकर को विचलित कर दिया। सच्चे शिव दर्शन की भावना बलवती होने लगी।

बारहमासी :-

इस घटना के बाद पुत्र की चिंता बढ गई है।

खो-खो रहे रात्रि की निद्रा उड़ गई है।

सोच दिन रत करे भारी।

पत्थर को भगवान समझ रही ये दुनिया सारी।

बहिन की मृत्यु हुई घर में।

आंसू पीकर खड़े मूल जी सोच करें मन में।

मौत से सब डरते भाई।

है क्या ऐसी चीज बनी जो सबको दुःखदाई।

गजब एक और भयो भारी।

सबसे प्यारे चचा आ गई अब उनकी बारी।

मृत्यु की देख भयंकरता।

कैसे इससे बचूं बढ़ गई दिल में व्याकुलता।

मूल जी मन में सोच किया।

बिना त्याग वैराग्य किसी को मिला नहीं पिया।

प्रभु उपकार है बहुत किया।

करने को उद्धार विश्व का बिज डाल दिया।

वार्ता :- बालक मूल शंकर को, मृत्यु ने इतना, भयभीत कर दिया कि वह मृत्यु से बचने के उपाय सोचने लगा, संसार असार लगने लगा, पारिवारिक बंधनों से विमोह पैदा होने लगा।

राग लांगुरिया :-

अब नर छोड़ जगत के फेर, देर ना तेरे जाने में।

नौ दस मास गर्भ में रहता,

पैदा होए काल खा जाता।

जन्म मरण का चक्र घूमता, उम्र बिताने में। अब नर..

बालापन हंस खेल गवाया।

होकर बड़ा बहुत गर्वाया।

काया जर-जर होए लगा क्यों इसे सजाने में। अब नर..

सुन्दर तन अग्नि में जलता,

सब कुछ पड़ा यहीं रह जाता।

फिर कैसा अभिमान अरे नर देख ज़माने में। अब नर..

प्रभु का नाम, सुमिर के बन्दे,

छोड़ सभी ये गोरखधन्धे।

भव सागर में पड़ा हुआ क्यों उम्र गवाने में। अब नर..

व.त. :-

मूल शंकर के वैराग्य दिल में बसा,

मोह ममता से चित्त अलग कर लिया।

अब न शादी के बन्धन बंधुंगा कभी,

धार ऐसा कठिन व्रत मन में लिया ।। टेक।।

घर में शादी की होने लगी तयारियां,

राह अपनी को बालक लगा खोजने,

किस दिशा में गमन कर मिलेगा प्रभु?

कौन बतालाए लगा उसको सोचने ।। १।।

वार्ता :- इस प्रकार बालक मूल शंकर दिन ब दिन चिन्तित रहने लगा। माता पिता को यही उचित लगा कि जितना जल्दी हो सके इसको शादी के बन्धन में बांध दिया जाए। शीघ्र ही आनन-फानन में शादी की त्यारियां होने लगी।

वीर छन्द :-

शादी के दिन निकट आ गए घर में छाई ख़ुशी अपार।

मात-पिता परिवार बन्धुजन मिलकर कारज रहे संवार।।

व्याकुल मन एकांत वास में, मूल जी हरदम करें विचार।

एक दिन काल मुझे खाएगा, ऐसे जीवन में क्या सार।।

योगी बनकर निडर रहूं मैं, शंका करूं काल की नाय।

मात- पिता से नाता तोडूं घर को तुरत देऊं बिसराय।।

बाईस वर्ष की भरी जवानी, यौवन से टूटा अनुराग।

काम वृत्ति को आहुति दे दी, गहरी लगन तीव्र वैराग्य।।

रात्रि अँधेरी मंजिल करके, पंहुचे बीस कोस एक ग्राम।

हनुमान जी के मंदिर में उस दिन जाए किया विश्राम।।

वार्ता :- इस तरह बालक मूल शंकर ने तीव्र वैराग्य के वशीभूत होकर सच्चे शिव की खोज में स्वगृह को त्याग दिया । उधर उनके परिवार की क्या दशा होती है?

लामिनी :-

खबर सुन माँ के दिल पर बिजली गिरी दह्लाए।

मीन जल बिन के तड़पे माता रही अकुलाए।।

पिता के होश उड़ गए, चेहरा रहा कुम्हिलाए।

बन्धुजन शोक मनाएं, विपदा ये कैसी आए।

रंग सब फीके पड़ गए। घर में उदासी छाए।।

तुरत घोड़े दौडाए, सुत खोजो कहीं जाए।।

पिंजड़ा तोड़ पक्षी उड़ जावे।

फिर न लौट कभी वहां आवे।।

एक दिन उड़े ताल के हंस फेर नहीं आएंगे। फेर नहीं आएंगे।

वार्ता :- मूल जी पहचान जाने के भय से छुपते-छुपाते अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ते ही जाते हैं । उनके शारीर पर कीमती आभूषण भी थे।

राग जोगिया :-

लगन नहीं छूटे जब दिल में लागी। टेक

राह चलत मिले ठगीया साधू,

कहाँ लगे यूं डाल के जादू।

कौन धाम क्या नाम विचारों,

आभूषण से क्यों प्रेम तुम्हारों।

इन्हें उतार बनों वैरागी । लगन नहीं..

शुद्ध चौतन्य नाम रख दीन्हां,

स्वेत वस्त्र कर तुम्बा दीन्हां।

बड़े दुःख इस तन पर झेले,

कोट कांगड़ा सिद्धिपुर मेले।

कहीं तो मिलेगा परम अनुरागी। लगन नहीं..

पिताजी खबर सुनकर मेले में आए।

सूत को पकड़ बैन कड़वे सुनाए।

सिपाही बुला सख्त पहरा बिठाए।

करो चौकसी भागकर फिर न जाए।

सोए सभी नींद उसको न लागी। लगन नहीं..

गया भाग पहरे से घर को न जाना,

प्रभु की शरण में अमर पद को पाना।

कभी मोह-ममता को दिल में न लाना,

उसी को मिला है प्रभु का ठिकाना।

नर्मदा के तट पर गया वीतरागी। लगन नहीं..

वार्ता :- शुद्ध चौतन्य जी, ऐसे योग्य गुरु की तलाश में थे, जो उन्हें संन्यास की आश्रम की दीक्षा देकर सच्चे शिव की रह दिखा सकें। आयु कम होने से कोई संन्यास देने को तयार नहीं होता था।

वीर छन्द :-

चारणोद कर्नाली में एक संत पूर्णानंद जी रहते थे।

दो मुझको वैराग्य ये बिनती शुद्ध चैतन्य जी करते थे।।

सौम्य स्वभाव बुद्धि अति उत्तम, गुण वैराग्य बताते थे।

ब्रह्मचारी की देख लगन को, मन ही मन हरषाते थे।।

पूर्णानंद सरस्वती जी ने, मन में निश्चय कर लीन्हां।

देकर के संन्यास की दीक्षा, नाम दयानंद रख दीन्हां।।

वही दयानंद ऋषि बन गया, भारत के इतिहास में।

वेदों का उद्धार कर गया, दुनिया के आकाश में।।

ज्वालानंद शिवानंद गिरी से, रहस्य योग का जान लिया।

कृपण शास्त्री से व्याकरण की विद्या का गुर सीख लिया।।

अहमदाबाद दुधेश्वर मंदिर, माउण्ट आबू गए श्रीमान।

संवत उन्नीससौ बारह में, हरिद्वार कीन्हा प्रस्थान।।

वार्ता :- स्वामी पूर्णानंद जी से संन्यास की दीक्षा लेकर शुद्ध चैतन्य जी, स्वामी दयानंद सरस्वती नाम से विभूषित होकर संवत १९१२ में, कुंभमेला दर्शन हेतु, हरिद्वार में आते हैं। जो कुछ मेला में देखने को मिला उसका कैसा प्रभाव दयानंद जी पर पड़ता है?

राग रसिया :-

कुंभ मेला की जुरी है भारी भीड़,

लगौ है मेला सन्तन को।

दूर-दूर से भक्त आए रहे। अपनी शान दिखने को।

ऐसी संगत से भयो है मन अधीर। लगौ है मेला-(१)

भांति-भांति के साधू देखे, अलग-अलग उनके भगवान।

डुबकी लगा गंग धारा में, मांग रहे क्या-क्या वरदान।

कहते गंगा मैया हरे सबकी पीर। लगौ है मेला-(२)

धर्म-कर्म की देख दुर्दशा, मन ही मन अकुलाए हैं ।

ऐसा कैसे हुआ दयानंद समझ नहीं कुछ पाए हैं ।

भारत माता कौ हरण भयो चीर। लगौ है मेला-(३)

गंगा तट की देख गन्दगी, दयानंद मन करें विचार।

निर्मल गंगा मैली कर दई, किस विधि इसका हो उद्धार।

चंडी पर्वत पर गए धर धीर। लगौ है मेला-(४)

वार्ता :- मेला के भारी कोलाहल से दूर स्वामीजी हिमालय की दुर्गम यात्रा पर निकल पड़े ऋषिके, गुप्तकाशी गौरीकुंड, भीमगुफा, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि स्थानों पर अनेक साधू संतों के संपर्क में आए। समागमों से बहुत कुछ स्वामीजी ने सोचा, समझा और सीखा।

कवित्त :-

हिमालय की दुर्गम पहाडियों में घूमकर,

साधू संत मंडली से बहुत कुछ पायो है।

बहुत सारे धर्म देखे, अच्छे बुरे कर्म देखे,

आपस में विरोध ने बहुत कुछ सिखायौ है।।

वामियों के ग्रन्थ पढ़े, कमियों के भेद खुले,

पाखंड के जाल में, सबको फसायौ है।

सत्य क्या है जानना जरूरी और हो गया,

सत्य के ही जानने में जीवन लगायौ है।।

वार्ता :- दयानंद जी महाराज का ओखी मठ के महंत रावल जी के साथ वेद और दर्शनों के विषय पर वार्तालाप हुआ करता था। दयानंद की प्रतिभा से रावल जी बहुत ही प्रभावित हुए, आगे क्या होता है?

दोहा :-

ओखी मठ पर जाए कर आसन दिया लगाए।

दयानंद को परख कर महंत रहा समझाए।

चौबोला :-

महंत रहा समझाए शिष्य गर मेरे बन जाओगे।।

लाखों की संपत्ति देखो स्वामी बन जाओगे।।

हो भटकना दूर उम्र भर सेवा करवाओगे।।

बात मेरी पर गौर करो नहीं पीछे पछिताओगे।।

सुनत महंत के वचन। कहे यों कथन।

दयानन्द स्वामी,

दौलत के भूखे भक्त को मिलें न अंतर्यामी।।

बारहमासी :-

पिताजी राजपुरुष मेरे,

धन दौलत की कमी न घर में नौकर बहुतेरे।

लगन मेंरे दिल एक लागी,

इसलिए सब छोड़ बना हूं बाबा बैरागी।

खोज दिन रात करूं भारी,

सत विद्या को जान मोक्ष का बन जाऊं अधिकारी।

वहां सत्संग बहुत कीन्हा,

द्रोण सागर पहुंच चित्त को निर्मल कर दीन्हा।

संत ही सब अजमाए हैं,

विरजानंद को नाम सुनत ही मन हरषाए हैं।

हृदय में प्रेम उमड़ आयो,

मथुरा नगरी जाए गुरु का द्वार खटखटायो।

वार्ता : –दण्डी स्वामी विरजानंद जी व्याकरण एवं वेदादि के उद्भट विद्वान थे । वे प्रज्ञाचक्षु थे। पांच साल की आयु में ही शीतला रोग से उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी। कुशाग्र बुद्धि के धनी विरजानंद की समरण शक्ति इतनी प्रबल थी, कि एक बार सुनकर ही कंठस्थ कर लेते थे। मथुरा नगरी में जाकर दयानंद जी कुटिया का द्वार खटखटाते हैं।

दोहा :-

अन्दर से पूछे गुरु, कौन धाम क्या नाम?

किस कारण आना हुआ, क्या तेरी पहचान?

दयानंद

यही जानने के लिए, आय हूं गुरु पास।

ज्ञान पिपासा की मुझे, लग रही भारी प्यास।।

लामिनी :-

सुनकर ऐसे वचन गुरु को, मन मंदिर हर्षायो है।

बहुत दिनों के बाद हृदय में, प्रेम भाव भरी आयो है।।

तुरंत ही खोले द्वार प्रभु ने, कैसा मिलन कराओ है।

चक्षु हीन श्री विरजानंद थे, रूप नजर नहीं आयौ है।

वार्ता :- विरजानंदजी ने परीक्षा रीति पर दयानंद जी से कुछ प्रश्न पूछे। उत्तर मिलने पर बोले, अब तक तुमने अनार्ष ग्रंथों का अध्ययन किया है। जब तक तक तुम अनार्ष शैली का परित्याग नहीं करोगे, तब तक आर्ष ग्रंथों का महत्त्व और मर्म समझ नहीं पाओगे ।

वीर छन्द :-

क्या-क्या ग्रन्थ पढ़े हैं तुमने वो सब हमें देऊ बतालाए।

सारस्वत सिद्धांत कौमुदी का विवरण दीन्हा समझाए।।

इन्हें त्याग दो मन से अपने, पिछला ज्ञान देऊ विसराए।

अनार्ष ग्रंथों के अध्ययन से बुद्धि भ्रम युक्त है जाए।।

अति उमंग से कहे दयानंद, गुरु चरणों में शीर्ष झुकाए।

जो कुछ आज्ञा होय गुरु की सेवक पालन को तैयार।।

गुरु शिष्य के हृदय मिल गए, कठिन तपस्या का परिणाम।

विरजानंद ने दयानंद को सारे रहस्य दीए समझाए।।

तोड़ :-

मेरी प्रभू ने सुनी पुकार शिष्य बाद भागी आयौ है।

वार्ता :- कहते है दण्डी स्वामी महाराज जी अनार्ष ग्रंथों से इतने चिढ़ते थे कि सिद्धांत कौमुदी के संपादक भट्टोजी दीक्षित के नाम पर शिष्यों से जूता लगवाया करते थे। यह कार्य दयानंद जी से भी करवाया फिर उन्हें शिक्षा दी। दिन ब दिन दयानंद जी की योग्यता और प्रतिभा की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी।

छन्द कवित्त :-

साधू संत मंडली में, विजया के अखाड़ों में,

चारों ओर धूम, दयानंद की ही छाई है।

मथुरा के हाट-पाट, जमुना के घाट-घाट,

तर्क बुद्धि पांडित्य की, चर्चा चलाई है।।

योगी यती बहुत देखे, देखा नहीं ऐसा और,

ब्रह्म तेज चेहरे पर, रहा दमकाई है।

विद्या में निपुण बल-तेज के पुजारी वह,

शीलता और धीरता का सच्चा अनुयाई है।।

फड़ :-

दयानंद की सीरत पर मगन भई मथुरा सारी,

ब्रह्मचर्य की महिमा को सराय रहे नर और नारी।

धन्य धन्य यों कहे, नगर के वासी,

चंदा सौ चमके रुप लगे पूरनमासी।

वार्ता :- स्वामी दयानंद जी महाराज गुरुजी के स्थान के लिए नित्य प्रति यमुना से जल भर कर लाया करते थे। बाजार गलियों में चलते समय उनकी नजर नीचे रहा करती थी। उनकी सादगी की सर्वत्र प्रशंसा होती थी। गुरु शिष्य की हमेशा गूढ़ विषयों पर चर्चा होती रहती थी।

रसिया :-

गुरुवर विरजानंद महाराज एक दिन दयानन्द से बोले।    

वेदों का पथ विसराया, अज्ञान जगत में छाया।

सबके बिगड़ गए व्यवहार, एक दिन दयानन्द से बोले।    गुरुवर..

ईश्वर को बांट लिया है, अपने अनुकूल किया है।

बन गया धर्म-कर्म व्यापार, एक दिन दयानंद से बोले । गुरुवर..

विद्या का नाश हुआ है, बल तेज ह्रास हुआ है।

इससे भारत बना गुलाम, एक दिन दयानंद से बोले। गुरुवर..

हम विश्व गुरु कहलाए, अब सेवक बन शरमाए।

इसका करना है उद्धार, एक दिन दयानंद से बोले। गुरुवर..

वेदों की ज्योति जगाओ, अज्ञान को दूर भगाओ।

सब सुखी बने संसार, एक दिन दयानंद से बोले। गुरुवर..

वार्ता-स्वामी दयानन्द जी ने ढाई वर्ष गुरु विरजानंद जी के पद पद्मों में बैठकर अष्टाध्यायी महाभाष्य वेदांत सूत्र आदि अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया। गुरु सत्संग दयानंद जी के लिए सुवर्ण सुगंधि का योग बन गया। विद्या से भरपूर दयानंद का विचार गुरु आज्ञा लेकर देशाटन

करने का हुआ।

दोहा :-

पूर्ण शिक्षा हुई शिष्य की, गया गुरु के पास।

बिछुड़न के दिन आ गए, मनवा हुआ उदास।।

छन्द :-

थोड़ी सी लेकर लौंग को गुरुदक्षिणा देने लगे।

इसके आलावा कुछ नहीं है यूं विनय करने लगे।।

विरजानंद जी..

वत्स जाओ खुश रहो, कर्तव्य का पालन करो।

इस दीन-हीन परतंत्रता से मुक्त मानव को करो।

मेरी यही गुरुदक्षिणा है बात मानो आज से।

सच्ची कसौटी वेद की जाने न पाए हाथ से।।

तोड़ :-

हरदम रखना प्रभु को यद् धर्म की ज्योति जलना है…….

वार्ता :- दयानंद अगर गुरुदक्षिणा देना है तो सुनो! देश में मतमतान्तरों के कारण कुरीतियां प्रचलित हो गई हैं, उनका निवारण करो । आर्य जनता की बिगड़ी दशा सुधारो । आर्य संतान का उपकार करो । ऋषि शैली प्रचलित करके वैदिक ग्रंथों के पठन-पाठन में लोगों को प्रवृत्तिशील बनाओ, यही गुरु दक्षिणा मुझे दान करो । दयानन्द जी को स्वामी विरजानंद जी ने अंतिम बात कही ‘‘दयानंद स्मरण रखना मनुष्य कृत ग्रंथों में परमात्मा और ऋषि मुनियों की निंदा भरी पड़ी है । परंतु आर्ष ग्रंथों में इस दोष का लेश भी नहीं । इस

कसौटी को हाथ से कभी मत छोड़ना ।’’

दोहा :-

मन में निश्चय कर लिया जीवन दाव लगाए ।

   बिगुल सत्य का बज गया शहर आगरा जाए ।।

राग रागिनी :-

दयानंद वहां आए, प्रथम गीता के रहस्य बताए,

कुंजी वेद ज्ञान की लाए । सत्य की ज्योति जली। टेक

भैरव मंदिर के निकट, ऋषि आसन लगाए दियो।

पंडित सुंदरलाल जी ने, आकर के प्रणाम कियो।।

भक्तों की मण्डली आई, सुनकर वचन रहे हरषाई,

देखा ऐसा नहीं, गुसाई, झूठ की पोल खुली। दयानंद..

बड़े-बड़े दिग्गजों ने मूर्ति पूजा छोद दीन्ही।।

निराकार ईश्वर ही के ध्यान में शरण लीन्ही।।

शहर ग्वालियर आए, पंडित पोप सभी घबड़ाए,

भागवत पाठ में दोष गिनाए, ऋषि की धूम मची।  दयानंद..

पादरी रॉबिन्सन ने, अजमेर में यूं प्रश्न किया।

अपनी ही पुत्री से काहे, ब्रह्मा ने व्यभिचार किया।।

गलत इतिहास बताया, जिसमे मिथ्या दोष लगाया,

लालच देकर ग्रन्थ रचाया, घटना नहीं घटी। दयानंद..

कर्नल ब्रुक के साथ गौ रक्षा पर विचार किया।।

गौ वंश की रक्षा हित, गौ महिमा का प्रचार किया।

गाय जन-जन हितकारी, सुनो भारत के नर और नारी,

जिस पर निश-दिन चले कटारी, छाती जाए फटी। दयानंद..

लामिनी :-

तीन साल के बाद दयानंद फिर मथुरा में आए हैं।

मलमल थान एक स्वर्ण मुद्रा, गुरुसेवा में लाए हैं।।

विजय दुन्दुभी बजी शिष्य की, गुरुवार मन हरषाए हैं।

सिर पर हाथ फेर पुलकित भए, स्वस्ति भव दरशाए हैं।।

वार्ता :- स्वामी विरजानंद जी ने दयानंद जी को अनेक शास्त्रीय रहस्य समझाए । यह भी पता चला कि हरिद्वार में बारह वर्ष बाद, महाकुम्भ का पर्व पड़ा है, उसमें समस्त देश के संत, महात्मा, योगी, यती आने वाले हैं।

छन्द :-

महाकुंभ की खबर सुनी तो, दयानंद मन करे विचार।

आज्ञा पालन करूं गुरु की, नहीं तो जीवन को धिक्कार।।

दोहा :-

कुंभ पर्व हरिद्वार में बहुत संत जन आवे।

कोई तो मिलेगा प्रभु भक्त जो वेद ज्ञान अपनावे।।

चौबोला :-

सत्य ज्ञान अपनाए धर्म की डूबी नाव उबारे।

कैसी दुर्गति भई देश की, इसकी ओर निहारे।।

पाखंडों का करे सफाया, वैदिक नाद पुकारे।

धन्य वही नर जन्म, कौम की बिगड़ी दशा सुधारे।।

गुरु की इच्छा जानी, उसी दम मन में ठानी।

कूंच हरिद्वार किया है।

गंगा तट पर जाए ऋषि ने डेरा डाल दिया है।

वार्ता-हरिद्वार में पाखंड खंडिनी पताका फहराकर, धर्म के नाम पर व्याप्त कुरीतियों का पुरजोर खंडन करना शुरु कर दिया है।

तर्ज लांगुरिया :-

देखो हरिद्वार में जाए, ऋषि ने गंगा उलट दई।।

सप्त स्रोत पर जाय, गाड़ पाखण्ड खण्डिनी दीन्ही।

पौराणिक पोपों के ढोल की पोल खोल दीन्ही।।

प्रतिमा पूजन का खंडन कर धारा पलट दई।। देखो..

पुराण व्यास ने नहीं रचे हैं, वे थे वेद के ज्ञाता।

मिथ्या गन्दी बातों का ये बना पोल खाता।।

ईश्वर इनसे नहीं मिलेगा, बुद्धि नष्ट भई।। देखो..

गंगा में स्नान करे से पाप नहीं छूटेगा।

श्राद्ध का भोजन मरे पितर को कभी नहीं पहुंचेगा।।

पैगम्बर अवतार मसीहा, सबकी खबर लई।। देखो..

भांति-भांति के संत पधारे, लम्बे तिलक लगाए।

इनकी कलि करतूतों ने क्या-क्या  जल बिछाए।।

देश हुआ कमजोर, धर्म की हालत बिगड़ गई।। देखो..

शंखासुर वेदों को ले गया, पंडित कहते थे हर बार।

जो कुछ हमने बता दिया है, वही वेद विद्या का सार।।

वेदों का सन्मार्ग दिखा के युक्ति पलट दई।। देखो..

वार्ता :- आगरा, ग्वालियर, जयपुर, पुष्कर और अजमेर आदि स्थानों में जाकर उन्हें प्रत्यक्ष हो गया था कि पण्डित पुरोहित जन अपने पुरातन पुरुषों के पौरुष को खो चुके हैं। इसलिए हरिद्वार का कुंभ मेला ही उनकी आशा की किरण था। क्योंकि वहां आने वाले साधू संन्यासी लोग घर बार त्यागी, लोभ मोह से दूर, ब्रह्मलीन आत्मज्ञानी, समदृष्टि हैं। यदि वे जागृत

होकर सत्य के सहायक बन जाएं तो आर्य संतान के दुरूख दारिद्र दूर हो जाएं। इसके भाग्य का चन्द्रमा विश्व में चमकने लगेगा। सारा बल लगाने के बाद भी उस महा मेले में उन्हें एक भी ऐसा साधु संत न मिला जो सत्य का साथ देता । स्वामीजी का मन इतना व्यथित हुआ कि उन्होंने पुस्तकें त्यागकर तन पर राख रमा ली, कौपीन मात्र धारी मौनावलम्बी बन गए। और क्या-क्या सोचने लगे।

वीर छन्द :-

महाकुंभ की देख दुर्दशा, दयानंद मन करे विचार।

भांति-भांति के मत पंथों ने, आर्य जाति का किया विनाश।।

स्वाभिमान मिट्टी में मिल गया, कायर, वीरों की संतान।

साधु संत और वैरागी, मस्ती में दिन रहे बिताए।।

प्रभु नाम का मिला आसरा, मौज -मजे का है व्यापार।

गांजा, भांग और चरस का, हरदम रहता भूत सवार।।

मन मंदिर का दर्पण मैला, घोर अविद्या का अंधकार।

सत्य ज्ञान के बने विरोधी, पाखंडों की है भरमार।।

घोर निराशा हुई ऋषि को, मन का कमल गया मुरझाए।

इतने बड़े संत मेला में, कोई नहीं मिला सत्य अवतार।।

मेरी बात सुने ना कोई, क्यों जीवन को रहा खपाए।

मौन साध लिया दयानंद ने, मन की ज्वाला दई दबाए।।

इससे तो अच्छा प्रभु नाम की, माला जपूं शिखर पर जाए।

अंत समय पर हिम खण्डों में, अपने प्राण देऊं बिसराए।।

भागीरथी की कल-कल प्यारी, ऋषि को रह रही बतलाए।

गति निरंतर शुभ कर्मों की, इससे होए विश्व कल्याण।।

वार्ता :- जिस महात्मा ने ‘‘मौनात्सत्यं विशिष्यते’’ अर्थात चुप्पी साधने से सत्य बोलना उत्तम है यह पाठ पढ़ा हो वह कब तक मौन रह सकता है? हरिद्वार में एक दिन स्वामी जी की कुटिया पर एक मनुष्य ने ‘‘निगम कल्पतरोर्गलितं फलम्’’ वेद से भगवत उत्तम है उच्चारण किया। यह वाक्य सुनते ही उन्होंने मौन व्रत तोड़ दिया और लगे भगवत का खंडन करने। अब स्वामी जी प्रबल वेग से मतमतान्तरों का खंडन करने लगे। चहुँ ओर उनके तर्क बाणों की वर्षा होने लगी ।

रसिया ताल :-

वेद ज्ञान की देखों, मुरलिया बाज रही।। टेक

शूर वीर दिग्गज महा पंडित, उनके मत को कीन्हा खंडित,

ओेम् की ज्योति जगाए। मुरलिया..

कई बार विष अमृत कीन्हा, क्षमा दान सबको दे दीन्हा,

दयावान गुणधाम। मुरलिया..

पाखंडों का जाल बिछा था, उसे तोड़ना बड़ा कठिन था,

तर्क दिए आसान। मुरलिया..

अंधकार में देश सो रहा, आर्य जाति का पतन हो रहा,

उसको दिया जगाए। मुरलिया..

अवतारों की धूम मची थी, जिनके दम पर कौम बटी थी,

ईश्वर एक महान। मुरलिया..

वार्ता :- दयानंद जी महाराज फर्रुखाबाद, सोरोघाट, रामघाट, राजघाट, बैलोन में प्रचार करते अनूपशहर पधारे। प. इन्द्रमन जी उनके परम भक्त बन गए, खंडन के कारण स्वामी जी पर अनेक प्राणलेवा हमले होते रहते थे। एक दिन इन्द्रमन कहने लगे।

दोहा :-

इन्द्रमन कहने लगे तुम अवधूत महान।

खंडन-मंडान के झगड़े में क्यों पड़ते श्रीमान ?।।

कवित्त :-

पाखंड कुरीतियों के जाल में फंसा है देश,

चारों ओर अविद्या रूपी अन्धकार छायो है।

शूरवीर रणवीर सब ही गुलाम बने,

ब्राह्मणों का ज्ञान कुछ काम नहीं आयौ है।।

आपस की फूट से विदेशी सरताज बने,

दीन-हीन भारत का दुखड़ा सुनायो है।

देश के सुधारने की गुरु से प्रतिज्ञा किन्ही,

वेद का ही ज्ञान मैंने सबको बतायो है।।

चौकझड़ :-

भारत की शान निराली, इस पर पड़ गई छाया काली।

गौ वंश की है बदहाली, इनकी कौन करे रखवाली।।

धर्म की काट रहे हम डाली, उपवन उजड़ गया बिन माली।

वेद माता की करो बहाली, चमन में फिर आए खुशहाली।

दयानंद का वचन, सत्य का कथन, सुनके चितलाई।

जिसने भी मानी सीख-बनौ सुखदाई।

वार्ता :- राजपूतों की भूमि कर्णवास में आकर महाराज ने कुरीतियों का खंडन कर गायत्री   महिमा पर उपदेश देना आरंभ कर दिया।

चौकझड़ :-

स्वामी कार्णवास में आए, नगर के ठाकुर अति हरषाए।

जाकर सबने शीष झुकाए, संत ने वैदिक वचन सुनाए।।

बारहमासी :-

वहां एक हंसा ठकुरानी,

नब्बे वर्ष की उम्र नगर की जानी पहिचानी।

सभी करते आदर भारी,

कई गांव की स्वामिन बनकर करती सरदारी।

ऋषि के दर्शन को आई,

भूमि पर धर शीश प्रेम मन मंदिर हरषाई।

भक्त का भाव जान लियो,

गायत्री उपदेश ऋषि ने माता को दियो।

वहां एक हिरा वल्लभ था,

शास्त्रार्थ निपुण दर्शनों का वह पंडित था।

द्वंद्व छः दिन तक था जारी,

हुई ऋषि की विजय सत्य का पक्ष पड़ा भारी।

धन्य नर नारी बोल रहे,

है निराकार भगवान मूर्ति जल में फेंक रहे।

नगर में कोलाहल भारी,

रास मंडली की जोरों से होने लगी त्यारी।

कर्णसिंह कर्णवास आए।

रास देखने दयानंद को न्योता भिजवाए।

वार्ता :- बरौनी के राव कर्णसिंह की कर्णवास में ससुराल थी। वहां उन्होंने रास रचवाया। जिसे देखने के लिए दयानंद जी बुलाने कुछ लोगों को भेजा। इस पर स्वामी जी ने कहा कि महापुरुषों का स्वांग भरना मनुस्मृति में दोष वर्णन है। इस निन्दनीय कार्य में हम कदापि नहीं जायेंगे। लौटकर उन्होंने नमक मिर्च लगाकर कर्णसिंह को स्वामीजी के प्रति भड़काया।

दोहा :-

कर्णसिंह से जा कही स्वामी जी की बात।

सच्चे कडुवे बोल से क्रोध भर गया गात।

वीर छन्द :-

क्रोधित होकर पहुंचे कर्णसिंह स्वामी दयानन्द के द्वार।।

दयानंद उपदेश दे रहे लगा हुआ उनका दरबार।

पास पहुंचकर स्वामी जी को, कर्णसिंह दीन्ही ललकार।।

हमने बुलाया क्यों नहीं आए, क्या अपने को रहे जताए।

कितना घमंड तुमको छाया है, वह मिट्टी में देऊ मिलाए।

कर्णसिंह की देख दशा को, दयानंद दीन्ही फटकार।

महापुरुषों का स्वांग रचाते, ऐसे जीवन को धिक्कार।।

रास-रंग की इस मस्ती ने, देश को दिया गुलाम बनाए।।

छात्र धर्म मर्यादा घट गई, धीर-वीरता दई नशाए।।

कर्णसिंह :-

मैं चेला हूं रंगाचार्य का, साधु सुनले कान लगाए।

ज्यादा जो बकवास करोगे, कर्णवास से देऊ भगाए।।

संयम बिगड़ा कर्णसिंह का, ऋषिवर ने दीन्ही हुंकार।

शस्त्र चलाने की इच्छा हो, जाए लड़ो जयपुर दरबार।।

शास्त्रार्थ गर करना चाहो, रंगाचार्य को लेऊ बुलाए।

उठा विवाद श्री के ऊपर जो मस्तक पर रही दिखाए।।

आग बबूला कर्णसिंह भए, नंगी ली तलवार उठाए ।

बुद्धि भ्रष्ट भाई ठाकुर की, संन्यासी पर दई चलाए।।

वार्ता :- स्वामी दयानंदजी ने संन्यास धर्म का पालन करते हुए, हिंसा का जवाब अहिंसा से किस प्रकार दिया?

कवित्त :-

आतताई जान के कलाई ऋषि थम लीन्ही ।

हाथ से खडग राव महाशय का छीन लियो।।

भूमि पर दबाय उसे तपोबल से तोड़ दी।

टुकड़ा उठायकर दूर-दूर फैक दियो।।

लामिनी :-

ऋषि की देख साधना, राव जी गए घबड़ाए।

लालिमा फीकी पड़ गई, चेहरा गया मुरझाए।।

तुरत ही बैरंग लौटे, गैरत रही दिल पर छाए।

श्रेष्ठ जन निंदा कर रहे, आपस में रहे बतियाए।।

वार्ता :- जिस समय यह घोर घटना घटित हुई उस समय स्वामी जी के पास अन्य संभ्रांत लोगों ने राव महाशय पर अभियोग चलाने की चर्चा की।

तोड़ :-

कर्णसिंह बहुत बुरा किया।

उन पर अभियोग चलाने का प्रस्ताव पास किया।

देखो संन्यासी का धर्म नहीं अभियोग चलाने का।।

चौक रसिया :-

महिमा कहाँ तक करूं बखान।

ऋषि ने कैसी धूम मचाई।

विशुद्धानंद और कृष्णानंद जी शास्त्रार्थ में हार गए।

पंडित राम नारायण जी, फिर अंगद जी के पास गए ।।

अंगद शास्त्री हर मान कर ऋषि को करे प्रणाम।। ऋषि ने..

कन्ठी तोड गले की डाली, प्रतिमा दी जल में दई बहाए ।

सत्य वचन है दयानंद का, शंका रही हृदय में नाए ।।

संत मंडली को सोरों में, दिया वेद का ज्ञान।। ऋषि ने..

कासगंज में जाए ऋषि ने, शिक्षा का उद्धार किया ।

पंडित सुखानंद जी को वहां, अध्यापक का भार दिया ।।

गुरु मरण का सुना संदेशा, तड़फे उनके प्रान।। ऋषि ने..

चिंता न कीन्ही मात-पिता की गुरु की याद सताई है ।

चित्त चन्द्रमा पर राहू की, काली छाया छाई है ।।

सूरज डूब गया वि।ा का, मन में दुरूख महान।। ऋषि ने..

वार्ता :- गुरुवार विरजानंद जी की मृत्यु का जैसे समाचार दयानंद जी महाराज ने सुना, अनायास ही उनके मुख से ये शब्द निकले कि ‘‘आज व्याकरण का सूर्य अस्त हो गया।’’ उन्ही दिनों वै। रामदयाल जी चौबे स्वामी जी से मिलने आए और कहा कि ग्वालियर का एक पंडित मुझे कचुरा में मिला कहता था कि मेरे पास कालीदास रचित संजीवनी नाम की पुस्तक है। जिसमे लिखा है कि महाभारत में ग्यारह हजार श्लोक है। और दस पुराणों की विद्यमानता स्वीकार की गई है। जबकि इस समय महाभारत की श्लोक संख्या एक लाख से ज्यादा और पुराण अठारह या चौबीस तक हैं। स्वामी सोरों पहुंचकर प्रचार कार्य में तत्पर होते हैं।

र.हा.-

सोरों पहुंच गए महाराज,

वहां पण्डों पर गिर गई गाज,

कैसे बचे हमारी लाज ऋषि के फंदे से।

कपट कुचाली पंडितों ने मिल विचार किया।

कैसे-कैसे हथकंडों से दयानंद पर वार किया।।

दुष्ट जन उनसे सबही हारे,

गर्दन झुकी शर्म के मारे,

दिन में देखन लगे सितारे। ऋषि के..

हीरा वल्लभ अम्बादत जी समर भूमि से भाग गए।

हलधर जी ओझा ने आकर अपने झंडे गाड़ दीए।।

हार ओझा की हुई मढ़ी पर,

मूर्छित होकर गिरा जमीं पर,

न ऐसी देखि हर कहीं पर। ऋषि के..

वार्ता :- ’’भगवत चर्चा में स्वामीजी बताया कि सन १६०० ई. के लगभग बंगाल प्रान्त के मक्सूदाबाद परगणे के शक्तिपुर ग्राम के निवासी बोपदेव और जयदेव भाइयों ने भागवत पुराण की रचना की है। लोग व्यास के नाम से प्रचारित करते हैं जो मिथ्या है । दयानंद जी महाराज सोरों से कानपूर पहुँचते हैं।

कवित्त :-

कानपूर जाए ऋषि गंग के किनारे देखो,

भैरव घाट पहुंचकर आसन लगाए दियो।

वैदिक आठ सत्यों का विज्ञापन छ्पायकर,

गली-गली दूर-दूर शहर में लगाए दियो।

सत्य का प्रचार देख पोप लोग डर गए,

ऋषि के उखाड़ने का सबने विचार कियो।

बातों के विवाद में दयानंद हार गयो,

चारों ओर झूठ का ही, जोरों से प्रचार कियो।

वार्ता :- पंडितों के इस असत्य व्यवहार से कानपूर के कलेक्टर थेन महाशय को बड़ा कष्ट हुआ क्योंकि वे शास्त्रार्थ समर के मध्यस्थ थे। शास्त्रार्थ लक्ष्मण शास्त्री और हलकर ओझा के साथ हुआ था।

तोड़ :-

कलक्टर थेन महाशय, मन में रहे अकुलाए।

झूठ की पोल खोल दी, विज्ञापन दिए बढवाए।।

वार्ता :- स्वामी जी के साथ विशेषकर शास्त्रार्थ मूर्ति पूजा पर ही होता था। महाराज चार वेद, चार उपवेद, छः शास्त्र उपांग, दस उपनिषद, कात्यायन सूत्र, योगभाष्य, मनुस्मृति और महाभारत को प्रमाणिक ग्रन्थ मानते थे। कानपूर में श्री हृदय नारायण जी ने स्वामी जी का जी भरकर सत्कार किया। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से चंद्रमा प्रकाशित होता है उसी प्रकार स्वामी जी की विद्या से हृदय नारायण जी का हृदय प्रकाशित हुआ। कानपूर से स्वामी जी अनेक स्थानों पर विचरण करते कशी पहुंचे।

                     (काशी खंड)

अश्विन वदी प्रतिपदा संवत १९२६ को स्वामी जी काशी में जाकर गंगा की रेती में विश्राम करने लगे। शिव सही जिसने वाल्मिक रामायण पर अशुद्ध टिप्पणी लिखी स्वामी जी के भय से काशी नरेश के पास छिपकर रहने लगा। स्वामी जी ने इसी ओर कूंच किया।

बहर तबील :-

काशी नगरी का महात्म्य प्राचीन है,

ज्ञान गंगा का विस्तार यहां से हुआ।

सभ्यता संस्कृति की प्रचारक यही,

ईश महिमा का गुण ज्ञान यहां पर हुआ।

देश-परदेश में इसकी ख्याति रही,

वेद ज्योति का भू पर उजाला हुआ।

विद्वत्ता में जमी धाक चहुं ओर थी,

रीति-नीति का व्यवहार यहां से हुआ।

तोड़ :-

दीन्ही काशी में ललकार,

होश पंडों के उड़ गए हैं-होश..

वार्ता :- संवत १९२६ काशी के आनंद उद्यान में तीन सौ पंडितों ने शास्त्रार्थ समर में स्वामी दयानंद को पछाड़ने का संकल्प लिया। साथ में काशी नरेश भी पंडित मंडली के साथ थे। पं. ज्योति स्वरूप जी और श्री जवाहर दास जी स्वामी जी के साथ व्यवस्था में सहायक थे।

कव्वाली राग होलिका :-

पौराणिक मत के झुण्ड में देख खड़ा था ऋषि अकेला।

घंटा और घड़ियाल बज रहे,

बम-बम भोले शंख बज रहे,

काशी के बाजार में। देख खडा..

भांति-भांति के संत पधारे,

ऐसे भी जो पहिले हारे

फंस बैठे तकरार में। देख खडा..

लम्बे चौड़े तिलक लगावे,

अपना अपना ज्ञान बतावे,

जो फसे भंवर के जाल में। देख खडा..

तीन सौ पंडित एक तरफ थे,

काशी पति भी उसी तरफ थे,

पंथाई पंडाल में। देख खडा..   

धर्माधर्म मूर्ति पूजा पर,

इतिहास पुराण कल्म संज्ञा पर,

उलझे थे वाद-विवाद में। देख खडा..

दयानंद की जीत हुई थी,

मत पंथों की हर हुई थी,

जो पड़े कपट जंजाल में। देख खडा..

वार्ता –कार्तिक सुदी द्वादशी मंगलवार के दिन प्रातः काल से ही विचित्र हलचल मच गई । विश्वनाथ दुर्गा आदि मंदिरों की प्रार्थनाएं, न्याय की पंक्तियां व्याकरण की भाषा, वेदांत की कोटियां और चातुर्य की अनेक चले भी स्वामी दयानंद के सामने व्यर्थ साबित हुईं।

चौक :-

झूठ का सहारा लेके कपट जाल बुनने लगे,

हार ही को जीत मान खुशियां मनाने लगे।

दुर्व्यवहार दुर्वचन बोल-बोल थक गए,

ईट पत्थर गोबर की बरसात करने लगे ।

वार्ता :- पंडित ईश्वररीसिंह निर्मल संत वेदांत के एक विद्वान काशी में रहते थे। जब उनहोंने देखा कि पंडितों की हार  होने के बाद भी अपनी जीत का जयजयकार कर रहे हैं, तो उन्होंने सोचा महा निरादर, घोर अपमान से, विपरीत नीति, निष्ठुर अन्याय से अगर दयानंद का चित्त

विचलित नहीं हुआ होगा तो वह एक सच्चा ब्रह्मज्ञानी और पहुंचा हुआ महात्मा है। और वे महाराज दयानंद की परीक्षा करके कहते हैं।

चौबोला :-

पंडित इश्वरीसिंह निर्मले ज्ञानी संत कहाते।

दयानंद की धैर्य परीक्षा की वे कथा सुनाते।।

तर्ज बारहमासी :-

दयानंद ईश्वर विश्वासी।

धर्मादि गुणों की खान, जगत में पावन संन्यासी।।

लोक निंदा का त्याग किया।

सत्य का दीप जलाने का, संकल्प ठान लिया।।

छटा मुख मंडल पर छाई।

इतने बड़े हादसे की नहीं लीक नजर आई।।

हृदय में साहस था भारी।

वे वीतराग श्री सिद्धि पुरुष हैं जग में बलिहारी।।

ज्ञान से जीत गई काशी ।

धर्मादी गुणों की खान जगत में पावन संन्यासी ।।

तोड़ :-

दीन्ही काशी में ललकार, होश पंडों के उड़ गए हैं। होश..

वार्ता :- संवत १९२६ काशी के आनन्द उद्यान में तीनसौ पंडितों ने शास्त्रार्थ समर में स्वामी दयानन्द को पछाड़ने का संकल्प लिया। काशी नरेश भी पंड़ित मण्डली के साथ थे। पंडित ज्योतिस्वरूप जी और श्री जवाहरदास जी स्वामी जी के साथ व्यवस्था में सहायक थे।

कव्वाली राग होलिका :-

पौराणिक मत के झुण्ड में, देख खड़ा था ऋषि अकेला।

घण्टा और घड़ियाल बज रहे,

बम-बम भोले शंख बज रहे,

काशी के बाजार में। देख खड़ा..

भांति-भांति के सन्त पधारे,

ऐसे भी जो पहले हारे,

फंस बैठे तकरार में। देख खड़ा..

लम्बे-चौड़े तिलक लगावे,

अपना-अपना ज्ञान बतावे,

जो फंसे भंवर के जाल में। देख खड़ा..

तीनसौं पण्डित एक तरफ थे,

काशीपति भी उसी तरफ थे,

पन्थाई पण्डाल में। देख खड़ा..

धर्माधर्म मूर्तिपूजा पर,

इतिहास पुराण कल्मसंज्ञा पर,

उलझे थे वाद-विवाद में। देख खड़ा..

दयानन्द की जीत हुई थी,

मतपन्थों की हार हुई थी,

जो पड़े कपट-जंजाल में। देख खड़ा..

वार्ता :- कार्तिक सुदि द्वादशी मंगलवार के दिन प्रातःकाल से ही विचित्र हलचल मच गई। विश्वनाथ दुर्गा आदि मन्दिरों की प्रार्थनाएँ, न्याय की पंक्तियाँ, व्याकरण की भाषा, वेदान्त की कोटियाँ और चातुर्य की अनेक चालें भी स्वामी दयानन्द के सामने व्यर्थ साबित हुईं।

चौक :-

झूठ का सहारा लेके कपट-जाल बुनने लगे,

हार ही को जीत मान खुशियाँ मनाने लगे।

दुर्व्यवहार-दुर्वचन बोल-बोल थक गए,

ईंट पत्थर गोबर की बरसात करने लगे।

वार्ता :- पण्डित ईश्वरीसिंह निर्मले सन्त वेदान्त के एक विद्वान काशी में रहते थे। जब उन्होंने देखा की पण्डितों के हार होने के बाद भी अपनी जीत का जयजयकार कर रहे हैं, तो उन्होंने सोचा महा निरादर घोर अपमान से, विपरीत नीति, निष्ठुर अन्याय से अगर दयानन्द का चित्त विचलित नहीं हुआ होगा तो वह एक सच्चा ब्रह्मज्ञानी और पहुँचा हुआ महात्मा है। और वे महाराज दयानन्द की परीक्षा करके कहते हैं..

चौबोला :-

पण्डित ईश्वरीसिंह निर्मले ज्ञानी संत कहाते।

दयानन्द की धैर्य परीक्षा की वे कथा सुनाते।।

तर्ज बारहमासी :-

दयानन्द ईश्वरविश्वासी।

धार्मादि गुणों की खान, जगत में पावन संन्यासी।।

लोकनिन्दा का त्याग किया।

सत्य का दीप जलाने का, संकल्प ठान लिया।।

छटा मुख मण्डल पर छाई।

इतने बड़े हादसे की, नहीं लीक नज़र आई।।

हृदय में साहस था भारी।

वे वीतराग श्री सिद्धिपुरुष हैं, जग में बलिहारी।।

ज्ञान से जीत लई काशी।

धर्मादि गुणों की खान, जगत में पावन संन्यासी।।

तोड़ :-

दीन्ही काशी में ललकार, होश पण्डों के उड़ गए हैं। होश..

वार्ता :- काशी शास्त्रार्थ में दयानंद की विजय वैजयंती का समाचार प्रत्नकमर नंदिनी, रुहेल खंड समाचार और ज्ञान प्रदायिनी पत्रिकाओं में छपा हुआ है। अब पौराणिक मत की राजधानी काशी को फतह कर स्वामी जी ने प्रयाग के लिए कूच कर दिया।

बहर तबील :-

जिसने जीवन दिया लोक हित के लिए,

उस ऋषि को हलाहल पिलाया गया।

ईंट पत्थर की बोछार उन पर हुई,

रात्रि निद्रा में उनको सताया गया। (१)

घोर पाखंड के जाल में देश था,

और गुलामी के बन्धन में जकड़ा हुआ था।

ज्ञान ज्योति से घर-घर को रौशन किया,

हर बसेरे से उसको हटाया गया। (२)

वार्ता :- लोक कल्याण के क्या-क्या कष्ट सहे ऋषि दयानंद उपकारों के बोझ हमें चुकाना है।

बहर तबील :-

मृत प्राय भारत को जीवन दिया,

जड़ अधर्म की काटी बड़े यत्न से।

दुष्ट वचनों से अपमान पल-पल सहा,

गंग धारा में उनको डुबाया गया। (३)

दीन दुःखयों का ऐसा मसीहा बना,

वैसा अब तक जहां में न कोई हुआ।

सम विचारों का जयघोष उसने दिया,

उसका बदला न हमसे चुकाया गया। (४)

एक अबला की घटना घटी देखकर,

अश्रु आँखों से बहने लगे गंग पर।

जिसके हृदय में करुणा का सागर बहे,

उस महात्मा को पग-पग सताया गया। (५)

वार्ता :-एक दिन स्वामी जी महाराज गंगा के तट पर बैठे प्रकृति के सौंदर्य को निहार रहे थे कि एक स्त्री अपने मृत बच्चे को गोद में लिए गंगा तट पर आकर बच्चे के कलेवर को तो गंगा में बहा देती है, परंतु कफ़न जो साड़ी फाड़कर बनाया था उसे अपने साथ ले जाती है। इस घटना को देखकर स्वामी जी का दिल दहल गया।

बहर तबील :-

तन के टुकड़े को माँ ने दिया सौप जल,

पर कफ़न को न पहना सकी थी उसे।

जीर्ण साड़ी का टुकड़ा गई साथ ले,

ऐसी घटना ने बनाया व्याकुल उसे।

बहिन चाचा की मृत्यु पर रोया नहीं,

पिता-माता ने निष्ठुर बताया उसे।

सुख सुविधा से संपन्न गृह त्यागते,

कोई बंधन नहीं बांध पाया उसे।

वार्ता :- दीन दुखी और अबलाओं के प्रति स्वामी जी महाराज हमेशा चिन्तित रहा करते थे । सच्चे प्रभु भक्त की यही निशानी है। स्वामी महाराज वेद का डंका बजाते हुए कासगंज की ओर चलते हैं।

वीर छंद :-

काशी और प्रयाग घूमकर कासगंज कीन्हा प्रस्थान।

वैदिक शाला चलें किस तरह, मन में था ये लक्ष्य महान।।

सोरों घाट पर धूम मचा के, राम घाट पहुंचे महाराज।

नगर-नगर और डगर-डगर में, गूंजे स्वामी की आवाज।।

साठ गाँव थे रजपूतों के छलेसर पहुंच गए श्रीमान।

ठाकुर मुकुन्दसिंह ने उनका, जी भर के कीन्हा सम्मान।।

गायत्री संध्या वंदन की,युक्ति दी सबको समझाए।

ज्ञान की ज्योति जगी मन मंदिर, प्रतिमा जल में दई बहाए।

रमता जोगी बहता पानी, इनके रुके कींच है जाए।।

चैत्र सुदी राम नवमी को, पूर्व दिशि कीन्हा प्रस्थान।

जमालपुर मुंगेर विचरते, भागलपुर पहुंचे श्रीमान।।

गंग किनारे भागलपुर में, मेला का सुनिए अहवाल।

कन्याओं का दान ले रहे, पण्डे हो रहे मालामाल।।

देख दुर्दशा आर्य जाती की, व्याकुल भाए ऋषि उस रात।

खानपान सब नींद बिसर गई, चिन्तित मन पल-पल अकुलात।।

वार्ता :- अनेक स्थानों पर वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए स्वामी जी बिहार से बंग प्रदेश की ओर गए। पटना में एक दिन एक मैथिली ब्राह्मण ने श्री महाराज से कहा-७आप भागवत का व्यर्थ खंडन करते हो, उसमें अठारह हजार श्लोक हैं। आज तक किसी की सामर्थ्य नहीं हुई जो ऐसे श्लोकों की रचना कर सके। स्वामी जी ने हंसकर कहा कि हम ऐसे अड़तीस हजार कल्पित श्लोक बना सकते हैं। तत्काल दस श्लोक बनाकर दिए। जिससे वह ब्राह्मण चकित हो गया। स्वामीजी कलकत्ता शहर पहुंचकर प्रचार कार्य में लग जाते हैं।

दोहा :-

कलकत्ता में जिस समय पहुंचे थे श्रीमान।

ब्रह्म समाज का शहर में होता था गुणगान।।

हेमचंद चक्रवर्ती ठाकुर प्रसन्न कुमार।

स्वामी जी की भक्ति में श्रद्धा विपुल अपार।।

तोड :-

ईश्वरचंद विद्यासागर जी मिलने को आते थे।

बाबू केशवचंद धर्म की चर्चा चलाते थे।।

वार्ता :- महाराज अति सरल शैली में संस्कृत भाषा में व्याख्यान दिया करते थे। पश्चिमी ज्ञान में पारंगत ब्रह्म समाज के लोग स्वामी जी के तर्क से, युक्तियों से, द्रष्टांतों और प्रमाणों से परमहंस के वैज्ञानिक, आत्मिक बल को जानकर आश्चर्य करने लगे। तीन माह तक कलकत्ता निवासियों को अमृत पान कराके पटना, बनारस, इलाहबाद, फर्रुखाबाद, अलीगढ होते हुए मथुरा नगरी पहुँचते हैं।

शेर :-

गोउ हत्या बंदी होए, लाट कार्सन से मिलते थे।

सर सैयद अहमद खान, ऋषि से बहस रोज करते थे।।

ाग धमाल :-

मथुरा पंहुच जाए महाराज, नींद पंडों की उड़ गई है। टेक मथुरा..

फाल्गुन सुद एकादश का दिन,

मलूकदास का राधा उपवन ।

जाए ऋषि ने डेरा डाला,

उड़ गए होश देखकर ज्वाला   

कंठी तिलक मूर्ति पूजा की पोल खोल दई है। मथुरा..

काशी से संदेश पंहुच गए,

रंगाचार्य के होश उड़ गए ।

शास्त्र समर से खुद को बचाया,

बीमारी का ढोंग रचाया ।

कैसे भगाए दयानंद को चिंता बढ गई है । मथुरा..

सब मिल बैठ मशवरा कीन्हा,

कपट कुचल सहारा लीन्हा ।

दुराचारिणी एक महिला को,

लालच दीन्हा उस अबला को ।

दयानंद के पास कहो, मेरी इज्जत लुट गई है । मथुरा..

त्रिया चली चरित्र दिखाने,

ब्रह्मचारी का मन घटाने ।

ध्यानागत स्वामी को पाया,

तेज देख माथा चकराया ।

कापें गात पाप के भय से उसकी घिग्घी बांध गई है । मथुरा..

नैनन बहे अश्रु की धारा,

रोए-रोए यूं वचन उचारा ।

रंगाचार्य ने जाल बिछाया,

लालच ने मुझको बहकाया ।

भगवन क्षमा मुझे कर दीजे, मेरी आखें खुल गई हैं । मथुरा..

वार्ता :-स्वामी को बदनाम करने के लिए पाखंडियों ने कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए। श्री महाराज के दर्शन मात्र से एक दुराचारिणी महिला का उद्धार हो गया। बाल ब्रह्मचारी दयानंद जी के रूप का वर्णन सुनिए, कैसी है उनकी सूरत और सीरत?

लामिनी चौक :-

सुंदर रूप मोहिनी शक्ति नेत्र विशाल कमल मुख जैसा।

उन्नत नक् भौंह अति सुंदर, विकसित भाल चंद्रमा जैसा।।

बलिष्ठ सुडौल गात था उनका, कदली स्तंभ भांति जंघा थी।।

करुणा वर्ण नख शोभा देते, तप्त ताम्र की प्रतिमा थी।

अंग-प्रत्यंग रूप अति मोहक, मुख पर तेजस्विनी घटा थी।।

कोमल हृदय सिंह गर्जना, दुर्मति दानव डरते थे।

वाणी से माधुर्य छलकता, सज्जन गद-गद होते थे।।

वार्ता :- मथुरा वृन्दावन में अपनी धवल कीर्ति की पताका फहराने के बाद स्वामी पुनः काशी नगरी के लिए प्रस्थान करते हैं। प्रयाग में कुछ दिन रूककर धर्म प्रचार करते हैं।

दोहा :-

इलाहबाद में चल रहा, एक दिन वाद-विवाद।

काशीनाथ शास्त्री कही, अंधकार वश बात।।

तर्ज राधेश्याम :-

सारे भारत वर्ष में, क्यों इधर-उधर फिरते हो।

किस प्रयोजन के लिए, तुम कोलाहल करते हो।।

वार्ता :- स्वामी जी कितना सुन्दर उत्तर देते हैं?

तर्ज बारहमासी :-

देश की दशा बिगड़ गई है,

महाभारत के बाद धर्म की गरिमा घट गई है।

घटा अधर्म की छाई है,

मत-पंथों की वजह हृदय में कटुता आई है।

वेद का पढना छूट गया,

सच्चिदानंद स्वरूप से देखो नाता टूट गया।

समय कैसा दुःख दाई है,

प्रतिमा पूजन से बुद्धि में जड़ता आई है।

झूठ का व्रत सबने लीन्हा,

सत्यासत्य जानने का संकल्प छोड़ दीन्हा।

रात दिन चिन्तित रहता हूं,

रक्षा हेतु धर्म की मैं कोलाहल करता हूं।

वार्ता :- प्रयाग में गंगा के तट पर एक वयोवृद्ध महात्मा रहते थे, वे दयानंद महाराज जी को बच्चा कहकर पुकारा करते थे। एक दिन दयानंद से क्या कहते हैं?

कवित्त :-

गंगा तट घाट पर, वयो वृद्ध महात्मा ने,

एक बार स्वामीजी को वचन सुनायौ है।

निवृत्ति मार्ग छोड़कर, लोक कल्याण हित,

ब्रह्म लीन मुक्ति का, अवसर गवायो है।

बोले ऋषि मुक्ति की, इच्छा अब जाती रही,

देख दशा भारती, मन अकुलायो है।

दीन हीन कमजोर, दुरूखी दुःख भोग रहे,

उनके उद्धार में, परम सुख पायौ है।

वार्ता :- श्री महाराज को बम्बई वालों के अनेक पत्र उन्हें बुलाने के मिला करते थे। स्वामी जी ने बम्बई जाने का निश्चय कर लिया और वे नासिक होकर मुंबई आ जाते हैं।

वीर छन्द :-

संवत उन्नीससौ इकतीस को, जब द्वादश अश्विनी मास।

प्रयाग,जबलपुर,नासिक होकर मुंबई पहुंच गए महाराज।।

वालकेश्वर में जाकर ठहरे, सेवा करते सेवक लाल।

मत-पंथों का खंडन कीन्हा, सारा शहर गया दह्लाए।।

जीवन जी गोस्वामी रहता, धूर्त मंडली का सरदार।

किस विधि हनन होय स्वामी का, करता हरदम यही विचार।।

सेवक एक बलदेव ऋषि का, जो लालच में लिया फसाए।

जहर मिठाई उसको दीन्ही, रुपया ठहरा एक हजार।।

कान भनक स्वामी के पड़ गई और बलदेव को लिया बुलाए।

सेवक थर-थर कांपन लागा, दयानंद दीन्ही फटकार।।

जिसकी रक्षा ईश्वर करता, उसको मार न सका कोय।

पासा पलट जाए दुश्मन के, उसको बाल न बाका होय।।

कृष्णाराम जी इच्छाराम को, लेखन कार्य दिया समझाए।

विद्या पढ़ते लेखन करते, मन में श्रद्धा रही समाए।।

वेदान्त ज्ञान की पोल खुल गई, सुन सुन तर्कों की बौछार।

ब्रहमचारी बाबा बलदेव थे, शारीरिक बल के भंडार।।

प्रतिमा पूजन उचित कर्म नहीं, स्वामी जी देते समझाए।

बहुत से समझदार लोगों ने प्रतिमा जल में दई बहाए।।

वार्ता :- मुंबई में वल्लभ मत और स्वामी नारायण मत का प्रबल युक्तियों से खंडन किया, इससे प्रभावित कुछ सज्जन लोग स्वामी के पास आकर विनय करने लगे कि कार्य को आगे बढ़ाने के लिए एक सत्संग मंडल बनना चाहिए। उनके नाम करण का स्वामी से निवेदन किया।

छंद :-

श्रेष्ठ जन आकर कहें, एक संघ बनना चाहिए।

क्या नाम हो उस संघ का, ऋषि को बताना चाहिए।।

नयनो को अपने बंदकर, महाराज चिंतन में लगे।

नाम आर्य समाज उत्तम, सोचकर कहने लगे।।

न हो सकी स्थापना, ऋषिराज सूरत जा चुके।

संस्कार विधि लिखवा रहे, सत्यार्थ प्रकाश लिखवा चुके।।

वार्ता :- मुबई से स्वामी सूरत शहर पधारे वहां रेल्वे स्टेशन पर महाराज का स्वागत समारोह हुआ । स्वामी जी रायबहादुर जगजीवनदास खोसलदास के आवास में ठहरे। भक्तों की मण्डली श्री दर्शनों को आने लगी।

बाबा मोहनलाल ब्रह्मचारी, पास ऋषि के आते हैं।

भक्ति भाव से ऋषि चरणों में, श्रद्धा सुमन चढाते हैं।।

व्याख्यान के बाद नगर में, कोलाहल मच जाता है।

पत्थर ईट बरसते उन पर, हुल्लड़ तक हो जाता है।।

शांति स्वभाव धैर्य की मूर्ति, लक्ष न अपना छोड़ा है।

सूरत से चल दिये दयानंद, भरूच से नाता जोड़ा है।।

जेठालाल वकील एक दिन पास ऋषि के आते हैं।

श्रद्धा युक्त प्रेम भक्ति से, मीठे वचन सुनाते हैं।।

वार्ता :- भरुच में स्वामी जी से जेठालाल वकील विनय पूर्वक निवेदन करते हैं।

बहर तबील :-

शास्त्र विधि द्वारा मंडन करो मूर्ति का,

जग में कीर्ति बढ़ेगी ऋषि-आपकी।

लोक मानस में शंकर के अवतार की ,

पूजा घर-घर में होगी ऋषि आपकी।

(स्वामी जी उवाच)

बहर तबील :-

मुझे विश्वनाथ पदवी का लालच दिया,

काशी नगरी में डंका बजा वेद का।

कोई बन्धन नहीं जो हमें बांध ले,

दिल आभास रहता सदा ईश का।

वार्ता :- जाति-पाति, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े की भेदभावना से मुक्त ऋषि दयानन्द जी दया के सागर थे।

बहर तबील :-

एक दिन कृष्णराम जी ज्वर से पीड़ित हुए,

उनके सर को दबाने लगे थे ऋषि।

बोले भगवान अरे ! आप करते हो क्या,

पाप मुझको लगेगा क्षमा दो ऋषि।।

     (स्वामी जी)

बोले स्वामी जी इसमें कोई पाप ना

सेवा करना मनुष्य का परम धर्म है।

भाव सेवा का छोटों में उत्पन्न हो,

सीख देना बड़ों का प्रथम कर्म है।

वार्ता :- भरूच से स्वामी जी अहमदाबाद के लिए रावण हुए। स्टेशन पर अनेक सज्जनों ने उनका स्वागत किया। एक भाटिया सेठ अपनी गाड़ी में बैठा कर उस राह से ले गया, जहां लाखों रूपया खर्च कर एक मंदिर बनवाया था। उसने स्वामी जी से मंदिर देखने को कहा।

राग धमाल :-

स्वामी गए अहमदाबाद लोग स्वागत को आए हैं।। टेक।।

सेठ भाटिया ने स्वामी को गाड़ी में बैठाया।

लाखों रुपया खर्च किये एक मंदिर बनवाया।।

स्वामी जी ने कहा अविद्या इसको कहते हैं ।

विद्यालय खुलने से ज्ञान के जलते हैं।।

मणिकेश्वर मंदिर में स्वामी जी ठहराए हैं । स्वामी..

राव बहादुर गोपालराव जी भक्ति भाव रखते हैं ।

शास्त्रार्थ के बाद वहां सत्कार हुआ करते हैं ।।

पौष वदी पंचमी को स्वामी राजकोट में आए ।

राजकुमारों को विद्यालय में उपदेश सुनाए ।।

ज्ञान की गंगा बही देखकर सब हरषाए हैं । स्वामी..

वार्ता :- पौष कृष्ण पक्ष संवत ॉ८२ॉ में स्वामी दयानंद सरस्वती महाराज ने प्रथम आर्य समाज की स्थापना की। लेकिन नियम और उपनियमों के न बनने से कार्य अपूर्ण था।

वीर छन्द :-

आर्य समाज स्थापित कर दी, नर नारी सब मगन भए।

नियम और उपनियम नहीं थे, अधिकारी सब नियम किए।

अहमदाबाद बड़ौदा होकर, स्वामी पहुंच गए बलसाड।

पारसी और मुसलमानों पर, कृपा दृष्टी कीन्ही महाराज।।

वार्ता :- स्वामी जी बलसाड से वसई होकर फिर मुंबई आते हैं ।

लामिनि :-

सोचते विचरते स्वामी मुम्बा नगरी आए हैं।

लालजी दयालजी के बंगले में ठहराए हैं।।

ढोंगी पोप पंडितों के चेहरे कुम्हिलाए हैं।

सत्य के पुजारी अपने मन में अति हरषाए हैं।।

तर्ज बारहमासी :-

सत्य सबके ही मन भावे,

समय बड़ा बलवान बीज से अंकुर उग आवे।

चैत्र का शुक्ल पक्ष भाया,

संवत उन्नीससौं बत्तीस का सुअवसर आया।

देर न कीन्ही पल की है,

गिरगांव मुहल्ले में वाटिका माणिकचंद की है।

आर्य समाज स्थापित कीन्हा,

वैदिक धर्म प्रचार ऋषि ने बीज रोप दीन्हा।

देख जन सबहीं हरषाए,

आर्य जाति के उद्भव के आसार नजर आए।

प्रभु का दयाभाव पावे,

समय बड़ा बलवान बीज से अंकुर उग आवें

बड़ौदा शहर पहुंच गए हैं,

विश्वामित्र के तट पर मंदिर में पहुंच गए हैं।

तर्क के तीर चलाये हैं,

दक्षिण और गुजराती पंडित सब घबडाए हैं।

राज्य का धर्म बताया है,

माधवराव के कहने पर सबको समझाया है।

           विजय का बिगुल बजाय है,

कमलनयन को जीत महा गौरव पड़ पाया है।

ऋषि की महिमा सब गावें,

समय बड़ा बलवान बीज से अंकुर उग आवे।

वार्ता :- स्वामीजी बड़ौदा से फिर मुंबई पधारते हैं। वहां उनसे मिलने भगवती नाम की माई जो बचपन से वैराग्यवती हो गई थी मिलने आई। सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर उसकी इच्छा स्वामीजी से मिलने की हुई। मुंबई शहर में आर्य समाज की स्थापना हो चुकी थी। सर्वप्रथम अट्ठाईस नियम बने थे।

दोहा :-

होशियारपुर के पास में हरयाणा एक ग्राम।

वहां की कन्या भगवती जपें प्रभु का नाम।।

जपें प्रभु का नाम, जवानी में वैराग्य समाया ।

काषाय वस्त्र को धार, ज्ञान वेदांत गुरु से पाया।                   

पढ़ सत्यार्थ प्रकाश विचारों में परिवर्तन आया।

भक्ति भव से संग भ्रात के मुंबई कदम बढाया।।                   

पास स्वामी के आई। बात परदे में चलाई।

गाँव तुम वापिस जाओ ।

वहां की नारी जाति को सत का मार्ग दिखलाओ।

वार्ता :- स्वामी जी नारी जाति से वार्तालाप नहीं करते थे फिर भी माई भगवती के हट से परदा डालकर उपदेश दिया और उसे नारी जाति उद्वार हेतु निज वतन को भेज दिया। स्वामी जी मुंबई से पुना को प्रस्थान करते हैं।

                     (पूना कांड)

वीर छन्द :-

कृष्ण पक्ष आषाढ़ का आया तेरस तिथि दिन मंगलवार।

संवत उन्नीसौ बत्तीस को, पुना पहुंचे गए महाराज

लामिनी :-

वेद की ऋचाएं बोल, पूना को पुनीत किया।

गोविन्द रानडे महादेव ने स्वामी का सत्कार किया।।

पालकी सजाए नगर कीर्तन का प्रबंध किया।

गली-गली हाट-हाट वेद का प्रचार किया।

रसिया :-

मिल गए दुष्ट पुजारी। उनने हुल्लड़ की करी तयारी।

निकाली गदर्भानंद सवारी। ऋषि अपमान के लिए। टेक-

लामिनी :-

दुष्ट नीच पामर जन, कोलाहल अति भारी करें।

कीचड़ ईट पत्थरों की, स्वामी पर बरसात करें।।

रानडे जी यह देख हाल, मन ही मन विचार करें।

मान और अपमान की ना, स्वामी जी परवाह करे।।

रसिया :-

विज्ञापन भए जारी। सभी पापों ने बाजी हारी।

ऋषि के कदम बढ़ गए अगारी, शहर मुंबई के लिए। टेक-

वार्ता :- पूना शहर में स्वामी जी के पंद्रह व्याख्यान बड़े ही प्रभावशाली हुए, जिनके कारण स्थान-स्थान पर स्वामी जी की विद्वत्ता की चर्चा होने लगी। पूना नगरी को वेद की ऋचाओं से पवन कर स्वामी जी मुंबई शहर की ओर चल दिए।

चौपाई :-

पूना से ऋषि मुंबई आए। आर्य सभासद मन हरषाए।

कुछ दिन मुंबई किया प्रवासा। संस्कार विधि किया प्रकाशा।

वेद ज्ञान का दीप जलाकर। उत्तर भारत गया ऋषिवर।

कायम गंज अयोध्या काशी। लखनऊ पहुंच गया संन्यासी।

विक्रमसिंह जी लेकर आए। अपनी कोठी में ठहराए।

राजा जयकृष्ण दास पधारे। दयानंद के चरण पखारे।

इन्द्रमन सत्संग में आते। सुन व्याख्यान धन्य हो जाते।

चर्चा करें नगर के वासी। मिला नहीं ऐसा संन्यासी।

वार्ता :- स्वामी दयानंद को पता चला कि रानी विक्टोरिया के स्वागत में देश के राजाओं को दिल्ली में आमंत्रित किया गया है तो वे उपयुक्त अवसर जानकर अलीगढ़ होकर दिल्ली पहुँचते हैं वे समझते थे कि सामान्य जनता की अपेक्षा राज पुरुषों को प्रभावित करने से ज्यादा लाभ होगा। राजा बदलेगा तो जनता के बदलने में समय नहीं लगेगा।

राग ख्याल :-

अब दिल्ली के दरबार में सब रजा लोग बुलाए। टेक-

रानी विक्टोरिया आई है, हमें गुलाम बनाने को।

स्वागत करने राजा जा रहे, लानत राज घराने को।

कायर पूत जनें मत जननी,

बांझ भली संसार में। सब राजा..

ध्यान लगा ऋषि मन में सोचें सुन्दर अवसर आया है।

सेरूमल के अनारबाग में आसन जाए लगाया है।।

सिंहगर्जना दयानन्द की,

गूंजे घर-परिवार में। सब राजा..

राजा जयकृष्ण दास साथ में, ठाकुर मुकन्दसिंह भूपाल।

पंडित भीमसेन इन्द्रमन, ऋषि का हरदम रखते ख्याल।

वेद नीति को राजा समझे,

रहते इसी विचार में । सब राजा..

नहीं सफलता मिली कार्य को, गुत्थी तुरंत लई सुलझाए।

राज्य सभा की जगह ऋषि ने धर्म सभा को लिया बुलाए।।

ईश तत्व और धर्म तत्व का,

निर्णय होए जहान में। सब राजा..

वार्ता :- भारतीय राजाओं द्वारा कार्य की सफ़लता न देख ऋषि दयानंद ने भिन्न-भिन्न मत और जातीय विभागों के नेताओं की एक धर्म सभा बुलाई। जिसमें पंजाब के सुधारक कन्हैयालाल अलख धारी, श्री युत नवीनचंद राय, श्री हरिश्चंद्र चिंतामणी, सर सैय्यद अहमद खां, श्री केशवचंद्र सेन और श्री इन्द्रमन जी प्रमुख थे। सभा में स्वामी क्या कहते हैं ?

लामिनी :-

देश की दयनीयता का लोगों से बखान करें।

मानव का धर्म एक उसकी सब पहचान करें।।

वेद की सुनीतियों का स्वामी जी प्रचार करें।

आओ हम मिलकर इस देश का उद्वार करें।।

आपसी मतभेदों का हम, पहले परित्याग करें।

एक साथ बैठ एक नीति पर विचार करें।।

वार्ता :- इस अभूतपूर्व सभा में स्वामी जी ने प्रस्ताव रखा कि भारत के वासी परस्पर एक मत होकर एक नीति से देश का सुधार करें तो आशा है कि देश सुधर जाएगा। परंतु स्वार्थ और अहम् के कारण धर्मध्वजी एक न हो सके। स्वामी दयानंद सत्य के इतने प्रबल पक्षधर थे, वे कहते थे कि मैं अमृत को विष मिश्रित कर देना नहीं चाहता। सच्चाई छिपाना महापाप है अंत में सत्य की ही विजय हुआ करती है। स्वामी जी दिल्ली से मेरठ के लिए कूच करते हैं।

                     (चांदापुर शास्त्रार्थ)

तर्ज बारहमासी :-

ऋषि मेरठ से आए हैं।

कुछ दिन कर सत्संग, सहारनपुर को धाए हैं।

ब्रह्म मेला का दिन आयौ,

शाहजहां के पास चांदपुर में मौसम छायौ।

प्रसिद्ध मेला की भारी,

मुस्लिम पादरी, कबीर पंथ में बहस होत जारी।

खबर चहूं ओर फ़ैल गई है,

कबीर पंथ गया हार, जीत मुल्ला की है गई है।

सभी पंथी सरमाए हैं,

अपनी जीत के लिए इन्द्रमन के घर आए हैं।

बात सुन कही इन्द्रमन जी

धर्म शास्त्र में निपुण देश में ऋषि दयानंद जी ?

ऋषि के तर्क करारे हैं,

शास्त्र समर में सुनों सभी मत वादी हारे हैं।

खबर तुम उन तक पहुँचाओ,

सहारनपुर को जाए ऋषि को सादर बुलवायौ।

देर ना जरा लगाई है।

सहारनपुर में पहुंच ऋषि को विनय सुनाई है।

ऋषि मेला में आए हैं,

प्यारेलाल ने शास्त्र समर के नियम बताए हैं ।

वार्ता :- चांदापुर मेले के शास्त्रार्थ में श्री प्यारेलाल जी ने सब मतावलंबियों को नियम और विषय के बारे में समझाया। पांच विषय नियत किए गए जो इस प्रकार हैं।

१. सृष्टि को ईश्वर ने किस वस्तु से और कब और क्यों बनाया ?

२. ईश्वर सर्वव्यापक है अथवा नहीं ?

३. ईश्वर न्यायकारी और दयालु किस प्रकार है ?

४. वेद,बाइबिल और कुरान के ईश्वर वाक्य होने में क्या युक्ति है ?

५. मुक्ति क्या वस्तु है और वह किस प्रकार मिल सकती है ?

इस अभूतपूर्व शास्त्रार्थ में स्वामी दयानंद की पताका चहुँ ओर फहराने लगी है, सर्वत्र उनके वेद ज्ञान की चर्चा होने लगी।

सवैया :-

जीत भई नर पुंगव की, जब चारों ओर भयो उजियारो।

वेद के ज्ञान की ज्योति जली तब दूर भयो मन को अंधियारों।

भयभीत भए मत-पंथ सभी, ज्यों शेर की मांद से सियार सिधारो।

सूरज की नव ज्योति जगी, कहां दीपक की लौ का पतियारो।

वार्ता :- स्वामी जी की तर्कपूर्ण खंडन शैली से घबराकर शाक्त संप्रदाय के लोगों ने उनके प्राण हरण की चेष्टा की।

राग लांगुरिया :-

स्वामी दयानंद के प्राण घोर संकट में फँस गए हैं।। टेक।।

मीठे वचन सुनाए ऋषि को ले गए शाक्त लिवाए।

कई दिनों तक सेवा कीन्ही, श्रद्धा बहुत दिखाए।

पर्व पड़ा एक रोज ऋषि को, मंदिर ले गए है। स्वामी..

देवी के मंदिर में उनसे कहने लगा पुजारी।

झुक करके प्रणाम करो, यह जम की पालन हारी।

खड्ग हाथ में देख दुष्ट के नयना खुल गए हैं। स्वामी..

मार झपट्टा छीन खड्ग को, आगे को बढ़ते हैं।

देखा द्वार बंद बाहर का हिंसा से बचते हैं।

उछल कूद दीवार फांदकर, तुरत निकल गए हैं । स्वामी..

वार्ता :- सज्जनों इस प्रकार स्वामी जी बिना हिंसा किये अपने प्राणों की रक्षा की। शाक्त लोग स्वामी जी की बलि चढ़ाना चाहते थे। धन्य है ऋषि दयानंद ! तूने अपने प्राण लेने वालों का भी कल्याण चाहा। शाहजहांपुर से सहारनपुर होते हुए ऋषि पंजाब प्रान्त के लुधियाना शहर के लिए कूच करते हैं। वैशाख वदी द्वितीय संवत १९३४ को वे पहली बार पंजाब की पावन धरती पर पैर रखते हैं।

दोहा :-

सतलज झेलम व्यास, नद, रावी और चिनाब।

इन पांचों के मध्य में बसे देश पंजाब।।

चौबोला :-

बसे देश पंजाब दयानंद, लुधियाना को धाए।

सं उन्नीस सौ चौतीस वदी, वैशाख माह में आए।

बंशीधर के सुरम्य बाग में, आसन जाए लगाए।

ढेरों सारे ग्रन्थ बैलगाड़ी पर जा पहुंचाए।

पादरी बेरी आया, कृष्ण पर दोष लगाया।

निवारण उसका कीन्हा।

उसको दे उपदेश, कूंच लाहौर शहर कर दीन्हा।

वीर छंद :-

रतनचंद की फूल-बगिया में, स्वामी डेरा दिया लगाए।

बावली साहब में जाए नित्यप्रति, वेद का अमृत रहे पिलाए।

ब्रह्म समाजी और पादरी, पंडित पौराणिक भय खाए।

रहीम खां की कोठी पर ऋषि, उनकी गलती रहे बताए।

भक्त एक मनफूल महोदय, स्वामी जी का रखते ध्यान।

धन्य-धन्य जिज्ञासु कहते, शंका मिटी सुनत व्याख्यान।।

राव बहादुर मूल राज जी, ऋषि का करत बहुत सम्मान।

आर्य समाज करो स्थापित, चारों ओर यही गुणगान।।

प्रधान चुने थे मूलराज ली, मंत्री लाला साईदास।

संशोधित नियमों को कीन्हा, जिससे पड़ी ठोस बुनियाद।।

संस्थापक की पदवी ऋषि ने, यों कहकर दीन्हीं ठुकराए।

मठ गद्दी की गलत धारणा, लोगों को देगी बहकाए।।

कुछ पंडित यूं कहने लगे, वेद पुराण को लेऊं मिलाए।

मुझे नहीं स्वीकार संगति, अमृत विष में देऊं मिलाए।।

वार्ता :- मुंबई आर्य समाज की स्थापना के समय जो अठाईस नियम बने थे उनको संशोधित कर उनकी जगह दस नियम बनाए गए जो वर्तमान समय में हैं  अब इनमे परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं रही। मुंबई के नियमों में वेद को ईश्वरीय ज्ञान नहीं बतलाया था ईश्वर सृष्टि का रचियता भी नहीं था इसके अलावा श्रेष्ठ सभासदों की राय से नियमों में हेर-फेर भी हो सकता था। पंजाब प्रान्त के मस्तिष्क लाहौर को अपने उपदेशों से प्रभावित कर स्वामी जी अमृतसर के लिए प्रस्थान करते हैं।

चौक :-

श्री चरणों की करें वंदना, धन्य-धन्य नर कहते हैं।

धर्म ध्वजा फहराए ऋषि, लाहौर नगर से चलते हैं।।

अमृतसर में आए देख, उत्साह प्रजा में भारी है।

प्रतिमा पूजन मृतक श्राद्ध, पाखंड का खंडन जारी है।

मिथ्या मूलक मत पंथों की, बाढ़ देश में आई है।

गौरव गरिमा नष्ट हुई, इसलिए गुलामी छाई है।।

पहृप मंडली विचलित हो गई, दयानंद के तीरों से।

सत्य नहीं टल सकता हरगिज, झूठ की कुटिल लकीरों से।।

वार्ता :- ईसाई स्कूल में पढने वाले चालीस युवक मन से ईसाई बन चुके थे वे ईसाई रीति से प्रार्थना करते थे। परंतु स्वामी जी के उपदेश सुनकर उनके हृदय में ईसाई मत का विचार कपूर की भांति उड़ गया। वे पुनः अपने मत में आ गए।

वीर छन्द :-

खंडन सुनकर हिन्दू मत का, अंग्रेज कमिश्नर मन हरषाए

स्वामी जी के पास में आकर, अपनी शंका रहा बताए।।

मुझको शंका हिन्दू मत पर, यह तो धर्म टिकाऊ नाए।

न अनुशासन न कोई नीति, कोई एक मसीहा नाए।

तुरंत जवाब दिया स्वामी ने, हिन्दू धर्म समुन्द्र समान।

परमेश्वर को मानो न मानो, फिर भी बनी रहे पहचान।।

परोपकारी सद्गुण वाले ब्रह्मचारी और दया निधान।

नीति विशारद शास्त्र प्रणेता, आज्ञाकारी निष्ठावान।।

ज्ञानी-ध्यानी और तपस्वी, योगी-यती श्रेष्ठ परिवार।

ढोंगी कपटी और पाखंडी, कहते ईश्वर ले अवतार।।

अत्याचारी क्रूर कुचाली, सबकी है इसमें भरमार।

खाओ पीओ मौज उड़ाओ, नास्तिक मत के दावेदार।।

छुआ-छुत का भेद बहुत है, ऐसे भी हैं सब का खाए।

त्यागी भोगी और प्रमादी, धर्म का रहे मखौल उड़ाए ।।

धर्मशील दानी और मानी, क्षमाशील प्रभु भक्त महान।

मन मरजी का जीवन जीना, यह है हिन्दू की पहचान।।

ऐसा धर्म टूट नहीं सकता, व्यापक हो जिसका आधार।

छोटी-छोटी भूल सुधर जाए, तब होगा इसका विस्तार।।

संशोधित इसको करने का, मैंने बीड़ा लिया उठाए।

सत्य सनातन वेद ज्ञान को, चारों ओर रहा फैलाए।।

वार्ता :- अमृतसर में आर्य समाज की स्थापना कर स्वामी जी गुरुदासपुर बटाले होकर जालंधर शहर में अपने उपदेशों की वर्षा करने लगे।

दोहा :-

अमृतसर गुरुदासपुर शहर बटाले जाए।

जालंधर में आए कर ऋषि शोभा रहे बढ़ाए।।

तर्ज राधेश्याम :-

विक्रमसिंह की कोठी में ऋषि, आसन जाए लगाया है।

मौलवी अहमद हसन ऋषि से, प्रश्न पूछने आया है।।

पुनर्जन्म और चमत्कार पर, पूछे प्रश्न बहुत सारे।

वाद-विवाद में पोल खुली तो, भाग गया भय के मारे।

पैंतीस व्याख्यान हुए शहर में, गूंजे घर-घर में आवाज।

ब्रह्मचर्य का महत्व बता रहे, एक दिन दयानंद महाराज।

शंका उपजी विक्रमसिंह को स्वामी जी से करें विचार।

ऐसा क्या है ब्रह्मचर्य में, मन अपने सोचे सरदार।।

घोड़ा-गाड़ी के वाहन में, घर जाने को भए सवार।

पहिया पकड़ लिया स्वामी ने, बग्घी जरा न बढ़ी अगार।।

मुड़कर देखा विक्रमसिंह ने, गाड़ी कैसे रुक गई है।

ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझे, फिर आगे को बढ़ गई है ।।

सूरत सीरत दोनों अनुपम, प्रभु की महिमा अपरम्पार।

वेद शास्त्र में निपुण दयानंद, शारीरिक बल के भंडार।।

रावलपिंडी गुजरांवाला, सारा जीत लिया पंजाब।

फिरोजपुर की छावनी पहुंचे हिंदूसभा बनी, आर्य समाज।।

वार्ता :- पंजाब में स्वामी जी के प्रचार से आर्य समाज की स्थापना होने लगी। सारे नगरों में धर्म आन्दोलन होने लगा । स्थान-स्थान पर धर्म के नूतन संस्कार की चर्चा होने लगी।

बहर तबील :-

प्रान्त पंजाब में ऋषि दयानंद ने, वेद ज्योति का घर-घर उजाला किया।

धूर्त पापों ने छल बल का ले आसरा, हर तरह से परेशान उनको किया।

पंच नदियों से निर्मित ये पावन धरा, हर तरफ से कहे ऋषि निराला हुआ।

आम जनता में ऐसी मची खलबली, सबको आभास नूतन धर्म का हुआ ।

वार्ता :- एक बार मंदिर का पुजारी रघुनाथ स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने आया। स्वामी जी ने कहा कि ‘‘पहले पुजारी शब्द का अर्थ तो बताइए ?’’ वह कुछ उत्तर न दे सका। स्वामी जी ने कहा कि ‘‘पुजारी शब्द का अर्थ है पुजा का शत्रु।’’ आप लोग पंडित होकर ऐसे नाम क्यों रखते हैं। पुजारी शर्म के मारे भाग गया।

तर्ज बारहमासी :-

ऋषि पंजाब विचरते है,

गुजरांवाला में पं. विद्याधर रहते हैं। 

पादरी पंडित ढिंग जावें,

दोनों मिलकर दयानंद के दुश्मन जावें।

उन्हें पंडित ने दी घुड़की,

दयानंद के साथ हमारी चर्चा है घर की।

पादरी विवश लौट गए हैं,

शास्त्र समर स्वामी से सभी हार गए हैं।

लौट लाहौर चले आए,

अल्ला रक्खा की कोठी में आसन लगवाए।

बहुत से मुसलमान आए,

मुस्लिम मत का खंडन सुनकर मन में अकुलाए।

शहर मुलतान पधारे हैं,

नारायण कृष्ण ने स्वामी जी से वचन उचारे हैं।

मांस खाने से क्या हानि,

घोर पाप का कर्म वेद की आज्ञा न मानी।

नहीं आरोगी रह सकता,

मांसाहारी कभी नहीं कोई योगी बन सकता।

वार्ता :- एक दिन पा. बुकैनयन महाशय स्वामी के पास आकर बोले महाराज- मृत देह को भूमि गाड़ना लिखा है वेद में। और उसने प्रमाण में मोक्षमूलर का भाष्य बताया जिसमें लिखा था कि ‘‘हे भूमि तू अपनी भुजा जिसमें मृतक देह रक्खी जाए।’’ स्वामी जी ने उसी मंत्र से बताया कि यहां यह वर्णन है कि ‘‘भूमि को खोदकर वेदी बनाई जाए उसमें मृत देह

को जलाया जाए’’ स्वामी जी कहा करते थे वैदिक धर्म प्रचार हेतु अपने प्राणों की आहुति देने को तत्पर रहता हूं। आर्य समाज रूपी उद्यान की रक्षा अपनी सफल सामर्थ्य से करुंगा।

वीर छन्द :-

आर्य समाज का बाग लगाया, मैंने इस भूमंडल पर।

वेद ज्ञान का सूर्य प्रकाशित होगा, इस नभ मंडल पर।

मैं हूं माली इस बगिया का, रहता हूं हरदम होशियार।

पानी खुद सुरक्षा से ही, इसकी कायम रहे बहार।

(सवैया)

यह बाग लगाया है ऐसा, छाया में दुःखी संसार रहे।

कल्याण करे सब दुनिया का विद्या का अतुल भंडार रहे।।

यह काल बनेगा पोपों का बरदान बना दलितों का रहे।

सम्मानित हो इससे नारी, उद्धारक भी पतितों का रहें।।

वार्ता :-‘‘एक भक्त ने पूछा महाराज क्या कारण है ? जहां रास-रंग हास-विलास होता है वहां सारी रात नींद नहीं आती परंतु जहां सत्संग हो, धर्म चर्चा हो थोड़ी देर में लोग ऊंघने लगते है।’’ स्वामी जी ने उत्तर दिया ‘‘हरिकथा तो एक सुकोमल शय्या है उस पर नींद नहीं आएगी तो कहाँ आएगी? कांटो का बिछौना उस पर नींद कैसे आएगी?’’ एक दिन महाराज ने गंभीर होकर पं. भोलाराम जी से कहां..

लामिनी :-

विशुद्धानंद जी और बाल शास्त्री मेरा अंग साथ देते।

मूल काटकर पाखंडों की धर्म को शुद्ध बना देते।।

भारत माता जग-मग होती, वेद की ज्योति जला देते।

ओ३म् पताका कर में लेकर दुनियां में फहरा देते।

वार्ता :- मुझे दुःख इस बात का है कि उन्होंने मुझे गलत समझा, मेरा घोर विरोध किया परंतु मेरे हृदय की निर्मल भावना को ईश्वर जानता है। संवत १९३५ श्रावण मास अमावस्या को स्वामी जी पंजाब से रुड़की पधारे।

लागुरिया :-

रुड़की में कर धर्म प्रचार ऋषि मंडल में आए हैं।। टेक।।

गंग महात्म्य मूर्ति पूजा पर प्रश्न किए लोगों ने।

तिलक श्राद्ध अवतार वाद के तर्क दिए लोगों ने।।

दयानंद के तर्कों से पंडित घबड़ाए हैं। रुड़की..

अंतरूकरण में ईश्वर साक्षी सबके रहता है ।

जब मन पाप कर्म को करता तब वह कहता है ।।

बुरे कार्य के करने वाले सब पछिताए हैं। रुड़की..

एक दिन हरिश्चंद्र चिंतामणि मुंबई से आए हैं ।

साथ में श्यामकृष्ण जी वर्मा मिलने को आए हैं ।।

लेकर के आदेश ऋषि का तुरंत सिधाए हैं। रुड़की..

मेरठ शहर में बिगुल बजाकर दिल्ली में आए हैं ।

सब्जी मंडी में जाकर के डेरा लगवाए हैं ।।

आर्य समाज बनाए ऋषि जयपुर को धाए हैं। रुड़की..

दिल्ली में कर धर्म प्रचार ऋषि जयपुर में आए हैं।।

वार्ता :- मेरठ की धर्म सभा ने स्वामी जी से तीन प्रश्न पूछे। पहला परंपरा से चली आ रही देवमूर्तियों की पूजा, दूसरी गंगा नदि की पवित्रता स्थान से मुक्ति की प्राप्ति, तीसरा ईश्वरावतार आदि से संदेह निवृत्ति। स्वामी जी ने प्रश्न का सर गर्भित उत्तर दिया । धर्म प्रचार करते हुए स्वामी मेरठ दिल्ली होकर जयपुर आते हैं।

चौपाई :-

जयपुर पहुंच गए बलवीरा। स्वर्ग सिधार गए रणवीरा।

तुरंत गए अजमेर रवाना। ठहरे राम प्रसाद उद्याना।

पुष्कर के मेला में आकर। धर्म प्रचार किया वहां जाकर।

स्वामी जी खंडन जब करते। रोजी गई पोप सब डरते।

कई पादरी मिलकर आए। शंका समाधान करवाए।

धनुर्वेद के ढाई पन्ने। उनसे भए ऋषि चौकन्ने।

जीवन लड़ी अधिक हो जाए। पुरा धनुर्वेद लिख जाए।

राज्य मसूदा जाए विराजे। हर्षित बहादुरसिंह महाराजे।

वेद प्रचार किया वहां जाकर। धर्माधर्म दिया समझकर।

स्वामी जी जयपुर में आए। राजा पोप सभी खिसियाए।

ठाकुर लक्ष्मण सिंह समझाए। ऋषिवर नहीं डिग पावे।

रेवाड़ी से दिल्ली आए। वहां से ज्वालापुर को धाए।

राव ओजखाँ स्वामी जी से। मिलने आते बड़े प्रेम से।

भक्ष्याभक्ष्य विषय की जाना । दीना छोड़ मांस का खाना ।

वार्ता :- एक दिन स्वामी जी बैठे- बैठे लेट गए और फिर उठकर टहलने लगे। एक भक्त ने पूछा कि महाराज क्या बात है। बड़े बेचैन नजर आ रहे हो। स्वामी जी ने कहा कि मेरी बेचैनी का कारण विधवाओं की दुःख भरी आह, अनाथों का निरंतर आर्त नाद और गौवध से इस देश का सर्वनाश हो रहा है। हृदय में पर पीड़ा के भाव लिए स्वामीजी हरिद्वार के कुंभ मेले में आते हैं।

दोहा :-

कुंभ पड़ा हरिद्वार में, ऋषिवर पहुंचे जाए।

श्रवणनाथ के बाग में, आसन दिया लगाए।।

विज्ञापन चहुं दिशि लगे प्रचार हुआ घनघोर।

जिज्ञासु और संत महात्मा चले ऋषि की ओर।

बहर तबील :-

स्वामी आनंदवन बड़े तैश में,

ऋषि दयानंद से बात करने लगे।

हार उनकी हुई शास्त्र संग्राम में,

पक्ष ऋषिवर का सच्चा बताने लगे । (१)

मठाधीशों के दर्शन से कुछ ना मिला,

गंग स्थान से शुद्ध होता वादन ।

परम तृप्ति मिले अंत मुक्ति मिले,

जिसने आकर सुने थे ऋषि के वचन । (२)

आर्ष भाषा के प्रबल प्रचारक थे वे

राष्ट्र निर्मित उसी के हितैषी बने ।

राष्ट्र गौरव का सम्मान पल पल लिया,

आर्य भाषा में वे ग्रन्थ सारे लिखे । (३)

कर्नल अल्काट मैडम ब्ले वट स्की,

वे सहारनपुर में ऋषि से मिले ।

पहुंच मेरठ में दोनों हुए एक मन,

ऐसा देखा मिलन तो विदेशी जले । (४)

मुरादाबादी कलेक्टर के अनुरोध पर,

राजनीती का व्याख्यान ऋषिवर दिया ।

शासकों शोषितों का सम्बन्ध क्या,

ऐसे उदात्त नियमों का वर्णन किया । (५)

वार्ता :- एक उम्मीद खां और पीर जी इब्राहीम ने स्वामी जी से निवेदन किया कि हमने सुना है कि आप किसी को भी आर्य बना लेते हो। आर्य श्रेष्ठ धर्मात्मा को कहते है अगर आप सन्मार्ग पर चलकर आर्य धर्म का पालन करो तो आप भी आर्य हैं। वे बोले अगर हम आर्य बन गए तो क्या आप हमारे साथ भोजन करेंगे ? स्वामी जी ने कहा कि ‘‘हमारे धर्म में किसी का जूठा खाना वर्जित है, परंतु सहभोज में कोई दोष नहीं।’’ ‘‘स्वामी जी ! झूठा

खाने से परस्पर प्रीति बढती है’’-वे कहने लगे ‘‘अगर ऐसा है तो कुत्ते एक दुसरे का जूठा खाते-खाते आपस में काटने-नौंचने लगते हैं’’ यह सुनकर दोनों आवाक रह गए।

तर्ज बारहमासी :-

कायम मंत्र निवासी एक दिन रामलाल आए।

वर्षा ऋतु में कष्ट झेल श्री दर्शन को धाए।

इन्द्रमन साथ में आए हैं,

श्रद्धा से भरपूर भक्त ने भाव बताये हैं।

दयानंद करुणा के सागर,

रामलाल जी धन्य मान रहे गुरु मंत्र पाकर।

वचन यो रामलाल कहते,

लेते शिष्य बनाए योग्यतम कार्य पूर्ण करते।

महर्षि व्याकुल मन बोले,

है कुछ ऐसे कर्म दूर नहीं होंगे बिन भोगे।

त्याग मैंने घर का सब कीन्हा,

चुका नहीं ऋण मात-पिता को दुःख बहुत दीन्हा।

मात की ममता ठुकराई,

ऐसे हैं ये कर्म शिष्य न योग्य मिला भाई।

भविष्य उज्जवलतम देखेंगे,

आर्य समाज को कई विद्वज्जन सीचेंगे।

वार्ता :- स्वामी जी ने कहा कि रामलाल मैंने तीव्र वैराग्य वश यौवन काल में अपने माता-पिता आदि परिवार जनों का परित्याग किया और मृत्यु को जीतने के लिए योगाभ्यास कर रहा हूं। माता की ममता और पिता के ऋण से मुक्त नहीं हुआ हूं। यह ऐसे कर्म हैं जो योग्य शिष्य मिलने में बाधक हैं। महाराज का कर्म में अटूट विश्वास था, उत्तर भारत में स्वामी जी के विजय के झंडे गड़ने लगे।

रा.बं.ला.हो. :-

दई वेद की ज्योति जगाए,

ऋषि राम-कृष्ण की भूमि में।। टेक।।

गांव-गांव और नगर नगर में,

चर्चा चल रही डगर डगर में,

दई ज्ञान की गंगा बहाए। ऋषि..

शहर बदायूं पंहुच ऋषि ने, डंका जाए बजाया है।

गंगाराम की फुल बगिया में, आसन जाए लगाया है ।।

पाखंडों का जल काटकर,

दिए संशय सभी मिटाए। ऋषि..

शहर बरेली गए ऋषि जब लक्ष्मीनारायण लिवाए।

अपनी कोठी में ठहराकर हाथ जोड़ रहे विनय सुनाए।

भाषण में नर्मी अति लाकर,

प्रसंग वश सबको समझाकर,

शहर कोतवाली के पद पर मुंशी राम के पिता सुजान।

प्रेरित कीन्हा सुत अपने को दयानंद के सुन व्याख्यान।।

वाणी की देखी चतुराई,

रूप मोहिनी मन को भाई,

गए मुंशीराम चकराए। ऋषि..

चर्चा सुनकर पाए ब्रह्म की मुंशीराम अवाक् हुए।

मन का संशय मिटा नहीं तो स्वामी जी के पास गए।।

दया भाव जब होए प्रभू का,

तब होवे विश्वास उसी का,

मन श्रद्धा से भर जाए। ऋषि..

लक्ष्मण पंडित शाहजहां पुर का, स्वामी जी रहा बतराए ।

शंखासुर वेदों को ले गया क्यों रहे वेद-वेद चिल्लाए।

आलस रूप शंखासुर मारा,

वेदों पर वर्चस्व हमारा,

दिए सबको वेद बताए । ऋषि..

वार्ता :- बरेली में खचाखच भरे सभा स्थल पर स्वामी जी ने गुजरते हुए कहा लोग कहते हैं महाराज इतना कठोर खंडन मत करिए। आपके शरीर को दुष्टजन हानि पहुंचा सकते हैं। इस देह रक्षा के लिए हम सनातन धर्म को नहीं त्यागेंगे। सत्य को नहीं छोड़ेंगे। वह शूरवीर पुरुष मुझे दिखाइए जो मेरी अंतरात्मा के छिन्न-भिन्न करने का घमंड रखता हो। जब तक ऐसा पुरुष नहीं मिलता दयानंद का सत्य में संदेह करना स्वप्न में भी असंभव है।

राग मल्हार :-

वेद की बांसुरिया, स्वामी जी की बज रही है।। टेक।।

तन मंदिर में प्रभु वास करे,

और सत्य बसे मन के माहीं।

उपकार भरा जीवन उनका,

करुणा बरसे दिल के माहीं।

ज्ञान की बांसुरिया, स्वामी जी….वेद..

कितने लोगों ने कष्ट दिया,

कितने लोगों ने प्यार दिया।

मथुरा काशी में धूम मची,

हरिद्वार में झंडा गड दिया।

तर्क की बांसुरिया, स्वामी जी….वेद..

अधर्म को धर्म जो मान रहे,

उन्हें धर्म की राह दिखा दीन्ही।

पाखंड मतों का खंडन कर,

सत ज्ञान की गंग बहा दीन्ही।

प्रेम की बसुरिया स्वामी जी….वेद..

मंदिर मस्जिद गिरिजाघर में,

हुंकार उठी स्वामी जी की।

पूर्व-पश्चिम उत्तर-दक्षिण,

चहूं ओर विजय स्वामीजी की

ज्ञान की बांसुरिया स्वामी जी….वेद..

वार्ता :- प्रसंगवश फर्रुखाबाद में स्वामी जी श्री मदनमोहन लालजी से कहां हमारा उद्देश्य मूर्तियों का तोडना नहीं अपितु मूर्ति पूजा को लोगों के हृदय मंदिर से निकलना है जड़ पूजा के स्थान पर एकमेव परमेश्वर की प्रतिष्ठा स्थापित करना है। देखो ! मुस्लिम आतताइयों ने बाहर से आकर देश के अनेकों मंदिरों की मूर्तियों का विध्वंस किया परंतु मूर्तिपूजा लोगों के हृदय से नहीं निकल सकी।

वीर छन्द :-

फर्रुखाबाद कानपुर होकर, मिरजापुर कीन्हा प्रस्थान।

आश्विन सुदी पूर्णिमा के दिन, दानापुर पंहुचे श्रीमान।।

जन समुदाय उमड़कर आया, स्वागत समारोह सत्कार।

माधौरामजी की कोठी में, ऋषि का जाए लगा दरबार।।

अखिल विश्व का पालन करता, सबका एक वही करतार।

कण-कण में व्यापक वह ईश्वर, फिर कैसे होगा साकार।।

सूरज चाँद सितारे सबके, पृथ्वी वायु और आकाश।

धर्मतत्व भी एक सभी का, हरदम हो मन में आभास।।

विघ्न डालता व्याख्यानों में, चतुर्भुज पंडित दिया भगाए।

दुर्गा अंवस्थी ऋषि चरणों की, रजकण माथे रहा लगाएं।

एक महाशय कहने लागे, स्वामी है ऋषि महान।

गौतम और कणाद के युग में, जो मेरी होती पहचान।।

संशय मेरे मन के अन्दर, गिनती में होता विद्वान।

दानापुर से स्वामी जी ने, काशीधाम किया प्रस्थान।।

धर्म प्रचार किया काशी में, शंका समाधान के साथ।

वैदिक मुद्रणालय बनवाकर, लखनऊ पहुंच गए महाराज।।

वार्ता :- एक दिन स्वामी जी मोरछल से शरीर पर लगने वाली मक्खियों को उड़ा रहे थे। पास बैठे महाशय अनंतलाल ने कहा कि आप मक्खियों को पीड़ा पंहुचा रहे हैं क्या इसमें दोष नहीं है ? इस पर महाराज ने कहा ‘‘हानिकारक और शुद्र जीवों के निवारण करने में आप जैसे बोदे लोगों ने बाधा डाली है दूसरी नाम मात्र की दया से भारत वर्ष का सर्वनाश हुआ है। आप जैसे मक्खी मच्छर की दया मानने वाले भी, हृदय के दुर्बल मनुष्य, काम पड़ने पर रणक्षेत्र में क्या कर सकता है?’’ स्वामी जी वहां से लखनऊ मैनपुरी की ओर प्रस्थान करते हैं।

बारहमासी :-

लखनऊ से कर कूंच ऋषि अब मैनपुरी आए।

वहां के पोप पुजारी अपने मन में घबराए।

ऋषि के अंतर मन इच्छा,

मातृ शक्ति को सत्य धर्म की तुरंत मिले शिक्षा।

ऋषि मेरठ में आए हैं,

भांति-भांति के लोगों को उपदेश सुनाए हैं।

ज्ञान का फल है सुखदाई,

रमा नाम की विदुषी स्वामी के ढिंग आई।

रमा जी है नारी धन्या,

महाराष्ट्र की रहने वाली ब्रह्मण कुल कन्या।

संस्कृत भाषा की ज्ञाता,

दे-देकर उपदेश बन गई पूरी व्याख्याता।

उसे सत कर्म व्रत दीन्हा।

ब्रह्मचारिणी रहने का ऋषि परामर्श दीन्हा।

आगरा शहर ऋषि आए,

पंडित ज्वालादत्त अनेकों दर्शन को धाए।

शहर की जनता उमड़ रही,

धर्म शास्त्र में निपुण ऋषि की तूती बोल रही।

वार्ता :- स्वामी जी के हृदय में नारी जाति के उत्थान के लिए हमेशा करुणा विद्यमान रहती थी । देश के भविष्य के लिए स्त्री जाति के शिक्षण पर विशेष बल दिया करते थे। एक दिन रात्रि को स्वामी जी अचानक चिन्तित मुद्रा में इधर से उधर-चहल कदमी कर रहे थे। एक भक्त ने कहा कि ‘‘महाराज क्या तबियत ख़राब है ? अगर वेदना है तो औषधि उपचार

करूं।’’ एक लम्बी श्वास छोड़ते हुए स्वामी जी बोले मेरी वेदना की कोई औषधी नहीं। यह वेदना देश के परिश्रिमी लोगों की दुर्दशा से उत्पन्न हुई है । इसाई लोग सात समुन्द्र पार से आकर भारत की भोली-भाली जनता को इसाई बना रहे हैं । हमारे पंडित पुरोहित और महंत कुंभकरण की नींद सोते हैं । उनके कानों पर जू तक नहीं रेंगती। मैं चाहता हूं कि देश के राजाओं-महाराजाओं को सन्मार्ग पर लाकर इस आर्य जाति का सुधार करूं । स्वामी जी अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजस्थान की ओर कूंच करते हैं ।

                     (राजस्थान कांड)

राग धमाल :-

ऋषि ने देखो जीत लिया जग सारा।। टेक।।

उसे जीतने वाला हमने कोई नहीं निहारा। ऋषि ने..

बड़े-बड़े दिग्गज पंडित देखो शास्त्र समर में हार गए।

मुल्ला और पादरी भी ऋषिवर का लोहा मान गए।

उत्तराखंड को जीत दयानंद दक्षिण को प्रस्थान किया।

राजस्थान की समर भूमि में वेद का डंका बजा दिया।

शहर भरतपुर में जाकर के वैदिक धर्म प्रचार किया।

नगर निवासी मोहित हो गए फिर जयपुर को कूंच किया।।

जयपुर से अजमेर पहुंच गए मन में लगन लगी देखो।

सेठ फतेहमल जी के बाग में आसन जाए लगा देखो।

सुना आगमन दयानंद का घर-घर बजा नगारा। ऋषि..

पंजाब प्रान्त से लेख्ररामजी दर्शन हेतु पधारे हैं।

दश प्रश्नों का समाधान कर अन्य भी प्रश्न विचारे हैं।

अष्टाध्यायी प्रति ऋषि ने लेखराम को दीन्ही है।

गुरु-चरणों का वंदन करके तुरंत विदाई लीन्ही है।।

उधर ऋषि अजमेर छोड़कर राज्य मसूदा पंहुंच गए।

बहादुरसिंह के आग्रह से ऋषि राम उद्यान में ठहर गए।।

पादरी शूल्ब्रेड जी आकर प्रश्न पूछकर चला गया।

जैन शिरोमणि सिद्धि करण भी शास्त्रार्थ में हार गया।

तब कई जैन यों कहने लागे वैदिक धर्म हमारा। ऋषि..

रायपुर और ब्यावर में भी धूम मची थी स्वामी की।

नगर बनेड़ा की गलियों में जयजयकार थी स्वामी की।।

चक्रांकितों का मर्दन करके गढ़ चित्तौड़ पंहुंच गए हैं।

गंभीर नदि तट मंदिर में जाकर महाराज ठहर गए हैं।।

वहां लाट रिपन की राज सभा में राजा-महाराजा आए।

राज धर्म उपदेश ऋषि ने सब लोगों को बतलाए हैं।।

राज्य उदयपुर के महाराजा सज्जन सिंह पधारे हैं।

सादर न्योता दिया ऋषि को अपने राज्य सिधारे हैं।।

कवि श्यामलदास ने भक्तिभाव से वैदिक नाद उचारा। ऋषि..

वार्ता :- महाराजा सज्जन सिंह का निमंत्रण पाकर स्वामी उदयपुर जाने को तत्पर हुए।  कुछेक पंडितों और राजपुरुषों के साथ भ्रमण करने निकले। रस्ते में एक देवालय पड़ा। कुछ छोटे-छोटे बच्चे सीढियों पर खेल रहे थे। वहां स्वामी जी अपना सिर एकाएक नीचा कर लिए, फिर आगे चल पड़े। तभी पंडित लोग बोले ‘‘महाराज मूर्ति पूजा का चाहे जितना खंडन कर लो परंतु देवशक्ति के आगे तो झुकना ही पड़ता है।’’ स्वामी जी ने तुरंत वहां खेल रही चतुर्वर्षीय कन्या की ओर इशारा किया। मेरा सर तो इस मातृशक्ति के आगे झुका है। यह सुनकर सब लोग मौन हो गए।

कव्वाली गझल :-

राज्य चित्तौड़ में ऋषि ने बड़ी हलचल मचाई है।

राज पुरुषों में वैदिक धर्म की चर्चा चलाई है।

बुलावा राज्य से उन्हें इंदौर आने का।

किया पुरुषार्थ स्वामी ने अविद्या को मिटाने का।।

कूंच मुंबई को फिर कीन्हा लगन ऐसी समाई है। राज..

आगमन पर बड़ा स्वागत हुआ था शहर मुंबई में।५

वहां महाराज का आसन लगाया बालकेश्वर में।।

रानडे, अल्काट ने आकर भक्ति अपनी दिखाई है।। राज..

गौ करूणानिधि लिखकर गौरक्षा का व्रत लीन्हा।

योगविद्या के रहस्यों का मर्म सब को बता दीन्हा।

जनकधारी ने दानापुर से आ शंका जताई है। राज..

निवारण संदेह का कीन्हा मौनियर विलियम्स आए हैं।

प्रभावित ऋषि के वचनों से संदेशा साथ लाए हैं।

वेद के ज्ञान से योरोप की भी हो भलाई है। राज..

दिया उपदेश विप्रों को जरा बहार निकल जाओ।

कोल भीलों को जाकर के धर्म का तत्व समझाओ।।

इसाई बन रहे अज्ञानवश जो अपने भाई हैं। राज..

वार्ता :- स्वामी जी के पास गुजरात, काठियावाड़ अवध और आगरा से अनेक निमंत्रण पत्र आते थे । स्वामी जी पुनः मुंबई से इंदौर के लिए प्रस्थान करते हैं ।

वीर छन्द :-

मुंबई से इंदौर जाए कर, वेद का डंका दिया बजाए।

जावर और रतलाम घूमकर, गढ़ चित्तौड़ पहुंच गए जाए।।

रामानंद ब्रह्मचारी साथ में, स्वामी आत्मानंद महाराज।

नौलखा बाग उदयपुर पहुंचे, पंडित भीमसेन के साथ।।

स्वागत कीन्हा राणा जी ने, श्री चरणों में शीष झुकाए।

गदगद कंठ भए लोगों के, पुलकित नयन हृदय हरषाए।।

मौलवी अब्दुर्रहमान ऋषि से, आया करने वाद-विवाद।

प्रश्नों का उत्तर सब पाया, दूर हुआ मन का संताप।

जन्म-मरण से मोक्षधाम तक, चर्चा में कीन्हा विश्वास।

सहजानंद एक संन्यासी, रहता स्वामी के पास।।

शिष्य बन गया स्वामी जी का, मान रहा उनका आदेश।

नगर-नगर और गांव-गांव में, करने लगा धर्म उपदेश।

मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, हाथ जोड़ रहे विनय सुनाए।

कब कैसे हो भला देश का ? ऋषिवर हमको दो बतलाए।।

एक धर्म इक भाषा होगी, एक भव का ही संचार।

स्वाभिमान मर्यादा जागे देश का तब होगा कल्याण।।

वार्ता :- एकांत पाकर एक दिन महाराणा सज्जनसिंह जी स्वामी दयानंद से विनय पूर्वक बोले- ‘‘महाराज अगर आप मूर्ति पूजा का खंडन छोद दें तो एकलिंग महादेव की गद्दी आपकी सेवा में समर्पित है। जिसकी लाखों की आय है। सारा ऐश्वर्य आपका होगा । आप राज-गुरु होंगे।’’ स्वामी जी झुंझलाकर बोले कि ‘‘राणा जी आप तुच्छ प्रलोभन देकर मुझे परमात्मदेव से विमुख करना चाहते हैं, उसकी आज्ञा भंग कराना चाहते हैं। आपके राज्य और मंदिर की सीमा से एक दौड़ लगाकर बाहर जा सकता हूं। पर उस अनंत ईश्वर की आज्ञा भंग करके मैं कहाँ जाऊंगा ? ईश्वर के परमप्रेम के सामने उस मरुभूमि की मायाविनी मरीचिका अतितुच्छ है। ऐसे शब्द कहने का कभी साहस मत करना।’’

लामिनी :-

साहस बटोर राणा स्वामी जी से बोल रहे।

मूर्ति का खंडन छोड़ो मन को वे टटोल रहे।।

एकलिंग मंदिर की गद्दी को तुम स्वीकार करो।

लाखों की आय को जी भर के अंगीकार करो।।

प्रभु ध्यान करके ऋषि; राणा को जवाब दियो।

मेरी ध्रुव धारणा पर आपने सवाल कियो।।

एक बार दौड़ राज्य सीमा को मैं पार करूं।

ईश्वर के राज्य का मैं कैसे बहिष्कार करूं।

तर्ज बारहमासी :-

नहीं कोई वस्तु है जग में।

मेरे प्रबल विचारों को जो कर सकती वश में।

क्षमा राणा ने मांगी है।

आपकी दृढ़ता देखन को अभिलाषा जागी है।

ऋषि ने धर्म कार्य किया।

परोपकारिणी सभा बनाकर वृक्ष खड़ा किया।

सभापति राणा चुन लीन्हे।

तेइस सदस्य की सभा ऋषि ने नियम बना दीन्हें।

वार्ता :- वैदिक धर्म के प्रचार को स्थाई रूप देने के लिए स्वामी जी ने परोपकारिणी सभा की स्थापना की। उदयपुराधीश महाराणा सज्जनसिंह प्रधान, लाला मूलराज एम.ए. अ. कलक्टर उप-प्रधान और मंत्री श्री कविराज श्यामलदस जी मेवाड़ राज्य इसके आलावा महाराजा नाहरसिंह शाहपुराधीश, म. फतेहसिंह जी भीलवाड़ा रायबहादुर जयकृष्ण दास कलक्टर बिजनौर, राजे श्री गोपाल हरि देशमुख कौंसल गवर्नर मुंबई, राव बहादुर महादेव गोविन्द रानडे जज पूना, सर श्याम कृष्ण वर्मा प्रो. अहृक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन इत्यादि। अन्य गण मान्य प्रतिष्ठित महानुभाव परोपकारिणी सभा के सदस्य थे।

राग लहरिया :-

ऋषि ने घर-घर अलख जगायौ है।

तब ज्ञान की ज्योति जगी है। ऋषि ने..

तंत्र मंत्र और जादू टौना,

दुष्ट जनों का खेल खिलौना,

खोल सब इनको भेद बतायौ है। तब ज्ञान..

पण्डे कन्या दान ले रहे है,

धन से मालामाल हो रहे

सतियों का धर्म बचायौ है। तब ज्ञान..

ऊंच-नीच और जात-पात के,

पंथ बन गए भांति-भांति के,

ऋषि ने धर्म का मर्म बतायौ है। तब ज्ञान..

पाखंडों का दमन किया है,

वेद का सूरज उदय हुआ है,

ऋषि ने आगे कदम बढ़ायौ है। तब ज्ञान..

वार्ता :- जिस सिसौदिया वंश की विमल कीर्ति को महाराणा प्रताप ने उदयास्त तक विस्तृत करके अमर बना दिया, जिस वंश ने ‘‘जो राखे निज धर्म को तेहि राखे करतार’’ इस पाठ को पढ़ा हो, जिस वंश के वीरों ने अपनी आन-बान की रक्षा के निमित मर मिटना तो सीखा हो, परंतु कायर बनकर अपनी शान को वहां नहीं लगाया और जिस वंश की

बहु बेटियों ने प्रचंड चिता पर चढ़कर; जलकर मर जाना तो उत्तम समझा परंतु अपने पवित्र चरित्र पर मलिन दुष्ट लोगों का हाथ स्पर्श नहीं होने दिया, उस वंश के शिरोमणि श्रीमन महाराणा सज्जनसिंह को अपना शिष्य बनाकर जगद्गुरु दयानंद सरस्वती धर्म प्रचार के लिए आगे बढ़ते हैं । श्रावण वदी संवत १९३६ में स्वामी जी जोधपुराधीश महाराजा जसवंतसिंह

के निमंत्रण पर वहां जाने के लिए प्रस्थान करते हैं।

दोहा :-

फाल्गुन वदी सप्तमी के तिथि को व्याकुल हुआ समाज।

छोड़ उदयपुर चल दिए, दयानंद महाराज।।

चौ.-दयानंद महाराज बुलावा जसवंत सिंह का आया।

राठौर वंश की मरू-भूमि में, ऋषि ने कदम बढाया।।

होन-हार बलवान समय को नहीं बांध कोई पाया।

दयानंद के जीवन का अब वक्त आखरी आया।

ऋषि शाहपुर में आए। राव राजा हरषाए।

वहां विश्राम किया है।

वैदिक धर्म प्रचार ऋषि ने झंडा गाड़ दिया है।

वार्ता :- जोधपुर जाते समय आर्य लोगों ने स्वामी से कहा, ‘‘आप जहां जा रहे है वहां के लोग कठोर प्रकृति के हैं । कहीं ऐसा न हो कि सत्योपदेश से चिढ़कर श्री चरणों को पीड़ा पहुंचाए।’’ स्वामी जी महाराज ने उत्तर दिया ‘‘अगर लोग मेरी ऊंगलियों की बत्ती बनाकर जला दें तो भी मैं सत्य बोलने से पीछे नहीं हटूंगा।’’ स्वामी शाहपुर से अजमेर होकर पाली पहुंचे। वहां जोधपुर नरेश की ओर से चारण नवलदान एक हाथी तीन ऊंट, तीन रथ, एक सेज गाड़ी ओर चार वाहन से उतरकर पैदल चलकर आते हैं। जोधपुर नरेश ने कैसा उत्तम

स्वागत किया है। जिसका कहना ही क्या? शहर प्रवेश से पूर्व स्वामी जी की छवि का वर्णन बड़ा ही मनोहारी है।

लामिनी :-

जोधपुर नरेश आन-बान से सत्कार कियौ।

राव राजा ज्वानसिंह और तेजसिंह को भेज दियो।।

दोनों एक रत्नगढ़ को पैदल ही पधार रहे।

स्वामी जी के रूप को वे दूर से निहार रहे।।

काषायाम्बर धारी ऋषि चाल तो गंभीर चले।

मस्तक विशाल उनका चन्द्रमा समान खिलें।।

हाथ में है दण्ड उनके चहरे पर मुस्कान लिए।

कुंदन के समान रूप नर नारी मोह लिए।।

संन्यासी के पास आकर दोनों नम्री भूत हुए।

श्रद्धा के भाव हृदय मंदिर में अभिभूत हुए।।

वार्ता :- दोनों राव राजा अति सम्मान, सत्कार के साथ स्वामी जी को लेकर आए और मियां फैजुल्ला खां के उ।ान में उनका निवास स्थान तय किया। महाराजा प्रतापसिंह उद्यान के द्वार पर तैनात थे। महाराज तेजसिंह जी स्वयं स्वामी जी की सेवा सुश्रूषा में तैनात थे। राठौर राज्य के राजपूत सरदार स्वामी जी की विमल कीर्ति से प्रभावित होकर उनके शिष्य बनने लगे। सत्रहवें दिन महाराजा जसवंत सिंह जी बड़े ही समारोह के साथ श्री दर्शनों के लिए उपस्थित हुए।

वीर छन्द :-

मारवाड़ की मरुभूमि में, गूंजे, वेदों की आवाज।

न्याय धर्म की चर्चा कर रहे; राजा, राव और महाराज।।

सत्रहवें दिन श्री यशवंत सिंह जी, श्री दर्शन को पहुंचे जाए।

मन उत्साह हृदय में श्रद्धा, बैठे बीच फ़र्स पर जाए।

वैसे ही नजर पड़ी ऋषिवर की, वहां क्यों बैठे हो महाराज।

शोभा नही आपको देता, राज्य जोधपुर के सरताज।।

हाथ जोड़ यशवंत सिंह बोले, ऋषिवर सुनइए विनय हमार।

आश्रम, धर्म और मर्यादा के, हम क्षत्री पालन हार।।

ईश्वर, जीव और मुक्ति पर, स्वामी जी के सुन व्याख्यान।

धन्य धन्य नर कहें नगर के, स्वामी जी एक संत महान।

वैष्णव मत का प्रबल युक्तियों से, खंडन करते महाराज।

तिलक-छाप कंठी माला को, मिथ्या जन्म कहें ऋषिराज।।

समालोचना सुन कुरान की, फैजुल्ला खां मन खिसआए।

कैसे बदला लूं साधू से मन में सोचन लगा उपाए।।

राव ज्वान सिंह कहें ऋषि से, करिए योग्य शिष्य तैयार।

जीवन भर कोई शिष्य मिला नहीं मेरे शिष्य आर्य नर नारि।।

वार्ता :- महाराजा यशवंत सिंह जी तीन बार स्वामी जी से मिलने आए और तीनों बार राज प्रसाद में पधारने का निमंत्रण दिया।

तर्ज राधेश्याम :-

महाराज निमंत्रण दिया ऋषि को, राज प्रसाद में आने का।

एक रोज पहुंच गए स्वामी जी, देखा था दृष्य लजाने का।।

नन्ही जान एक वेश्या थी, राजा के मन में बसी हुई।

देख ऋषि को बैठ पालकी में महलों से विदा हुई।।

वार्ता :- उस स्थान पर महाराजा यशवंत सिंह को उपस्थित देखकर स्वामी जी धर्मावेश में आकर कहने लगे- ‘‘केसरी की कन्दरा में ऐसी कलुषित कुक्करी के आगमन का क्या काम है?’’

वीर छन्द :-

धर्मावेश में स्वामी जी ने राजा को दीन्हा उपदेश।

सिंह समान वीर क्षत्री को, कुक्करी संग न शोभा देए।

कान भनक वेश्या के पड़ गई, गुस्सा गई वदन में छाए।

इस साधू के प्राण हरुंगी, मन में निश्चय ली ठहराए।

घर के दीपक से घर जलता, दावानल से वन जल जाए।

अपने ही दगा करें अपनों से, लालच ऐसी बुरी बलाए।

जगन्नाथ रसोइया स्वामी का, वो लालच में लिया फसाए।

कालकूट विष उसको दीन्हा स्वामी जी देए खिलाए।।

अश्विनी वदी तिथि चौदस थी, संवत उन्नीस सौ चालीस।

जगन्नाथ ने जहर दे दिया लीला खूब रची जगदीश।।

वार्ता :- वाह रे समाज द्रोहि ब्रहमहत्यारे जगन्नाथ! तूने जहर देकर इस मानव जाति को अनाथ बना दिया।

राग लांगुरिया :-

दिया दूध में जहर मिलाए,

ऋषि का काम अधूरो रहि गयो।।

जगन्नाथ रसोइया तूने बुरा किया।

विष देकर के महापाप किया।।

दीनी ज्ञान की ज्योति बुझाए। ऋषि काम..

एक वेश्या ने नागिन बनकर।

विष वार किया स्वामी पर।।

गई धर्म बेल मुरझाए। ऋषि काम..

इस देश को स्वर्ग बनाने का।

संकल्प लिया गुरु अपने का।।

दिया तन-मन धन विसराए। ऋषि काम..

यहां कर्म-भोग-फल चक्र चलें।

उसमें मानव का वश न चले।।

प्रभु इच्छा पूर्ण होए। ऋषि काम..

वार्ता :- धन्य है ऋषि दयानन्द तुमने अपने प्राण लेने वाले महापातक जगन्नाथ के साथ कैसी दया दिखाई कि उसे नेपाल राज्य की सीमा में भेज दिया। जहां वह पंद्रह वर्ष तक भेष बदल कर रहा। अब देखिये ऋषि दयानंद के शरीर की कैसी दशा है।

बारहमासी :-

जहर का असर अति कष्टकारी पीड़ा।

कीने बहुत उपाय पेट में, पीडा अति भारी।

वैद्य सूरजमल बुलवाए,

देख ऋषि की दशा वैद्यजी मन में घबराए।

दवा कुछ काम नहीं आई है।

आर्य जाति के लिए घटा कलि घिर आई है।

संदेशा राजन मिलवाया,

करने को उपचार अली मर्दानखान आया।

प्रभु ने कैसा न्याय किया,

काया जर-जर भई दावा का उल्टा असर हुआ

खबर चहूं ओर फ़ैल गई है,

ऋषि भक्तों के लिए गजब की चिंता बढ़ गई है।

पालकी राजा भिजवाई,

माउन्ट आबू जाने की ऋषि इच्छा बतलाई।

लक्ष्मणदास दवा दीन्ही,

थोड़े समय के लिए ऋषि को राहत दे दीन्ही।

ऋषि अजमेर आ गए हैं ।

देश के कोने-कोने से ऋषि भक्त पहुंच गए हैं।

वार्ता :- ‘‘निर्भय स्वागत करो मृत्यु का, मृत्यु एक विश्राम स्थल’’ विश्राम के विधान को कौन पलट सकता है ? स्वामी जी का अंतिम समय आ गया। और वे मृत्यु के स्वागत के लिए प्रातः ही से तैयार हो गए, क्षौर कर्म करा के स्नान किया शेष समय प्रभु चिंतन में लगाया।

वीर छन्द :-

कृष्ण पक्ष तिथि अमावस्या थी,

दीपावली दिन मंगलवार।

पीछे खड़ा किया लोगों को,

खोले सभी हवा के द्वार।

ध्यान लगाया परमेश्वर का,

जिसने रचा सकल संसार।

चंद्र समान तेज चेहरा पर,

मुख पर रहस्य भई मुस्कान।

जिसे देखकर गुरुदत्त जी ने,

मन के संशय दिए मिटाए।

घोर नास्तिक आस्तिक बन गया,

श्रद्धा बढ़ी प्रभु से जाए।

लीला खूब रची मेरे ईश्वर,

तेरी इच्छा पूरण होए।

अंतिम शब्द बोलकर ऋषि ने,

अपने प्राण दिए बिसराए।

वार्ता :- इस धराधाम पर रहने वाली समस्त मानव जाति ऋषि के अनगिनत उपकारों की ऋणी है। ऋषि भक्त को अपने गुरु के आदर्शों को मानते हुए संसार को वेद की ज्ञान ज्योति से प्रकाशित करना है। तभी हम ऋषि ऋण से मुक्त होंगे।

           बहुत कुछ लिखेंगे लोग ऋषि तेरी शान में।

            तुझसा फरिस्ता नहीं देखा जहान में।।

                ओ३म् शांति शांति शांतिः।।