उठ जाग मुसाफिर भोर भई

प्रातःगान

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो सोवत है?

जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है।।

टुक नींद से अँखिया खोल जरा, और अपने प्रभु से ध्यान लगा।

यह प्रीत करन की रीत नहीं, प्रभु जागत है तू सोवत है (1)

जो कल करना है आज करले, जो आज करना है अब करले।

जब चिड़ियों ने चुग खेत लिया, तब पछताए क्या होवत है (2)

नादान भुगत करनी अपनी, ऐ पापी पाप में चैन कहाँ।

जब पाप की गठरी शीश धरी, फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है (3)