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Audio Tag: Vivek Vairagya Sloke Sangrah

संगठन सूक्तम्

संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ। इळस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर।। 1।। हे प्रभो तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को। वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिए धन-वृष्टि को।। सं गच्छध्वं सं [ … ]

शार्दूलविक्रीडितम् छन्दः

धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी,       सत्यं मित्रमिदं दया च भगिनी भ्राता मनःसंयमः।       शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम्       ह्येते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद् [ … ]

त्रिष्टुप् छन्दः

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्ता      कालो न यातो वयमेव याताः, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः।                     (भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लो. १२)        भावार्थ– हम [ … ]

मालिनी छन्दः

वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लक्ष्म्या,             सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।       स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला,             मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।                    (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो.४५) [ … ]

मन्दाक्रान्ता छन्दः

गंगातीरे हिमगिरिशिला-बद्धपद्मासनस्य,             ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य।       किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशंकाः,             कण्डूयन्ते जरठहरिणाः स्वांगमंगे मदीये।।                    (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ३७)        भावार्थ- प्राचीन काल में लोगों का [ … ]

वसन्ततिलका छन्दः

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,             लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।       अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,             न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।                   (भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो.७९)        भावार्थ– [ … ]

शिखरिणी छन्दः

यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं  द्विप इव मदान्धः समभवम्,       तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।       यदा कि९िचत् कि९िचद् बुधजनसकाशादवगतं,       तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इन मदो मे व्यपगतः।।                   (भर्तुहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ७)        [ … ]

अनुष्टुप् छन्दः

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।       धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।। (मनु. ६-१२)        भावार्थ- धैर्य रखना, सहनशील होना, मन को अधर्म से रोकना, चोरी-त्याग, रागद्वेष न करना, इन्द्रियों को धर्म में [ … ]

दयाकर भक्तिविज्ञानम्

ईश प्रार्थना दयाकर भक्तिविज्ञानं पितः परमात्मनं देयम्। दया देया दयालुरसि चितौ संशोधनं धेयम्।। टेक।। प्रभो आगच्छ ध्याने मे वश शीघ्रं च नेत्रे मे। तमश्छन्ने मनस्येत्य परमज्योतिर्न आनेयम्।। 1।। प्रवाहय प्रेम-गंगां [ … ]

भगवन् त्वदीय भक्तिम्

भक्ति प्रार्थना भगवन् त्वदीय भक्तिं स्वान्ते सदा भरेयम्। वेदोक्त धर्मकार्यं नक्तन्दिनं विधेयम्।। टेक।। संगः सदा सुधीनां सरणी च सज्जनानाम्। सद्भावनाश्रितोऽहं पापात्सदा बिभेयम्।। 1।। रोगा दहन्ति देहं प्रबलाः शरीरमध्ये। ब्रह्मचर्यमौषधं च [ … ]

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