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Articles Tag: PDF Books

यज्ञोपैथी

यद्यपि यज्ञ शब्द बहुत व्यापक है, जिसका अर्थ है देवताओं की पूजा, संगतिकरण तथा दान तथापि यज्ञ शब्द अग्निहोत्र अथवा हवन (होम) के लिये सर्वत्र प्रचलित हो गया है । [ … ]

मैंने ईसाई मत क्यों छोड़ा

विगत 29 वर्षों के अपने वैदिक धर्म के अध्ययन से मैं निश्चयपूर्वक यह कह सकता हूं कि पृथ्वी पर सभी मत सम्प्रदायों में वैदिक धर्म के से सार्वभौम कल्याणकारी विचार [ … ]

वैदिक सिद्धान्तावली

वैदिक सिद्धान्तावली पुस्तिका महर्षि दयानन्द सरस्वती प्रणीत कालजयी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश पर आधारित है.. सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम दस समुल्लासों (अध्यायों) में आए मुख्य-मुख्य सिद्धान्तों को प्रश्नोत्तर शैली में सरल [ … ]

वैदिक साधना पद्धति

इस पुस्तक में महर्षि दयानन्द जी द्वारा प्रणीत वैदिक संध्योपासना के साथ-साथ प्रणव ध्यान, गायत्री मन्त्र ध्यान, आर्य समाज के द्वितीय नियमाधारित ध्यान, अष्टांग योग से सम्बन्धित चुने हुए अर्थ [ … ]

आर्य वीर दिनचर्या

इस लघु पुस्तिका में आर्यवीर की आदर्श दिनचर्या कैसी हो, इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सङ्कलन करने का यत्न किया गया है। इसका प्रथम संस्करण हमने सन् १९९१ [ … ]

वेदपाठ

‘‘वेद सब सत्यविद्याओं की पुस्तक है’’ महर्षि दयानन्द जी के इस उद्घोष एवं ‘‘वेद का पढ़ना-पढ़ाना सुनना-सुनाना सभी आर्यों का परम धर्म है’’ इस प्रकार के स्पष्ट निर्देश के कारण [ … ]

पितर सिद्धान्त बनाम पीटर प्रिस्कृप्शन

पीटर प्रिस्कृप्शन PETER PRESRIPTIONS लारेस जे पीटर की प्रसिध्द पुस्तक ‘‘दी पीटर पुस्तक प्रबंधन के श्रेष्ठ में एक नया उद्बोध माना गया है। पीटर का मूल सिध्दंात यह है कि [ … ]

बीजवृक्ष

”मौन“ आवाजों की आवाज है। ”अरूप“ रूपों का रूप है। ”वीलम“ प्रकाशों का प्रकाश है। ”आस्वाद“ स्वादों का स्वाद है। ”अस्पर्ष“ स्पर्षों का स्पर्ष है। ”अपरा“ वाकों की वाक् है। [ … ]

परीक्षा में सफलता के 101 सूत्र

परीक्षा में सफलता के १०१ सूत्र परीक्षा पूर्वपढ़े चलोपढ़े चलोचलता हुआ सतयुग है।उठकर खड़ा हुआ त्रेता है।करवट बदलता द्वापर है।सोता हुआ कलयुग है।तुम सतयुग हो।।१।। परीक्षा कोर्स के विषयों में [ … ]

गृहस्थ धर्म परिचायिका

लेखक स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय सम्पादक ब्र. अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ आर्यवीर प्रकाशन 7666986837, 8074872028 E-mail : 1aryaveer@gmail.com विवाह अ) विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, बल, कुल, शरीरादि का परिमाण यथायोग्य [ … ]

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