7.”महापुरुषों की लाशों के संग्रहालय”

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे

7.”महापुरुषों की लाशों के संग्रहालय”

धार्मिक महापुरुषों में ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन चरित्रों को भरपूर विकृत किया जाता है सम्प्रदाई भक्तों द्वारा। ये मन्दिर, मस्जिद, गिरजे ऐतिहासिक महापुरुषों की लाशों के संग्रहालय हैं। महापुरुषों के सत-असत मानवी जीवन में अमानवीय (तथाकथित दैविय) सत मात्र की अन्ध धारणा ही सम्प्रदायों को जन्म देती है और कालांतर में इन सम्प्रदायों में धर्म के ठेकेदारों का प्रादुर्भाव होता है। ये ठेकेदार धर्म बेचने का धन्धा करते हैं। ईसा के नाम पर क्षमा पत्र बेचे जाते हैं, स्वर्ग-नरक की कल्पनाएं गढ़ी जाती हैं, इच्छाओं की पूर्ति हेतु धर्म को उपयोगित किया जाता है। धर्म लालच, कामना, लोभ, आदि-आदि की पूर्ति का साधन हो जाता है। एषणाओं (धन, पुत्त, यश) की आपूर्ति के नाम पर भोली-भाली जनता को यज्ञ, पूजा, क्रास, मजार, की ओर ढ़केला जाता है। इस सबके लिए धार्मिक गुण्डे महापुरुषों के विकृत किए गए चरित्रों का भरपूर सहारा लेते हैं। “चौपाए” सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं। झुकना उनकी नियति है। “दो-पाए” की नियति खड़ा होना है। इस खड़े होने की स्वाभाविकता को आहत करते हैं ये सम्प्रदाय। झुके-झुके लोगों के समुहों का नाम है हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि। झुकना कहीं भी हो झुकना ही है। झुके हुए आदमी की एक ही संज्ञा है, फिर चाहे वह राम की मूर्ति के आगे झुके या कृष्ण की या मरियम की या ईसा या मज़ार के आगे झुके। उसकी संज्ञा हमेशा ‘चौपाया’ ही रहेगी। ‘दो-पाए’ को चौपाए की संज्ञा देने वाले इन सम्प्रदायों के घेरों से महापुरुषों को उन्मुक्त करना होगा। महापुरुषों की लाशों को स्वाभाविक बुद्धिमान धार्मिक पुरुषों के रूप में जीवित करना होगा। अप्राप्त ऊंचाइयों से उन्हें प्राप्त ऊंचाइयों तक काटना होगा। काल्पनिक धार्मिक महापुरुषों को वास्तविक ऐतिहासिक महापुरुषों के रूप में बदलना होगा।

झुके-झुके लोगों के समूह के मध्य खड़ा हो जाना एक गुनाह घोषित कर दिया गया है धार्मिक कठमुल्लाओं के द्वारा। हर व्यक्ति को इस गुनाह को स्वेच्छा से करना होगा ताकि मानव धार्मिक हो सके। मुखौटे तोड़नें होंगे। उन लोगों को नग्न करना होगा जिन्होंने दूसरों के कर्मों की खाल ओढ़कर सामाजिक प्रतिष्ठा पाई है। मुखौटे ओढ़े लोग, दूसरों की कर्मों की खाल ओढ़े लोगों को सामान्य व्यक्ति से भी गया-बीता कहना, समझना होगा। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा जिसका आधार झूठा है भंग करनी होगी। तभी समाज में अध्यात्म सांस ले सकेगा।

“जवानी का एक घंटा ऐसा नहीं जिसमें कोई भावी न हो, एक भी पल ऐसा नहीं जिसके चले जाने पर उसका निर्धारित काम बाद में कर सके। गर्म लोहे पर चोट न कर पाए तो फिर ठण्डे लोहे को ही पीटना पड़ता है….।” रास्किन के उपरोक्त शब्दों में यथार्थता है। आज धर्म घण्टों में, पलों में व्याप्त भावी को रोकता है। एक स्तर के पश्चात पलों को जीवन में अनवरत मरण देने का नाम है हिन्दू, मुसलमान आदि हो जाना। इस स्तर के पश्चात का पथ है हिन्दू, मुसलमान ईसाई से मानव होना। नष्ट होते पलों, पुराने पड़ गए पलों को जीवित और नया करने के लिए हमें छोटे-छाटे ये घेरे घेरने ही होंगे। इन्हें काटना होगा। इनसे परे सरल रेखा में गमन करना ही होगा। अन्यथा हम सत्यों को भी मुर्दा कर-कर के जीते रहेंगे। आंखें रहते भी अन्धे रहेंगे।

एक गुलशन को उजाड़ने के लिए एक उल्लू काफी होता है। पर इस जगत की गुलशन में हर सम्प्रदाय के वृक्ष की डाल-डाल पर एक-एक उल्लू बैठा है। इस गुलशन का अंजाम कल्पनातीत है। इन उल्लुओं का उल्लूपन खत्म करना होगा। जगत गुलशन को नया, सुन्दर, परिष्कृत, अंजाम देना होगा। ताकि आनेवाले कल में बीता कल न दुहर सके। और सुकरात, दयानन्द, ब्रूनो, स्पिनोजा……यन्त्रणा और मृत्यु के शिकार न बनाए जा सकें।

(~क्रमशः)

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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