2/8 “दिव्य-मानव”

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे

“दिव्य-मानव”

स्वर्ग कहां हैं? “अल जन्नतों तहता कदम इल उम्म” कुशन शरीफ बहिश्त, स्वर्ग फैला हुआ हैं मां के पेरों के तले। ममता की पावन घनिष्ठ छांह ही स्वर्ग है। हम सबनें कम – अधिक समय के लिए गुनगुनाती ममता की छाया में सुखद सांसे ली हैं। आश्वस्ति भोगी है। हम वह ठहरा ठहरा आनन्द जानते हैं। ममता प्रेम ही आनन्द है, दुश्मनी घृणा ही दुःख है। घेरे दुश्मनी पैदा करते हैं अतः दुःखद हैं। हमें सुखद की और बढ़ना है। अतः ये घेरे तोड़ने हैं।

बाईबिल में ईसा मसीह कहते हैं … क्व नदजव वजीमत ें लवन ूवनसक जींज जीमल ेीवनसक कव नदजव लवनए जीपे पे ूीवसम व`ि जीम सूं ंदक जीम चतवचीमजे ण्ण् “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें। सब धर्मों सब पैगम्बरों की सीख बस इतनी सी हैं।” आदमी को सबसे प्यारे अपनें प्राण हैं! आदमी को ही नहीं संसार के समस्त प्राणियों को अपनी जान सर्वाधिक प्रिय हैं। यही सही अर्थों में पहचान लेना ही धर्मिक होना हैं।” समझ कर जान अपनी सी दुखाओ मत किसी का दिल”! दुःख बांटने पर दूसरा भी हमें दुःख ही देगा! सुख बांटने पर दूसरा भी हमें सुख देगा। भलाई करो तुम्हारा भला ही होगा।

एक छोटा सा सच हैं “जो मंदिर है वही गुरुद्वारा है, मसजिद और गिरजाघर है। 57 इतना छोटा सा सत्य पहचान कर आदमी कितना बड़ा हो जाता है। वह आदमी जो यह सच जानता हैं.. हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि से कहीं बड़ा हैं क्योंकि वह हिन्दू भी है, मुसलमान भी है, सिक्ख भी है, ईसाई भी है या एक बात में कहा जाए तो वह आदमी है और उनसे निश्चत्तः बड़ा है जो आदमी से कम हैं। जब कोई भी साम्प्रदाई व्यक्ति मनुष्य बन जाता है तो उसकी अंातसिक चेतना वातावरण में आनंद धाराओं के रूप में बह बह जाती हैं और चारों ओर पावनता, शान्ति, सौम्यता, स्नेह, सौदर्य तथा सुख ही सुख फैला देती है। परम चैतन्य से वह चेतना आप्लावित होती है।

मानव सृष्टि की सर्वोतम रचना है। मानव विशुद्ध क्षमता हैं परम होने की। इस विशुद्ध क्षमता की उत्तरोत्तर जागृति एवं विकास ही मानव का सर्वोच्च कर्तव्य है। इस सर्वोच्च कर्तव्य की राह में आने वाले रोड़े ही अधर्म है। विकास सोपानों पर उत्तरोत्तर प्रगति करने से सम्प्रदाय रोकते हैं। अतः सम्प्रदाय अधर्म हैं। विशुद्ध क्षमता को कुंठित कर देने पर मानव हो जाता है हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि। इस क्षमता को विकास देने पर ही वह बनता है इन्सान। इस मानव की सृष्टि में श्रेष्ठता अपूर्व है.. अद्भुत है..।

“मानव परम दिव्य कलाकार ही अभिनव कृति है। मानव की विचारणा शक्ति कितनी उदात्त है। सामर्थ्यों की अनन्त क्षमतायुक्त, परिधानों एवं कर्मों में कितना अभिव्यक्त एवं सराहनीय है। उद्योग में स्वर्ग दूतों सा सहज, उत्तमता एवं सर्वोच्च सौंदर्य की प्रतिमूर्ति का साक्षात रूप यह मानव जीवों का सिरमौर है।”58 इतना ऊंचा .. इतना विशुद्ध, इतना दिव्य मानव जब मूर्तियों, पत्थरों, मजारों के आगे सिर पटक पटक कर रोता है, उनमें भीख मांगता हैं उनके पांवो में गिड़गिड़ाता हैं तो मानवता अपनें इस बेटे के घोर पतन पर आंसू बहाती है। अरे इन्सान उठ अपनें अदंर धंसे इन अंधेरों के टुकड़ों को अपने शौर्य के प्रकाश से विनष्ट कर दे। तू गिड़गिड़ाने के लिए पेदा नहीं हुआ है, सिर झुकाने के लिए पैदा नहीं हुआ है, तेरी राह मे दिव्यता की राह है.. तेरा अन्तस् तो आनन्द का सागर है.. उठ इस आनन्द के सागर से सरोबार जो लोग हैं उनकी श्रेणी तक उठ.. आह्लादित तू दिव्यता के गीत गा.. गुनगुना विह्नलता में! अपनी क्षमताओं का विकास कर! पूर्ण विकास कर! अरे मानव ये सौदा बड़ा सस्ता है। नन्हें नन्हें सुख बांट कर जग में… ढेर ढेर सारे प्यार बटोर ले!

मानव रे तू “स्वाहा” हो जा! चारों और इत् उत् सर्वत्र एक अग्नि जल रही है! इस हर सम्प्रदायी धर्म में सतत् जलने वाली अग्नि का नाम है प्रेम! अपने आप सा सबसे प्रेम! इस दिव्य प्रेम की चादर ओढ़ ले रे मानव! बाकी सब छोटे छोटे चोले उतार फेंक! इस दिव्य प्रेम को अपना स्व अपना आत्म समर्पित कर दे अरे मानव.. बिखर बिखर जा सबका आत्मीय बन इस दुनियां में। तू अकेला बस सबका अपना हो जा, उतना ही अपना हो जा जितना तू खुद का अपना है। फिर आनंद की एक धारा चारों और बह जाएगी! मानव रे घेरे तोड़ दे!!

मेरा एक भयानक घेरा है। “यह नहीं मेरा” का महापाठ तू जानता है रे इसे जी ले। इदं न मम अपने जीवन में सार्थक कर ले। मम की सब क्षुद्र सीमाएं उठ.. उठ तोड़ दे! ये छोटे छोटे घेरे तो पिंजरे हैं इनकी तीलियां केवल तेरी कल्पना है अपने ज्ञान के पंख पसार.. इन तीलियों की विचारणा की तर्कश्य चोंच से परे तो करके देख.. ये सब हट जाएंगी.. मानव रे मन्दिर, मसजिद, गुरुद्वारे, गिरजे के छोटे छोटे पिंजरों में तू उड़ न सकेगा.. इनका विकास कर इन्हे मानवता गृह बना कि विश्व एक नीड़ हो सके.. तू .. तू उन्मुक्त दिव्य आकाश में उड़ सके।

घेरों को घेर दे रे मानव! तू मनुष्य बन.. आदमी बन.. इन्सान बन! सर्व व्यापक उस परमात्मा से तू अर्चना कर..

“हे दृढ़ बनाने वाले ब्रह्म! मुझे ऐसा दृढ़ बना कि विश्व के सारे के सारे प्राणी मुझे मित्रता से देखें! मैं भी सबको मित्रता से देखूं। (हम इतने दृढ़ हो आपस में) कि सब एक दूसरे को मित्र की ही दृष्टि से देखे!” 59

विश्व मैत्री का अध्यात्म स्वप्न यथार्थ करने के लिए हमें ये छोटे छोटे घर त्यागने होगें। “जय व्यक्ति” से ‘जय गृह’.. ‘जय गृह’ से ‘जय नगर’ से ‘जय-प्रांत’ से ‘जय जगत’ से ‘जय विश्व’ से ‘जय ब्रह्माण्ड’ को सार्थकता देनी होगी- अपनी प्रसुप्त क्षमता के अनन्तीय स्वरूप को यथार्थतः अनन्त करना होगा!

(~क्रमशः)

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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