२/५ सरलता

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे

“सरलता”

पाक, सरल जीवन जीना हमें प्रारम्भ करना होगा इसी पल से। हम संसार से अभय रहें, संसार हम से अभय रहे। द्वितीय धर्म पग अधिक कठिन है। शेर बकरी से अभय रहे तथा बकरी भी शेर से अभय रहे तब शेर का जीवन अभय गिना जाएगा। सरल जीवन, पाक जीवन जीनेवाले को दर्द, हर्ष नहीं छू पाता। “जिसके जीवन जीने से कोई उद्विग्न नहीं होता, और किसी के जीवन जीने से जो उद्विग्न नहीं होता। हर्ष, अहर्ष, भय उद्वेग से मुक्त रहता वह व्यक्ति ब्रह्म को प्रिय होता है।” 44 पूर्णतः अनुद्विग्न जीवन जीना एक कठिन साधना है। तभी तो वह उच्चतम धर्म है। धर्म की उच्चतम अवस्था में मानव परिष्कृत होता है। वह समझदारी पूर्वक बचपन जीता है। बचपन में बचपन जीना धर्म नहीं है। बड़े होकर बचपन सा सरल रह जाना धर्म है। “जो मूर्तिमान धर्म बन गया है, वह छोटे बालक जैसा होता है सरल, पवित्र और निष्कलंक”-लाओत्से के उक्त कथन की गहराई को आंकना होगा। “जो अपने को झुका देगा वह सरल होगा। जो अपने को खाली करेगा वह परिपूर्ण होगा। जो अपने को नम्र बनाएगा वह ऊंचा होगा। इसलिए ज्ञानी सरलता का ही पल्ला पकड़ता है।” 45 सरल, सहज, सौम्य व्यक्ति स्वयं असन्तुष्ट नहीं होता है तथा किसी की असन्तुष्टि का कारण भी नहीं बनता है। वही धर्म जीता है, धार्मिक होता है। किसी भी बाड़े में घिर जाना अपनी व्यापक सरलता को कम करना है। एक हिन्दू मस्जिद में, एक मुसलमान मन्दिर में उतने ही सहज नहीं रहते जितने कि हिन्दू मन्दिर में तथा मुसलमान मस्जिद में रहते हैं। ये असहजता पूजा के बाह्य भेदों पर आधारित हैं। इन बाह्य भेदों को तोड़ना होगा। महत्वहीन करना होगा तभी ये बाड़े टूटेंगे। तभी सहज प्रेम को व्यापकता मिलेगी।

व्यापकता एक अखिल सत्य है। संकीर्णता एक क्षुद्र असत्य है। व्यापकता की एक महत्वपूर्ण कड़ि है आत्मा। आत्मा का प्रयोग में आनेवाला रूप है “मैं”। यह विशुद्ध “मैं” न हिन्दू है, न मुसलमान, न सिक्ख है, न बौद्ध है, न जैन। ये सब तो आवरण हैं, जो हम इस ‘मैं’ को पहना देते हैं। आवरण या चोला अस्थाई है। अस्थाई चोला धारण कर उसे स्थाई समझकर उससे बन्ध जाना, अपने आप को अपने आप सा न जानना है। सम्प्रदायों ने धर्म की भयानक दुर्गति की है। इसलिए तो धर्म इन चोलों से परे की बात कहता है। धर्म कहता है मैं की तुलना में सर्वत्र जग देखो। “सुख या दुःख में आत्मा की उपमा से जो सर्वत्र देखता है, वही योगी है।” योग की यह परिभाषा गीता देती है। “सुख दुःख में आत्मा की उपमा से सर्वत्र देखना योग है।” 46 परिभाषा से स्पष्ट है कि प्राणिमात्र से समभाव, मैत्री रखना ही उच्चतम ब्रह्म सोपान से जुड़ने का तरिका है। इस सर्वत्र सम के पथ से भटक जानेवाले पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकते हैं। छोटे-छोटे झण्डों तले गिरजे, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे बना लेना सर्वत्र सम से भटकना है। धर्म की अपेक्षा निम्नावस्था पर ही रह जाना है।

(~क्रमशः)स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रियपी.एच.डी. (वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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