२/१ डबरों से सागर की ओर

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे

२/१ डबरों से सागर की ओर

अध्यात्म को अन्धेरे के, अज्ञान के, रूढ़ियों के अन्धतम भयानक शिकंजों से उन्मुक्त करना होगा। जो वस्तु जैसी है उसे वैसा ही जानना होगा। जो वस्तु जैसी जानते हैं उसे वैसा ही उपयोगित करना होगा। मैं हिन्दू हूं, मैं मुसलमान हूं, मैं ईसाई हूं, मैं जैन हूं, मैं सिक्ख हूं, मैं बौद्ध हूं, मैं कम्युनिष्ट हूं ये सब के सब भ्रामक कथन हैं। सत्य कथन यह है कि “हिन्दू धर्म मेरे लिए है”, “इस्लाम मेरे लिए है” आदि यदि धर्म मेरे लिए है तो मैं अपने को धर्म, सम्प्रदाय के दायरे से बाहर मानता हूं। धर्म का अपने लिए उपयोग करता हूं। पर जहां मैंने कहां मैं फलाना हूं, कि मैंने अपने आपको दायरे में कैद कर लिया। ‘मैं’ और ‘मेरे लिए’ के अन्तर को न समझ पाने के कारण इन्सान ने धर्म के हेतु उपयोगित होने की त्रुटि की। इस त्रुटि ने सम्प्रदाय को जन्म दे घृणा, विद्वेष, अशान्ति, दुःख तथा अधर्म के विकराल राक्षस समाज उपवन में खड़े कर दिए हैं।

मानव-व्यक्तित्व, मानव-अस्तित्व, मानव-परिचिन्तन तथा मानव-कर्म सम्प्रदाय के संकीर्ण दायरों से उन्मुक्त करने होंगे। सम्प्रदाय गढ़ जहां हमने महापुरुषों और भगवानों को भी गढ़ा है, जन्म दिया है वहां उनके व्यक्तित्व को सीमित भी किया है। उनके नामों को जिन्दा रखने के प्रयास में उनके गुणों की हत्या भी की है। हर सम्प्रदाय के मसीहा महापुरुषों को दायरे में सीमित कर उनके गुणों का सही व्यापक मूल्यांकन नहीं होने दिया गया है। हमें आज भूल सुधार करनी होगी। वरन् इन महापुरुषों के धवल प्रेरणादायक चरित्र उलझ-उलझ कर धर्म-अधर्म की इस छींटाकशी में बिखर-बिखर कर पूर्णतः नष्ट हो जाएंगे।

हमारा पवित्र दाइत्व है कि हम इन महापुरुषों को लघु घेरों से उन्मुक्त करें। जब ये महापुरुष अपने गुण रूप में मानव-मानव में जीवित हो उठेंगे तभी धर्म सार्थक होगा। हम अपने वैचारिक अस्तित्वों पर लादे गए अनफिट अर्थात कहीं तंग, कहीं ढीले संकीर्णता के लबादे उतार फेंके। कुएं के मेंढ़क से डबरे के मेंढ़क न बनें। सागर की ओर कदम धरें।

किसी भी सम्प्रदाय का आधार घृणा नहीं है। इन सम्प्रदायों में फैली नफरतों के आधार में भी प्रेम है। अपने से प्रेम करने वाले किसी से नफरत नहीं करते। जो अपने से प्रेम करते हैं वे सबसे प्रेम करते हैं। या सबसे प्रेम करने वाले ही अपने से प्रेम कर सकते हैं। यही महा धर्मवाक्य है। इसी के सहारे सभी घेरे तोड़े जा सकते हैं। एक शत प्रतिशत सच्चा हिन्दू सच्चा मुसलमान, सच्चा ईसाई भी होगा। शत प्रतिशत सच्चा ईसाई, सच्चा मुसलमान सच्चा हिन्दू भी होगा। यह एक धार्मिक आवश्यकता है। शत प्रतिशत परिशुद्धता में जब सब एक हैं तो फिर इतने सारे नाम क्यों धरे जाएं?

“अपने को धोकर पवित्र करो, भलाई करना सीखो, पीडितों का दुःख दूर करना सीखो।”  इस धर्मवाक्य से क्या कोई मुसलमान, ईसाई या हिन्दू इसलिए इन्कार कर सकता है कि यह यहूदी ग्रन्थ में लिखा है? “धन्य हैं वे जिनके हृदय शुद्ध हैं। धन्य हैं वे जो शान्ति करानेवाले हैं, मेल-जोल करानेवाले हैं।”  क्या यह वचन ईसाई ग्रन्थ में लिखा गया इसलिए शाश्वत होने पर भी हम गलत मान लें? शब्दों को बदल देने से सत्य नहीं बदल जाते। “ऐ ईमान वालों! क्यों कहते हो ऐसी बात जो करते नहीं?”  “तुम नेक काम करने की नसीहत देते हो और अपने को भूल जाते हो।”  हमें अपनी आंखें खोलनी होंगी… अन्दर भी और बाहर भी। सत्य यदि बाहर है तो उसे भी स्वीकारना होगा। असत्य यदि अन्दर भी है तो उसे भी स्वीकारना होगा। विश्व को पूर्ण रूप में यथावत जानना होगा.. यथावत जीना होगा।

(~क्रमशः)

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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