०२ धर्म की दुकानें

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे..

दुकानदारी और अध्यात्म में बहुत अन्तर है। आज दुकानदारी और अध्यात्म एक हो गए हैं। दूसरे की आवश्यकता का फायदा उठाना, भांति-भांति की सजावटों, शोर-शराबों द्वारा लोगों को आकर्षित कर बढिया उद्घोषणाओं के साथ घटिया माल मंहगे दामों में बेच देना दुकानदारी है। आज मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे भी सज-धज में एक दूसरे से होड़ कर रहे हैं। कराहती मानवता के सीने पर बड़े-बड़े भोज किए जाते हैं। अध्यात्मिक कहे जाने वाले फंक्शनों में बाम्बे पार्टियां बुलाई जाती हैं। करोड़ों जग-जग बल्बों द्वारा भवन सजाएं जाते हैं। इस शोर शराबे में खोटा अध्यात्म सस्ते मनोरंजन के रूप में बेचकर पैसा कमाया जाता है। खोटे अध्यात्म को और चमकाया जाता है। इस अन्तहीन और धार्मिक उत्सवों का अन्त करना होगा।

आज देश की संस्कृति का ऐक्य विध्वस्त है। नए-नए मतवाद के दुष्ट बीजाणुओं ने हमारी स्वाभाविक धर्म बुद्धि को क्लिष्ट और नीरस कर रखा है। विपरीत मुखी आकर्षण आज हम लोगों को हमारी चिरंतन प्रतिष्ठा भूमि से किसी अन्ध रसातल की ओर खींचकर लिए जा रहा है।

‘चिर शान्ति के अभय निर्झर’ की ओर प्यासे मानव को ले जाने वाला अध्यात्म इन संकीर्ण गलियों की भूल भुलैया में भटक गया है। हिन्दुत्व, मुसलमानियत, ईसाइयत, आदि-आदि सरल रैखिक प्रगति पथ नहीं है वरन् वृत्ताकार घेरे हैं। इन पर मानव कितना भी क्यों न चल लें, वहीं का वहीं घूमता रहता है। चिर शान्ति के अक्षय निर्झर से उतना ही दूर रहता है। धर्म की सबसे अधिक दुकानें तीर्थ स्थानों पर हैं। यहां एक छोटे-से-छोटा तिलक धारी भी इस घिनौने धन्धे में बुरी तरह लगा हुआ है। इस घिनौने धन्धे का अध्यात्म से बड़ी दूर तक का कोई नाता नहीं है। तमाम भारतवर्ष में मिलाकर 1 हजार 5 सौ से ऊपर प्रसिद्ध तीर्थ हैं। जिनमें अनगिनत मन्दिर और बेशुमार देवता बैठे-बैठे यात्रियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उन तीर्थों पर प्रतिवर्ष लगभग पांच करोड़ यात्री पहुंचते हैं और डेढ़ अरब से ऊपर धन जनता का इस मद में खर्च होता है। जिसमें से 90 करोड़ के लगभग मन्दिरों, महन्तों, और पुजारियों के पेट में आ जाता है।

धर्म के नाम पर चलते इस घिनौने धन्धे को बन्द करना हेागा। इन धर्म व्यवसाइयों को सामाजिक घृणा देनी होगी। इनके प्रति घोर उपेक्षा का व्यवहार करना होगा, अध्यात्म तक मानव को लाने के लिए ये कदम आवश्यक हैं।

जो बात नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने पन्द्रह वर्ष की उम्र में समझ ली थी वह कई-कई वृद्ध पुजारियों, पादरियों, मौलवियों को भी समझ नहीं आती है। पन्द्रह वर्ष की उम्र में सुभाष ने मां को लिखा-“मुझे आशा है इस बार पूजा बड़ी धूमधाम से मनाई जाएगी। पर मां क्या इस दिखावे, इस उत्सव की कोई आवश्यकता है? जिसे हम पाना चाहते हैं उसका सच्चे हृदय और पूरी इमानदारी से आह्नान करें इससे और अधिक क्या चाहिए? जब भक्ति और प्रेम चन्दन और फूलों का स्थान ले लेते हैं तब हमारी पूजा दुनियां की सबसे महत्वपूर्ण चीज हो जाती है।” दिखावा और भक्ति एक दूसरे के विरोधी हैं।

दिखावे की टीमटाम झीमझाम से भक्ति को मुक्त करना ही होगा। दिखावे के समस्त उपकरण तोड़नें होंगे, छोड़नें होंगे कि इन्सान भक्ति पर उतर सके ठहर सके।

यहां वहां से संग्रहीत असम्बन्ध शृंखलाहीन विचार कुछ कुछ इकट्ठे होकर सम्प्रदाय का रूप ग्रहण कर लेते हैं। इन संप्रदायों से बन्धे लोगों को इन विचारों का पूर्ण पाचन नहीं होता। और पाचन के स्थान पर ये लोग मानसिक अजीर्ण तथा अव्यवस्था के रूप में इनको फैलाते हैं।

अधकचरे विचारों को जब अधकचरे मानस ग्रहण करते हैं तो एक दलदली संस्कृति का निर्माण होता है। जिसमें यथार्थ में इन्सान नहीं जी सकते, पर इन्साननुमा शूकर खुशियां मनाते हैं। एक दूसरे पर कीचड़ उड़ाते हैं।

ये पण्डित, ये मौलवी, ये पादरी गीता पुराणों के, कुरान के, बाईबिल के लाउड़स्पीकर हैं।         धर्मग्रन्थों के बातों की तोता-रट हैं इनके प्रवचन भाषण। इनके द्वारा प्राप्त ज्ञान इनके ही आचरण में नहीं उतरा है। अन्य की तो बात ही दूर है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करना जिसे हम आचरण में प्रकट नहीं कर सकते, अन्त में आध्यात्मिक कब्ज और मानसिक अजीर्ण पैदा करता है। 5

मन्दिर, मस्जिद, गिरजों का कोई वजूद राम, कृष्ण, महावीर, गौतम, हजरत मुहम्मद, ईसा आदि से पूर्व नहीं था। इन महापुरुषों के चेलों, मोटी भाषा में कहा जाए तो चमचों नें इन्हें गढ़ा है। मन्दिरों, मस्जिदों आदि का गढ़न उन लोगों नें किया है जो महापुरुष नहीं हो सकते थे। इन मन्दिरों, मस्जिदों आदि की सत्य सीमा वे महापुरुष हैं जिनके नाम पर ये गढ़े गए हैं। इनसे किसी नए सत्य का उद्भव होना असम्भव है।

निर्धारित लक्ष्यों तक

                     पहुंचाई गई सड़कों!

                     तुम्हें बगावत करने का कोई हक नहीं है।

                     तुम्हारा कोई वजूद ही कहां था? 

सम्प्रदाय इन्कार को नकारते हैं। कुरान से इन्कार मुसलमानियत खोना है। बाईबिल से इन्कार ईसाईयत खोना है। “विधि निषेधों” की मृत लाशों के नियम जीवित नकारों से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ब्रूनो को जला दिया जाता है। सुकरात को जहर दिया जाता है। गैलीलियो को जेल में डाल दिया जाता है। दयानन्द को कांच पिलाया जाता है। धर्म का रूढीवादी अन्धा इतिहास बड़ा घिनौना है। धर्मशास्त्रों के संकीर्ण बन्धनों का नकार उदात्त विचारों के प्रसार करने का प्रयास जिस किसी नें भी किया उसका घोर विरोध पण्डितों, मौलवियों, पादरियों नें किया। उसे जलवा दिया, मरवा दिया।

कमजोर व्यक्ति सभा समाजों के सहारे जिन्दा रहता है। निर्बलता छिपाने का साधन बेईमानी छिपाने का तरीका हो गया है आज का धर्म। आज जरूरत है स्वस्थ तन, स्वस्थ मन, स्वस्थ मानस युक्त बलवानों की। सभा समाजों और सम्प्रदायों पर भरोसा मत करो। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह स्वयं अपने भीतर से बलवान हो। 7

मन्दिर, मस्जिद, गिरजे की शरण में जाना अपनी स्वाधीनता की हत्या करने के सिवाय और क्या है? ओ रे मानव! ये सब मतमतान्तर तेरी अपनी रचना हैं। तुम अपने आप को ईश्वर, ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, कृष्ण अथवा संसार के किसी अन्य महात्मा के अधीन क्यों समझते हो? तुम सब के सब स्वाधीन हो। (~क्रमशः)

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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