०१ छोटे-छोटे घेरे

घेरों को घेर दो उन्मुक्त हो ही जाओगे

०१ छोटे-छोटे घेरे


हिन्दू मुसलमान आदि कौन? मनुष्य ज्ञान के लिए है या ज्ञान मनुष्य के लिए है? इस प्रश्न का उत्तर इस नीतिवाक्य में है कि ”जीने के लिए खाओ खाने के लिए मत जीओ“ ज्ञान के लिए मनुष्य का रह जाना अध्यात्म से भटकाव है, ज्ञान मनुष्य के लिए है, मनुष्य ज्ञान के लिए नहीं है। इंसान का ज्ञान के लिए रह जाना उसे हिन्दू बना देता है, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन, बना देता है। और मानव का हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आदि हो जाना अध्यात्म की हत्या है, मानव की हत्या है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आदि कौन हैं? ये वे पशु हैं जो अतीत में हुए महापुरुषों के तप किए गए सत् असत् कर्मों की हड्डियों को सत् समझकर चूंसने में ही अपने को श्रेष्ठ समझते हैं।

जब ज्ञान के लिए आदमी रह जाता है तो वह ज्ञान का अन्धानुकरण करता है। वह ज्ञान के लिए शó उठा लेता है। अपने नाखून बढ़ा लेता है। इसी अन्धानुकरण के कारण कुरानवादी ने कहा ”एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में तलवार“ वेदवादी ने कहा ”आगे-आगे चार वेद चलेंगे और पीछे-पीछे सुसज्जित धनुष।“ ग्रन्थ साहबवादी ने कहा ”दोनोें हाथ से ग्रन्थ साहब सम्हालेंगे लेकिन कमर में पैनी कृपाण होगी।“ बाईबल वादी बोला ”शरीर पर बाईबिल और क्रास धारण करूंगा, लेकिन कन्धे पर बन्दूक रखंूगा। गिरजे में प्रार्थना करूंगा, लेकिन धर्मयुद्ध के लिए बारूद सूखी रखंूगा।“ 1

अध्यात्म तलवार, बन्दूक आदि के शरणागत हो गया तो वह अध्यात्म कैसा है? ज्ञान वह है जो मुक्त करता है। ज्ञान मुक्ति का साधन है। मुक्ति प्राप्ति पर यह साधन भी छूट जाता है। इस साधन से बन्ध जाने पर मुक्ति असम्भव है। मुक्ति समष्टि का अनुभव है और इस समष्टि का जिसे अनुभव हो गया है उसके लिए नैतिक मूल्यों के अनुसार आचरण करना उतना ही सहज, सरल और स्वाभाविक हो जाता है जितना सांस लेना। 2

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि होना बुरा नहीं है; पर हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, आदि ही रह जाना बहुत बुरा है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई होना यदि समष्टि के अनुभव में पहला कदम है तो वह सराहनीय है। ये तथाकथित धर्म समय के साथ चलने में समर्थ नहीं रह गए हैं, ये बूढ़े हो गए हैं, मर गए हैं। आज इन्हें जला देने की आवश्यकता है। इसलिए आदर के साथ इनको जला दो, नफरत के साथ नहीं। जैसे हमारे पिताजी मर जाते हैं तो उनकी लाश को आदर के साथ जलाते हैं। 3

”तटस्थता बुद्धि की आत्मा है।“ इस तटस्थता को धूमिल करते हैं, बिखरित करते हैं- सम्प्रदाय, संस्थान। मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे कालिख हैं जो तटस्थता पर थोप दी गईं हैं। इन मन्दिरोें, मस्जिदों, गिरजों, गुरुद्वारों से जो हवाएं बहती हैं उनमें शान्त, सौम्य, अध्यात्म की सुवास नहीं हैं, वरन् आवेगपूर्ण उफनती अनाध्यात्म की दुर्गन्ध है। इससे मानव मात्र को बचाना आवश्यक है। एक प्रेम के लिए अनेक घृणाएं फैलाना यदि धर्म है तो अधर्म क्या है? अन्धा व्यक्ति गन्दली आंख वाले व्यक्ति से कहीं श्रेष्ठ है। अन्धा व्यक्ति सभी कुछ को कुछ नहीं देखता है, जब कि गन्दली आंख वाला सभी कुछ गन्दला देखता है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजों, गुरुद्वारों से समाज में बहता तथाकथित धर्म एक ”बुद्धि महारोग“ है। जिससे मानवता को बचाना ही होगा। समाज मंे हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई का पैदा होना इस महारोग की जड़ है। समाज में बच्चे पैदा होने चाहिएं। हिन्दू बच्चे, मुसलमान बच्चे, ईसाई बच्चे-आदि आदि नहीं। जो बहुत बड़ा दुर्भाग्य इस जगत में घटा है वह यह है कि हम अपने धर्म को जन्म से तय करते हैं। इससे बड़ी कोई दुर्भाग्य की घटना पृथ्वी पर नहीं हुई। क्योंकि इससे सिर्फ उपद्रव होता है और कुछ भी नहीं होता। दुनियां से धर्म के नष्ट होने के बुनियादी कारणों में एक यह है कि हम धर्म को जन्म से जोड़े हैं। एक बार मैं एक बड़े ही विचित्र आदमी से मिला वह अपना यह दावा अभिव्यक्त कर रहा था कि वह पांच हजार साल से वही है, और आने वाले पांच हजार साल तक वही रहेगा। वह कह रहा था कि मैं अमर हंू, कभी नहीं मर सकता। लोग उससे बड़े प्रभावित हुए।

”महात्माजी आपका शुभ नाम?“ -मैंने पूछा।
”बुद्धु महाराज“- उसने कहा।
”आपके पिताजी का नाम?“ -मेरा दूसरा प्रश्न था।
”बुद्धु महाराज“ वह बोला।
”आपके बेटे का नाम ?“……”बुद्धुमहाराज“। और मैं समझ गया कि पांच हजार साल क्या करोड़ों साल तक यह आदमी जिन्दा रहा है और जिन्दा रहेगा। पर यथार्थता तो यह है कि करोड़ों वर्ष पूर्व के पहले बुद्धु महाराज ने लगातार मुर्दों को जन्म दिया है। हमें सोचना है कि क्या हमें विश्व को मुर्दों का जमघट बनाना है? बुद्धु महाराजोें से भरना है इसे? बुद्धु महाराज का नाम हिन्दू, मुसमान, सिक्ख, ईसाई जैन आदि रख देने से क्या सत्य बदल जाएगा? नहीं सत्य वही रहेगा। हमें जीवित होना होगा, हमें नए सिरे से पैदा होना है और नए आदमी को पैदा करना है।

हमारे बाप-दादे बेशक हमें सत्य बता सकते हैं, दिखा सकते हैं। पर वे हमारे सत्य, हमारे जीवन निर्धारित नहीं कर सकते। उन सत्यों का विकास करने का हमें पूरा हक है और इस हक को कुंठित करने का अधिकार किसी मन्दिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे को नहीं है।

कोई आदमी नास्तिकता को कांससली (विचार पूर्वक) चुनता है, उसे चुनना पड़ता है। वह कहता है -नहीं है ईश्वर, तो यह उसका चुनाव होता है। और जो आदमी कहता है कि ईश्वर है, यह उसके बापदादों का चुनाव है इसलिए नास्तिक के सामने आस्तिक हार जाता है। उसकी विरासत चल अचल सम्पत्ति की होती है। उसे सम्पत्ति तक ही सीमित रखना होगा। विचारों की विरासत की परम्पराएं खत्म करनी हांेगी। किसी भी मानव को वेद, कुरान, बाईबिल, पिट्टक, ग्रन्थसाहब विरासत में नहीं दिए जाने चाहिए। किन्हीं भी परिस्थितियों में लादे गए सत्यों के भयानक बोझों से आदमी को बचाना होगा, कि वह उन्मुक्ति की सांस ले सके।

”अस्थाई का स्थाई के लिए समर्पण ही अध्यात्म है।“ मानवता के कुछ मूल्यों के आधार पर काल विशेष में प्रचलित सम्प्रदायों से अधिक स्थाई है- मानवता। स्थाई एवं अस्थाई का एक सुन्दर उदाहरण है भूख एवं भोजन। भूख स्थाई है, भोजन ग्रहण करना अस्थाई। भूख के लिए भोजन होना चाहिए, भोजन के लिए भूख नहीं। भोजन के लिए भूख का अनाध्यात्म शारीरिक, मानसिक, विकृतियों को उत्पन्न करता है। धर्म के क्षेत्र में हम बहुत ही पिछड़े हैं। हम ज्ञान भूख के अनुसार पुस्तकें नहीं पढ़ते हैं। वरन् पुस्तकों के आधार पर ज्ञान भूख गढ़ते हैं। जब हम ज्ञान भूख के स्थाइत्व को सीमित तथा कल यहीं न रह जाने वाले संकीर्ण विचारों के भोजन के लिए ही रह जाने देते हैं तो हमारा स्वस्थ जीवन अपनी सम्पूर्ण ताजगी खो देता है। जीवन की ताजगी खोना, सुवास खोना ही हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, जैन, बौद्ध आदि हो जाना है।

”कल त्यागने पर आज मिलता है। कितनी दुःखद स्थिति है अध्यात्म की कि हम कल त्यागने को तैयार नहीं हैं और आज की हममें तीव्र तमन्ना है। परिणामतः हमारा आज कल से विकृत है। इस विकृति के नष्टीकरण का एक ही पथ है-हमें इन तथाकथित धर्मों का उदात्तीकरण करना होगा। इन्हें एक परिष्कृत ”एका“ के अन्तर्गत लाना होगा। ये सम्प्रदाय मंजिल तलाशने में पथ भूल चुके हैं। ‘उदात्त एका’ में हमें पथ को ही मंजिल करना होगा। मंजिल के सफर के शाश्वत सत्यों का उद्घोष करना होगा।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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