सृष्टि विषय

मंच पर आसीन आदरणीय महानुभावों एवं मान्यवर श्रोताओं तथा प्यारे मित्रों आज मैं आप के समक्ष सृष्टिविद्या के विषय में अपने कुछ विचार रखना चाहता हूँ।

इस संसार को ईश्वर ने बनाया है। ईश्वर संसार को सत्व, रज और तम नामक तीन मूल कणों से बनाता है। जैसे रोटी बनाने की सामग्री आटा है वैसे ही संसार को बनाने की सामग्री को सत्व, रज और तम कहते हैं। इन तीनों के सम अवस्था का नाम प्रकृति है। प्रकृति जड़ है। संसार में सबसे पहले बनने वाला पदार्थ महतत्व है, जिसे बुद्धि कहते हैं। संसार में सबसे अन्त में पांच महाभूत बनते हैं। पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। संसार अपने आप नहीं बन सकता, क्योंकि वह जड़ है। जड़ पदार्थ में अपने आप क्रिया नहीं होती। मनुष्य, पशु-पक्षी आदि प्राणियों के शरीरों को ईश्वर ही बनाता है, किन्तु सत्व, रज और तम (प्रकृति) को कोई नहीं बनाता, ये अनादि हैं।

जो कभी उत्पन्न नहीं होता उसे अनादि कहते हैं। ईश्वर, जीव और संसार का मूल कारण प्रकृति (सत्व, रज और तम) ये तीन पदार्थ अनादि हैं। अनादि सत्व, रज और तम को प्रकृति कहते हैं तथा इससे उत्पन्न सृष्टि के पदार्थों को विकृति कहते हैं। किसी भी पदार्थ के बनने में तीन कारण होते हैं। पहला है निमित्तकारण याने बनाने वाला, उदाहरण – हलवाई। दूसरा है उपादान कारण याने बनाने की सामग्री, उदाहरण – सूजी, घी, चीनी। तीसरा है साधारण कारण याने अन्य सहयोगी साधन, उदाहरण – कड़ाही, चूल्हा, कड़छी आदि। निमित्त कारण हमेशा चेतन ही होता है तथा उपादान कारण हमेशा जड़ ही होता है।

बीज का अर्थ है कारण। कारण हमेशा कार्य से पहले होता है। इसलिए वृक्ष से पहले बीज होता है। जैसा हम कर्म करते हैं वैसा ही हमें फल प्राप्त होता है। बिना कर्म के कुछ नहीं मिलता। केवल अपनी इच्छा से ईश्वर किसी को राजा या फकीर नहीं बना सकता। ईश्वर सर्वज्ञ होने से उससे कभी भूल-चूक नहीं होती।

पहले पृथिवी आदि पदार्थ बने तदनन्तर जलचर थलचर नभचर पशु-पक्षी मछली आदि जीव बने और सबसे अन्त में मनुष्य की उत्पत्ति हुई। मनुष्य की उत्पत्ति सबसे पहले तिब्बत में हुई। हजारों की संख्या में युवा स्त्री-पुरुषों को परमात्मा ने धरती में गर्भ उत्पन्न करके रचा। सृष्टि के आदि में सकल जीवों की रचना अमैथुनी होती है। उसके बाद की सृष्टि नर और मादा द्वारा प्रजनन प्रक्रिया याने मैथुनी सृष्टि होती है। संसार में दो प्रकार की योनियाँ हैं। एक मनुष्य जो कर्म एवं भोग उभययोनी है तथा दूसरी मनुष्य से भिन्न भोग योनियां पशु-पक्षी मछली वृक्षादि।

कुछ सम्प्रदायवाले यह मानते हैं कि पृथ्वी को नाग अथवा बैल ने धारण किया है। जब कि सच्चाई यह है कि पृथ्वी को नाग अथवा बैल ने नहीं अपितु ईश्वर ने धारण किया है। हमारी पृथ्वी के अलावा ब्रह्माण्ड में अन्य स्थानों पर भी जीवसृष्टि अवश्य है।
संसार चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों तक विद्यमान रहता है। उसके बाद संसार का विनाश अर्थात् प्रलय हो जाता है। प्रलय भी उतने ही काल का अर्थात् चार अरब बत्तीस करोड़ वर्षों का होता है। इस एक सृष्टि-प्रलय के काल को ब्रह्म-अहोरात्र याने ब्रह्मदिन और ब्रह्म-रात कहते हैं। प्रलय के बाद संसार फिर से उत्पन्न होता है। इस प्रकार सृष्टि-प्रलय-सृष्टि-प्रलय का चक्र सतत चलता है। सृष्टि को बनाने चलाने अथवा विनाश करने का ईश्वर का अपना प्रयोजन कुछ भी नहीं है। हम जीवों के भोग और अपवर्ग याने मोक्ष की सिद्धि के लिए ही ईश्वर सृष्टि रचना करते हैं।

हम जीवों की सत्ता अनादि काल से है, तथा हम अनादि काल से कर्म करते आ रहे हैं। इसलिए हमारे कर्मों का फल भुगाने हेतु एवं हमें मोक्ष प्राप्त कराने के लिए ही ईश्वर भी अनादि काल से सृष्टि रचना करता आ रहा है। सकाम कर्मों से जीव सृष्टि में बार-बार जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त होता है जबकि निष्काम कर्मों का फल मोक्ष है। जीव का मोक्ष अनन्त काल के लिए नहीं होता परान्त काल याने 31 नील, 10 खरब, 40 अरब वर्षों तक जीव मोक्ष में रहता है पश्चात् पुनः सृष्टि में जन्म धारण करता है। संसार को साधन मानकर ईश्वर को साध्य माननेवाले साधक ही निष्काम कर्मों को करके जन्म-मरण के चक्र को तोड़ पाते हैं और मोक्ष में प्रवेश कर पाते हैं। आइए इस वैदिक तथ्य को समझ तथा अपना कर हम भी मोक्ष के भागी बनें।

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