सफल गृहणी बनने के एक सौ एक सूत्र’

ममेरी बहन रीती की बेटी रोमा के विवाह पर ‘‘परीक्षा में सफलता के एक सौ एक सूत्र’’ पुस्तक देख कुछ भाभियों नें साधिकार अनुरोध किया कि मैं सफल गृहणी बनने के एक सौ एक सूत्र भी लिखूं। तब तक मैं ‘भरथरी प्रबन्धन’ एवं ‘साक्षात्कार सफलता के एक सौएक सूत्र’ पुस्तकें प्रारम्भ कर चुका था। ‘परीक्षा में सफलता के एक सौ एक सूत्र’ का प्रथम संस्करण हाथों हाथ समाप्त हो गया। मेरा सुख यह है कि हजारों विद्यार्थी सुज्ञान लाभान्वित हुए। इसी बीच एक शास्त्रीय पुस्तक ‘‘ऋतद्युम्न प्रबन्धन’’ पूरी की थी। इसके बाद यह पुस्तक शुरु की।
पुस्तक आपके हाथ है। आपका गृहस्थाश्रम सुखद हो।
डॉ. त्रिलोकीनाथ क्षत्रिय
पी.एच.डी.(वेद), एम.ए.(आठ विषय), सत्यार्थ शास्त्री,
बी.ई., एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई.,
एम.आई.ई., आर.एम.पी. (१०७५२)
बी ५१२, सड़क-४, स्मृतिनगर, भिलाई नगर,
पिन-४९००२०, (म.प्र.) दूर : (०७८८) ३९२८८४
एक सौ एक बातों की एक बात भूल जाईए दूरदर्शनी, समाचारपत्री, पत्रपत्रिकाई, पाश्चात्य, नौकरीयाई, प्रजातन्त्री आजादी की सारी बातों को कि ये बातें शाश्वत ऋत नियमों शृत नियमों के विरुद्ध है। विश्व की कोई भी नारी गृहीणी की तो बात अलग है उपरोक्त आजादी को जीकर न तो सफल हो सकी है न हो सकेगी। याद राखए विश्व की खेलकूद प्रतियोगिताओं की स्वतन्त्रता को।।१।।
खेलकूद प्रतियोगिताओं की स्वतन्त्रता यह मानकर चलती है कि स्त्री पुरुष शरीर भिन्न क्षमता भिन्न हैं। जो कि प्राकृतिक सत्य है। तभी यह स्वतन्त्रता स्त्री पुरुष की प्रतियागिताएं भिन्न भिन्न रख स्त्रियों के स्वतन्त्रता हक का शत प्रतिशत सम्मान करती है। विश्व नारी विश्व पुरुष यह ऋत सत्य है कि आप खून में रक्त कण मात्रा प्रति घन मीटर, मस्तिष्क के आकार, रक्त में कोलेस्ट्रॉल, शारीरिक आकार प्रकार, तन वसा कार्बोहाईड्रेड संचयन उपयोग, चय अपचय प्रक्रिया पुरुष सम नहीं पुरुष विषम है। यह विषमता उत्तम पूरकता के सन्दर्भ में है। इसकी जीवन में कद्र करती नारी तथा कद्र करते पुरुष ही सफल युगल हो सकते हैं। आप ही इसकी कदर न कर अनृता होकर भला सफल कैसे हो सकेंगी?।।२।।
स्त्री पुरुष प्राकृतिक मानसिक शारीरिक विषमता, सोच विषमता अति आह्लादकर है। समानता की सोच जो स्त्री पुरुष संबंधों की अशृत (शाश्वत अनैतिक) सोच की उपज है मूलतः अतिकष्टकर है। आह्लाद हर व्यक्ति का जन्मजात हक है। आह्लाद सफलता का आधार तथ्य है। सफलता का आह्लादकर पथ चुनिए। युगल आनन्द के द्वार आपका स्वागत करने खुल गए हैं।।३।।
सतत मध्यम श्रम आपकी तन मन योग्यता एवं उपयुक्तता है। आपमें मातृत्व होने के कारण यह प्रकृति की आवश्यकता भी है। असतत उच्च श्रम पुरुष की तन मन योग्यता एवं उपयुक्तता है। उनमें पितृत्व होने के कारण यह प्रकृति की आवश्यकता भी है। पुरुष आपके मातृत्व कार्यों आप पुरुष के पितृत्व कार्यों मुग्ध हों यही सफलता है।।४।।
एक + एक = एक यह एक स्त्री तथा पुरुष का अगणितीय, अद्वितीय रिश्ता है। दुग्ध + दुग्ध = दुग्ध धवल पौष्टिक सुस्वादु इस रिश्ते की कद्र किजीए। याद रखिए हर द्वि धवलता कर्म पवित्र है। आपके तथा पुरुष के जीवन के पल एक + एक = एक पल हैं। पुरुष कन्धे पर रखा आपका हाथ अमृत हाथ है। आपके शीश पर रखा पुरुष हाथ अमृत हाथ है। आप दोनों के बच्चों शीश रखे हाथ अमृत हाथ हैं। आपका परिवार अमृता है।।५।।
संस्कार का अर्थ है भूषणभूत सम्यककरण। सहजता, सरलतापूर्वक स्वाभाविक गुण अलंकृत कर देता है जो वह है संस्कार। हर धर्म में जीवन संधियों, उम्र संधियों, ऋतु संधियों पर संस्कार प्रावधान है। संस्कार घर में होता है। यह गृह धर्म है। इससे बच्चे नमस्ते, नमन, चरणस्पर्श, व्यवहार विविधता, बातचीत, सामाजिकता, आयोजन, कौशल, वाक् चातुर्य सहजता, सरलतापूर्वक सीखते हैं। संस्कार केन्द्रिय महत्ता के कारण उनका स्वविकास होता है।
संस्कार गृह सफलता है जो गृहणी सफलता है। पर एक शर्त संस्कार को आडम्बरों से बचाएँ।।६।।
गृहीणी के दिव्य नाम सुशेवा, सुमंगली, अघोरचक्षुणी, शिवा, अपतिघ्नी, वधुरिमा, प्रतरणी आदि हैं। इन समस्त नामों के गुणरूप में गृहणी स्वगृहकार्य क्रियान्वित करती है वह सफल होती है। इन नामों को स्मरण कर लें, ये कई जगह उपयोगी हैं।।७।।
उपरोक्त सारे नाम गृह व्यवस्था के हैं। ‘गृह व्यवस्था’ गृहणी के घर की साज सम्हाल का नाम है। गृहणी की पूरी गृह व्यवस्था पर छाप होती है। गृह से गृहणी नाम है। गृह व्यवस्था में गृहणी के सफलता के साठ प्रतिशत तत्त्व समाहित हैं। ‘गृह व्यवस्था’ गृहणी को स्वयं करनी तथा करानी चाहिए। मात्र स्वयं कोई गृहणी गृह व्यवस्था कर नहीं सकती है। जो गृहणी मात्र स्वयं गृह व्यवस्था करती है वह स्वयं का, बच्चों का, पति का भविष्य बरबादी की ओर ढकेलती है।।८।।
तीस वर्ष पूर्व एक पच्चीस वर्षीया गृहणी गृहकार्य में किसी से भी सहयोग लेना पसंद नहीं करती थीं। पति द्वारा बच्चों पति से सहयोग लेने की बात पर तिनुक कर कहती थी- ‘‘मेरे हाथ पैर टूट गए हैं क्या, जो तुम लोग घर का काम करोगे?’’ आज पचपन वर्ष की उम्र में उम्रीय परेशानियों में उसमें वह ऊर्जा नहीं रह गई। बच्चे कामचोर हैं, अस्तव्यस्त हैं। पति गृहकार्य बेकार है। परिणाम गृह बेतरतीब है। बेटी को पराए घर मजबूरन काम करना सीखना पड़ रहा है।।९।।
मेरी माता जी कुशल गृहणी थीं। निवार, खेस स्वयं बुनती थीं। भैंसे सम्हालती थीं। मक्खन, घी, बनाती थीं। घर के सारे काम सौदा सुलफ तक लाती थीं। घर में व्यंजन- पिन्नी (आटे के लड्डू) टिक्की आदि भी बना कर हमेशा रखती थीं। कपडे धोना, साफ सफाई भी स्वयं के जिम्मे थी। मैं इन्जीनियर हो दूसरे शहर आ गया था। छुट्टी में वापस अपने घर गया। सबेरे का समय था। मां बोली ‘‘काका जमावड़ा रिड़क दे’’ (दही मथ दे) मैं जमावड़ा रिड़कने लगा। मां बचपन से गृहकार्य में बच्चों की लबालब ऊर्जा का सदुपयोग करती थीं। हम पांचों भाई-बहन ताउम्र मेहनती, मेहनत में सहयोग देनेवाले, सहयोग लेनेवाले रहे।।१०।।
गृह सामूहिक है। गृहव्यवस्था सामुहिक दायित्व है। गृहणी गृहनेता है। बच्चे शक्ति भरे होते हैं। गृह सामाजिकता की पहली सशक्त रिश्ता खून संबंधि इकाई है। इसीलिए यह ऊर्ध्वगति आगे ले जाता अश्व है। गृहणी दाईत्व है। इसे गृह उद्योग रूप में परिवर्तित कर परिवार संकल्पना सार्थक करें। समूह श्रमानन्द, सामाजिकतानन्द, स्नेहसम्बन्ध सने परिवार को सुखद आनन्दित कर देता है।।११।।
गृहव्यवस्था गृह सारतत्त्व है। इसके कई उपतत्त्व हैं। हरेक तत्त्व सार्थक है। तत्त्वों में एक दूसरे की मिश्रता है। तत्त्व एक दूसरे के भी सहयोगी हैं। सभी तत्त्वों का ध्यान रखना गृहणी का सर्वांगणीय दाईत्व है। ये तत्त्व गृहणी को गृह में सर्वव्यापक, सुविधासम्पन्न, शक्तिसम्पन्न होने में सहायता करते हैं। गृह सदस्यों की सुविधा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, उन्नति शान्ति आदि में अभिवृद्धि गृहव्यवस्था के उद्देश्य हैं। कुछ गृहणियाँ मात्र अपने लिए गृहव्यवस्था करती हैं। इस अंश दोष से गृहणी को बचना चाहिए।।१२।।
गृहणी गृह की ब्रह्म है। ब्रह्म सारे विश्व में शाश्वत प्राकृतिक नियमानुरूप (ऋत), शाश्वत नैतिक नियमानुरूप (शृत) और सत्यानुरूप व्यवस्था श्रम, ज्ञान तथा तप पूर्वक सप्रयास, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक होने के कारण सतत कायम रखता है। देवव्यवस्था उसमें सहयोगी होती है। गृहणी गृहब्रह्म को गृह की व्यवस्था ऋत, शृत, सत्य नियमानुरूप श्रम, ज्ञान, तपपूर्वक प्रेम ममता वात्सल्य रिश्ते जुड़ी व्यवस्था सहयोग से अप्रतिम रचनी चाहिए। एक बार गृहव्यवस्था कर लेने पर उसे कायम रखने पर वह स्वयं कार्यों में अतिमददगार होती है और गृहकार्य सहज सम्पन्न होते हैं।।१३।।
मां के चरणोंतले स्वर्ग है। मां के चरण महा-वर सजे हैं। यह महा-वर गृह व्यवस्था का है। चरण महावर है। कर कौशल है। पति देव है। शिशु उपदेव है। बुजुर्ग महा-देव है। रिश्तों में अमृत बहता है। घर अमृत घर है। मां के महावर चरणों तले स्वः आनन्द गतिशील है गृहस्थाश्रम।।१४।।
गृहव्यवस्था के उद्देश्य हैं १) परिवार जन उन्नयन, २) समय क्षरण बचाव, ३) गृहसदस्य कल्याण, ४) अभिवृद्धिकरण- परिवार क्षरणरक्षण, ५) उल्लंघनकर्ता को दण्ड, ६) सुस्वास्थ्य, ७) पर्यावरण, ८) अभिरक्षण। याद रखें घर पंचतारा होटल नहीं है, आडम्बर नहीं है। रिश्तों की खिल-खिल, हिल-मिल, गतिशील सामाजिकता है। जिसकी दिव्य धुरि आप हैं। परिवार वसुंधरा आप धुरि पर सुशर्माणम् है।।१५।।
‘‘सुशर्माणम्’’
अत्यन्त सुखकर व्यापक घरवत है सुशर्माणम् व्यवस्था। घर के तत्त्व हैं- १) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (चार पुरुषार्थ) पथ गमनकर्ता शक्तिमय सतत गतिशील अश्व, २) अविराम ऊर्ध्वगतित, ३) प्रशिक्षित गति, ४) सौहार्द, सेवा, निरोगिता, सुखकर, शान्तिदायक, आनन्ददायक व्यवस्था, ५) अवीनामी अर्थात विस्तरणशील, ६) समय (काल) के समान सर्पणशील, ७) ज्योति, ८) उमंग, उत्साह प्रवाह भरा- त्रि आश्रम आधार, ९) ज्ञान केन्द्र, १०) शिशु के आह्लाद, उछाह का केन्द्र, ११) परिवार सदस्य शुभगमन, १२) रमणीय, १३) श्रेष्ठ निवास, १४) स्व-हा जहाँ सब एक दूसरे को समर्पित हैं। ऐसा घर है सुशर्माणम्। जिसकी अधिष्ठात्रि आप गौरवमयी हैं।।१६।।
‘‘अघोरचक्षुणी’’
गृह की गृहव्यवस्था का आधार संसाधन तथा मस्तिष्क है। मस्तिष्क हर वस्तु का सदुपयोग गृहव्यवस्था में कर सकता है। ‘घोर’ का अर्थ है क्रूर भयानक। अघोरचक्षुणी का अर्थ है जो चक्षुप्रिय हो। चक्षुप्रिय का अर्थ है मानस प्रिय। इसका तत्त्व है सलीका। पॉश मूढ़ो, कक्ष झोपड़पट्टी, अनगढ़ मार्बल दीवार, बैलगाड़ी पहिया, पाश शोकेस, मेहंगी वस्तु सजाया, पंचतारा होटलवत सजा कक्ष, रंगोरोगन सोफे, बेतरतीब तरतीब चुंधियाती व्यवस्था जो अन्य अवसरों प्रभावशील है गांधी विचार संगोष्ठी के समय घोरचक्षुणी हो जाता है।।१७।।
करीने से सजी, चीथड़े भी जहाँ सुव्यवस्थित बांस लटके, सिल-लोढ़ा भी जहां साफ सुथरे, माटी फर्श लिपा-पुता, कच्ची दीवारें धूल झड़ी, तवा चुल्हा साफा सुथरा, आईने कंघी क्षेत्र ही साबुन तेल, चारों कोने किचन, कपड़ा, शृंगार, बक्सा सामान, त्रिभुज कक्षवत बना है जिस झोपड़ी में तथा बड़ी दीवार मध्य पलंग बेधूल चादर बिछा है जिसमें वह झोपड़ी भी चक्षुप्रिय अघोरचक्षुणी है।
अघोरचक्षुणी, सदुपयोगिनी, सुभद्र, अतिउत्तम गृहव्यवस्था का श्रेष्ठ मापदण्ड हवाईजहाज में टॉयलेट रूम है। अवसर मिलने पर रुके या उड़ते हवाई जहाज में गृहणी को टॉयलेट गृहव्यवस्था अवश्यमेव देखनी, सीखनी, करनी चाहिए।।१८।।
‘‘अपतिघ्नी’’
जो व्यवस्था का उल्लंघनकर्ता है उसे दण्ड देनेवाली व्यवस्था का नाम अपतिघ्नी है। मकान मालकिन तो कहीं नजर नहीं आ रही है पर पूरी व्यवस्था में जो करीना (कौशल) है उसमें उसकी छाप है। इस व्यवस्था के अनाधिकृत हैं चोर, नौकर, बाइयाँ, अपरिचित। यदि इनमें से कोई भी कोई वस्तु लेता है तो उसका तत्काल गृहणी को पता लग जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था अपतिघ्नी है। सबसे घातक गृहव्यवस्था का नाम पतिघ्नी है जहां अधिकृतों को ही आवश्यक होने पर ढूँढने पर वस्तुएँ नहीं मिलती और सारा घर चिल्ल-पों हो जाता है। सावधान पतिघ्नी व्यवस्था समयखाऊ व्यवस्था है। स्त्रियों के गहनों की पेच व्यवस्था अपतिघ्नी होती है।।१९।।
‘‘स्योना’’
सुखदायिनी व्यवस्था का नाम स्योना है। ‘सु-खम्’ अर्थ है उत्तम इन्द्रियाँ। स्योना का अर्थ है इन्द्रियों के लिए उत्तम। घर इतना पॉश होटलवत बहुत सजा हो कि चलते-फिरते टेबल लॅम्प, सजावटी मूर्तियाँ, बस्तर आर्ट के घोडे, नृतक, दीवार उभरे शोकेस, कमरे मध्य सोफा, मोढ़ादि सजावट क्रम ही बाधा बन जाए तो ऐसी व्यवस्था अस्योना होगी। याद रखिए घर घर है होटल नहीं, और होटल होटल है घर नहीं। दोनों के उद्देश्य, नियम, कार्य, सिद्धान्त अलग-अलग हैं।
घर को होटल बना लेते हैं जो लोग।
सर पे आसमां उठा लेते हैं वे लोग।।
डंडे लगी झाडू-पोंछा व्यवस्था ऊंचाइयों तथा पलंगों के नीचे सफाई करने में उपयोगी होने के साथ-साथ स्योना भी है। आधुनिक विद्युत धूल शोषक भी इस दृष्टि उपयोगी है पर उनकी ‘स्व-सफाई’ भी समय खाती है। रैकों में भारी सामान नीचे हल्के ऊपर स्योना व्यवस्था है। बर्तन व्यवस्था में विशेष ध्यान रखना है कि निकालते रखते समय न्यूनतम टनटनाएँ। भाग्य भरोसे व्यवस्था में बर्तन सामान बहुत गिरते, बहुत टनटनाते, बहुत टूटते हैं। आपके पति यदि प्रशिक्षित अधिकारी या दुकानदार हैं तो उनसे गृहव्यवस्था में सलाह लें। दो मस्तिष्क सामंजस्य में एक से बेहतर होते हैं।।२०।।
‘‘सुयमा’’
उत्तम गृहनियमों से उद्भूत गृहव्यवस्था सुयमा कहलाती है। कुछ गृहणियाँ ‘‘ठूस-परदा’’ व्यवस्था करतीं हैं। मैं एक शहर में आ अमीर हो गए परिवार के यहाँ गया। बडी पॉश अलमारी कव्हरों की व्यवस्था थी। पुरानी पहचान थी, मैंने गृहणी से कहा- ‘‘शामो तूने घर को खूब सजाया है। अघोरचक्षुणी व्यवस्था है।’’ वह बहुत खुश हो गई। ‘‘सारा सामान क्या इन छोटी अलमारियों में है?’’ मैंने एक अलमारी खोली। उसमें भयानक ठूस व्यवस्था थी। किताबें, कपड़े, चादरें सब अस्त-व्यस्त भर दिए गए थे। मैंने कहा- ‘‘क्या आन-तान सब भर रखा है?’’ शामों पानी-पानी हो गई, बोली- ‘‘सब धीरे-धीरे ठीक करूगी न भैया!’’।।२१।।
सात सुर क्रमबद्ध बजने से सुमधुर संगीत पैदा होता है। यम, नियम, (संयम) योग सधने से जीवन में संगीत उभरता है। सुयमा गृहव्यवस्था का भी ऐसे ही एक संगीत होता है जो घर के रिश्तों में माधुर्य भर देता है। आगंतुक अतिथि को यह संगीत मुग्ध कर देता है। मैं अपने मित्र के घर पहुँचा, बैठा ही था कि बत्ती गुल हो गई। भाभी ने अंदर से कहा- ‘‘भाई साहाब दाएँ टेबल दाईं ओर आपके साईड के कोने रखी माचीस जला वहीं की मोमबत्ती जला लीजिए।’’ यह सुयमा संगीत अति मधुर था। हर वस्तु के लिए समुचित स्थान, और हर वस्तु समुचित स्थान पर ही यह सुयमा व्यवस्था है।।२२।।
‘‘प्रजावती’’
प्रजा का प्रतीक हाथ है। हाथ व्यवस्था प्रजावती है। अंगूठा = ज्ञान, तर्जनी = शौर्य, मध्यमा = संसाधन, अनामिका = शिल्प, कनिष्ठा = सेवा। उपलब्ध समुचित संसाधनों का बच्चों की भी सेवा लेते हुए कलात्मक (शिल्प) सप्रयास ज्ञानपूर्वक सदुपयोग जिस व्यवस्था में है वह व्यवस्था प्रजावती है। सारे परिवार की सहभागिता गृहव्यवस्था में जरूरी है। अन्यथा अप्रजावती गृहणी दिन-रात अकेली ही गृह व्यवस्था करती रहेगी।।२३।।
‘‘वामा’’
क्षय नाम है संसार का, शरीर का, गृह का। क्षय निवास को कहते हैं। संसार निवास प्राणी जगत का, शरीर निवास आत्मा का, गृह निवास परिवार सदस्यों का। वामा नाम है गृहस्वामिनी का। गृह हमेशा क्षयमान परिवर्तनशील होता है। बच्चे शिक्षा दर शिक्षा उन्नत बड़े होते हैं। मृत्यु जन्म संस्कार स्थल है यह। आज कल और आनेवाले दिवस-दिवस प्रशंसनीय बुद्धिपूर्वक मंगलमयी सौंदर्य, सुख, समृद्धि, शान्ति परोसती व्यवस्था वामभाज है। जिसकी अधिष्ठात्रि वामा है। ‘‘वामभाज’’ व्यवस्था करना गृहणी वामा का कर्तव्य है।।२४।।
‘‘शम्या’’
कर्मकुशलता में वृद्धि करनेवाली व्यवस्था का नाम है शम्या। कुछ महिलाएँ कडाही में तेल डब्बे में रखे चपटे चम्मच से डालती हैं, कुछ महिलाएँ सीधे डब्बे से डालती हैं, कुछ महिलाएँ कटोरी से डालती हैं। ये सारी व्यवस्थाएँ शम्या नहीं है। शम्या व्यवस्था महाराष्ट्र की उपज है। स्टील के विशिष्ट कम गहरे तेल पात्र में खडा लघु कटोरीनुमा चम्मच। अन्य शम्या प्रयोग हैं कटोरी से कच्चा दोसा फैलाना, पराठा लकड़ी के गुटके से सेंकना, लघु कड़छीवत बर्तन का छौंकने के लिए प्रयोग, अथवा कटोरी बनी थाली का प्रयोग, पकाओ परोसो बर्तन व्यवस्था, सीधा डब्बा अल्पाहार परोस व्यवस्था। इन व्यवस्थाओं का भरपूर प्रयोग आपके समय की बचत करेगा, सुविधा में वृद्धि करेगा।।२५।।
‘‘सुप्रणीतम्’’
प्रणीत वे नियम होते हैं जो प्रेरणा देते हैं। घर नियमों से बनते हैं। मकान ईटा-गारा से बनते हैं। जबलपुर के एक घर गायकवाड़ कुटिर में नियम था कि एक दो वर्ष के बच्चों से भी आप कहकर बात करना है। आज सब बड़े हो गए हैं अपने पृथक परिवार वाले हैं। सारा परिवार आज भी आदर व्यवस्था जुड़ा-जुड़ा सुमधुर है। नागपुर एक परिवार में तू तड़ाक थी, नियम नहीं थे। वर्तमान में सब बड़े हो गए हैं, अपने पृथक परिवार वाले हैं पर उनमें तू तड़ाक डंडे बज रहे हैं।
सुप्रणीतम् वह जादू है जो सिर चढ कर बोलता है। जल्दी जागरण, नित्य कर्म, सहसाधना, सहजलपान, जलपान पूर्व लघु ब्रह्मरस साधना, सहभोजन, सहपठन, सहमनोरंजनगमन, सहसमयशयन, अतिथि सत्कार नियम वह जादू है जो मकान को घर बनाता है। घर का नाम गढ़ होते होते सुगढ़ हो जाता है। आपका एक नाम सुघरा है। आप सुगढ़ा हैं। यह नाम याद रखिए।।२६।।
भोजन नाश्ता परोसने का नियम याद रखें कि सबसे पहले सबसे छोटे को परोसें, फिर सबसे बडे को, फिर अन्यों को। भोजन पकाने में विविधता सर्वोत्तम नियम है। सारी सब्जियों के अलग स्वाद होते हैं अतः अलग तरह के मसाले उनमें लगते हैं। जीभ पर अनुगुणित तैंतीस रस देवता हैं। सुगृहणी गृहसदस्यों के रसदेवताओं को जागृत रखती है। मिश्रता का भरपूर प्रयोग आपको ‘‘किचन रूढ़’’ होने से बचाएगा।।२७।।
‘‘शर्म वर्म उपस्तरे’’
कुरान में लिखा है मां के पगतले स्वर्ग है। वेद परमात्मा सन्दर्भ में कहता है जिसकी छाया अमृत है, अछाया मृत्यु है। शर्म वर्म उपस्तरे :- ओढ़न बिछावन सुखद। अमृत ओढ़ना, अमृत बिछाना आदर्श ममता प्रेम अवस्था है। आपकी छाया गृहसदस्यों को भली लगे। मैंने एक मित्र से पूछा ‘‘खाली ऑफिस में देर तक क्यों बैठता है?’’ उसने कहा- ‘‘घर से यहाँ अच्छा लगता है।’’ प्रायः लोग अपनी बीबियों के बारे में अच्छी धारणा नहीं रखते ऐसा मैंने पाया है। बुलडोजर, जबरदस्त, हिटलर, तानाशाह, लाऊडस्पीकर, बर्र का छत्ता, दूध देती मरकट्टी गाय अदि नाम लोगों नें बीबी के रखे हुए हैं। मधुछाया, अमृतछाया, प्रेम, ममता, स्नेह, वात्सल्य आभरा के प्रति ऐसे शब्द तनिक सोचिए कार्याधिक्य, अनियोजन, असहयोग लेने के कारण आप व्यवहारकटु तो नहीं हो गए हैं?।।२८।।
‘‘शर्म वर्म उपस्तरे’’ का दूसरा रूप वस्त्र, वेषभूषा, परदे आदि की व्यवस्था भी है। रायपुर एल्युमिनी की परिवार पार्टी थी। पूरी तड़क भड़क थी। जनवरी महीना ढलती ढलती ठंड थी। गाढ़े, लाल, नीले, हरे रंगों की भरमार थी। बच्चों के वस्त्रों पर भी काकटेल उतरी हुई थी। मोटी भाषा में वस्त्र व्यवस्था शराबी थी। आंखों को एक नशा आवेग दे रही थी। एक महिला ऊंची भरे बदन की तनिक चायना चेहरायुक्त अपने पति तथा तीन बच्चों के साथ बिल्कुल अलग लग रहीं थी। परिवारने हल्के आइसक्रीमो रंग के मंहगे कपड़ो पर गैर तड़क-भड़क वाले विविध भी पहने हुए थे। वह पर्याप्त धनी परिवार था। मैं उधर चला गया बोला- ‘‘भाभी आपके परिवार का रंग वस्त्रादि चयन सिम्पली वंडरफुल है, बधाई!’’ वे बोलीं- ‘‘भाई साहाब मैं आपको जानती हूँ जानती थी आप मार्क करेंगे’’ वस्त्रों में ही नहीं उनकी बातों में भी शर्मवर्म उपस्तर उर्फ शालीनता थी।
वेशभूषा, गृहसज्जा, परदे चादर, व्यवहारादि शालीनता शब्द याद रखें।।२९।।
‘‘उपस्तर’’ शब्द ही शालीनता का स्तर कह रहा है। उप- निकट, स्तर- आवरण। जो आवरण अपने आप को निकट लगे। अपना आप बड़ा ही ऋजु बड़ा ही सरल शुद्ध पवित्र है। अपना आप सुखदायक होता है। व्यवस्था भी सहज, सरल, सुखदायक होनी चाहिए। शालीनता जो शालीनों को निकट खींच ले व्यवहार और आवरण में भी शर्म वर्म उपस्तर व्यवस्था है।।३०।।
‘‘देवृकामा’’
‘सह रहनियों’ परिवार सदस्यों की कामनाएँ पूर्ण करनेवाली। मुझे स्मरण है मुझे खीर पसंद थी। मेरी छोटी बहन को बड़ी चावल। बनने पर नोंक-झोंक करते थे। पर मां की देवृकामा व्यवस्था में दोनों की भावनाओं का समुचित आदर था। तथा दोनों ही बनाना इतना न्यायोचित था कि आज वो नोंक-झोंक स्मरण मधुर लगने लगा है। देवृकामा व्यवस्था की सच्ची परितृप्ति मां को तब मिलती है जब विवाहित बेटियाँ या नोकरीपेशा बेटे बाहर से आकर स्व-पसंद की चीजों की देवृकामा व्यवस्था के सन्दर्भ में मनुहार करते हैं।।३१।।
‘‘अदेवघ्नी’’
‘देवृकामा’ अनुपूरक शब्द है अदेवघ्नी। सात्विकता देव लक्षण है। तामसिकता अदेव लक्षण है। मेरे पिताजी ठेकेदार थे। उनके मित्र ठेकेदार खाते-पीते लोग थे। मटन चिकन (तब उसे मुर्गा कहा जाता था) कबाब शराब आम बात थी। एक बार घर में पिता मित्रों का भोजन था। उनकी इच्छा मांसाहार की थी। पिताजी ने मां से कहा। मां ने स्पष्ट मना कर दिया। फिर मुझसे कहा पिताजी को बुला ला। मैंने बुलाया। मां नें सुझाव दिया- ‘‘उन्हें बताइए मत मैं कटहल और मुंदकबड़ी की मटन समान सब्जी बना देती हूँ।’’ सहमति हो गई। अदेवघ्नी व्यवस्था की जीत हुई। पिताजी के ठेकेदार मित्र ऊंगलियाँ चाटते वाह-वाह करते घर से गए।।३२।।
हमारे अति नजदीकी रिश्ते में रिश्तेदार जो डॉक्टर थे घर आए। उनकी रोज पीने की आदत थी। वे शराब साथ रखते थे। मुझसे उन्होंने पूछा- ‘‘घर में पीने में कोई हर्ज तो नहीं है?’’ मैंने कह दिया- ‘‘होना तो नहीं चाहिए’’ उन्होंने बोतल निकाली। मैं गिलास लेने आया। मेरी पत्नी और बिटिया नें इतना उग्र विरोध किया कि मैं तो मैं वह रिश्तेदार भी सहम गया। मैंने घर के बाहर व्यवस्था स्वयं की। अदेवघ्नी व्यवस्था का अर्ध अहसास थी यह घटना।।३३।।
कॉलेज के दिनों में अपने जीवन में मैंअति कठोर देवघ्नी व्यवस्था जीता था। सिनेमा, सिगरेट, नशा, मांसाहारादि के किसी भी कार्य के लिए अप्रत्यक्षतः प्रत्यक्षतः साईकिल पैसे साथ आदि का तनिक सहयोग नहीं करता था।
एक बार व्ही.डी. मंत्री मेरे शतरंज गुरु ने गले पर हाथ लगा कसम खा मुझसे साईकिल शहर जाने के लिए ली। मैंने उसे चाबी देते हंसते कहा- ‘‘अच्छा जाओ पर पिक्चर का नाम तो बता दो!’’ उसने भोलेपन प्रभावित भोलेपन में धरमपुत्र नाम बता दिया। साईकिल वंचन ही अदेवघ्नी व्यवस्था की मांग थी।।३४।।
देवघ्नी गीगो व्यवस्था
पंजाबी में आँख के कचरे मिश्र द्रव्य को गिग कहते हैं। आँख में कचरा जाता है। आँख पानी के साथ मिलकर सफेद गिग बाहर निकालता है। यह कडाकनी- कचरा डाल कचरा निकाल सिद्धान्त है। कम्प्युटर भाषा में इसे गारबेज इन गारबेज आउट (गीगो) कहते हैं।
एक पिता ने अलमारी खोल पैसे निकाले। चार वर्षीय लड़के नें मां से कहा- ‘‘मम्मी डॅड चोट्टा हैं’’ मैं वहीं बैठा था। बातों-बातों में मैंने पूछा- ‘‘आपके यहां कौनसा सीरियल पसंद किया जाता है?’’ सबने एक साथ कहा- ‘‘हम पांच’’
याद रखिए! ‘मुहफट’ सीरियल ‘मुहफट’ गीगो देवघ्नी व्यवस्था को जन्म देते हैं।।३५।।
‘‘अप्रजावति व्यवस्था’’
‘‘पंचीकरण’’ प्रजावती सिद्धान्त है। सात घोडे सात दिशाएँ गृहस्थी आठवी दिशा अप्रजावती सिद्धान्त है। वाह क्या परिभाषा है ‘लड़के’ की! लड़-लड़ के पति-पत्नी ने पैदा किए वे हैं लड़के। ताल ठोक परिवार अलगाव दुःख भोगते हैं। मैं चार परिवार ऐसे जानता हूँ जिनमें एक ही घर पति-पत्नी अलग रह रहे हैं। वे साधनाएँ जला देनी चाहिए जो परिवार को अप्रजावती करे। ये चारों ही हिन्दू धर्म के चार साधना सम्प्रदायों से जुडे हैं। एक का विवरण इस प्रकार है-।।३६।।
तीन लड़के लड़ते लड़ते, दो लड़कियाँ पति को ताल ठोंक, एक पत्नी पति को ताल ठोंक एक बड़े मकान में रहते हैं। ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ इस घर के हर सदस्य की परिभाषा है। अनायास मैं उनके घर गया। रिश्तए बू सूँघी देखी। वापस आया। फिर पत्नी के साथ उनके घर गया। परिवार पुस्तक वहाँ छोड़ दी। अर्धतः वह परिवार हमारे यहाँ आया। फिर पत्नी तथा बच्चे समेत उस घर गया। पूरे परिवार को अतिआत्म साधना का शान्तिः चरण कराया। शान्तिरेव शान्तिः हमें शान्ति भी शान्तिपूर्वक प्राप्त हो यह समझाया। एक लड़की को जबरदस्ती उसके घर भिजवा दिया। परिवार सदस्यों अलग-अलग साथ-साथ मिलता रहा। मेरी पत्नी बालकों ने भी सहयोग दिया। आठ दस माह में समस्या सुलझ गई।
पति ने करीब चौदह वर्ष बाद पहले दिन जब कार्यालय में पत्नी के हाथ का बना डिब्बा खोल गर्व से चारों ओर देखा तो उस गर्व में मेरा भी अप्रतिम सुख था।
अब मैंने दूसरे परिचित के घर प्रवेश प्रारम्भ कर दिया है।।३७।।
‘‘गृहणी व्यवस्था’’
बिल्ली-कुत्ता, सांप-नेवला, राम-रावण, कंस-कृष्ण, विभीषण-रावण, मगर-मछली वैर होता है सास-बहू में। जबसे उसकी शादी हुई है दोनों ने घर नरक कर दिया है। आए दिन बहू को छोड़ देने की बातें होने लगीं हैं घर में। मैं कभी कदा घर जाता था। मणिका नाम था बहु का। एक दिन घर में अकेली थी बोली- ‘‘भैया देखो न घर-बार छोड़ के आई हूँ। और ये छोड़ने को कहते हैं’’ मैंने कहा मणिका एक बार तुम दृढ़ शब्दों में कह दो मैं बहू हूँ इस घर की, पत्नी हूँ पति की, यहीं ही रहूँगी।’’ उधर सासू और लावण्य को भी मैंने यही समझाया। एक दिवस मणिका ने वे शब्द दृढतापूर्वक कह दिए। आज घर सुखी है।
गृहणी का अर्थ है गृह-णी। गृह को कठिन परिस्थितियों में गति देने ऊर्ध्व ले जाने वाली। गृ-हणी घर पर लगी अदेव गृद्ध दृष्टि का हरण कर लेनेवाली। पत्नी पति पर भी प्रेम नियन्त्रण रखने से पत्नी है। गृहणी पत्नी होने की कद्र कीजिए।।३८।।
‘‘सावित्री’’
सविता व्यवस्था को जो लागू करे वह गृहणी है सावित्री। सूर्य, चांद, तारे, ग्रह, धरा, आकाशगंगाएँ सब क्रमबद्ध सब नियमबद्ध हैं और भविष्य दिशा गतित हैं। इनसे निश्चित भविष्यवाणी की जा सकती है तथा वह स्थिति दुहरती है यह सविता ब्रह्मकृत रचना है। सूर्योदय, सन्ध्या समय सूर्य डूबने के दिवस-दिवस तय है। आयोजनमयी, सुचिन्तित, निश्चित भविष्यनिर्मात्री गृहव्यवस्था का नाम है सावित्री।
गुरुकुल व्यवस्था सावित्री कठोर है। ब्रह्मसावित्री व्यवस्था सहज है। सावित्री कठोर व्यवस्था बोझ होती है और कायम नहीं रह सकती है। हमारी माताजीकृत प्रातः उठते ही शौच, दन्तधावन, स्नान, सहनाश्ता, रात्रि सहभोजन, व्यवस्था सावित्री थी। बिना शौच, बिना स्नानादि किसी को नाश्ता नहीं मिलता था। सबको मां ने दायित्वों में भी बांध रखा था। सब्जी लाना, गेहूँ पिसाना, भैंस-गाय जमावड़ा काम मेरा नियत कार्य था। याद रखें बचपनी सहज सावित्री व्यवस्था बच्चों की उम्र को सुखी करती है। ताउम्र सुखदात्री व्यवस्था है सावित्री।।३९।।
ं‘‘न अड़’’ व्यवस्था
अराते व्यवस्था वह है जो निरर्थ जड़ है। अराते अड़ व्यवस्था का नाम है। इसके तीन रूप हैं। १) अनुपयुक्त = अनावश्यक, २) संसाधन रहते हुए संसाधनहीनता प्रदर्शित करना, ३) कंजूसिन व्यवस्था। ये तीनों अड़ तत्त्व हैं जो गृह को अगृह करते हैं।
१) सड़क घूमते पड़ोसन पड़ोस घर चली गई। उसे दो नमकीन, दो मीठा, चाय का नाश्ता करा दिया गया- अनुपयुक्त आतिथ्य व्यवस्था। २) वर्षों बाद घर आए मित्र को एक साहूकार मित्र के घर यह कहकर याद दिलाना कि शक्कर साली बड़ी मेहंगी हो गई है- संसाधना रहते संसाधनहीनता प्रदर्शित करना है। पिता बैंक मॅनेजर, दोनों बच्चे नौकरी और तीस वर्ष से परिचित परिवार के मात्र एक सदस्य के दूर से मिलने आने पर चाय तो चाय पानी भी न पूछना कंजूसिन व्यवस्था है। आतिथ्य क्षेत्र में उपरोक्त तीनों व्यवस्थाएँ अराते या अड़ व्यवस्थाएँ हैं। आप ‘न अड़’ समुचित हैं।।४०।।
अदुर्मंगली व्यवस्था
अदुर्मंगली शब्द में कई शब्द हैं। यथा- अदुर्मंगली, दुर्मंगली, अमंगली, मंगली। इन चारों व्यवस्थाओं पर चिन्तन पश्चात जो व्यवस्था गृहक्षेत्र में लागू की जाती है वह है दुर्मंगली व्यवस्था। मंगली व्यवस्था कहते हैं भौतिक मंगल करने वाली व्यवस्था को। भौतिक हानीकारक व्यवस्था है अमंगली। एक कम आय सिकुड़े घर में पहले ही वायु संचलनाभाव खिड़कियों का अभाव था। रहा सहा वायु प्रवहण तीस हजार रु. मूल्य के कीमती शोकेस द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया है अमंगली व्यवस्था। खराब आदत सदस्यों के घर की व्यवस्था बिखरी हुई, अस्तव्यस्त, कैसी भी होती है और सब उसके लिए एक दूसरे को दोष देते लड़ते रहते हैं। यह व्यवस्था दुर्मंगली व्यवस्था है।
भौतिक सुविधाजनक, सामाजिक माधुर्यदायक, आध्यात्मिक आह्लादकारक व्यवस्था का नाम है अदुर्मंगली। यह सुमंगली, वधूरिमा होती है।।४१।।
‘‘प्रतरणी वधूरिमा’’
वधू वह है जो स्नेह की धाराएँ बहाते घर की समृद्धि की का कारण बने। वधू के हाथों में बरकत होती है। खुशबू वधूरिमा होती है। फूलों की खुशबू हवा की दिशाओं में बहती है पर उत्तम व्यवस्था उत्तम कार्यों की खुशबू चारों दिशाओं में फैलती है। यशकारी बहू वधूरिमा होती है।
प्रतरणी का अर्थ है सतत अंकुरणशील। वृद्धि के बीजों से युक्त वृद्धिदायिका उत्तम कर्म खुशबू फैलाती व्यवस्था का नाम है प्रतरणी वधूरिमा।
मेरे दूर के रिश्ते की भाभी अत्यन्त हताश-निराश दुःखी थीं। तब मैं बहुत छोटा था। मेरी एक आदत थी, जो भी पुस्तक पढ़ता था उसके उदात्त वाक्य लिख लेता था। वे बीज वाक्य थे। मैंने वह कापी भाभी को पढ़ने को दी। भाभी की समस्याएँ तो नहीं सुलझीं पर उनका दृष्टिकोण बदल गया। वे प्रतरणी पथ चलीं। कालान्तर में समस्याएँ सुलझ गईं।
घर में प्रतरणी व्यवस्था के लिए उदात्त पुस्तकें सहज उपलब्ध होनी चाहिएँ। ताकि यदा-कदा स्वतः लोगों को वृद्धि के बीजों (विचारों) का लाभ मिलता रहे। नागपुर रामदास पेठ में एक पर्यावरण कुटिर है। उस खपरैल घर में आँगन दीवारें पर्यावरण उदात्त वाक्यों से सजी हैं।
आप प्रतरणी वधूरिमा हैं। अनपे घर को वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, गीता, दर्शन, बौद्ध, जैन, बाईबिल, कुरान घर या प्रबंधन, गृहव्यवस्था, सुरक्षादि घर बना सकतीं हैं।।४२।।
‘‘न शून्येषी’’
मेरे एक मित्र हैं। उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है। लड़कियों लड़के का विवाह हो चुका है। चार बेडरूम के घर में अकेले रहते हैं। छोटी सी दिनचर्या, नित्यकर्म, नाश्ता बनाना-करना, पेपर पढ़ना, खाना बनाना, पेपर पढ़ना, खाना खाना, टी.वी. देखना, सोना, टहलना, खाना बनाना-खाना, सोना के क्रम में जीवन बिता रहे हैं। वे कहते हैं घड़ी तो चलती ही रहती है। यह शून्येषी व्यवस्था है जीवन की।
अपने घर को गृहणी शून्येषी न बनाए। शून्येषी का अर्थ है निरुद्देश्य। शून्य चाहने वाली, असामाजिक शून्यता पैदा करने वाली, अवसाद कारक व्यवस्था या निर्जनता पैदा करने वाली व्यवस्था। गृहणी का दायित्व है कि घर में जिन्दादिली हँसमुख व्यवस्था हो। परिवार सभी एक दूसरे पर चारों ओर वारे-न्यारे हों। संस्कारों, उत्सवों, संगाष्ठियों भरा परिवार न शून्येषी होता है।।४३।।
मेरा एक रिश्तेदार परिवार है पांच जनों का। एक पत्नी, एक पति, एक पुत्र, दो पुत्रियाँ। मैं उनके घर गया.. दरवाजा खुला था। अन्दर गया तो भाभी निठल्ली शून्य ताक रहीं अधलेटी बैठीं थीं। उनसे बात कर दूसरे कमरे गया तो वहाँ लड़का पलंग अधलेटा शून्य ताक रहा था। ऊपर पहुँचने पर पाया कि एक कमरे में अस्त व्यस्त किताबों के मध्य बड़े पलंग पर उनकी छोटी बेटी अधलेटी शून्य ताक रही थी और चौथे बगल के नीचे कमरे में बड़ी लड़की शून्य ताकती मानों सो गई थी। हर व्यक्ति शून्य ताक अधलेटी अवस्था में अलग-अलग होने की अवस्था शून्येषी अवस्था होती है।
इस घर एक शून्यता प्रभाव, अवसादकारक प्रभाव, निर्जनता प्रभाव सारे के सारे सदस्यों पर पड़ता है। गृहणी का दायित्व है कि व्यवस्था को शून्येषी न होने दे। घर बाह्य नहीं तो गृहसदस्यों की चहल-पहल, हिलन-मिलन, प्यार नोक झोंक का नाम है। शून्येषी का विरोध है अनन्तेषी।।४४।।
‘‘अनन्तेषी’’
‘‘पूर्ण है यह पूर्ण है वह। पूर्ण को कहते हैं पूर्ण। पूर्ण से पूर्ण आहर। पूर्ण ही बचता है शेष। पूर्ण है अशेष।’’ यह अनन्त परिभाषा है। सूत्र से सूत्र पिरोया, गुण से गुण पिरोया घर पूर्ण लबालब भरा आसपास तक बहता अनन्तेषी है। ब्रह्म में अनन्त गुण हैं। उसके गुणों को अपने आप में सप्रयास सोद्देश्य गतित घर अनन्तेषी है। अनन्तेषी गति सदस्यों को समझनी चाहिए।
हमने घर परिवर्तन किया। श्रीमती जी ने सोचा नई जगह नए पडोसी कैसे मिलेंगे? मैंने मजाक में कहा हमारे जैसे मिलेंगे। आज हम जानते हें अगल-बगल में भाभियाँ क्या खाना बनाने में दक्ष हैं। किसी के कुछ दिन न दिखने पर लगता है कहीं कुछ कम है।
आनन्द भरे घर बाहर तक छलकते हैं। परमात्मा धरती आकाश ब्रह्माण्ड घेर सबसे बाहर तक फैला देता है।।४५।।
‘‘सध्रीची’’
सध व्यवस्था सर्वाधिक उपयोगी होती है। सध्रीची व्यवस्था का अर्थ भावात्मक है। आपसी सम्बन्धों की उपयोगिता आधारित व्यवस्था का नाम है सध्रीची। सध्रीची व्यवस्था में मां हर सदस्य को एक दूसरे और घर के लिए उपयोगी बनाती है।
कहते हैं देश की आबादी बढ़ रही है। जनसंख्या भयावह समस्या है। एक बार घरों का सर्वेक्षण किया गया, घर-घर पूछा गया- आपके यहाँ कोई बच्चा अतिरिक्त है क्या? हर जगह नहीं उत्तर मिला। हर एक का परिवार में उपयोग रिश्ता है।
जिस परिवार ये उपयोग रिश्ते नहीं रह जाते वहाँ राम भरोसे, लंगड़े पगले, भारती आदि अधपगले उपजते हैं वे अतिरिक्त हो जाते हैं और घर के बाहर सड़कों पर आ जाते हैं।
पति-पत्नी रिश्ता संतुष्टि, बहन-भाई रिश्ता संतुष्टि, भाभी-ननद-देवर रिश्ता संतुष्टि आदि-आदि संतुष्टि भाव तरल उपयोगिता भाव से उत्पन्न होते हैं। सचिव स्तरीय पचपन वर्षीय अधिकारी घर आकर जब अपने अठावन वर्षीय ग्रामीण भाई के चरण छूता है तो दोनों के मन में जो आह्लाद पैदा होता है उसमें एक रिश्ता संतुष्टि का आह्लाद होता है। इसके पीछे संस्कृति की मूल भावना कार्य करती है कि बड़ों के अभिवादन से धर्म, शील, यश, समृद्धि बढ़ते हैं।।४६।।‘‘सुबुधा सूर्या’’
वह व्यवस्था जो विवेकपूर्वक की गई हो तथा प्रेरणादायक हो सुबुधा सूर्या कहलाती है। इस व्यवस्था को देख कोई भी चाहेगा कि वह भी ऐसी व्यवस्था करे।
हमारे ऑफिस के पास कुछ ताप सह ईंटें विविध आकारीय जो गलत गुणवत्ता के कारण फेंक दी गई थीं पडी थीं। मैंने सोचा इन पर कुछ रख देने से सुन्दर दिखेगा। मैं कुछ सुआकारित घर में उठा लाया। श्रीमती जी ने सजा दिए। बाद में यह विधा इतनी प्रसिद्ध हुई कि कुछ लोग कबाड़ियों के यहाँ से वैसी ईंटे तलाश कर लाए।
सुबुधा शब्द ‘‘नवीयो पदमक्रमुः’’ दर्शाता है। लकीर के फकीरों ने नया कदम बढ़ाया नया सूर्य गढ़ लिया। नया सूर्य व्यवस्था सुबुधा सूर्या होती ही है। बोध का स्तर प्रज्ञा मेधा से भी ऊँचा होता है। बोधा व्यवस्था ऋता शृता तो होती ही है। सुबोधा अर्थ धरातल तक उठी व्यवस्था है। इसमें सत्य भी समाविष्ट रहता है।।४७।।
‘‘शग्मा’’
कौशलपूर्वक की गई तथा कुशलता में वृद्धि करने वाली व्यवस्था का नाम शग्मा है। गृहव्यवस्था कौशल अ) ज्ञान से, ब) अवलोकन से, स) त्रुटियों से, द) पर त्रुटियों से, ई) व्यवहार उतारने सीखा जा सकता है।
ज्ञान, पुस्तक, दूरदर्शन, रेडियो से भी मिल सकता है। अवलोकन- विभिन्न घरों को इस दृष्टि से देखने पर। स्व त्रुटियों से सीखना सबसे कम सीखना प्रक्रिया है। पर त्रुटियों से सीख तटस्थ अवलोकन कर्ता के रूप में है। ज्ञान को व्यवहार में उतारने का अनुभव श्रेष्ठ सीखना है।
सीखने तथा अनुभव को धीरे धीरे सब सीख लेंगे सोच समय पर मत छोड़िए। कई टालमटोलू लोगों को समय राक्षस खा चुका है। तत्काल ज्ञान प्राप्ति से जुट उन्हें व्यवहार उतार जीवन में उसका उपयोग कर लिजीए। अकौशल की दुर्घटना निश्चित्तः कौशल अभिवृद्धिकारक होती है। इससे उत्तरोत्तर प्रगति होती है।
आप शग्मा हैं- शग्मा व्यवस्था करें।।४८।।
‘‘स्वरित्राम्’’
सुअरित्राम् गृहव्यवस्था वह है जिसके आधारस्तम्भ सुव्यवस्थित तथा सबल हैं। गृहस्थ तीन आश्रमों- ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ तथा सन्यास का आधार है इसके आधार स्तम्भ हैं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। चारों में सामंजस्य का नाम गृह है। धर्म का मुख्य आधार है विद्यार्थी, बच्चे। अर्थ (धर्ममय) का मुख्य आधार है पिता। काम भौतिक शारीरिक प्रतिपूर्ति का मुख्य आधार है गृहणी। मोक्ष का मुख्य आधार है पितर- अतिथि।
एक घर में एक उम्रविशेष में चौथा आधार अंग क्षीण हो गया परिणामतः घर में अपरोक्ष धर्म प्रवेश अभाव में बाद के बच्चे कुसंस्कारी हो गए। गृहणी का दाईत्व है कि सुअरित्राम् गृहव्यवस्था में सहयोग करे। गृहधुरी होने के कारण बच्चों को स्कूल भेजने, पढ़ने बैठाने, पति के समय पर कार्यालय जाने, सन्यासी, अतिथियों या बड़े बुजुर्गों हेतु व्यवस्था करे। सबको आह्लादित कर स्वयं आह्लादित रहे।।४९।।
यदि पत्नी कार्यालय में कार्यरत है तो भी उसे सुअरित्राम् व्यवस्था करनी ही चाहिए। वर्तमान युग में इतने भौतिक संसाधन उपलब्ध हैं कि औसतः द्वि पेशा गृहस्थ वे संसाधन खरीद सकता है। उनके समुचित आयोजित उपयोग से कार्यालयीन गृहणी कार्यालय रहती सोलर कुकर में खाना पकाती भी रह सकती है। केवल बच्चों को रखने के निर्देश देने हैं। पुड़िंग, ढोकला, उपमादि अर्धपूर्व तैयार खाद्य सहजतः गृहणी अनुपस्थिति में भी पक सकते हैं। शाम को पके पकाए तैयार मिल सकते हैं। ये पौष्टिक, अधिक सुस्वादु भी होते हैं। भुनी शकरकंद, भुनी मूंगफली, भुने आलू, भुने कटलेट, ओषिजित तेलदोषमुक्त सुस्वादु होते हैं।
बाई को अतिरिक्त समय रखकर भी गृहणी अपने हाथों का विस्तार करके अतिरिक्त कार्य कर सकती है।।५०।।
संस्कृति में गृहणी के बोलते हुए ऐसे गृहनाम हैं जो गृह में स्वर्ग उतार सकते हैं। ये नाम स अर्थ मस्तिष्क में प्रविष्ट हो जाएँ परिवार सदस्यों में तो घर आनन्दमय हो जाता है। गृहणी का दायित्व है संस्कृति गृहणी नाम अपरोक्ष रूप में क्रमशः घर के हर सदस्य की बुद्धि में भी उतारते भी चले जाएँ। जैसे-जैसे ये सदस्यों में उतरते चले जाते हैं वैसे-वैसे गृहणी गृह में सशक्त, समर्थ, सर्वव्यापक होती चली जाती है।
याद रखिए आप अकेली नहीं हैं आपका नाम गृहणी है। गृहपति गृह से कुछ हटकर पति है पर गृहणी गृह युजित निकट है। अगर आप में ‘कहाँ-कहाँ मैं अकेली मरूँ’ भाव आ रहा है तो इसका कारण आपकी असामाजिकता (गृह सन्दर्भ) की है। मेरी माजाजी गृह सामाजिक थीं। उन्हें अगर ये परिभाषाएँ कहीं से मिलीं होतीं तो घर और अधिक उच्च स्तर होता।।५१।।
‘‘सुशेवा’’
उत्तम सेवा देने वाली। इस व्यवस्था का नाम है सुचिन्तित, नियत। गृहणी सुशेवा है यदि गृह में व्यवस्था पूर्व चिन्तित है तो। व्यवस्थापक व्यवस्था में सर्वव्यापक तभी हो सकता है जबकि व्यवस्था नियमबद्ध, सटीक हो और वह नियमों का ज्ञान भी रखता हो। मानव स्वभाव से अल्पज्ञ है। याद रखें अल्पज्ञ का अर्थ अज्ञानी नहीं। अंश ज्ञानी या क्षेत्रविशेष ज्ञानी है। अपने गृहक्षेत्र में आप सबसे अधिक ज्ञानी हैं। अतः आप ही उपयुक्त सुशेवा व्यवस्था कर सकती हैं।
एक मैकेनिक द्वारा सुसज्जित टूल बॉक्स सुशेवा व्यवस्था का उदाहरण है। ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टरों के सर्जिकल अवजार सुशेवा व्यवस्था का दूसरा उदाहरण है। सेना के अस्त्रकक्ष में रखी हुई अस्त्र व्यवस्था सुशेवा है। किचन रैक चुनते समय उसके पदार्थ आकार प्रकार के स्थान पर उसके सुशेवा होने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। वह ‘कड़छुल अटक जाए’ या ‘बर्तन भरभरा गिरे’ न हों।।५२।।
बर्तन गिरने, टनटनाने, खनखनाने की ध्वनि बड़ी कटु ध्वनि होती है। यह कर्कश न होने पर भी कर्णकटु जरूर होती है। बर्तन निकालना, उपयोग, धोना-धुलवाना अतिविशेष सावधानी चाहता है। इस कार्य में लापरवाही कई बार गृहकलह का कारण बनती है। यह आवाज कई बार आए अतिथियों, पढ़ते विद्यार्थियों, गप्पियाती सखियों, लिखते लेखकों, टी.व्ही. सीरियल देखते परिवार को परेशान कर लड़ाई, मनमुटाव का कारण बनती है। कर्ण-कटुता मन-कटुता हो जाती है। रैक खरीदते समय इस व्यवस्था का ध्यान रखते रैक खरीदें। स्टील झाएँ की तुलना में बाँस झाएँ में बर्तन कम टनटनाते हैं। फर्श या पत्थर पर मांजने के स्थान बर्तनमांज-लकड़ी का प्रयोग अच्छा है।।५३।।
वर्तमान युग में कुछ व्यवस्थाएँ सुशेवा व्यवस्थाएँ हैं। यथा किचन, बाथरूम, वाश बेसीन निकट, धोबन प्लेटफॉर्म पर नाली व्यवस्था में बाहर से गंदी गन्ध, कीड़ों मकोड़ों आदि को रोकने के लिए जल अवरोध। ये व्यवस्थाएँ सुशेवा होने की शर्त है कि गृहणी स्वयं तो सावधान रहे, घर सदस्यों नौकरानी को भी सावधान करे कि जहाँ कहीं फ्लोर ट्रिप, पी ट्रिप, एस ट्रिप हो वहाँ धूल रेत मिट्टि आदि का जाना न हो अन्यथा इनके चोक हो जाने पर बड़ी मुसिबत का सामना करना पड़ता है। धूल, मिट्टी, रेत, राखादि अलग से झाड़कर साफ कर अलग बैग पर यथास्थान फैंके जा सकते हैं। इन व्यवस्थाओं को सुशेवा रखने के लिए, बालों आदि से चोक होने से बचाने के लिए बीच-बीच में इन्हें एक दो बाल्टी पानी से फ्लॅश करते रहना चाहिए।।५४।।
‘‘अप्सरा’’
वैदिक शब्द अप्सरा ने पतन सफर भोगा है। पुराणों में इस शब्द का प्रयोग उन लावण्यमयी ललनाओं के लिए किया गया है जो ऋषियों का तप भंग कर श्राप पाती हैं। उर्वशी, मेनका आदि ऐसे ही नाम हैं। चन्द्रगुप्त काल में लावण्यमयी कन्याओं को चुन विष खिला-खिला विषकन्या बनाया जाता था। अप्सरा शब्द स्वर्ग सुन्दरियों में भी आम प्रचलित है। वैदिक अप्सरा शब्द का अर्थ है कार्य में प्रवहणशील तरल होकर कार्यसुविधा देकर मुग्ध कर देनेवाली। डॉक्टर को सही समय पर सही औजार देनेवाली नर्स अप्सरा है। शिशु को आवश्यकता पहचान रोने पूर्व दूध, जल, आहार प्रदत्त करनेवाली व्यवस्थायी मां अप्सरा है। हर परिवार सदस्य की मूल प्रवृत्ति को समझ तदनुरूप सुविधा देती व्यवस्था अप्सरा है। प्रवहणशील रत्न आगार महासागर अप्सरा का शाब्दिक अर्थ है। रत्नगर्भा, रत्नदायी, रत्नकर्त्री गृहणी का नाम है अप्सरा।
प्यार भरी गागरिया नहीं सागरिया होती है नारी।
इतना-इतना छलकती कि उम्र भर नहा सकता है आदमी।।५५।।
‘‘शिवतमा’’
वैदिक शब्द गुणवाचक है नामवाचक नहीं। ‘शिव’ देवता, भगवान का नाम नहीं है। कल्याण या भलाई या मंगल धर्म का नाम शिव है। अशिवतमा, अशिवतरा, अशिवा, शिवा, शिवतरा, शिवतमा वे श्रेणियाँ हैं जो गृहव्यवस्था की हो सकती हैं। इनमें शिवतमा वह है जो सर्वश्रेष्ठ कल्याणदात्री है। अशिवतमा सर्वघटिया हानीकारक है।
कल्याण शब्द सर्वांग से संबंधित है। एक पक्षीय या भौतिकी या दैवीय या आध्यात्मिकी न होकर भौतिकी, दैवीय, आध्यात्मिकी तीनों ही एक साथ जो व्यवस्था हो उसे शिवगुण व्यवस्था कहते हैं।
नमित का जन्मदिवस था। पुष्पा परिवार, शुचि परिवार और हमारा परिवार इकट्ठे थे। कमरे में सोफा दीवान व्यवस्था में चीनी पिष्टल से निशाना लगाना प्रतियोगिता हुई। फिर अरुण के स्वर निर्देश में सोफे दीवानों पर बैठ सबने अतिआत्म साधना की। अक्षत, हल्दी, समूह तिलक तथा पुष्पाशीश पश्चात भोजन में गज़लें बज रहीं थीं। भोजन पश्चात अध्यात्म चर्चा बाद अध्यत्म गज़ल-
उगते सूरज का रंग कितना पलाश है।
हर उगन कितनी कितनी पाश है।।
सुनने के बाद कार्यक्रम समाप्त हुआ। कार्यक्रम शिवतर कहा जा सकता है।।५६।।
‘‘वीरसू’’
गृह में आए दिन व्यवस्था चुनौतियाँ आती हैं। बीमारी, विभिन्न आयोजन, आकस्मिक रिश्तेदार आगमन, सामानों का खराब हो जाना, मकान विस्तार, मकान मरम्मत, बच्चों की परीक्षाएँ, दुर्घटना, मृत्यु आदि-आदि चुनौतियाँ हैं। जिसमें गृहसदस्यों का साबका पड़ता रहता है।
वह गृहव्यवस्था वीरसू होती है जिसमें इन सारी परिस्थितियों के आ जाने पर व्यवस्था शान्तिपूर्वक, बिना शोर शराबे, बिना पसीना आए हो जाती है। हमारा परिवार जीप करके नागपुर जा रहा था। रस्ते में भंडारा में सोचा कौशल दादी से मिलते चलें। हम उनके घर चले गए। वे उसी समय भोजन करके उठी ही थीं। समय भोजन के आसपास था। तनिक सी उहापोह और जीजाजी तथा दीदी परिवार ने हम पाँच सदस्यों के लिए भोजन की शानदार व्यवस्था कर दी। सारे परिवार की सोत्साह खिलाने की भागीदारी थी। हम सब कई दिनों तक सोचते रहे कि इतनी शानदार व्यवस्था दीदी परिवार कैसे कर सका? अन्दाजन उत्तर यही सोच पाए कि व्यवस्था किसी और के लिए थी जो हमारे लिए उपयोगित की गई।।५७।।
‘‘उर्वरा’’
बीज ग्रहण तैयार उपजाऊ भूमि का नाम है उर्वरा। नित नूतन करने को जो गृह तैयार है जिसमें नूतन के प्रति अदम्य उत्साह है वह व्यवस्था है उर्वरा। उपलब्ध भूमि की भी उर्वर शक्ति का उपयोग करना उर्वरा व्यवस्था का चिह्न है। यदि फसल को सुकतारित निश्चित दूरी पर मापानुसार बोया जाता है तो हर पौधा समान पुष्ट होता है तथा उसे समान भूमि से समान पुष्टि भी मिलती है।
परिवार के हर सदस्य के लिए जो व्यवस्था समानुपाती, सुविधाजनक, वृद्धिकारक, पुष्टिकारक हो वह गृहव्यवस्था उर्वरा है। गृहणी के हाथों में जो संसाधन हैं वे मूल हैं। उनका वितरण उर्वरा होना चाहिए। गृहपति के हाथों में जो संसाधन हैं वे तो मात्र बोनस रूप में प्रयुक्त किए जाने योग्य होते हैं।।५८।।
‘‘शान्तिः’’
वह संसार का मूर्खतम व्यक्ति है जो युद्ध के द्वारा शान्ति पाने की कामना रखता है। युद्ध की बात सोचते ही शान्ति भंग हो जाती है। जैसे बात कहते ही मौन भंग हो जाता है। शान्ति का अर्थ है स्थैर्य एवं सन्तुलन। यह एक गतिशील प्रत्यय है। परिवार भी एक गतिशील प्रत्यय है। तभी गृह की प्रगति, शान्ति, स्थैर्य एवं सन्तुलन पर आधारित है। परिवार अन्तर्संबन्धित रिश्तों से जुड़े परिवर्तित गतिशील संबन्धों का नाम है। इन गतिशील रिश्तों की अपेक्षाकृत स्थिर धुरी है गृहणी। असंतुलित धुरी सारे अन्तर्संबन्धित धागों को असंतुलित कर देती है। शान्ति क्षेत्र में गृह का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक आप ही हैं। इस तथ्य को कभी भी न भूलें। आपका एक असंतुलित व्यवहार अनेक असंतुलन पैदा करता है। शान्ति के साथ कई-कई प्रत्यय एक साथ युजित हैं।।५९।।
‘‘द्युतिशील शान्त प्राप्त’’
वर्तमान युग हिरण्ययुग है। चमचम ज्योतियुग है। द्युतिशील शान्त प्राप्त। घर में द्युतिशील है- १) प्रकाश व्यवस्था, २) दूरदर्शन, ३) दरवाजे खिड़कियों के पर्दे-कोच, ४) धूप, ५) बिजली कटौति अवस्था में मोमबत्ति, चार्जेबल बैटरी बत्तीव्यवस्था, ६) गॅस आदि। इनके शान्त प्राप्त नियम इस प्रकार हैं- (१) दूरदर्शन- अ) न्यूनतम ३.५ मीटर से देखें। ब) ज्योतिअग्रा रखें- उसके परदे पर बल्ब प्रकाश पड़े। स) दस मिनट से ज्यादा अपलक न देखें। द) विज्ञापन न देखें। ई) मुंहफट कार्यक्रमों से बचें। (२) प्रकाश व्यवस्था- अ) चमकहीन हो। ब) ४५० कोण से ऊपर बल्ब या ट्याूबलाईट आदि हो। स) कौंध, चमक कालान्तर में मोतियाबिन्द पैदा करती है। द) दिवस में कृत्रिम प्रकाश प्रयोग आवश्यक होने पर ही करें। ई) सतत कृत्रिम प्रकाश में रहना बोदापन पैदा करता है। (३) पर्दे कोच- अ) प्रकाश व्यवस्था बाधक न हों। ब) वातायन हवा हर कमरे की घंटे में अट्ठारह बार परिवर्तन होना आवश्यक। (४) धूप व्यवस्था- अ) बिस्तरों आदि को सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य। ब) धूप सेवन यथा संभव करें। स) हर दिृष्टि लाभप्रद है धूप सेवन। द) सूर्योदय, सूर्यास्त आकाश सेवन ताजग होता है। (५) अन्य- अ) गॅस का सिम या मद्धिम मात्र प्रयोग करें। ब) हाई पर गॅस प्रयोग प्रदूषणकारी होने के साथ-साथ गॅस का नुकसान भी करता है।।६०।।
‘‘अन्तरिक्ष शान्त प्राप्त’’
अन्तरिक्ष- गृह वातायन अन्तरिक्ष है। कई घरों में अन्तरिक्ष में किचन बसा रहता है- भुने मसाले की गन्ध, जली रोटी की गन्ध और कैद हवा की उमस। इसमें गर्मी ऋतु में पंखों, कूलरों की ऊष्मा, ग्रीष्म तापादि के मिश्र हो जाने से वातायन दमघोंटू हो जाता है। इसमें रहनेवालों को आदि हो जाने के कारण इसका अहसास नहीं होता पर बाहर से आए व्यक्ति का इसमें दम घुटता है।
समस्या निदान- प्रातः सायं खिड़कियाँ जाली, परदेरहित खुली रखें। कुछ हवादान जो शीतल हवाक्षेत्र हों भी रख सकते हैं। अमीर निकास (एग्जॉस्ट) पंखे लगवा सकते हैं।
अन्तरिक्ष बड़ा करती है आदमी को। गृहणी प्रयास करे अगर संभव हो तो प्रतिदिवस दस मिनट अन्तरिक्ष सेवन (तारों भरा आकाश दर्शन) अवश्य करें। तनाव मुक्ति का यह प्रभुप्रसाद है।।६१।।
‘‘धरा शान्त प्राप्त’’
आधार तल जिन पर बैठा जाए, सोया जाए, चला जाए धरा कह सकते हैं। मोटी परिभाषा में इसे सोफा, कुर्सी, डायनिंग टेबल, पलंग, दीवानादि कहा जा सकता है। ये सारी व्यवस्थाएँ लकड़ी के चूलों से निर्मित होती हैं। सतत उपयोग, बैठने, लेटने के तिरछ उपयोग, ये चूलें धीरे-धीरे घिस जाती हैं। आधार शान्ति व्यवस्था चूँ-चमर हो जाती है।
गृहणी को प्रति चार पाँच वर्ष में फर्निचर को किसी कुशल बढ़ई से ठीक करवा लेना चाहिए। इससे फर्निचर की उम्र भी बढ़ती है, तथा व्यवस्था धरा शान्त प्राप्त भी हो जाया करती है।
हर घर त्रिधरा व्यवस्था की आवश्यकता होती है। संबंधित लघु व्यंग इस प्रकार है- घर में तीन प्रकार की कुर्सियाँ होनी चाहिए। १) सामने के पग दो इंच कटे। २) पीछे के पग दो इंच कटे। ३) समतल। पहली उनके लिए जिन्हें आप जल्दी खिसकाना चाहते हैं वे खिसक-खिसक जाएँगे। दूसरी सामान्य जन के लिए तथा घनिष्ठों के लिए या जिन्हें आप ज्यादा देर बैठाना चाहते हैं।।६२।।
‘‘प्रवहणशील शान्त प्राप्त’’
गुह में वायु, जल प्रवहणशील है। इनसे ज्यादा ही प्रवहणशील तन-रस-रक्त है। गृहणी सुगृहणी हो तो तन-रस-रक्त सारे गृह सदस्यों के शरीर में शान्त सम प्रवहणशील हो सकता है। शरीर में बहता हुआ जल का सागर है रक्त जो परिभ्रमणशील है। आवेग, क्रोध, शोक, अज्ञान, निरर्थ चिड़चिड़, ऊलजलूल आदि वे तत्त्व हैं जो गृहणी में होने पर गृहणी शंकराचार्य के शब्दों में नरक का द्वार हो जाती है। मैं तो कहता हूँ ऐसी गृहणी गृह सदस्यों के लिए साक्षात नर्क हो जाया करती है।
फैशन आवेग भरी एक युवती का विवाह एक सीधे-साधे सात्विक युवक से हो गया। युवती का मन तो न बदला पर उसने बलात मन दमित कर लिया। अवचेतन में चला गया फैशन विकराल आवेग दैत्य बन गया। कालान्तर में मां होने पर उसने इसी अवचेतन प्रभाव अपने लड़के और लड़की में शौक आवेग भरकर अपना पूरा घर बरबाद कर लिया।
हर आवेग विचार अस्तव्यस्त चयापचय को जन्म देता है। अस्तव्यस्त चयापचय अस्तव्यस्त रक्त परिभ्रमण को जन्म देता है। प्रवहणशील शान्त प्राप्त की भौतिक शरीर परिणति हार्ट अटैक, उच्च रक्तदाब, मधुमेह आदि में होती है।।६३।।
विषय ध्यान शौक आवेग का प्रारम्भ है। दो तत्त्व विषय ध्यान आधार है। आइना और पेट का दिमाग में घुस जाना। आइने ने मुंह चिढ़ाया शृंगार-शौक संगेच्छा भटकाव हुआ। दिमाग पेट में या पेट दिमाग में घुस गया। सॉस, आचार, ओला-कोलादि संगेच्छा भटकाव शुरु हुए। संग से, काम से, क्रोध से, सम्मोह से, स्मृतिभ्रंश से, बुद्धिनाश से सर्वनाश सफर निश्चित है। जड़ मूर्ति भी विषय है। समस्या निदान क्या है? ब्रह्म-ध्यान या ब्रह्म-आधान, इससे आनन्देच्छा से, ओज से, मन्यु से, चिन्तन-मनन-निदिध्यासन से, बुद्धिशान्तन से सर्वोन्नति।
मानव में ज्ञान-प्रवहण से ब्रह्म-प्रवहण का आरम्भ है। सुगृहणी घर को ज्ञान प्रवहण देती है सत्संग जाकर, आयोजित कर, घर में ज्ञान वातावरण बनाकर। सुगृहणी के घर का बीमारियाँ दर्शन भी नहीं करती हैं। तत्काल फुटबॉल खेल ठंडा पानी पी लेने पर आधा दिवस सरदर्द के अतिरिक्त माताजी के काल के गृहनिवास में मैं कभी बीमार नहीं पड़ा। मैं बिलासपुर घर के ज्ञान वातावरण की उपज हूँ।।६४।।
‘‘औषध अनाज शान्त प्राप्त’’
‘‘अन्न ब्रह्म है’’ ‘‘ब्रह्म बलदा आत्मदा है’’ स्वस्थ मानव शान्त होता है। औषध व्यवस्था मानव को स्वस्थ करती है। गृहणी औषधा औषदा है।
आप अपने घर की सबसे बड़ी डॉक्टर हैं। आपके हाथ औषध व्यवस्था है। औषध कहते हैं उन उत्पत्तियों को, उन खाद्यों को जो एक फसल होते हैं। सारे अनाज सारी सब्जीयाँ कटहल छोड़ औषध हैं। सुगृहणी अनुभव से, किंवदन्तियों से, परंपराओं से और पठन से औषध के सत-रज-तम, कफ-वात-पित्त गुण-दोष तथा मिश्र प्रभाव (सम दोष या विषम प्रभाव) एवं ऋतुगुण दोष पहचानती है। वर्षा कफज शीत वातज ग्रीष्म पित्तज ऋतुएँ हैं। एक समय था कि रात्रि में कफज (उड़द, भिण्डि, गोभी आदि) बनाने वाली महिला हँसी का पात्र समझी जाती थीं। सुगृहणी को सौंफ, लहसून, अदरख, हल्दी, प्याज आदि के औषध प्रयोग से सुभिज्ञ होना ही नहीं चाहिए वरन इनका तत्काल प्रयोग करना ही चाहिए।
जिस गृह औषध शान्त प्राप्त व्यवस्था है उस गृह के सदस्य स्वतः स्वस्थ रहते हैं।।६५।।
‘‘वनस्पति रस शान्त प्राप्त’’
वन वृक्षों उत्पन्न खाद्य पदार्थों की व्यवस्था को वनस्पतयः व्यवस्था कहते हैं। सारे फल, काली मिर्च, दालचीनी, लौंगादि के स्वास्थ्यकर उपयोग करने से परिचित होना चाहिए।
वनस्पति अवश्यमेव ही भोजन का करीब बीस प्रतिशत भाग होना ही चाहिए। नूतन खोज दर्शाती है मात्र बीस प्रतिशत भोजन वनस्पति भाग से ही व्यक्ति में कैंसर जैसे भीषण रोग की संभावनाएँ कम हो जाती हैं। ‘‘शान्ति वनस्पतयः’’ का अर्थ है सतत फसल फलादि हमें स्थैर्य एवं संतुलन प्रदान करते हैं। फलाहार वह आहार है जिसकी विश्व के किसी भी डॉक्टर ने निन्दा नहीं की है। सभी ने उसे लाभप्रद ही बताया है।
केला वह फल है जो औषध भी है वनस्पति भी है इसमें दुहरे लाभ हैं।।६६।।
‘‘विश्वदेव शान्त प्राप्त’’
पंच ब्रह्म युजित देव हैं तन में आँख, कान, नाक, रसना, त्वक्। इनके क्रमशः ब्रह्म स्वरूप हैं १) रूप ब्रह्म है, २) शब्द ब्रह्म है, ३) गन्ध ब्रह्म है, ४) रस ब्रह्म है, ५) स्पर्श ब्रह्म है। वह व्यक्ति ब्रह्म टूट है जिसके ये पाँच विकृत हो गए हैं। गृहणी के आधिपत्य में भोजन के माध्यम से रस देव, वातायन के माध्यम से स्पर्श देव, सेंट वाटिका सफाई के माध्यम से गंध देव, वस्त्र सजावट दूरदर्शन के माध्यम से रूप देव और रेडियो दूरदर्शन कॅसेटप्लेअर समारोहों में लाउड स्पीकर के माध्यम से शब्द देव रहते हैं। गृहणी गृहपति सहयोग से इस देव व्यवस्था को ब्रह्मित या विषयित कर दे सकती है। इन्हें विषयित आवेगित करना देवों को विषयन करने जैसा है।।६७।।
मैं अपने एक महाप्रबन्धक के मित्र के घर गया। इक्की जाने के लिए एक कक्ष जो उनके लड़कों का था से गुजरा। वहां दीवारें आदमकद नग्न अश्लील चित्रों भरी थीं। दूरदर्शन पर बिकनित महिलाओं का वक्ष चालित नृत्य चल रहा था। कक्ष सिगारेट गंध से भरा था जिसमें एक्सपेलरों की गन्ध भरी थी। कूलर पंखे पूर्ण गति चल रहे थे। नाट्या साधारणीकरण रस के रस देव लेकर गंध देव, स्पर्श देव, रूप देव विकृत थे। शराब मटन का गृह में चलन था ही अन्न या रस देव भी विकृत थे। मुझे स्मरण हुआ इसी महाप्रबन्धक को ठेकेदारों नें भ्रष्टतम कहा था। घर को अनुशासनबद्ध, दृढ़, कठोर, सत्यग्राही, सर्वोदयी गृहणी की आवश्यकता थी। कुछ पता करने पर ज्ञात हुआ कि भाभी के आरम्भिक दिनों के आवेगमय जीवन में पैसों के योग हो जाने से घर इस कागार तक पहुँचा था।
एक युवा को मैंने यह बताया तो उसने कहा- ‘‘तो क्या हुआ? सबको अपना जीवन जीने का हक है, हर एक स्वतन्त्र है।’’ मैंने कहा- ‘‘यही विष-बीज है जो विष-वृक्ष जन्मता है’’।।६८।।
ज्ञान शान्त प्राप्त हो
वाक् वै ब्रह्म- मेरी वाणी में वेद भरा हो वेद तक न पहुँचे तो कम से कम न्याय तो हो ही। एक पति ने पत्नी से कहा- ‘‘माचिस तो पड़ीं थीं फिर और क्यों मंगा लीं?’’ पत्नी ने उत्तर दिया- ‘‘क्या मुझे माचिस मंगाने का भी हक नहीं है..? आप बहुत टोका-टाकी करते हो, मैं तो तंग आ गई.. उस दिन ऐसे ही आपने सॉस के बारे में कहा था। कमाती जो नहीं हूँ..’’ वह धाराप्रवाह बहती रहीं। फिर पति के कुछ भी कहने का वह आन-तान उत्तर देती रहीं। बात का बतंगड़ बन गया। वह कोप बिस्तर चलीं गईं।
कई घरों का यह हाल है। मेरे साथ भी यह घटित हो चुका है। सरल सा न्याय शब्द जल्प या वितण्डा परिस्थिति का हल है। यह सन्दर्भ से हटकर न्यायच्युति है। पति को दो दिन बाद पता चला माचिस साबुन के साथ उपहार में आई थी। न्याय का तकाजा है चर्चा के अर्थ सन्दर्भ से न भटकें। भटकना ही वितण्डा है। वितण्डा वध, आत्महत्या, तलाक, परिवार विघटन, की जड़ है।।६९।।
वाक् वै ब्रह्म- वाक् ब्रह्म है वाक् वेद भरी हो से प्रारम्भ होती है। शुभ ही शुभ हम बोलें। सत्य हमेशा शुभ होता है। वाक् कसौटी हम नहीं वेद हो, विज्ञान हो।
कहीं-कहीं तो गृहणी संग और ही असुविधाजनक होती है। उपरोक्त अधूरे उदाहरण का पूरा रूप इस प्रकार है- पति को उपहार माचिस का पता लगने पर पति ने पत्नी से कहा- ‘‘आखिर आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि माचिस उपहार में आई है?’’ पत्नी बोली- ‘‘आपकी आदत ही खराब है हमेशा टोका-टोकी करते रहते हो बेकार में.. आपको घर से कोई वास्ता ही नहीं रखना चाहिए।’’
सावधान! ‘वाक् अब्रह्म’ भरे-पूरे घरों को बिखरा देता है। घरों में दीवारें उठवा देता है। एक ही घर पति-पत्नी को ऊपर नीचे बाँट देता है। कल मैं एक घर गया। सीढ़ी से ऊपर चढ़ा। घर नीचे बारह सौ फुट बना है। ऊपर डेढ सौ फुट में एक कमरा एक कम्बाइण्ड टॉयलेट है। कमरे का मैंने दरवाजा खटखटाया।।७०।।
‘‘सर्व सामंजस्य शान्त प्राप्त हो’’
आधे बाल उड़े, बचे में पौन-सफेद मेरे सेवानिवृत्त कभी सहअधिकारी ने दरवाजा खोला। मैंने कमरा देखा, मित्र को देखा दोनों एक जैसे लगे। जगह-जगह उखड़ा प्लास्टर, बहे पानी के दागों भरी दीवारें, एक खुली अलमारी में देवी देवता चित्र तथा पूर्वज चित्र, दूसरी में कुछ ऑफिस फाइलें, कुछ पुरानी पत्रिकाएँ एक दो पेपर, मध्य कोने जोर से लगा टी.व्ही., दोस्त का सब कुछ पत्नी से अधिक पत्नी। कुछ अंगूर कुछ बिस्कुट। दो चौकियाँ। मैं कांप-कांप गया। नीचे घर पत्नी होली खेलने ताला लगाकर गई है। यहाँ सर्व असामंजस्य शान्ति है या सर्व सामंजस्य अशान्त प्राप्त है या दोनों है।
उस व्यक्ति ने पिता पालन के सारे दायित्व वहन किए हैं। वर्तमान परिवार व्यय व्यवस्था भी उसने कर दी है। आज यह घर में उपेक्षित रह रहा है और गृहणी भी अलग रह रही है। पति-पत्नी परिवार सदस्य जब प्रजातन्त्री आजादी की परिभाषा में सोचने लगते हैं तो ऐसी नियति आम बात होती है। परिवार भाषा ‘हम’ है इसमें ‘मैं’ न घुसने देना गृहणी दाइत्व है।
द्वय अक्षरं ‘‘मम’’ मृत्यु होती है।
द्वय अक्षरं ‘‘हम’’ आत्मता होती है।
परिवार सामंजस्य शब्द ‘हम’ है। पति पत्नी तो एक + एक = एक है। मतभेद लहरें सागर नहीं है। इन्हें सागर न बनाना परिवार दाइत्व है।।७१।।
‘‘शान्ति शान्त प्राप्त हो’’
पति-पत्नी आपस में बहसरत थे। बहस का मुद्दा था घर में शान्ति। पत्नी का कहना था ‘जगतवत’ जैसा सब रहते हैं वैसा रहने से घर में शान्ति रहती है। पत्नी नें कहा- ‘‘आदर्शों के कारण ही तो लड़ाइयाँ होती हैं।’’ पति ने कहा- ‘‘नासमझी के कारण लड़ाइयाँ होती हैं।’’ पत्नी ने कहा- ‘‘आप होंगे नासमझ’’ पति बोला- ‘‘हम घर में शान्ति पर बातचित कर रहे हैं मेरे आपके नासमझ होने पर नहीं’’ पत्नी बोली- ‘‘आप तो कहाँ की कहाँ खींच लेते हो।’’
शान्ति के लिए युद्ध, बहस, कठोर प्रयास, दंडादि से शान्ति भंग हो जाती है। राष्ट्र, समाज, परिवार या व्यक्ति सभी के लिए नियम है शान्ति हेतु संघर्ष से शान्ति भंग होती है। युद्ध-भय से होनेवाली शान्ति शान्ति नहीं है वरन युद्ध की संभावना है।।७२।।
पति की तर्कणा से तंग आकर पत्नी ने खीजकर कहा- ‘‘अच्छा भई अच्छा अबसे हम बात ही नहीं करेंगे अपने आप शान्ति हो जाएगी।’’ सुनसान को शान्ति नहीं कहते। स्मशान की शान्ति शान्ति नहीं होती। शान्ति का एक तत्त्व है ऋजुता।
सहज, सरल की उन्नत अवस्था का नाम है ऋजु। सहज परिष्कृत व्यवस्था का नाम है ऋजु। ऋजु थे मेरे पिता। मैं छठीं सातवीं पढ़ता था। भाऊ पडोस के लड़के से लड़ाई हुई। तब हम कमीजें पहनते थे। उसने मेरी मैंने उसकी कमीज लड़ाई में फाड़कर बुशशर्ट बना दी। मैं डरता-डरता, सहमा-सहमा घर आया। तब घर समृद्ध न था। पिताजी तथा माताजी मिले। माताजी ने नाराजगी अभिव्यक्त की। पर पिताजी ने अपने बचपन की कस के धोती बांधने और दूसरों के खिंचवाकर फट जाने का उदाहरण देते समझाया। मैं ताउम्र उनकी सीख कि बच्चों के बारे में सोचते समय परिष्कृत बच्चे बनकर सोचो न भूला। शान्ति परिष्कृत उच्च सहज, सरल, ऋजु सम्बन्धों का नाम है। इसमें सुख ही सुख भरा हुआ है।।७३।।
‘‘त्म’’ व्यवस्था
‘त्म’ शब्द आत्म, परमात्म, अतिआत्म का आधार सूक्ष्म शब्द है। इसका अर्थ है ज्ञान करना, ज्ञान कराना। मात्र सुनने योग्य सुनना, मात्र सुनने योग्य सुनाना। कहने योग्य कहना। मात्र नमन योग्य का आदर करना। जहाँ इनका पालन नहीं है या ‘त्म’ व्यवस्था गृहणी नहीं करती है वह घर बकवादी हो जाता है। मोटी भाषा में वहाँ प्रजातन्त्र आ जाता है। राष्ट्र बरबाद करते प्रजातन्त्र को घर बरबाद करते कुछ भी समय नहीं लगता है।
स्व-प्रत्यय का आरम्भ स्थल है ‘त्म’ प्रत्यय। यह प्रजा से सबसे दूर के छोर का प्रत्यय है। ज्ञान भरा, कहने योग्य कहना, सुनने योग्य सुनना-सुनाना, नमन योग्य का आदर बड़ा उच्च कोटि का रसमय अनुशासन है। ‘त्म’ व्यवस्था गरिमामयी गृह व्यवस्था का नाम है।।७४।।
‘‘अनुसूया है मां’’
हर व्यक्ति का कोई जीवन लक्ष्य होना चाहिए। जीवन लक्ष्य जीवन से बड़ा होना चाहिए। मां अनुसूया है। मां बच्चे को जीवन लक्ष्य ही न दे वरन् उसे बनाए भी। अनुसूया का अर्थ ही यह है कि जैसा चाहे वैसा निर्माण करे। मां द्वारा न निर्माण करना ही कुनिर्माण है। जो मां बच्चे का कुनिर्माण करती है वह बरबादतम मां होती है।
आप अनुसूया हैं। बच्चों को वात्सल्य थपकियों, उत्साह शाबाशियो, निकटतमता का अहसास कराते, उनके सिर हाथ फेरते, ममता आह्लाद से सरोबार रखते, छुट्टि में गुणालंकृत करते जिस क्षेत्र चाहें उस क्षेत्र श्रेष्ठ कर सकती हैं। दस से सोलह वर्षों तक तो निश्चित्तः बच्चों को मातृममता आघेर चाहिए। मातृममता आघेर (बच्चों को निकटतम रखते अधिकतम हित करना) पुरोहित भाव है। इस आघेर दिया उपदेश सदाई उपदेश होता है। मैं स्वयं मां के भजन कार्यों का परिवर्द्धित परिष्कृत संस्करण हूँ। मेरी मां मुझमें आह्लाद आनन्द सिहरन हैं। उनके ममता चुम्बन मैं आज भी मेरे शीश अनुभव कर रहा हूँ।।७५।।
‘‘सह परिवार लक्ष्यता’’
व्यक्ति जीवन लक्ष्यवत परिवार जीवन लक्ष्य का भी निर्धारण आपको ही करना है। मंडन मिश्र परिवार वेद लक्ष्यित इस सीमा तक था कि तोता-मैना भी वेद शास्त्रार्थ भाषा बोला करते थे। वे पति-पत्नी एक + एक = एक थे। सुश्री पद्मावती गायकवाड़ परिवार आर्यत्व लक्ष्य युजित था। सारे परिवार सदस्य आर्य भावना युजित सहयुजित हैं।
कुरेटा, खमरिया, कोसानगर, देवबलौदा, सुपेला आदि बस्तियों ग्रामों मेरे साथ-साथ मेरे परिवार स्वर भी बच्चों के भजन स्वर मिले हुए हैं। प्रसांत संगोष्ठियां परिवार के ‘सह’ होती हैं। अरुण समेत हम सांतसा सहलक्ष्य हैं।
गायत्री संगठन सशक्तता सह परिवार लक्ष्यता में ही है। डॉक्टर, इंजीनियर, एम.बी.ए., सी.ए. आदि-आदि मात्र ब्रह्मचर्यावस्था समाप्ति लक्ष्य है। परिवार इतना छोटा सीमित लक्ष्य न करें। व्यापक परिवार लक्ष्य निर्धारण करें।
वैदिक सूक्त, बौद्ध ‘अंग’, कुरान आयत समूह विशेष, बाईबल उपदेश विशेष, गीता विषय विशेष श्लोक, उपनिषद विशेष परिवार लक्ष्य निर्धारण में आपके सहयोगी हो सकते हैं। वेद परिवार लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष समन्वित प्राप्ति है।।७६।।
‘‘गृहणी ही गृहणी है’’
वह घर घर नहीं जंगल है जिसमें गृहणी नहीं होती। महाभारत १२/३६४/३ में लिखा है कि वह गृहणी जिसमें गृहणी नहीं है जंगल से भी अधिक कष्टदायक है। जायेदस्तम् = जाया + इदम् + अस्तम् = जन्मदात्री पत्नी गृहणी ही गृह है। आप ही आधार हैं गृह का। गृह है सन्तान संबंधि, त्यागन लक्ष्यन संगठन, पितर सत्कार, वृद्धों की देखभाल, उत्तम रति, अतिथि सेवा, ये सब आप (गृहणी) आधारित ही हैं। आप से ही हैं आप अर्थात आप ही गृह हैं। केवल भौतिक गृह अधिपत्या ही नही है गृहणी वह आपसी सूक्ष्म संबंधों की भी नियामिका है। और यह नियामिका सुख गृहणी का सबसे बड़ा सुख है। इस सुख को कायम रखिए।
पति, बच्चे, माता-पिता, सेवक यह परिवार आप कल्पना कीजिए आप से रहित एक बियाबान जंगल हो जाएगा। आप इन सबकी शोभा हैं.. गृहणी हैं।।७७।।
‘‘दशरूपका’’
आपकी दसियों भूमिकाएँ हैं। हर रूप आप एक रूपका हैं। यह अगर आप एक रूपका रह गईं तो नौ रूप छूट जाएँगे अतः आपको दशरूपका होना ही होगा। अन्यथा आप अनथक नहीं रह सकेंगी। आप प्रबन्धिका हैं। प्रबन्धन प्रशिक्षण बिना आपने इत-उत से प्रबन्धन सीखा है। इस सीखे को सुव्यवस्थित कर लेना ही ‘दशरूपका’ होना है। आपके पास सतत इतने कार्य हैं कि कई कार्य छूट-छूट जाते हैं। अतः आपको प्रबन्धन के कुछ सरल नियम जानकर उनका पालन सतत करना है ताकि बढ़ती उम्र के साथ बढ़ते दायित्व आप सहजतः पूर्ण कर सकें और कार्यों में आपके चेहरे पर का हँसी का चहचहाता पक्षी घायल न हो। दशरूपका नियम इस प्रकार है-
१) श्रम विभाजन, २) समय आयोजन, ३) आकस्मिक प्रबन्धन, ४) कामूआत, ५) प्रदत्तीकरण।।७८।।
‘‘श्रम विभाजन’’
सबको उम्रानुसार, क्षमतानुसार यथायोग्य कार्य दीजिए। पति से भी कार्यों में सहयोग लीजिए। कभी पति के कंधे पर हाथ रखकर, कभी उसका हाथ स्पर्श करके, कभी अनुनय करके, कभी उसे बुल डोज़ करके, कभी आक्रोश करके, कभी मनुहार करके पति से कार्यों में सहयोग लीजिए। पति लड़के लड़कियाँ आपके कार्यों के अनुपूरक हैं।
कभी सफर में जाएँ तो हर परिवार सदस्य की क्षमतानुसार निश्चित सामान जिम्मेदारी सबको सौंपे। इस हिसाब से सामान भी तैयार करें। द्रुत कार्य नियम स्मरण रखें। यह नियम है कि यदि पाँच क्रियायुक्त कार्य को एक ही व्यक्ति पाँच बार कार्य कर पूरा करता है तो उसे जितना समय लगता है पाँच व्यक्तियों के द्वारा उसी काम को पाँच क्रिया बांट करके करने से प्रति व्यक्ति समय पाँच गुना से करीब कम लगेगा और सामाजिकता का लाभ मुफ्त मिलेगा।
श्रम विभाजन कर कार्य कीजिए दोनों हाथ लड्डू लूटिए।।७९।।
‘‘समय आयोजन’’
हर व्यक्ति कुछ न कुछ समय आयोजन करता ही है। क्या? क्यों? कब? कैसे? किसे? समय आयोजन के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। क्या? कार्य स्वरूप दर्शता है। क्यों? उसकी आवश्यकता तथा महत्ता दर्शाता है। कब? समय तथा समय महत्ता दिखाता है। कैसे? कार्य का तरीका है। किसे कार्य का कर्ता दिखाता है। गृहणी के हजारों काम होते हैं। अनियोजित कार्य करती गृहणियाँ सीधी भाषा में अर्ध विक्षिप्तवत लड़ती झगड़ती खींजती झींकती काम करती हैं। दैनिक साप्ताहिक मासिक वार्षिक कार्यसूची होनी ही चाहिए। प्रतिरात्रि कल के दैनिक कार्य लिख लेने चाहिएँ। साप्ताहिक कार्य दीवाल कॅलेण्डर में लिख लेने चाहिएँ। मासिक कार्य लाल स्याही से कॅलेण्डर में अंकित कर लें। वार्षिक कार्य पति पर छोड़ दें।
दैनिक कार्यों को बोझ न बनने दें। स्नान, पूजा, नाश्ता, खाना, चाय, शर्बत, बर्तन, चौका मुख्य दैनिक कार्य हैं। स्नान, पूजा, नाश्ते को ग्यारह बजे तक मत फैलने दें। नौ बजे के अन्दर समेट लें। ध्यान रखें सह नाश्ता, सह साधना, सह भोजन न केवल समय बचाता है वरन् ममता, स्नेह, घनिष्टता सामंजस्य भी बढ़ाता है।।८०।।
आधुनिक उपकरण दैनिक कार्यों को अर्ध साप्ताहिक भी कर दे सकते हैं। फ्रिज उपयोग से उबली सब्जी संरक्षण, पूर्व तैयार भुने मसालों (तीन प्रकार के) के संरक्षण, द्वारा छै बार किया जानेवाला कार्य एक बार में सिमट जा सकता है। कटौरी, छोटी डिबिया का डब्बों के साथ तथा अतिरिक्त जगह आलू शकरकंद आदि उपयोग कर कुकर तीन के स्थान छै वस्तुएँ उबाल सकता है। कुकर प्रारम्भिक भांप के गंध एन्जाइमों का सर्दी खांसी में दवा प्रयोग भी किया जा सकता है।
वॉशिंग मशीन का अर्ध साप्ताहिक या साप्ताहिक प्रयोग कर पर्याप्त समय बचत की जा सकती है। समय आयोजन का महान परिवार नियम ‘सह आदतें’ है। पति, बच्चों, माता, पिता की विशेषतः अपने आप की सह आदतें स्नान, ध्यान, नाश्ते, भोजन, की बनाने से आप दैनिक समय की करीब-करीब चालीस प्रतिशत बचत इन कार्यों में कर सकती हैं।।८१।।
‘‘आकस्मिक प्रबन्धन’’
गृहस्थी बड़ा ही प्यारा नाम है। आपसी रिश्तों परिचयों के साथ ही साथ गतिशील सामाजिक आनन्ददायक चलायमान गतित सम्बन्धों का नाम है गृहस्थी। समाज नामक पुरुष की आत्मा है गृहस्थी। बुरा हो अनगढ़, अनपढ़ पाश्चात्य का जिसने ‘गृहस्थी’ तोड़ दी। गृह एक बृहत सशक्त हस्ती है जो ठहरी-ठहरी, थमी-थमी ही गतिशील है। अचानक दामाद बेटी आ गए। खुशी में आपके हाथ पाँव दुगुनी गति चले। आपने चौगुनी आवभगत कर डाली। बाद में रात डेढ़ बजे तक समेटा-समेटी चलती रही। आकस्मिक प्रबन्धन का कचूमर निकल गया। दामाद बेटी उनके बच्चों का पेट तो इतना भर गया कि पूछो मत पर उनके सुख-दुःख, रहन-सहन, गति-प्रगति का आपको पता ही नहीं चला।
बच्चा खेल से ऊष्म-ऊष्म आया उसने पानी पी लिया। गर्म-सर्द उसका स्वास्थ्य थोड़ा ऊँचा-नीचा हो गया। पति घर आए आपने घर सर पर उठा लिया। बच्चे को ले डॉक्टर के पास चली गईं। दो सौ रुपए फूंक दिए। बच्चा शाम तक ठीक हुआ। दो दिन की दवा बेकार गई।
हड़बड़ हड़बड़ प्रबन्धन के स्थान पर धैर्यपूर्वक अचानक आई सुखद या दुःखद परिस्थितियों में संयत गुणवत्ता पूर्वक विवेकानुसार व्यवस्था आपको सुगृहणी तथा आपके घर को सुगृहस्थी करेगी।।८२।।
‘‘दशरूपकम्’’
दशरूपका हैं आप कि गृह अधिष्ठात्री हैं। गृह अधिष्ठात्री बड़ा ही गौरवमय पथ है। दसियों विधाओं, कला, शिल्प, कौशल, कथा, व्यवहार, कार्याादि का प्रवहणशील मिश्र रूप गृहस्थी है। बेशक जटिल अन्तर्संबंध है गृहस्थी पर सुखद है। शर्त है अधिष्ठात्री आप दशरूपका सारी डोरें सम्हाल कर संयत रखें।
भरतमुनि ने कहा है कि वह कला कला नहीं है, वह शिल्प शिल्प नहीं है, वह कथा कथा नहीं है, वह नाट्या-भूमिका भूिमका नहीं है, वह जीवन जीवन नहीं है जिसमें दशरूपकम् नहीं है या जो दशरूपका नहीं है। कहने का अर्थ है वह पत्नी कभी गृहस्थी को सुचारु रूप से नहीं चला सकतीं जिसे दशरूपकम् मालूम नहीं है। दशरूपकम् की आत्मा है कामूआत = कार्य, मूल्यांकन, आकलन, तकनीक।।८३।।
‘‘कामूआत’’
गृहस्थी के कार्य निश्चित उच्च कोटि का प्रबन्धन मांगते हैं। दशरूपकम् कामूआत नवीनतम जटिल अन्तर्सम्बन्धित परियोजना प्रबन्धन तकनीक है। गृहस्थी परियोजनामय है। परियोजना परिभाषा है बृहत लागत समयबद्ध कार्य जिसमें अन्तर्सम्बन्धित क्रियाएँ हों, आकस्मिक चुनौतियाँ हों तथा विशेष सुरक्षा व्यवस्थायुक्त नवनिर्माण हो वह परियोजना है। गृहस्थी भी लागतमय, समयबद्ध, कार्यों (संस्कारों, जन्मदिनों, सफरों, यात्राओं) अन्तर्सम्बन्धित रिश्तों के कार्यों, आकस्मिक आयोजनों तथा विशेष सुरक्षा अन्तर्गत नवजीवन निर्माण कार्य है। संस्कार, धर्मसंस्थान, महात्मा, औलिया, आश्रम पुरुषार्थ इसी गृहस्थाधारित हैं।
गृहणियों में प्रबन्धनाभाव में यह गृहस्थी संस्था बिखर-बिखर रही है। दशरूपकम् विधा जिसका अंग्रेजी नाम पर्ट (प्रोग्रॅम इवेल्यूशन रीव्यू टेकनीक) है का पालन करके आप इस संस्था का सबको अधिक लाभ दे सकती हैं।।८४।।
कामूआत तत्व
परिवार संदर्भ में कामूआत तत्त्व इस प्रकार है-
१) अधिकारिक :- पति पत्नी दंपति का धर्म, अर्थ, काम समन्वित मोक्ष भावयुक्त जीवन अधिकारिक है। इस मुख्य तत्त्व का आप तथा आपके पति को सदा ध्यान रखना है। इस तत्त्व युजित कार्य अधिकारिक हैं।
२) पताका :- बच्चों में ब्रह्मभावयुक्त शिक्षा कि उनका समाज में स्वस्थ सुसंगत प्रवेश (समावर्तन) हो सके। माता-पिता जो पालन दायित्व पूरे कर चुके हैं का आश्रय कि वे अपने अनुभव का लाभ परिवार और समाज को दे सकें गृहस्थी के पताका कार्य हैं।
३) प्रकरी :- मेहमान, भृत्य, बाई, विवाह, मकान, समारोह, निर्माण, मनोरंजन, यात्राएँ आदि-आदि गृहस्थ के प्रकरी कार्य हैं।
४) संधियाँ :- संस्कार, स्थानान्तर, पदोन्नति, घर परिवर्तन, जन्म, मृत्यु आदि उप संधियाँ हैं। मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, उपसंहार मुख्य संधियाँ हैं।
५) अवस्थाएँ :- तत्त्व के अनुरूप यत्न, आरम्भ, प्राप्ताशा नियताप्ति, फलागम अवस्थाएँ हैं। अधिकारिक के सन्दर्भ में विवाहोपरान्त प्रति पाँच वर्ष का समय क्रमशः यत्न, आरम्भ, प्राप्ताशा नियताप्ति, फलागम है।
६) प्रकृतियाँ :- बीज, बिन्दु, प्रकरी, पताका, निष्पत्ति पाँच अर्थ प्रकृतियाँ हैं।।८५।।
‘‘संधियाँ-प्रकृतियाँ’’
अधिकारिक, पताका, प्रकरी तत्त्व स्पष्ट हैं। संधियाँ तत्त्व पति-पत्नी (आरंभ से) बच्चों (विमर्शावस्था = उपसंहृति अवस्था) में आपसी क्रिया-प्रक्रिया के आधार तत्त्व हैं। मुख संधि पति-पत्नी मानसिक सामंजस्य समझ संधि है। इस संधि का अपालन अ) मनमुटाव- नासमझी, ब) शौक आवेग भटकाव के कारण होता है। कई-कई परिवार इस संधि अपालन से आज इखरे-बिखरे हो गए हैं। प्रायः प्रेम विवाहों में इस संधि का अपालन होता है। इस संधि की प्रकृति बीज है। अवस्था यत्न है। पति-पत्नी को समझ विकास करते जीवन नक्शा इसी अवस्था बनाना चाहिए। इस अवस्था एक वाक्य से महाबचाव आवश्यक है- ‘‘शौक पूरा करेंगे’’। याद रखें सहज, सरल, ऋजु सम्बन्ध आवेग के उद्दाम सम्बन्ध से प्रगाढ़ मधुर, मधुमय होता है। उपसंहार संधि, फलागम अवस्था, निर्वहण (निष्पत्ति) प्रकृति अतिमहत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इस अवस्था ‘‘भरपूर समझ’’ ही संतोषप्रद होती है। नासमझी के कारण इस अवस्था कई परिवार टूट के महान दुःख भोग रहे हैं।।८६।।
‘‘सर्व से अंश’’
‘ब्रह्म है सारे गुणों की खान, सर्व से अंश है नियम महान’ परमेश्वर सर्व से अंश का सबसे बड़ा उदाहरण तथा उपादेयता है। कामूआत सर्व से अंश होना सिखाती है। सर्व से अंश नियंत्रित होता है तो अंश सटीक रहता है। अंश जो लावारिस है एक भटकाव है। गृहस्थी कामूआत का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है प्रवहण। यत्नावस्था मातृत्व गहन गभीरा प्रसवावस्था प्रशान्तावस्था है। आरम्भावस्था शिल्प कौशलावस्था लालित्यावस्था है। प्राप्ताशावस्था प्रफुल्लावस्था तीव्रगति उल्हासावस्था है। नियताप्ति अवस्था एक स्थायित्व-धीरोदात्तावस्था लालित्य वितरणावस्था है। फलागमावस्था सौम्या, शान्ता ठहरावस्था है। इनमें जीवन सर्पिल गति प्रवहण है।।८७।।
‘‘आकस्मिकताएं’’
जन्म, मृत्यु, सहसा हानी, सहसा लाभ, दुर्घटनाएँ जीवन के कौतुक हैं जो जीवन के सहसा उछाल देते हैं। संसाधन इसमें सहसा प्रयुक्त होते हैं। कई बार तो ये जीवन के लिए चुनौतियाँ हो जाते हैं। अल्पसमयी ये बडी घटनाएँ जीवन को बड़ी दूर तक प्रभावित करती हैं।
मेरा तनजानिया हेतु चयन तथा वहाँ जाना एक ऐसी ही आकस्मिकता थी। एक ही समय में मेरी तथा मेरी पत्नी की भी दुर्घटना हो जाना, इसी प्रकार एक ही समय में मेरा गुण्डों द्वारा जख़्मी होना एवं पूज्य माताजी का दुर्घटना में जांघ की हड्डी टूटना। ये सहसा कौतुकवत घटनाएँ जीवन तप होती हैं तथा उम्र प्रभावी होती हैं।।८८।।
दशरूपकम् चित्र
जीवन दशरूपकम् चित्र इस प्रकार का बनाता है-।।८९।।
दशरूपका
आपका नाम दशरूपका है। आपको हर बड़े कार्य शादि, संस्कार, यात्रादि तथा कुछ सतत कार्य किचन कार्यादि में दशरूपकम् विधा का उपयोग करना है। यह उपयोग विधि इस प्रकार है-
१) सारे के सारे सम्बन्धित कार्य लिख लें। इसमें पति बच्चों से भी सहयोग लें। २) कार्यों में लगनेवाला समय भी लिख लें। ३) लक्ष्य से सीधे जुड़े जो आपको स्वयं करने हैं निकाल कर अलग लिख लें। ४) उन्हें क्रमबद्ध कर लें। ५) जो कार्य अन्य करेंगे मुख्य कार्यों के समानान्तर होंगे वे भी लिख लें। इनमें लम्बे कार्य पताका लघु कार्य प्रकरी होंगे। बहुत बड़े पैमाने के कार्य में उपपताका उपप्रकरी भी होंगे। ६) कार्यों की पूर्ण होने की तिथियाँ (समझ संधियाँ) भी लिख लें। ७) सब सिलसिलेवार जमा दशरूपकम् बना लें।।९०।। बच्चों को भी दशरूपकम् तरीके से परीक्षा देना सिखाएँ। आरम्भ में आप उन्हें दशरूपकम् बना कर दीजिए। बाद में वे खुद बनाने लगेंगे।
घबराइए नहीं दशरूपकम् कठिन नहीं है। कई-कई कार्यों के एक साथ करने की सुव्यवस्था का नाम दशरूपकम् है।
पति या बेटे को एक दिशा या स्थान विशेष की ओर या बाजार जाते समय अगर कोई अन्य सम्भावित कार्य हों तो वे भी बता दीजिए। वर्तमान यान्त्रिक युग में पेट्रोल व्यय एक महाव्यय है। इसमें दशरूपकम् प्रयोग आपको महाबचत दे सकता है।।९१।।
‘‘किचनी’’
क्या आप हमेशा किचन में रहती है? क्या आपके आने-जाने में किसी-किसी सामाजिक समारोह में भाग लेने में खाना बनानादि याने किचन एक बाधा बन गया है? क्या आपके कपड़े से हमेशा किचन की महक आती रहती है? यदि हाँ तो आप किचनी हो गई हैं। यह एक क्रांतिक अवस्था है। इस अवस्था पर सुखद किचन आपके लिए दुःखद हो जाने वाला है।
कई महिलाएँ आल्हादपूर्वक किचन का काम बढ़ाते-बढ़ाते किचनी होकर कालान्तर में किचन बोझ तले दुःखी होती मैंने देखीं हैं। इसे किचन हताशा कह सकते हैं। इस समस्या का निदान है रसोई दशरूपकम्।।९२।।
‘‘रसोई दशरूपकम्’’
रसोई दशरूपकम् बनाने के लिए पहले रसोई कार्यों की सूची बना लेना आवश्यक है। पाँच आदमियों का खाना बनाने के लिए निम्नलिखित कार्य हैं- दाल चावल चुनना, सब्जी काटना, आटा गूंथना, लहसून छीलना, प्याज छीलना, अदरख हरी मिर्चादि काटना, कुकर चढ़ाना, सब्जी बनाना, चावल पकाना, चटनी बनाना, पापड़ सेंकना, सलाद काटना, रोटी बनाना, आटा जोड़ना, डायनिंग टेबल सजाना आदि।
दशरूपका इन कामों को इस प्रकार करेगी- १) सर्व प्रथम कुकर को धोकर उसमें पानी डाल तथा डाल के डिब्बे में पानी डाल उसे सिम पर रख देगी। दाल चुन, धो डब्बे में डाल दूसरे डब्बे में धोकर सब्जी काटेगी एवं नमक मिला कुकर में रख देगी। चावल चुन, धो डब्बा भी कुकर में रख देगी। ढक्कन लगा देगी। स्टीम आ जाने की स्थिति वेट देगी। आटा मल कर रख देगी। दूसरी सब्जी काट लेगी। दूसरी गैस कढ़ाई चढ़ा सिम पर तेल चढ़ा देगी। दो सब्जी दाल हेतु प्याज, मिर्च, अदरख, लहसून आदि छीलकर काटकर प्लेट में अलग-अलग रख देगी। राई, जीरा, हल्दी, धनिया भी अलग रखेगी। आंश प्याज अदरख भुनने के बाद उसमें लहसुन, मिर्च, राई, जीरा, पिसा धनिया, हल्दी डालकर उसे हिलाएगी। तत्काल उसमें सब्जी डालकर उसे हिलाएगी।।९३।।
कुकर ठंडा होने रख देगी। दूसरी गैस कढाई में तेल सिम पर रख देगी। इसी बीच आटा जोड़ लेगी (तेल या घी मिलाकर पुनः गूंथ लेगी)। तेल में अदरख, प्याज को भूनकर अंश दाल तड़का निकाल उसमें हल्दी डाल हिला लेगी। बाकी सब्जी में सब्जी अनुरूप मसाला बदल कर भून लेगी। कुकर खोल सब्जी मसाले में डाल लेगी। दाल में तड़का दे देगी। दूसरे गैस बर्नर सब्जी उतार तवा रख रोटी सेंक लेगी। इसी मध्य सब्जी तथा दाल को भी रसा लेगी। यह रसोई दशरूपकम् एक प्रारूप है। अपनी सुविधानुसार, खाने के आइटमों के अनुसार, उपलब्ध सहभागियों के अनुसार प्रारूप में परिवर्तन मूल कामूआत आधार कायम रखते किया जा सकता है।।९४।।
‘‘कार्य-केन्द्र’’
हर घर में कुछ कार्य-केन्द्र होते हैं। इन कार्य केन्द्रों से ही गृहव्यवस्था प्रारूप बिगड़ना शुरु होता है। गृहणी को इन कार्य-केन्द्रों का विशेष न केवल आयोजन वरन् समय-समय पर व्यवस्था भी करनी चाहिए। इन कार्य-केन्द्रों को पास-पास भी नहीं होना चाहिए। कार्य-केन्द्रों के सामने गति हेतु स्थान भी होना आवश्यक है। किचन प्लेटफॉर्म, फ्रिज, ड्रेसिंग टेबल, सिंक, स्वतंत्र वॉश बेसिन, स्टडी टेबल, वॉशिंग मशीन, सेंटर टेबल, वस्त्र अलमारी, सिलाई मशीन आदि कार्य-केन्द्र हैं। इन कार्य-केन्द्रों की चिन्तन-मनन पूर्वक व्यवस्था करनी चाहिए। दो कार्य-केन्द्र पास-पास होना असुविधाजनक एवं कार्य-ह्रासात्मक होता है।।९५।।
‘‘पंचिका या पंचायिका’’
सुगृहणी हमेशा पंचिका होती है। पंच देव व्यवस्था है आदमी। रूप, रस, स्पर्श, गन्ध, शब्द पंच है आदमी। अनुगुणित पाँच गुणित अनुगुणित तैंतीस देव व्यवस्था आदमी है। और इतनी ही देव व्यवस्था बाह्य है। वास्तव में मानव इतने सुस्फुरण है और इतनी पताकाएँ है प्रकृति में जो मानव में इतने प्रतिसुस्फुरण उत्पन्न करती हैं। ‘‘उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः’’ पताकाओं के समान सुस्फुरण लहरते हैं प्रकृति में। अल्लाह नूर झलकता है बरसता है प्रकृति स्फुरणों से यहोबा उतरता है इन ध्वजाओं से धरा पर। पंचिका गृहणी इन पाँचों की अघोरव्यवस्था करती है। जिस गृह दीवारों पर प्रकृति दृष्य सजे उदात्त वाक्य हों, हव्य धूम या धूप अगर सौम्य महक महकता हो जो गृह, जिस गृह वातायन भजन, बाँसुरी, सितार साधना सस्वर गूँजते हों, शान्ति ओषधयः शान्ति वनस्पतयः सुरस आप्लावित अनाज पुरोडाश, ताजे फल, बदन ताप दो अंश मात्र कमाधिक्य सीमा ताप सुस्वाहा हो तथा बदन ताप एक दो अंश करीब कम गर्मी में एक दो अंश करीब अधिक वायु स्पर्शन हो वह व्यवस्था पंचिका या पंचायिका गृहणीकृत है।।९६।।
‘‘एन्जायिका’’
शरीर सहस्त्रों सहस्त्र किण्व (एन्जाइम) सामंजस्य व्यवस्था है। इस एन्जाइम व्यवस्था परे इससे सूक्ष्म सशक्त धातु, अधातु, आयन वैद्युतीय शक्ति व्यवस्था है। इससे पार सुपदार्थ प्रकृति पार असन्तुलन ऊर्जाकारक व्यवस्था है। इससे पार बोधान, अर्थान, चैतन्यान, आत्मान, अतिआत्मान अवस्थाएँ हैं। ये सारी व्यवस्थाएँ उत्तरोत्तर सामंजस्यमयी हैं। एक-दूसरे को ऊर्ध्व निम्न प्रभावित करती हैं।
एन्जायिका गृहणी अर्थान, बोधान स्तर गृह शिशुओं को सशक्त शुभ ही शुभ विचारों द्वारा करती हैं तथा उन शुभान बोधान के व्यवहार धरातल सुपनपने के लिए गृह का तीव्र उद्दीपनों अर्थात नकारात्मक एन्जाइमों से अभिरक्षण करती है। सारे कृत्रिम सेंट, इनसे निर्मित अगरबत्तियाँ, साबुन, स्क्वॅश, शर्बत नकारात्मक एन्जाइम व्यवस्थाएँ हैं और मानव को आहत करती हैं। ऐसा सतत आहत मानव एलर्जी, दमा, कैंसरादि जिनेटिक बिमारियों के शिकार होने की संभावना से युक्त होता है।
एन्जायिका प्रकृतिक मोगरा, चमेली, चन्दन, जुही, चम्पा, गुलाब एन्जाइम निर्मित (यह गृह निर्मित या बाजार निर्मित) सुगन्ध व्यवस्था का प्रयोग कराती है।।९७।।
‘‘वनस्पत्या’’
जीवन को जिसकी लालसा है वह जल है। जीवन को जिसकी कुलालसा है वह कुजल है। जीवन को जिसकी सुलालसा है वह सुजल है। कुमिश्रित जल कुजल है। सुमिश्रित जल सुजल है। जल त्रिश्रेणीय है। कुजल का ग्रहणीय अन्त्य उदाहरण देशी शराब है। सुजल का अन्त्य उदाहरण तत्काल तोड़कर तत्काल निकाला फलों का रस है। फल सारे ही वनस्पति हैं।
एक ही वृक्ष या पौधे से वर्ष दर वर्ष प्राप्त फसल साध का नाम है वनस्पति। संतरा, मुसम्बी, काजू, ताड़, नारियल, अमरूद, नींबू, कटहल, आम, पपिता, लीची, सेव, सीताफल आदि वनस्पतियाँ हैं।
जिस गृह में गृहणी ने खाद्य रूप में वनस्पतियों का कम से कम तैंतीस प्रतिशत खाद्यरूप में प्रयोग किया है तथा बच्चों को भी इनका ग्रहण करना सिखाया है वह गृहणी वनस्पत्या है। मैं स्वयं वनस्पत्या मां का पुत्र हूँ।।९८।।
‘‘ओषधया’’
अन्न का संवाहन ब्रह्म तक है। ब्रह्म है सर्वोत्तम औषध। अन्न औषध है संवहनशील। औषध कहते हैं उन खाद्यपदार्थों को जो पौधों से एक ही बार प्राप्त होते हैं। यथा चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, मक्का एवं सब्जियाँ।
अनाजों का प्रकृति के निकटतम रखते सुखाद्य बना प्रयोग करना ओषधया गृहणी का दायित्व है। चावल, दलिया, दाल, चोकरयुक्त आटादि सुखाद्य प्रयोग हैं। सब्जियाँ खड़ी-खड़ी अर्धपकी (महाराष्ट्रीयन नारियाँ जैसे पकाती हैं) अगर हो तो प्राकृतिक सुखाद्य होती हैं।
कच्ची जो खाई जाएँ ककड़ी, खीरा, खरबूजा, टमाटर, सलाद पत्तादि ताजा खाना डॉक्टर को दूर भगाना है। इनमें एन्जाइम गुण भी होते हैं। धनिया, प्याज, लहसुन, पुदिना आदि के गंध एन्जाइम स्वास्थ्यकर हैं। (६५, ६६ में भी अंशतः यह विवरण है)।।९९।।
‘‘सुविविधा’’
उत्तम हो परिवार जन व्याप्त = संवृधा। पवित्रता ओतः प्रोत पवित्रता बिखेरती = पावीरवी। दिव्या जिसे ऋचाएँ चाहती हैं, जिसमें ऋचाएँ रहती हैं, समताएँ जिसे आवृत करती हैं। गहनता से सोम भरा = जागारा। विदुषी, उत्तमवर्णा, तेजस्विनी, बढ़नेवाली, अनुकूला, वृद्धि आधारा = सुवर्चा। नेतृत्व में सुप्रशंसित = नृपत्नी। कोमल, अहंकारशून्य, सरल, सहज, ऋजु है जो = आर्जवा। पाँच इन्द्रियों को परिशुद्ध करता पाँच इन्द्रिय परिशुद्ध पका भोजन करनेवाली = पंचोदना। शौर्यशीला, आत्मसन्निद्धि आनन्द ओतः प्रोत, सुमति समागमी, प्रकृति-तथ्य-ज्ञाता, प्रत्यक्षा, सुरक्षा रक्षिता = सधमाद आदि-आदि आपके दिव्य नाम हैं। पंचगुणी माता है। १) संतुलित ममतामयी पूरे कुल के लिए। २) सन्तानों के भूषणभूत सम्यक् करण करती। ३) सुनिर्माण कर्त्री। ४) मान पूजा सत्कार योग्य। ५) अन्न भोजन संस्कारों से सन्तानों को धन्य मान्य करती स्त्री हैं आप। १) नीची पलक नम्र, २) आंख अतरेर सौम्य, ३) गंभीरता से चलनेवाली, ४) द्वियुगल अंग अप्रकट रखनेवाली, ५) स्त्रीत्व आत्मरूपा।।१००।।
‘‘सुपत्नी-पति’’
सुपत्नी-पति घर का निर्माण करते हैं। घर – १) उत्तम पराक्रमों से युक्त, २) गति साधनों से युक्त, ३) शोभायुक्त, ४) स्थिर एवं दृढ प्रतिज्ञ, ५) गौओं से युक्त, ६) अन्न से युक्त, ७) घी दुग्ध से युक्त, ८) उच्चस्तरीय बड़े सौभाग्य की प्राप्ति के लिए हो।
गृहस्थी दम्पति है। १) एक मन यज्ञकर्ता दो। २) स्वस्ति प्रार्थना द्वारा परमात्मा की ओर एक साथ दौड़ते। ३) ईश्वर आश्रय में सब कार्य करते। ४) विद्वानों का उपदेश कराते, विस्तारते। ५) शोभनमति बांटते। ६) शुभ कर्मों का उपार्जन करते। ७) नाना भोग आनन्दते। ८) सुख बाँटते-पाते। ९) सुखद विविधतापूर्ण। १०) दोनों अग्निहोत्र प्रिय = वातायन का सुएन्जाइमीकरण अग्निहोत्र है। ११) दोनों उदारचित्त दानी। १२) दोनों के रोम-रोम ज्ञान से ऊर्ध्वगमनयुक्त। १३) सच्चरित्र आभूषणयुक्त दैदीप्यमान। १४) समृद्धि सम्पन्न। १५) धर्म परिपूर्ण। १६) सहपरिवारपूर्ण उपरोक्त षोडस कला सुविकसित।
पति-पत्नी दिधिषु हैं। अर्थात एक दूसरे के पूरक तथा एक दूसरे की सेवा करने वाले हैं।
उपसंहार
पति-पत्नी में पति यह पत्नी वह का दुग्ध-दुग्ध वत उजल पुष्टिकारक सम्बन्ध है। दोनों सम ज्ञानी हैं। इनका परिवार गृहस्थाश्रम है जिसमें माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-भाई, बहन-बहन, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री, भृत्य आदि सदस्य समनस्वता, सहृदयतापूर्वक, एक स्नेहिल बन्धनयुक्त, समवेत श्रेष्ठता का सम्पादन करते, सहयोगपूर्वक एक अग्रणी का अनुसरण करते, उदात्त संस्कृति का निर्माण करते हैं।
गृहस्थाश्रम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पथ ले जाता अश्व है। यह सतत अविराम गति है। यह प्रशिक्षित गति है। अवीनामी विस्तरणशील है। कालवत सर्पणशील है। ज्योति है। तीनों आश्रमों की आधार वृषा है। उमंग उत्साह से पूर्ण है। ज्ञान प्रसार-उपयोग केन्द्र है। शिशु के आह्लाद उछाह का केन्द्र है। परिवार सदस्यों द्वारा शुभगमन है। रमणीयाश्रम है। श्रेष्ठ निवास है यह। श्रेष्ठ समर्पण भाव है। स्व विसर्जन भाव स्वाहा है यह।
आप साम्राज्ञी हैं गृहस्थ साम्राज्य की जो आपने बनाया है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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