सकारात्मक सुरक्षा संस्कृति समय की माँग

विश्व इतिहास का पहला कारखाना ईस्वी 1317 में ब्रिटेन के एमीनस् शहर में 120 श्रमिकों का लगाया गया था । सोलहवीं सदी में छः सौ, सात सौ श्रमिकों वाले बुनाई के कारखाने लगाये गये । 1750 में भाप के इंजन के साथ औद्योगीकरण का आरंभ हुआ । पुरुष, औरतें और बच्चे इस समय भीड़ भरे स्थानों में छोटी झोपड़ियों तथा कीचड़ी वातावरण में रहते हुए बारह बारह घंटे कार्य करते थे । इस समय मशीनों की चिन्ता मनुष्य से कहीं अधिक की जाती थी । श्रमिक सुलभ तथा सस्ते थे मशीनें दुर्लभ व महंगी । श्रमिक के श्रम से ही मालिकों का वास्था था । उसकी दुर्घटनाओं, चोटों, कभी-कभी मृत्यु से भी उद्योगपति तटस्थ रहते थे। इन भीषण परिस्थितियों में 1833, 1842 में कारखाना अधिनियम के आधार पर सुरक्षा का जन्म हुआ । सुरक्षा का जन्म मृत्यु, शोषण, दुर्घटनाओं के परिणामस्वरूप हुआ । इसके आधारभूत तथ्य नकारात्मक थे ।

दुर्घटना आधारित सुरक्षा:
आज औद्योगिकरण चरम विकास पर है परन्तु सुरक्षा का आधारभूत ढांचा 1833, 1842 के कारखाना अधिनियम ही है । अधिनियम के विशिष्ट प्रावधान दुर्घटनाओं से संबंधित है । पूरे कारखाना अधिनियम में ”सुरक्षा“, ”सुरक्षित कार्य“, की कहीं परिभाषा नहीं है । वर्तमान में नकारात्मक सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है ।

अप्रैल 93 में अर्न्तराष्ट्रीय श्रम संगठन एवं राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के तत्वाधान में एक अर्न्तराष्ट्रीय औद्योगिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सम्मेलन दिल्ली में हुआ था । सम्मेलन का 80 प्रतिशत भाग दुर्घटना एवं दुर्घटना बचाव पर केन्द्रित था । विश्व स्तर पर भी सुरक्षा का नकारात्मक पहलू हावी है । अतः नकारात्मक सुरक्षा संस्कृति समय की माँग है ।

सुरक्षा के क्षेत्र हैं – (अ) नकारात्मक (ब) सकारात्मक

नकारात्मक सुरक्षा:
इससे दुर्घटना सुरक्षा का आधारभूत तथ्य माना गया है । दुर्घटना की परिभाषा दो आधारों पर टिकी है ।

(अ) कार्य आधारित (ब) परिमाण आधारित
दोनों को मिलाने से
दुर्घटना वह अनअपेक्षित घटना है जिससे प्रक्रिया में रुकावट पड़ती है । जानमाल व मशीन की हानि होती है तथा जिसका कार्य में पूर्व प्रावधान नहीं होता और जो असुरक्षित स्थितियों के कारण या असुरक्षित कार्यों के कारण या दोनों के कारण घटती है, दुर्घटना है ।

सकारात्मक सुरक्षा:
सुघटना का विरोधी शब्द दुर्घटना ।
वर्तमान सुरक्षा के क्षेत्र में सुघटना की परिभाषा कहीं भी उपलब्ध नहीं है । सुघटना (परिभाषा) – वह अपेक्षित घटना जिसका कार्य में पूर्व प्रावधान हो जो प्रक्रिया में सहायक हो, जानमाल व मशीन के स्वास्थ्य में वृद्धि करे तथा जो सुरक्षित स्थितियों या सुरक्षित कार्यों या दोनों के सामंजस्य से हो, सुघटना है ।

सुघटना दुर्घटना
(सकारात्मक सुरक्षा संस्कृति आधार)

  1. सुघटना जानकारी का प्रमाण है।
  2. सुघटना सुखद है।
  3. सुघटना का प्रावधान होता है।
  4. सुरक्षित स्थिति का कार्य या दोनों ।
  5. सकारात्मक सुरक्षा क्षेत्र।
  6. आठ नकारात्मक तथ्याधारित।

(नकारात्मक सुरक्षा संस्कृति आधार)

  1. दुर्घटना बताकर नहीं आती।
  2. दुर्घटना दुःखद है।
  3. दुर्घटना का प्रावधान नहीं होता।
  4. असुरक्षित स्थिति या कार्य या दोनों।
  5. नकारात्मक सुरक्षा क्षेत्र।
  6. आठ घातक तथ्याधारित।

(अ) मृत्यु को पैर से ढकेलते चलो ।
(ब)सुघटना प्रगति आधार है।
(स)सुघटना से श्रेष्ठता नियम है ।
(द)गुणाधारित कार्य सुघटना है ।
(इ)मेरे दाहिने हाथ कर्म व बाये में विजय है ।
(फ)कार्य ही पूजा है ।
(य)मानव स्वयं भाग्य निर्माता है ।
(ल)मानव सुनियमबद्ध स्वतंत्र है ।

(अ) दिन पूरे हो गये ।
(ब) दुर्घटना प्रगति की कीमत है ।
(स) दुर्घटनाओं में औसत नियम हैं ।
(द) दुर्घटना परमात्मा के हाथ है।
(इ) हर एक का भविष्य लिखित है ।
(फ) कार्य बलि देता है ।
(य) भाग्य बचाता मारता है ।
(ल) मानव परतंत्र है ।

सुघटना योजना: (एक स्वस्थ दृष्टिकोण)
”दुर्घटना से बचाव ही सुरक्षा है“ यह एक अस्वस्थ दृष्टिकोण है । इसमें दृष्टिकोण नकारात्मक से होता हुआ सकारात्मक होता है । ”उत्तम कार्य (सुघटना) ही सुरक्षा है“ यह एक स्वस्थ दृष्टिकोण है । उत्तम कार्य के तत्व हैं:
(1) मेहनतपूर्वक , (2) नियमपूर्वक , (3) यशपूर्वक, (4) तपपूर्वक, (5) सत्यपूर्वक , (6) टिकाऊ, (7) मजबूत , (8) सुरक्षा सहित ।
सुघटना वह इच्छित कार्य है जिसकी परिणति लोगों के लिए स्वास्थ्यकार, संपत्ति के लिए रक्षणकरण एवं प्रक्रिया के सातत्व में होती है ।

सुघटना:
बोध से, प्रतिबोध (अवचेतन बोध) से, अनैच्छिक क्रिया स्वस्थता से, संतुलन से, स्वस्थ इन्द्रियों से , स्वस्थ शरीर अंगों से तथा सुचैतन्यता से प्राप् की जाती है । अथर्ववेद – 4/1/13

सुघटना कारण तालिका
क्र. नियंत्रण प्रमुख वर्तमान स्थिति सुघटना
सुकारण सुकारण संपर्क
(त्वरित)

  1. पर्याप्त संतुलित सुव्यक्तित्व मानक शक्ति व्यक्तिलाभ
    आयोजना कार्य औजार
    एवम्
  2. पर्याप्त सुव्यक्तित्व मानक पदार्थ से सम्पत्ति
    आयोजना स्थितियाँ सुसंपर्क लाभ
  3. पर्याप्त मानक युक्त सुकार्य — — प्रक्रिया
    आयोजन पूर्ति लाभ

सुघटना के मूल सुकारण:

  1. ( व्यक्तित्व संबंधित ) =
    अ) पर्याप्त क्षमता = (1) शारीरिक, (2) भौतिक, (3) मस्तिष्कीय, (4) मनोवैज्ञानिक,
    ब) ज्ञान
    स) दक्षता
    द) शक्ति-तनाव मुक्रावस्था = (1) शारीरिक, (2) भौतिक, (3) मस्तिष्कीय, (4) मनोवैज्ञानिक
    फ) प्रोत्साहन-उत्प्रेरणा
  2. सुकार्य स्तर = (अ) नेतृत्व, (ब) अभियांत्रिकीय योग्यता स्तर, (स) सुक्रय, (द) सु-सुधार कार्य, (इ) सुउपस्कर, सुऔजार, सुपदार्थ, (फ) पर्याप्त कार्य मानक, (ल) रक्षण एवं अभिसंचयन, (क) सदुपयोग।
    वर्तमान सुकारण:
    (अ) मानक-कार्य = 1. सत्ता सहित उपस्कर परिचालन, 2. चेतावनी देते कार्य/सावधान करते कार्य , 3. सटीक गति, 4. सुरक्षा घेरों का उपयोग, 5. सही औजार प्रयोग/औजार का सटीक प्रयोग, 6. सतत् सुरक्षा उपकरण प्रयोग, 7. सटीक उठाना, भरना, रखना, 8. बंद उपस्कर में ही सुधार कार्य, 9. संयत शांत कार्य व्यवहार।
    (ब) मानक स्थितियाँ = 1. पर्याप्त कवच या सुरक्षा आवरण, 2. पर्याप्त एवं सटीक सुरक्षा उपकरण, 3. सु-औजार, सु-उ पस्कर, सु-पदार्थ, 4. समुचित क्रिया स्थान, 5. ठीक चेतावनी व्यवस्था, 6. उत्तम गृह व्यवस्था, 7. शुद्ध-शांत पर्यावरण = (क) सौम्य आवाज, (ख) सौम्यताप, (ग) सौम्य प्रकाश, (घ) सौम्य वातायन।
    स्थिति संपर्क:
    दुष्पदार्थों से संपर्क दुर्घटना कारण होता है । इस कारण को स्थिति संपर्क कहते हैं । स्थिति संपर्क को सुस्थिति संपर्क में परिवर्तन करने का प्रमुखतम साधन गृह व्यवस्था है ।

इसके अन्य सुपथ इस प्रकार हैं:

  1. वैकल्पिक हानि रहित स्त्रोतों की तलाश ।
  2. लाभकर स्तर तक ही शक्ति का प्रयोग या लाभप्रद स्तर तक शक्ति दाब का अवमूल्यन ।
  3. शक्ति पृथक्करण – मानव ये संपत्ति से हानिकारक शक्ति को अलग-अलग करना ।
  4. संपर्क पदार्थों का समकिनारों युक्त होना ।
  5. सुसाधनिक कर मानव को शक्तिकृत करना, संपति को सुरक्षित करना ।

सुलाभ:
लाभ सामान्य समझे जाने के कारण उसकी ओर ध्यान नहीं जाता है । अतः लाभ को सु-लाभ के रूप में देखना चाहिए ।

  1. चिकित्सा-व्यय का अनुरक्षण
  2. सतत्-कार्य-शीलता लाभ
  3. आयोजन-सातत्य लाभ
  4. मानव संसाधन लाभ
  5. तात्कालिक-कार्यक्रम लाभ =
    अ. व्यक्ति सुघटना से चारों अलग
    ब. उपस्कर-यंत्र अलग तथा समूह में
    स. पदार्थ सामंजस्य में रहते हैं
    द. पर्यावरण

सकारात्मक गृह व्यवस्था के गुण गृहणी के प्रत्ययों में मिलती है । सकारात्मक गृह व्यवस्था सुमंगली, सुशेता (उत्तम सहायक), वधूरिमा (वृद्धि दायक) शुभा, सुकृता, सौमनस, स्योना (सुखद), सुयमा (नियम बद्ध), उर्वरा, सुर्क्या (गौरवपूर्ण), प्रतरणी (उन्नति करने वाली) शम्भूभाना, अपतिन्घी (अनाड़ी को दंडित करने वाली) होती है । ये सारे प्रत्यय पत्नी के लिए वेदों में दिये गये हैं ।

उपरोक्त सुतथ्यों के प्रकाश में सरक्षा अभियांत्रिकी की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है:

सुरक्षा अभियांत्रिकी: कला, समाज शास्त्र, विधि, मनोविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, शिक्षा तथा अभियांत्रिकी का सुघटनाओं के निष्पादन तथा स्वास्थ्य, जीवन एवं संपत्ति के रक्षण में उपयोग सुरक्षा अभियांत्रिकी है ।

संस्कृति:
संस्कृति शब्द ”सम“ और ”कृ“ धातुओं से बना है । इसका अर्थ है सम्यक् भूषण भूत कृतिकरण । मानव को गुण के आभूषणों से अलंकृत करना, कार्य स्थाल को कार्य नियमों से अलंकृत करना संस्कृति है ।

रक्षा (मानव, संपत्ति, संयंत्र की) व्यवस्था को समुन्नत करना सुरक्षा है एवं कार्य स्थल एवं कर्मचारियों के सुघटना निष्पादन हेतु समुन्नत करना सुरक्षा संस्कृति है ।

सकारात्मक सुरक्षा संस्कृति वर्तमान समय की मांग ही नहीं आवश्यकता है, इसे पूर्ण क्षेत्र में लागू करना एक कठिन कार्य है । भारतीय संस्कृति में पच्चीस-पचहत्तर का सिद्धान्त है । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, सन्यास, वामप्रस्थ में सोलह संस्कार आते हैं । इनमें से 75 प्रतिशत अर्थात 12 ब्रह्मचर्य में ही हो जाते हैं क्योंकि ब्रह्मचर्य आधारभूत आश्रम है । इसे साथ लेने से सभी आश्रम सध जाते हैं । इसी प्रकार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथ माता-पिता, आचार्य, अतिथि में क्रमशः प्रथम धर्म एवं माता के पच्चीस प्रतिशत को पचहत्तर प्रतिशत महत्ता है ।

सकारात्मक सुरक्षा संस्कृति के आरंभ के लिए हम पहले सर्वाधिक पच्चीस प्रतिशत क्षेत्र चुनकर वहाँ इसे लागू करने के प्रयास से कार्य आरंभ कर सकते हैं ।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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