रेवती ~ (पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त)

गौरवमय उन्नति अग्रसर मानस हलचल करते पंच समूह का नाम रेवती है। समस्या पर मानसिक हलचल करते समूह की क्रिया को ब्रेन स्टार्मिंग कहते हैं। ओसवार्न नाम के शिक्षक ने लंदन में उन्नीस सौ पैतीस में इस सिद्धान्त का प्रयोग किया। इस सिद्धान्त का कालान्तर में उद्योग क्षेत्र में व्यापक प्रयोग किया गया। रेवती सिद्धान्त के आधार सत्य निम्नलिखित हैं-

(1) पंच समूह, (2) पंचीकरण सिद्धान्त, (3) हाथ के समान, (4) मानसिक हलचल हाथवत- कम से कम, अधिक से अधिक, (5) एक से दो मस्तिष्क, दो से तीन मस्तिष्क आदि बेहतर सिद्धान्त, (6) व्यक्तियों को समस्त देने प्रोत्साहित करना, (7) समस्या का उत्तम अध्ाम पक्ष अध्ययन, (8) विशिष्ट वर्ग द्वारा समस्या समन्वय। (7) और (8) का आधार पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त है।

पच्चीस प्रतिशत अंश के पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण होने तथा शेष पचहत्तर प्रतिशत अंश के पच्चीस प्रतिशत महत्वपूर्ण होने के सिद्धान्त को पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त कहते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी समस्या या कार्य को तालिकाबद्ध करके उसका वह पच्चीस प्रतिशत छांट लिया जाता है जो पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण है तथा उसका वह पच्चीस प्रतिशत भी छांट लिया जाता है जो पच्चीस प्रतिशत महत्वपूर्ण है। स्पष्ट है प्रथम पच्चीस प्रतिशत हल करने से बाकी पचहत्तर प्रतिशत आसानी से हल हो जाता है।

पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त का आधार   धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार पुरुषार्थ हैं। जिसमें धर्म का पच्चीस प्रतिशत पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण है। तथा इसके सध जाने पर अर्थ, काम, मोक्ष के पचहत्तर प्रतिशत सहज हो जाते हैं। इसी प्रकार आश्रम व्यवस्था में पच्चीस वर्षीय ब्रह्मचर्य आश्रम सोलह में से बारह संस्कारों का आश्रम पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण है तथा इसके सध जाने से गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यासाश्रम सहजतर से सध जाते हैं।

वर्तमान में उद्योग शास्त्र में ब्रेन स्टार्मिंग तथा अस्सी-बीस सिद्धान्त मछली चित्र के रूप में प्रचलित है। इसमें कई कमियां हैं-

(1) समूहघात की सम्भावना यह प्रायः घटती है। समूहघात का अर्थ है पूरे समूह द्वारा घटिया सोच पर ठहर जाना तथा तदनुरूप निर्णय लेना।

(2) विशेषज्ञता के कारण विचार सम्मिश्रता का अभाव।

(3) समस्या हल या स्वरूप दर्शाते समूह में स्तरीकरण दूरी की अधिकता।

(4) तटस्थता जो बुद्धि की आत्मा है का न्याय दर्शन के अप्रचलन तथा विशेषज्ञता के कारण अभाव।

(5) इसका विदेश आयातित होने के कारण सहजतः व्यापक समर्थन नहीं।

(6) सिद्धान्त का सरलीकृत उदाहरण नहीं।

उपरोक्त कमियां भारतीय संस्कृति के रेवती पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त में नहीं हैं। इसमें संच समूह, पंचीकरण सिद्धान्त तथा हाथ के समान जोड़ देने से उपरोक्त समस्याओं का निराकरण हो जाता है तथा यह इक्कीसवीं सदी का ”रेवती पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त“हो जाता है। पंच समूह सम्मिश्र प्रजा का नाम है। जिसमें उद्योग में ज्ञान समूह, शौर्य समूह, संसाधन समूह, शिल्प समूह तथा सेवा समूह के पंच समूह कार्य करते हैं। पंचीकरण सिद्धान्त के अनुरूप ज्ञान समूह के हर व्यक्ति में पचास प्रतिशत ज्ञान तथा साढ़े बारह-साढ़े बारह प्रतिशत शौर्य संसाधन शिल्प और सेवा रहते हैं। यह विचारों की सम्मिश्रता और क्रास फर्टिलाइजेशन आफ आइडियाज़ का पूरा लाभ लेना है जो वर्तमान व्यवस्था में सम्भव नहीं है। इस पंचीकरण सिद्धान्त के कारण ब्रेन स्टार्मिंग के सिद्धान्त में गुणात्मक उन्नयन हो जाता है तथा ग्रुप थिंग (समूह घात) की सम्भावना ही समाप्त हो जाती है।

”हाथ के समान“रेवती पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त का सहज सरल उदाहरण है जो एक बालक भी समझाने पर समझ सकता है। हाथ सर्वोत्तम,  सर्वविविध, सर्वकारगर चल मशीन है सृष्टि की। संसार के सारे डॉक्टर, सारे इन्जीनियर, सारे वैज्ञानिक; संसार के सारे आधुनिक वैज्ञानिक चल-अचल संसाधनों को मिलाकर हाथ जैसी बहुआयामी सुसंगत रेवती मशीन नहीं बना सकते हैं।

शर्धं-शर्धम्, व्रातं-वातम्, गणं-गणम् का ऊंगलियों के क्रम अनुक्रम का सुबुद्धिपूर्वक प्रयोग करके नेतृत्व की संकल्पना का विकास करना चाहिए। ऋग्वेद का यह मन्त्रभाव रेवती पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त का आधारभूत मन्त्र कहा जा सकता है-

(1) शर्धम्- व्यक्तिगत शौर्य का आदर्श प्रारूप।

(2) शर्धम्- व्यक्तिगत शौर्य का व्यवहार प्रारूप।

(3) व्रातम्- जिसके लिए व्रत लिया गया हो उस लक्ष्य का आदर्श प्रारूप।

(4) व्रातम्- आदर्श लक्ष्य प्रारूप का व्यवहार रूप।

(5) गणम्- आदर्श समूह।

(6) गणम्- व्यवहार समूह।

प्लेटो तथा उसके गुरु सुकरात की दोनों आंखें आसमान पर लगी हुई थीं। वे आदर्श लोक के संकल्पक भाव निवासी थे। इनके शिष्य अरस्तू की एक आंख आसमान पर तथा एक जमीन पर लगी हुई थी। वेद आदर्श व्यवहार के समन्वय की बात कहता है। वर्तमान में नेतृत्व संकल्पना का सफल नायक जर्मनी का जान आफ्टर अडेयर है। जो नेतृत्व की सकारात्मक नेतृत्व व्यवहार संकल्पना देता है। जिसमें वह तीन तत्व- (1) व्यक्ति विकास, (2) लक्ष्य प्राप्ति, (3) समूह निर्माण संकल्पनाओं का त्रि-वृत गुम्फित स्वरूप देता है जो इस प्रकार है-

वैदिक नेतृत्व संकल्पना जान आफ्टर अडेयर की संकल्पना को सदीयों पीछे की- वैचारिक दृष्टि से बाबा आदम के जमाने की ठहराती है। वैदिक संकल्पना ”तब अब तब“है। इसमें पंचीकरण, रेवती, शर्धं-शर्धम्, व्रातं-व्रातम्, गणं-गणम् सम्मिश्र है। इसका स्वरूप इस प्रकार है।

चित्रानुसार कार्य आयोजना करने से व्यक्ति विकास का आदर्श ढ़ांचा तथा व्यवहार ढ़ांचा, लक्ष्य का आदर्श ढ़ांचा तथा व्यवहार ढ़ांचा एवं समूह का आदर्श ढ़ांचा तथा व्यवहार ढ़ांचा हमेशा सामने रहते हैं। दोनों में अन्तर गुणवत्ता ह्रास है। इस चित्रानुसार गुणवत्ता आकलन के भी तीन आधार स्पष्ट होते हैं। समूह गुणवत्ता एवं व्यक्तिगत गुणवत्ता उत्तरोत्तर एक दूसरे को सु, दुः सम प्रभावित करते हैं तथा इससे लक्ष्य गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।

उपरोक्त चित्र के आकारानुसार त्रिभुज बनाकर उसमें शर्धम्, व्रातम्, गणम् कार्य भरकर चित्र को शेष मात्रा आकलन के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।

रेवती सिद्धान्त का पंचीकरण के साथ एक और महत्वपूर्ण व्यवहारिक प्रयोग ”हाथ के समान“रूप में है। हाथ की ऊंगलियों के क्रम अनुक्रम के समान नेतृत्व संकल्पना एक मननीय संकल्पना है। हाथ की पांच अंगुलियां समाज के पांच घटकों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अंगुठा ज्ञान समूह का, तर्जनी शौर्य समूह का, मध्यमा धन समूह का, अनामिका शिल्प समूह का तथा कनिष्ठा सेवा समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। हर कार्य करते समय इनमें अöुत सामंजस्य है। अंगुठे का बीस प्रतिशत अर्थात् ज्ञान का बीस प्रतिशत सम्पूर्ण हाथ मुद्रा के कार्यों में अस्सी प्रतिशत महत्वपूर्ण है। गिनने कि मुद्रा में अंगुठे की पहुंच हर ऊंगलि तक है। आटा गूंथने की मुद्रा में अंगूठा मुख्य भीतरी आधार है जो सारा दबाव सहन करता है। लिखने में भी यह एक आधार ऊंगलियों के समानांतर रहता है। घुग्घू बजाने की मुद्रा में यह प्रमुख छिद्र बन्द कर विशिष्ट मुद्रा जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है धारण करता है। घंूसा मारने में भी इसका आधार सारी ऊंगलियों को प्राप्त है। वर्तमान व्यवस्था में भी अंगूठा संकेत, उत्साह वर्धन, उत्तम कार्य के रूप में प्रयुक्त होने लगा है, यह पूर्ण नकार के रूप में भी प्रयुक्त होता है। क्षतिपूर्ति नियम में भी इसकी महत्ता का विशेष स्वीकार है। लड्डू बनाने, चुनने, गिलास पकडने, काटने, हथौडा चलाने आदि में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अंगूठे के अस्सी प्रतिशत महत्वपूर्ण होने के कारण तथा वेद के क्रम अनुक्रम नियम पर ध्यान देने के आधार पर कहा जा सकता है कि अस्सी-बीस का मूल सिद्धान्ताधार यही हो सकता है।

जिस किसी समाज के ज्ञान को अस्सी प्रतिशत समाज मान्यता नहीं है वह समाज नष्ट होने की ओर गति कर रहा होता है। वेद तथा वैदिक साहित्य में अस्सी प्रतिशत महत्ता ज्ञान की हैै। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में ज्ञान की उपासना है।

परियोजना प्रबंधन में हाथ की क्रमशः चुटकी, लिखना, चुनना, लड्डू बनाना, घुग्घू बजाना, गिलास पकड़ना मुद्राओं के अनुक्रमानुसार कार्य समूह बनते हैं तथा कार्य होते हैं। धन $ ज्ञान = चुटकी से कार्य प्रारम्भ होता है। धन $ ज्ञान $ शौर्य = लिखना से कार्य तथा योजना निश्चित होती है। धन $ ज्ञान $ शौर्य $ शिल्प = चुनने से ले आउट, इनेबलिंग कार्य प्रारम्भ होते हैं। धन $ ज्ञान $ शौर्य $ शिल्प $ सेवा (सतत गति) = लड्डू बनाना से कार्य तीव्र गति होते हैं तथा पांचों के ज्ञान आधिपत्य = घुग्घू बजाना से कार्य कमिशन होते हैं एवं पांचों के सम सहज = गिलास पकड़ने वत सम्पन्न होते हैं।

पंचीकरण रेवती सिद्धान्त का आधार है। इसके साथ कुछ समस्याओं के लिए पच्चीस पचहत्तर एवं कुछ के लिए अस्सी बीस सिद्धान्त जोड़ा जा सकता है। इस सिद्धान्त का व्यवहारिक उपयोग इस प्रकार है।

पंच समूह जो पंचीकरण सिद्धान्तानुरूप हो को इकट्ठा कर एक समस्या दी जाती है। समूह को निश्चित समय में समस्या पर उत्तम से उत्तम तथा निम्न से निम्न सकारात्मक एवं नकारात्मक विचार देने के लिए प्रेरित किया जाता है। ये सारे विचार इकट्ठे कर लिए जाते हैं। सकारात्मक विचार बिन्दुओं को श्रेष्ठता क्रम में मानक तय कर अंक दे दिए जाते हैं तथा नकारात्मक विचार बिन्दुओं को अश्रेष्ठता या निम्नता क्रम में ऋणात्मक अंक दे दिए जाते हैं। अंकदाता- (अ) बहुज्ञ, (ब) तटस्थ, (स) आप्त, (द) अनुभव-प्रज्ञ होना चाहिए। इसके पश्चात विचार बिन्दुओं का एक तितली चित्र बना लिया जाता है। चित्र इस प्रकार होता है।

चित्रानुसार तितली मुख से पृष्ठ तक मध्य भाग के सकारात्मक विचारों को प्रोत्साहन तथा नकारात्मक बिन्दुओं का नष्टीकरण किया जाता है।

”पंचीकरण रेवती पच्चीस पचहत्तर“सिद्धान्त के उपयोग की हर उद्योग में, प्रजातन्त्र में, विभाग में, घर में, समाज में असंख्य सम्भावनाएं हैं। इसे सटीक अपनाकर कोई भी व्यवस्था सहजतः विश्व श्रेष्ठ हो सकती है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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