यम-नियम कानून और अपराध

यम पांच हैं नियम पाच हैं। कानून ढेर से हैं। अपराध अनेक हैं। क्या इन तीनों मे कोई अन्तर्सम्बन्ध है ? इस पर गहन चिन्तन मनन करने की आवश्यकता है। वर्तमान विश्व में अपराधों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। विश्वीकरण के फैलाव के साथ अपराधीकरण का भी फैलाव होता जा रहा है। अपराधीकरण के फैलाव के साथ साथ कानूनीकरण का भी विस्तार हो रहा है। कानूनीकरण के विस्तार के साथ साथ कानूनी छिद्रों का बढ़ना भी जारी है। कानून में सुई बराबर छिद्र से ऊँट निकाला जा सकता है यह स्वतः सिद्ध कहावत है। अगर कानून में हाथी बराबर छिद्र हो तो..?

कानून का संविधान ही किन्तु-परन्तु के छिद्रों से भरा-पूरा है। ऐसी स्थिति में कानून का रक्षण कैसे होगा..? दुःखद स्थिति यह है कि वर्तमान संसदें किन्तु-परन्तु के छिद्रों में और विस्तार करती जा रही हैं और नए छिद्रों की तलाश में जुटी है। यहाँ सुखद तथ्य यह है कि यम-नियमों की संख्या नियत दस ही है। यम-नियमों में कोई छिद्र नहीं है। जहाँ तक मेरे अध्ययन की सीमा है वेद, वेदांग, उपांग ग्रन्थ निर्बाध प्रावधान करते हैं। ये छिद्रहीन हैं। सारे के सारे विश्व संविधान किन्तु-परन्तु के छिद्रों से भरे हैं। वेद, वेदांग, उपांगादि के प्रावधान निश्चित पारिभाषिक मान्यताओं का प्रतिपादन असदिग्ध रूप में करते हैं। ये परिभाषाएं एक-दूसरे की पूरक तथा क्रमबद्ध वैज्ञानिक है। सारे विश्व संविधानों में एक भी सविधान उपांग ग्रन्थों जैसा एक-दूसरे सूत्रों का पूरक-अनुपूरक नहीं है। न हि वह वैज्ञानिक क्रमबद्ध है। हम संयुक्त राष्ट्र संघ के शान्ति प्रावधान पर तनिक मनन करें।

संयुक्त राष्ट्र संघ शिक्षा विज्ञान तथा सांस्कृतिक संस्था के संविधान का उद्देश्य शान्ति और सुरक्षा की वृद्धि बताते मूल प्रस्तावना में कहा गया है- ’’युद्ध आदमी के दिमाग में पैदा होता है, इसलिए शान्ति को सुरक्षित रखने की आधारशिलाएं भी मनुष्य के दिमाग में बनाई जानी चाहिएं।‘‘ यह एक उत्तम प्रावधान है तथा वैदिक शान्तिमन्त्र के ’’शान्ति हमें शान्ति से प्राप्त हो‘‘ का उप-प्रावधान है। ’’शान्ति हमें शान्ति से प्राप्त हो‘‘ का सरल अर्थ है- युद्धभाव दिमाग में आते ही शान्ति भंग हो जाती है। यह ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार बोलते ही मौन भंग हो जाता है। युद्ध और शान्ति का साथ-साथ रहना असम्भव है। इस प्रावधान के विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद ३९-५१ में अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने या फिर पुनः स्थापित करने के लिए जल-थल-वायुसेनाओं की सहायता ले सकती है। न केवल इतना वरन यह भी प्रावधान है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखने में सहयोग देने के लिए सुरक्षा परिषद के मागने पर और विशेष समझौते के अनुसार अपनी सशस्त्र सेनाएं सहायता तथा सुविधाएं प्रस्तुत करने का वचन देते हैं। स्पष्ट है विश्व के समस्त राष्ट्रों तथा राष्ट्राध्यक्षों की सामूहिक सोच ‘ शान्ति’ के विषय में छिद्रित है।

अन्तर्राष्ट्रीय न्याय की बात करें तो यह ‘‘आम मत’’ के द्वारा गंदला कर दिया गया है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के पंद्रह न्यायाधीशों के चयन की कसौटी के मानक उच्च नैतिक चरित्र तथा अपने राज्य के कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय विधि का विशेषज्ञ बिलकुल ठीक है। इसकी चयन प्रक्रिया प्रजातन्त्री है। इनके चयन का प्रथम चरण संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राष्ट्र की प्रजातन्त्री सरकार द्वारा मनोनीत है। इसके बाद दूसरे चरण में इनका चयन संयुक्त राष्ट्र कर साधारण सभा और सुरक्षा परिषद के सदस्य बहुमत से करती हैं। पहले राष्ट्र की औसत सरकार ’’नैतिक चरित्र और विधि विषेशज्ञता‘‘ के मापदण्डों का औसतीकरण कर शिथिलीकरण करती है। फिर साधारण सभा तथा सुरक्षा परिषद द्वारा अवमूल्यन करती है। इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ तथा नैतिक चरित्रवान तथा तटस्थ विधि-विशेषज्ञ का चयन असम्भव हो जाता है। राष्ट्रों की सरकारें तथा साधारण सभा तथा सुरक्षा परिषद सदस्य जिस विचार, विश्वास, अभिव्यक्ति, उपासना, धर्म की आजादी के मानवाधिकार की उपज है वह अति-विकृत है और बड़ा ही ठेठ या मोटी भाषा में कहें तो गंवार सा अधिकार है। इसके अन्तर्गत गंवार मान्यताएं और परिष्कृत मान्यताएं एक ही स्तर पर रखी गई हैं। ‘औसतीकरण’ प्रजातन्त्र की वह लाइलाज बीमारी है जो कहीं भी श्रेष्ठतम का चयन असम्भव कर देती है। विचार विश्वास आदि की जो आजादी संयुक्त राष्ट्र में राष्ट्रों को है वही आजादी सामान्य आम आदमी को भी है। यह आजादी प्रजातन्त्र का सबसे बढिया मानवाधिकार गिना जाता है। जिसका पालन कोई भी नहीं करता है। संसदें विधानसभाएं प्रतिदिन इसकी हत्या करती हैं। और इनमें मुद्दों पर चर्चाएं-बहस रखी जाती हैं। ये सारी बहस एक-दूसरे (पार्टी स्तर पर) को अपनी मान्यताएं मनवाने के लिए की जाती हैं जो विचार-विश्वासादि की आजादी का हनन है। हर प्रजानन (राजनेता) अपनी पार्टी का ठेठ पिट्ठू होकर अपने ही विचार-विश्वासादि को अंधा करता है। फिर यह अन्धापन दूसरी पार्टियों पर लादने का कुप्रयास करता है। और पार्टी-बदल की स्थिति (जो प्रजातन्त्र में आम बात है) में रंगे सियार की भूमिका धारण करके विचार-विश्वास के आजादी की अपने पार्टी तथा राष्ट्रीय स्तर पर तिहरी हत्या करता है। वास्तव मे उसके विचार आजादी के कारण नहीं वरन् पद-लाभ, अर्थ-लाभ के कारण बदलते हैं।

दूसरा महत्वपूर्ण अधिकार आर्थिक सामाजिक राजनैतिक न्याय का है। यह एक उलट खोपड़ी न्याय है। आर्थिक न्याय तो सीधा-सीधा बिकने का अधिकार है जो महापातक-महाघातक अधिकार है। इसमें आदमी ही बिकाऊ माल खुद बन जाता है। खेल्ली और फिल्मी सितारों का बिकाऊपन सरे आम जाहीर है। जीवित बिका हुआ जीता-जागता आदमी बिकाऊ माल साबुन, तेल, बिस्कुट, सायकल, कार, मोबाईल, पेन, कपड़ों से छोटा होकर बिकाऊ माल की जय बोलने लगता है और मूर्ख जनता जिसमे पढ़ी-लिखी जनता भी औसत मत शामिल हो जाती है तथा बिकाऊ माल को बेचने लगती है। आर्थिक न्याय (प्रजातन्त्री) उद्यम, मेहनत, लगन, श्रम, तप, नियम आदि को पूरा का पूरा चौपट कर देता है। फीकी दुकानें ऊँचे भाव बिक जाती हैं और ऊँची दुकानें भी फीका पकवान बेचने लगती हैं। प्रजातन्त्रा प्रशासक राजनेता समझते हैं देश तरक्की कर रहा है। ये राजनेता, खेल्ली, फिल्मी सितारों और उद्योगपतियों के साथ विश्व सम्मेलनों में कजरारे-कजरारे जैसे गानों पे हाथ में प्याले लिए नाचते हैं और समाचार पत्र (अति प्रतिष्ठित नंबर वन) देश की उन्नति का डंका बजाते हैं। इसके साथ गरीबी बढ़ती जाती है, मंहगाई बढ़ती चली जाती है। और मूर्ख प्रजातन्त्री नेताओं को समस्या का हल समझ नहीं आता है। देश में एक निठल्लापन दुश्चक्र चलता है। इस चक्र का विवरण देखें- निठल्ले नेता जिनकी सही कार्यक्षमता बड़ी मुश्किल चार-पांच प्रतिशत अस्थाई पद स्थायी पेंशन निठल्लेपन की पाते, सुविधाएं पाते, स्वयं अपनी सुविधाएं बढ़ाते और आम आदमी की तुलना में दुगुना मोटाते हैं। निठल्ले नेता निठल्लेपन का धर्म निबाहते निठल्लेपन की कद्र करते निठल्लेपन के कारण गरीब हुए लोगों को खाद्य, भूमि, मकान, नमक सुविधाएं मेहनती लोगों के कमाई से प्राप्त कर से बाटते हैं। उन्हें समझ नहीं आता और गरीब होने की जनता में होड़ लग जाती है। कहीं साठ कहीं अस्सी प्रतिशत प्रान्त गरीबी रेखा नीचे चला जाता है। और खेल्ली, क्रीकेटी, टेनीसी बल्ला मैदान में घुमाते सारे दूरदर्शन चैनलों छा जाते। करोड़ों निठल्ले दर्शक देखते नहीं अघाते। अरबों श्रम घण्टे बरबाद करते। निठल्लापन फैलाते। ऐची-भैंची, उछल-कूद, कूल्हे मटकाऊ, वक्ष हिलाऊ, चिपकू-चिपकाऊ हरकतें करते निठल्ले फिल्मी भी मानव जाति के अरबों श्रम घण्टे बरबाद करते। विश्व मे इनकी तिकड़ी के कारण श्रम घण्टों की बरबादी या निठल्लेपन की एक बाढ़ सी आ जाती है। भूख, बेकारी या बेरोजगारी का कारण यह महा अनुत्पादक निठल्लेपन का प्रसार है। यह एक महा अर्थिक अन्याय है। अर्थिक बजार सर्वाधिक बिकाऊ मंहगे मोल बिकता। बिकाऊ फिल्मी कलाकार खरीद रहे क्रिकेटी धुंआधार, टोपी, बल्ला, जूता, कमीज, धुंआदारों के हजारों-लाखों में बिकते हैं। चित्रकार जो ऊलजलूल चित्र रचते हैं। उनके रचे चित्र जो दिव्य प्रकृति चित्रों के सामने निकृष्ट बेकार हैं। उषा-संध्या सौंदर्य से कोसों दूर इन चित्रों का मूल्य करोड़ों में आंका जाता है। और हाय रे आर्थिक न्याय इनसे दो-ढाई सौ प्रतिशत क्षमतावाला श्रम कठोर मोल-तोल ठेकेदार खरीदते सौ-अस्सी रुपल्ले में। आर्थिक न्याय का पूरा का पूरा कचूमर निकल गया। और मानवाधिकार आयोग प्रजातन्त्री संविधान अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार राग गा रहा। ब्रह्म की सर्वश्रेष्ठ कृति शिशु बिक रहे पाच सौ, तीन सौ रुपए में और कभी मुफ्त भी गली-गली। आर्थिक अन्याय का इतना विस्तार.. आत्महत्याएं कर रहे किसान, निर्धन परिवार जहर खा, आग लगा, फांसी खा मर रहे सरे आम इस आर्थिक न्याय के खुले बाजार में।

अब राजनैतिक न्याय की बात करें। अर्ध करोड़ी या पचास लखिया हैसियत से नीचे के स्तर का सांसद आज दुर्लभ है। बीस लखिया हैसियत से कम विधान-सभायी दुर्लभ है। राजनैतिक पद अस्सी नब्बे प्रतिशत प्रजा को दुर्लभ है। उस पर विडम्बना यह कि इस का हर नागरिक के लिए लिखित प्रावधान जरूर है। प्रजातन्त्र में हर आदमी एक वोट है। यह ’’एक आदमी एक वोट‘‘ प्रावधान प्रजातन्त्री संविधान स्वयं भूल जाता है। राष्ट्रपति चुनाव में सांसद आदमी एक वोट नहीं होता। संसद में सांसद एक आदमी एक वोट नहीं होता। बड़ी विचित्र व्यवस्था है। हजार दो हजार मतों से हारा एक सांसदतो एक वोट रह जाता है। और हजार दो हजार वोटों से जीता पूरे क्षेत्र लाखों वोट हो जाता है। यह राजनैतिक न्याय का कचूमर है। एक वोट न्याय देखिए- सड़क पर नंग-धडंग भिखारी जो पास आने पर भेड़िए की तरह दांत दिखाता है एक-वोट है। आठवीं या दसवीं पास या फेल कच्ची उम्र में लव मे लीन प्रेम विवाही एक वोट है। उफ प्रजातन्त्री राजनैतिक न्याय को स्तरीकरण या बेंच मार्किंग की समझ ही नहीं है। और आगे देखिए इस एक वोट के साथ विचार, विश्वास, उपासना, अभिव्यक्ति, पूजा की आजादी भी जुड़ी है। यह एक वोट प्रावधान मात्र पशुओं जो ‘एक’ गिने जाते हैं के लिए औचित्य रखता है।

अब सामाजिक न्याय की बात करें। व्यक्ति, पति-पत्नी, परिवार, मुहल्ला, समाज ये समाज के सामंजस्यपूर्ण स्तर हैं। इन सबकी सुसंगत संरचना के बिना समाज की संकल्पना ही नहीं की जा सकती है। परिवार वह घटक है जो व्यक्ति का सामाजिकीकरण करता है। विचार विश्वासादि की खुली आजादी की छांव मे बच्चे तय कर रहे हैं कि वे क्या पढ़ेंगे। उनके हिसाब से यशपाल कमिशन ’’सब पास-परीक्षा नहीं‘‘ ’’स्मरण बोझ‘‘ आदि ऊलजलूल निर्णय लेगा। हर व्यक्ति अपनी-अपनी जगह स्वच्छन्द, आजाद हो गए हैं। और संविधान प्रावधान कर रहा है सामाजिक न्याय की। बिना समाज के सामाजिक न्याय प्रजातन्त्र की ही उपज है। परिवार तो परिवार विवाह सस्थान ’’पति-पत्नी‘‘ जो समाज की पहली कड़ी है भी तहस-नहस है। हर कोई ‘एक-वोट’ रह गया है। ‘एक’ ही जब समाज है तो ’’एक न्याय‘‘ ’’पशु न्याय‘‘ या ’’जानवर न्याय‘‘ सार्थक होगा तथा है भी।

समाज हमेशा ही स्तरीकृत रहा है तथा रहेगा। योग्यता स्तरीकरण के अनुरूप कार्य स्तरीकरण सामाजीकरण की आवश्यकता है। ऐसी स्थिति में मानव को विचार, विश्वास, अभिव्यक्ति, धर्म, उपासना की पूर्ण छिद्रित आजादी देना तथा उसे एक वोट मानना सारे कानूनों की हत्या करना है। संविधान में स्तरीकरण को सटीक स्वीकारना होगा। और ’’वैज्ञानिक विचारों‘‘ मात्र की स्वतन्त्रता का प्रावधान करना होगा।

उपरोक्त कानून या प्रजातन्त्री संविधान ही अपराध है। राध कहते हैं खाना पकाने को अप कहते हैं खराब खाने को। इसलिए अपराध का अर्थ हुआ कंकड़ी बद-स्वाद खिचड़ी। सारे संविधान से उपजे कानून ऋत तथा शृत आधारित नहीं हैं। अपराध तथा दण्ड दोनों में ढीले रबड़ के समान लचीलापन है। अपील आदि के प्रावधान तो न्याय की शाश्वतता का सीधा हनन है। इसकी तुलना में साधारण यम-नियम प्रावधान कहीं अधिक सटीक हैं। यहां यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह सामाजिक कानून हैं तो नियम अर्थात् शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान व्यक्तिगत कानून हैं। सामाजिक कानूनों में व्यक्ति परतन्त्र परतन्त्र है और व्यक्तिगत कानूनों में स्वतन्त्र है। पांचों यम समाज से सम्बन्धित हैं और पांचों नियम व्यक्ति से सम्बन्धित हैं। पांचों यम एवं नियम व्यक्ति के मानवाधिकार महाव्रत हैं। समाज की अविभाज्य कड़ी व्यक्ति है। ये महाव्रत व्यक्ति युजित है। वे समस्त मानवाधिकार आधे-अधूरे हैं जो व्यक्ति युजित नहीं हैं। समाज की कोई भी संस्था, परिवार, पास-पड़ोस, ग्राम, नगर, प्रान्त, देश, विश्व, विभाज्य कड़ी है। केवल व्यक्ति ही अविभाज्य कड़ी है। मानवाधिकारों का सीधे व्यक्ति से युजित होना एक शाश्वत आवश्यकता है। यम-नियमों में मानवाधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी समावेश है। ये अप-राध या असंगत खिचड़ी नहीं वरन सुसंगत, सु-सध प्रावधान हैं। इनका संक्षिप्त प्रारूप इस प्रकार है-

पांच यम जाति, देश, काल तथा नियम (समय) की सीमा से पार सार्वभौम होने पर महाव्रत हैं। इन पांच के विरोधी भाव ये हैं- हिंसा, असत्य, स्तेय, विषयाचर्य तथा परिग्रह। स्वयं द्वारा निष्पादित- कृत, दूसरों द्वारा कराए- कारित तथा अनुमोदित होते हैं। लोभ, मोह, क्रोध इनके कारण हैं। इनकी प्रकृति मृदु, मध्य तथा तीव्र है। ये दुःख तथा अज्ञानरूपी अनन्त दुष्फल देनेवाले हैं। इन विरोधी भावों पर चिन्तन करना चाहिए ताकि ये अपराध नष्ट हो जाएं तथा पांचों यम अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह चित्त में दृढ़ हो जाएं। मानवाधिकारों के स्थापना की इतनी सक्षिप्त पर सर्वाधिक सशक्त एवं स्पष्ट योजना विश्व के किसी भी संविधान में मानव एकक के लिए नहीं दी गई है। आज का पूरा विश्व अन्धविश्वासों के मूर्ति, मजार, कण्ठी, माला, खड़ाऊं के जड़ों की पूजा, नित्य-अनित्य, जड़-चैतन्य की समझ से रहित अज्ञानरूपी जीवन के कारण अनन्त दुःख दुष्फल भोग रहा है। अपराध, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता की पाप गठरियाँ ढोता-ढोता जीते जी मरा जा रहा है। और विश्व में ढेरों मानवाणिकार आयोग लहरते पनप रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मानवाधिकारों के लागू करने की सही समझ विश्व में नहीं है। हिंसा, असत्य, स्तेय, (भ्रष्टाचार), विषयचर्या एवं परिग्रह ये पांचों व्यक्ति स्वयं कर रहा है तथा करा रहा है। इनका अनुमोदन समाज मे सरे आम हो रहा है। इसका कारण लोभ, मोह, क्रोध का बेलगाम हो जाना है। पूंजीवाद और वह भी निर्बाध जहाँ सविधान का आधारभूत तथ्य हो जाए वहाँ लोभ और मोह के विषय आम हो जाएंगे। और इनके सग की इच्छा में बाधा से क्रोध पैदा होगा ही। इन तीनों की गति मृदु से मध्य और तीव्र की ओर होगी ही। विश्व में यह होते सर्वत्र देखा जा सकता है। परिणामतः विश्व दुःखी है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था भी इस विषय में पूर्णतः जर्जर है।

अहिंसा का पारिभाषिक अर्थ सब प्रकार से हर समय में समस्त प्राणिमात्र के साथ वैरभाव त्याग कर प्रीतिपूर्वक वर्ताव करना। हिसा की जड़ वैरभाव याने बदला-भावना हटाकर प्रीतिपूर्वक आचरण अहिसा का आधार है। सत्य की कसौटियां हैं- १. ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव के अनुरूप, २. आप्त वचन अनुरूप, ३. सृष्टि नियम अनुरूप, ४. आत्मवत, ५. प्रमाण-अनुरूप, ६. वैज्ञानिक विधि या अवयव अनुरूप। इन बातों से जांचित तथ्य को जैसा है वैसा ही कहना, जानना, मानना, आचरण मे लाना सत्य है। वस्तु के अधिपति की इच्छा के विरुद्ध वस्तु की इच्छा भी न करना अस्तेय है। चोरी भावना त्याग अस्तेय है। जितेन्द्रिय होकर ज्ञान-विवेकपूर्ण आचरण, ज्ञान-वृद्धि, अज्ञान-त्याग, साधना-सिद्ध, सौम्य-शान्त, आवेगरहित व्यवहार ब्रह्मचर्य है। धन, ससाधनों, उपभोग, उपकरणों के उपार्जन, रक्षण, क्षय, संग हिंसा दोषों का विश्लेषण करके आवश्यकतानुरूप मात्र रखना तथा इनके प्रति निरभिमानी रहना अपरिग्रह है। ये पांचों व्रत समाजपरक दायित्व हैं जो समाज को सुसंगत करते हैं। ये सामाजिक मानवाधिकारों के आधार-सूत्र हैं। व्यक्ति-व्यक्ति आरोपित मानवाधिकार के महाव्रत हैं।

इसके ही साथ पांच महा व्यक्तिगत उत्थान व्रत हैं जिनका नाम नियम है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान। इन पांचों के क्षेत्र में मानव असीम उत्थान करने में स्वतन्त्र हैं। शौच शुद्धि का नाम है। स्वयं को पवित्र करने या शून्य त्रुटि या अमल करने का नाम है। स्वयं को अन्तस स्तर सत्य धर्म विद्या से युजित करना भीतरी शौच है। इससे आचरण पवित्र होता है। बाह्य शुद्धता तन-वस्त्रादि की जल से, वातायन की होम से होती है। शौच का महान निर्देश यह है हर व्यक्ति स्वकृत गन्दगी को स्वयं ही दूर करे। शौच सम्बन्धी यह महावाक्य है कि ’’स्वच्छता ही ब्रह्मता है‘‘ दूसरा नियम सन्तोष है। धर्म अनुष्ठान के अधीन अत्यधिक श्रम करके संचितश्रम (धन) अर्जित कर तन, मन, अन्न, वस्त्र, निवास प्रसन्न रहने का नाम सन्तोष है। धन के क्षेत्र में तीन तक की ही गिनती याद रखना सन्तोष है। एक किसान के पांच बच्चे थे। उसे गिनती मात्र तीन तक की आती थी। जब कोई उससे पूछता था कि तुम्हारे कितने बच्चे हैं ? एक सुषमा है, दूसरा मोहन है, तीसरा सोहन है और ढेर सारे हैं। धन के मामले में मानव को मात्र रोटी-कपड़ा-मकान (इन तीन) तक की गिनती और इसके आगे ढेर सा का गणित प्रसन्न रहने के लिए याद रखना चाहिए। अगला नियम तप है। आत्मा और मन को ब्रह्म शुभ-गुणों के आचरण में उतारने में दृढ़ रहना तथा जीवन में क्रमशः शुभ ही शुभ कर्मों को धारण करना तप है। स्वाध्याय का अर्थ यह है कि अंग उपांगों के साथ विद् अर्थात् सत्ता के लिए विचार के लिए, लाभ के लिए, ज्ञान के लिए वेदों के प्रयोग में निष्णान्त होने का प्रयास करना। अंग शास्त्र वे हैं जो अस्तित्व को अभिव्यक्ति देने में उपयोगी हैं। ये शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, कल्प और ज्योतिष हैं। उपांग वे शास्त्र हैं जो ब्रह्म के निकट होने के लिए जीवन जीने की विधि दर्शाते हैं। इनमें उपवेद, दर्शन, उपनिषद, अरण्यक, ब्राह्मण ग्रन्थों का समावेश है। विद्वेद या विद्वान होना स्वाध्याय का उद्देश्य है। ईश्वरप्रणिधान का अर्थ है अपने सर्व सामर्थ्य को ईश्वरमय होकर आनन्दपूर्वक ही कर्म के क्षेत्र में बदलना तथा समस्त प्राणियों से आत्मवत आनन्दपूर्वक ही व्यवहार करना।

इन यम-नियम के पालन से ही मानव समाज सुखी, समृद्ध, आनन्दित, आह्लादित रह सकता है। ये व्यक्तिगत उत्थान के साथ ही साथ स्वतः ही सामाजिक समरसता का विस्तार करते हैं। यम-नियम पालन से अपराध-दोष समाप्त हो जाते हैं। समाज में स्वतः स्फूर्त नैतिकता तथा कर्मठता का उदय होता है। समाज निरन्तर प्रगति की सीढियां चढता चला जाता है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (१०७५२)

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