यज्ञोपैथी

यद्यपि यज्ञ शब्द बहुत व्यापक है, जिसका अर्थ है देवताओं की पूजा, संगतिकरण तथा दान तथापि यज्ञ शब्द अग्निहोत्र अथवा हवन (होम) के लिये सर्वत्र प्रचलित हो गया है । मानव को यज्ञीय प्रेरणा सर्वप्रथम ईश्वर से मिली क्योंकि सृष्टिकर्त्ता ने स्वयं एक शाश्वत यज्ञ का दिव्य आयोजन किया हुआ है । ऋग्वेदीय पुरूष सूक्त के अनुसार सृष्टि-यज्ञ में जिस पुरूष की प्रेरणा से देवताओं ने हवि के द्वारा यज्ञ का विस्तार किया उसमें वसन्त ऋतु-घृत, ग्रीष्म-समिधा तथा शरद-सामाग्री की आहुति है । याज्ञिकों के अनुसार, यज्ञ के तीन अंश हैं संकल्प, मंत्र और आहुति । आहुति के तीन अंग है समिधा, घृत और सामग्री (हवि) ।
कालक्रम की दृष्टि से वैदिक काल का उत्तरार्ध व ब्राह्मणकाल बृहद् यज्ञों के लिये प्रसिद्ध था । यही कारण है कि कुछ विद्वान् उसे यज्ञकाल कहते हैं । ब्राह्मण ग्रन्थों का तो मुख्य विषय ही यज्ञीय प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक व्याख्या करना है । तब दैनिक, पाक्षिक, मासिक, चातुर्मासिक, षण्मासिक एवं वार्षिक यज्ञ किये जाते थे । बासन्ती (होली) और आषाढ़ी (दीवाली) के अवसर पर नये अन्नों द्वारा यज्ञ होते थे । दर्शेष्टि तथा पौर्णमासेष्टि तो विशेष रूप से किये जाते थे । श्रौत एवं स्मार्त भेद से 21 प्रकार के यज्ञों का विधान मिलता है । उपनिषदों में भी इसी प्रकार के प्रसंग मिलते हैं । ऋतु परिवर्तन के समय आने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिये भैषज्य यज्ञों के करने का विशेष उल्लेख किया गया है, जिन्हें चातुर्मास्य होम कहा गया है ।
वैदिक वांङ्मय में पर्यावरण एवं प्रदूषण सम्बन्धी अनुसंधान तथा 35 वर्षों के पौराहित्य जीवन में असंख्य संस्कारों – यज्ञों को सम्पन्न कराते हुए और विगत 07 वर्षों से यज्ञोपैथी सेन्टर – गायत्री हॉस्पीटल एवं रिसर्च सेन्टर रायपुर में हवन से रोग निवारण की दिशा में प्रयोग करते हुए अनुभव हुआ कि जन सामान्य को भी यज्ञ के चिकित्सकीय पक्ष से अवगत कराया जाय अतः अथर्ववेद के तद्विषयक सूक्तों का संग्रह कर यह यज्ञोपैथी नामक लघुग्रन्थ तैयार किया गया है, इसकी प्रस्तुति में जिन – जिन याज्ञिक आचार्यों, वैज्ञानिक व्याख्याकारों एवं वैदिक विद्वानों से मार्गदर्शन, प्रेरणा अथवा उद्धरण प्राप्त किया गया है, उन सभी का कृतज्ञता पूर्वक आभारी हूँ ।

यज्ञ प्रेमियों का सेवक
डॉ. कमलनारायण आर्य

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