मूर्तिपूजा

प्रश्न: क्या मूर्तिपूजा करनी चाहिए..?
उत्तर: नहीं करनी चाहिए.. वेदों में ईश्वर की ओर से इसका कोई विधान नहीं है..

प्रश्न: हमारे पूर्वज तो हजारों वर्षों से इसे करते आ रहे हैं..?
उत्तर: लगभग 2500 वर्षों से ही करते चले आ रहे हैं.. वह भी जैन और बौद्ध दोनों नास्तिक सम्प्रदाय के प्रादुर्भाव के उपरान्त का ही मूर्तिपूजा का इतिहास मिलता है.. समग्र संस्कृत साहित्य के अवलोकन से पता चलता है कि आदि सृष्टि से लेकर लगभग 1 अरब ९७ करोड़ वर्षों तक मूर्तिपूजा पूरे धरती पर कहीं नहीं हुआ करती थी।

प्रश्न: पर ईश्वर तो अवतार लेते हैं..?
उत्तर: ईश्वर का अवतार न तो वेदों के द्वारा न हि तर्क से सिद्ध किया जा सकता.. जो हम आप से पूछें कि आप ईश्वर को सर्वज्ञ मानते हैं या अल्पज्ञ..? जो कहो सर्वज्ञ तो अवतरित शरीरधारी सर्वज्ञ नहीं रहता.. फिर हम आप से पूछें कि आप ईश्वर को सर्वशक्तिमान् मानते हैं या अल्पशक्तिमान्..? जो कहो सर्वशक्तिमान् तो शरीरधारी कभी भी सर्वशक्तिमान् नहीं हो सकता.. यदि हम आप से पूछें कि क्या शरीरधारी अवतारी पुरुष में सृष्टि रचना का सामर्थ्य हो सकता है..? जीवों के कर्मों का हिसाब रखना और फल देना हो सकता है..? जो कहो नहीं.. तो आप कथित अवतारी पुरुष में ईश्वरत्व तो किसी भी तरह से नहीं घटा..

प्रश्न: तो क्या लाखों मन्दिरों में पूजा करते करोड़ों भक्त झूठे हैं..?
उत्तर: नितान्त झूठे तो मैं नहीं कहूंगा.. वे पुराणादि अवैदिक ग्रन्थों के द्वारा दिग्भ्रमित हैं.. मैं आप से पूछता हूं जलते अगरबत्ती की या फूलों की सुगन्धि का एहसास मन्दिर में रखी मूर्ति या चित्र प्रतिमा के लिए है या अगरबत्ती जलानेवाले अथवा फूल चढ़ानेवाले के लिए होता है..? इसी प्रकार दीपक से निकले प्रकाश की अनुभूति कौन करता है, मूर्ति अथवा दीपक जलानेवाला..? क्या किसी मन्दिर में आजतक किसी मूर्ति या प्रतिमा को चढ़ाया गया प्रसाद उसने खाया है..? क्या आप द्वारा किया जा रहा घण्टनाद या आरती के बोल कोई भी मूर्ति या प्रतिमा सुन पायी है..?

प्रश्न: आप तो ईश्वर को सर्वव्यापक बताते हैं.. इसीलिए मूर्ति या प्रतिमा में भी ईश्वर को ही तो हम पूजते हैं, तो इसमें क्या आपत्ति है..?
उत्तर: समझ का फेर है.. व्यापक तो ईश्वर संसार के हर पदार्थ में है.. जो और जैसा ईश्वर मूर्ति या प्रतिमा में व्यापक है वही और वैसा का वैसा मेज कुर्सी दीवाल पलंग आदि में भी तो है.. फिर इनकी पूजा क्यों न की जाए..? जो कहो इन में प्राणप्रतिष्ठा ईश्वर की नहीं की गई.. तो जिनमें आप प्राणप्रतिष्ठा का दावा करते हो उस मूर्ति या प्रतिमा में जीवित होने के एक भी लक्षण क्यों नहीं दिखाई देता..? और वैसे भी प्राण प्रतिष्ठा की बात सरासर झूठी है.. क्या मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा का दावा करने वाले एक भी पण्डित या पुजारी ने अपने घर में हुई किसी स्वजन को मौत के बाद पुनः प्राणप्रतिष्ठा द्वारा जिला दिया है क्या..? फिर ये कौन सी बुद्धिमत्ता है कि पहले ईश्वर को मूर्तियों में प्राणप्रतिष्ठा द्वारा आवाहन करो.. फिर उसकी कुछ दिन पूजा अर्चना करो फिर उसे पानी में डुबो कर मार डालो..?

प्रश्न: आर्य समाजी भी तो अपने घरों में दयानन्द और राम कृष्णादि की प्रतिमा रखते हैं, उसका क्या प्रयोजन है..?
उत्तर: जी हां रखते हैं.. उसका प्रयोजन चरित्र पूजा है, चित्रपूजा नहीं.. चित्रपूजा में धूप-दीप, नैवेद्य-पुष्प, घण्टनाद-आरती आदि निरर्थ कर्म किया जाता है। जबकि चरित्रपूजा में उन महापुरुषों के जीवन की घटनाओं को स्मरण करते अपने आचरण को परिशुद्ध किया जाता है..

प्रश्न : क्या आप मुझे चित्र पूजा और चरित्र पूजा का भेद समझाएंगे..??
उत्तर : अवश्य समझाऊँगा.. इसके लिए मैं समाज में प्रचलित एक देवता के दो पूजकों का उदाहरण देना चाहूँगा.. भारत एवं विश्वभर में रामायणकालीन महापुरुष बजरंगबलि हनुमान के मन्दिर हजारों नहीं लाखों की संख्या में मिल जाएंगे आप को.. उनकी दो श्रेणियां हम बना लेते हैं.. प्रथम श्रेणि के पूजकों का वर्णन इस प्रकार से है.. वह हनुमान का भक्त प्रतिदिन मन्दिर जाता है, यथा समर्थ्य विग्रह प्रतिमा चित्र या मूर्ति को सिंदूर पुष्प-हार नैवेद्य के रूप में फल मिठाई आदि चढ़ाता है, प्रदक्षिणा करता है, बैठ कर हनुमान चालिसा का जाप करता है, माला फेरता है, घण्टे घडियाल बजा श्रद्धापूर्वक आरती करता है, घर आकर इष्ट-मित्र-स्वजनों में प्रसाद वितरण करता है.. ऐसे भक्तों में सभी न सही पर अधिकांश के जीवन में अल्प या अधिक मात्रा में छल कपट अन्याय, किसी न किसी प्रकार का नशा आदि दुर्गुण भी पाए जाते हैं..

अब दूसरे हनुमानपूजक की कथा सुनें.. यह भी प्रतिदिन मंदिर जाता है, न चित्र को सिंदूर पुष्प या नैवेद्य चढ़ाता, न चालीसा पढ़ता, न घण्टे-घडियाल बजा आरती बोलता, न न प्रसाद बांटता.. तो फिर वहाँ जाकर वह क्या करता होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है वह हनुमान जी के सामने खड़ा होकर उनसे प्रेरणा लेता है कि हे हनुमान जी मैंने रामायण में पढ़ा है कि आप की राम-लक्ष्मण की प्रथम भेट के दो घण्टे के वातालाप में आपने राम के मन पर अपने व्याकरण और वेदादि शास्त्रों के अद्भुत विद्वान होने की छाप छोड़ी थी मैं भी उक्त आर्ष ग्रन्थों को पढ़-समझ-जीवन में उतार आप सदृश् प्रज्ञावान बनुंगा.. और हे पवनपुत्र आप न केवल बुद्धिमान् अपितु व्यायाम आदि करके सर्वोत्तम शरीर सौष्ठव (बॉडी बिल्डर) को प्राप्त वज्र-अंग=बजरंग बने थे.. मैं भी मैदानी खेल, आसन, व्यायाम, प्राणायाम आदि द्वारा आपसदृश ही बलवान बनूँगा.. इस पर भी आप की विशेषता ये थी कि आप ने अपने सदृश बुद्धिमान चरित्रवान बलवान वानर समुदाय के युवाओं का संगठन बनाकर राम सदृश धार्मिक क्षत्रिय युवराज के असुर-दलन के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.. मैं भी आप के जैसा ही बनकर समाज में चरित्रवान न्यायप्रिय राष्ट्रभक्त युवकों को इकत्रित कर संगठन बनाकर नरेन्द्र मोदी सदृश् किसी नेता के राष्ट्रहित कार्यों में सहायक बनूँगा..

अब आप ही के ऊपर मैं ये निर्णय छोड़ रहा हूँ कि उपरोक्त दो प्रकार के हनुमानभक्तों में से सही याने असली भक्त कौन तथा नकली कौन..!! आपके निर्णय-सुविधा के लिए बता दूँ पहले ने चित्र-पूजा की तो दूसरे ने चरित्र पूजा..!! जी हाँ, आप ने सही पहचाना चरित्र पूजा हर महापुरुष की जीवनोत्थान के लिए आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य है जब कि चित्र पूजा निरर्थक..!!

~ आर्यवीर अरुणकुमार

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