मास्टर सूर्यसेन

12 जनवरी प्रसिद्द क्रन्तिकारी अमर बलिदानी एवं अंग्रेजों को हिला कर रख देने वाले चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के मुख्य शिल्पी मास्टर सूर्यसेन का बलिदान दिवस है जिन्हें 1934 में 12 जनवरी के दिन ही फांसी पर लटका दिया गया था| चटगाँव (वर्तमान में बंगलादेश का जनपद) के नोआपारा में कार्यरत एक शिक्षक श्री रामनिरंजन के पुत्र के रूप में 22 मार्च 1894 को जन्में सूर्यसेन की प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा चटगाँव में ही हुई थी| जब वह इंटरमीडिएट में थे तभी अपने एक राष्ट्रप्रेमी शिक्षक की प्रेरणा से वह बंगाल की प्रमुख क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य बन गए और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगे लगे। इस समय उनकी आयु 22 वर्ष थी। आगे की शिक्षा के लिए वह बहरामपुर गए और उन्होंने बहरामपुर कॉलेज में बी.ए. में दाखिला ले लिया। यहीं उन्हें प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन “युगांतर” के बारे में पता चला और वह उससे अत्यधिक प्रभावित हुए। युवा सूर्य सेन के हृदय में स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना दिन-प्रति-दिन बलवती होती जा रही थी और इसीलिए 1918 में चटगाँव वापस आकर उन्होंने स्थानीय स्तर पर युवाओं को संगठित करने के लिए “युगांतर पार्टी ” की शाखा की स्थापना की।

अधिकांश लोग समझते हैं की तत्कालीन युवा सिर्फ हिंसात्मक संघर्ष ही करना चाहते थे, जो की पूर्णत: गलत है। स्वयं सूर्य सेन जी ने भी जहाँ एक और युवाओं को संगठित किया था, वहीँ वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसे अहिंसक दल के साथ भी जुड़े थे और इसकी चटगाँव जिला कमेटी के अध्यक्ष भी चुने गए। अपने देशप्रेमी संगठन के कार्य के साथ ही साथ वह नंदनकानन के सरकारी स्कूल में शिक्षक भी बन गए और अपनी कर्त्तव्यपरायणता और उत्तम शिक्षण के चलते यहीं से वह अपने विद्यार्थियों में “मास्टर दा” के नाम से विख्यात हो गए। नंदनकानन के बाद में वह चन्दनपुरा के उमात्रा स्कूल के भी शिक्षक रहे।

मास्टर सूर्यसेन न केवल निर्भीक बल्कि आदर्शवादी भी थे, जिसका परिचय उनके जीवन में घटी एक घटना से मिलता है। हुआ ये कि स्कूल में वार्षिक परीक्षा चल रही थी और जिस परीक्षा भवन में उन्हें नियुक्त किया गया था, उसी भवन में उस स्कूल के प्रधानाचार्य का पुत्र भी परीक्षा दे रहा था। यह संयोग ही था कि उन्होंने प्रधानाचार्य के पुत्र को नकल करते हुए पकड़ लिया तथा परीक्षा देने से वंचित कर दिया। परीक्षाफल निकला तो वह लड़का अनुत्तीर्ण हो गया। दूसरे दिन जब सूर्यसेन स्कूल में पहुंचे, तो प्रधानाचार्य ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया। यह जानकर अन्य सभी शिक्षक कानाफूसी करने लगे कि अब सूर्यसेन का पत्ता साफ हुआ समझो। इधर जब सूर्यसेन प्रधानाचार्य के कक्ष में पहुंचे तो उन्होंने आशा के विपरीत उनका न केवल सम्मान किया, बल्कि स्नेहवश बोले, ‘मुझे गर्व है कि मेरे इस स्कूल में आप जैसा कर्तव्यनिष्ठ व आदर्शवादी शिक्षक भी है, जिसने मेरे पुत्र को भी दंडित करने में कोताही नहीं बरती। नकल करते पकड़े जाने के बावजूद यदि आप उसे उत्तीर्ण कर देते, तो मैं आपको अवश्य ही नौकरी से बर्खास्त कर देता। मास्टर दा ने जवाब दिया ‘यदि आप मुझे अपने पुत्र को उत्तीर्ण करने के लिए विवश करते तो मैं स्वयं ही इस्तीफा दे देता, जो इस समय मेरी जेब में पड़ा है।’ मास्टर सूर्यसेन का जवाब सुनकर प्रधानाचार्य बहुत खुश हुए और उनकी दृष्टि में सूर्यसेन की इज्जत दोगुनी हो गई और साथ ही विद्यार्थियों में के बीच भी।

1923 तक मास्टर दा ने चटगांव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी और अपने विद्यार्थियों में उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बलवती किया। साम्राज्यवादी सरकार क्रूरतापूर्वक क्रांतिकारियों के दमन में लगी थी। साधनहीन युवक एक और अपनी जान हथेली पर रखकर निरंकुश साम्राज्य से भिड़ रहे थे तो वहीँ दूसरी और उन्हें धन और हथियारों की कमी भी सदा बनी रहती थी। ऐसे में मास्टर दा ने उन्हें गुरिल्ला पद्धति से लड़ने को प्रशिक्षित किया क्योंकि वो समझते थे कि कम संसाधनों के चलते शक्तिशाली अंग्रेजी सरकार से आमने सामने की लड़ाई करना असंभव है| उनका पहला बड़ा सफल अभियान 23 दिसंबर 1923 को चिटगांव में बंगाल आसाम रेलवे के ट्रेजरी आफिस में दिन दहाड़े डाका था परन्तु उनका सबसे बड़ा क्रांतिकारी अभियान था–18 अप्रैल 1930 को चिटगांव शस्त्रागार पर हमला जिसने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया, जिसने अंग्रेजी सरकार को खुला सन्देश दिया कि भारतीय युवा मन अब अपने प्राण देकर भी दासता की बेड़ियों को तोड़ देना चाहता है और जिसने मास्टर सूर्यसेन का नाम सदा के लिए इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया|

इस अभियान के लिए सन 1929 की मई कांफ्रेंस में पाँच प्रमुख व्यक्तियों मास्टर दा, अंबिका चक्रवर्ती, निर्मल सेन, गणेश घोष और अनंत सिंह के बीच लगभग पांच घंटे चली चर्चा में निम्नलिखित कार्यक्रम बनाये गए–
अचानक शस्त्रागार पर अधिकार करना।
हथियारों से लैस होना।
रेल्वे की संपर्क व्यवस्था को नष्ट करना।
अभ्यांतरित टेलीफोन बंद करना।
टेलीग्राफ के तार काटना।
बंदूकों की दूकान पर कब्जा।
यूरोपियनों की सामूहिक हत्या करना।
अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की स्थापना करना।
इसके बाद शहर पर कब्जा कर वहीं से लड़ाई के मोर्चे बनाना तथा मौत को गले लगाना।

इसके अलावा कुछ बुनियादी संकल्प भी लिए गए–
अब से डकैती नहीं करेंगे।
अपने-अपने घरों से अर्थ-संग्रह करेंगे।
गुप्तरूप से थोड़े से हथियार एकत्र कर उनकी सहायता से अस्त्रागार पर हमला करेंगे।
इसके अलावा जिस-जिस के घरों में बंदूकें हैं, उन्हें लाएँगे।
अस्त्रागार पर अधिकार पाने के लिए जितनी ज़रूरत हो, उतना बारूद और बम तैयार करेंगे।
व्यक्तिगत हत्या के बदले संगठित रूप में हमला या विद्रोह के विकास के लिए आयोजन करेंगे।
15 अक्तूबर 1929 को सभी ने ने शपथ ली कि ये ही हमारे भविष्य के कार्यक्रम होंगे और सब कुछ भूलकर इसी एक काम को सफल बनाने के लिए अपनी सारी ताक़त लगाएँगे। इसके बाद मास्टर दा ने मंत्र दिया—‘करो या मरो’ नहीं ‘करो और मरो’।

इस हमले के लिए मास्टर दा ने युवाओं को संगठित कर ‘भारतीय प्रजातान्त्रिक सेना’ (Indian Republican Army, Chittagong Branch) नामक सेना बनायी। उनके नेतृत्व में क्रांतिकारियों के इस दल में गणेश घोष, लोकनाथ बल, निर्मल सेन, अम्बिका चक्रवर्ती, नरेश राय, शशांक दत्त, अरधेंधू दस्तीदार, तारकेश्वर दस्तीदार, हरिगोपाल बल, अनंत सिंह, जीवन घोषाल, आनंद गुप्ता जैसे वीर युवक और प्रीतिलता वादेदार व कल्पना दत्त जैसी वीर युवतियां भी शामिल थीं। यहाँ तक कि एक 14 वर्षीय किशोर सुबोध राय उर्फ़ झुंकू भी अपनी जान पर खेलने गया था।

योजना के अनुसार 18 अप्रैल 1930 को सैनिक वस्त्रों में इन युवाओं ने दो दल बनाये, एक गणेश घोष के नेतृत्व में और दूसरा लोकनाथ बल के नेतृत्व में। गणेश घोष के दल ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार (Police Armoury) पर और लोकनाथ बल के दल ने चटगाँव के सहायक सैनिक शस्त्रागार (Auxiliary Forces Armoury) पर कब्ज़ा कर लिया किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बंदूकें तो मिलीं पर उनकी गोलियां नहीं मिल सकीं। क्रांतिकारियों ने टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। एक प्रकार से चटगाँव पर क्रांतिकारियों का ही अधिकार हो गया। तत्पश्चात यह दल पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुआ जहाँ मास्टर दा ने अपनी इस सेना से विधिवत सैन्य सलामी ली, राष्ट्रीय ध्वज फहराया और भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।

इस लोमहर्षक घटना का प्रभाव यह हुआ कि इसके बाद बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया।

दल को अंदेशा था कि इतनी बड़ी साहसिक घटना पर सरकार तिलमिला उठेगी और इसीलिए वह गोरिल्ला युद्ध हेतु तैयार थे और इसी उद्देश्य के लिए यह लोग शाम होते ही चटगांव नगर के पास की पहाड़ियों में चले गए। किन्तु स्थिति दिन पर दिन कठिनतम होती जा रही थी। बाहर अंग्रेज पुलिस उन्हें हर जगह भूखे कुत्तों की तरह ढूंढ रही थी और वहीँ जंगली पहाड़ियों पर उन्हें भूख-प्यास व्याकुल किये हुए थी।

अंतत: 22 अप्रैल 1930 को हजारों अंग्रेज सैनिकों ने जलालाबाद पहाड़ियों को घेर लिया जहाँ क्रांतिकारियों ने शरण ले रखी थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी समर्पण के बजाय क्रांतिकारियों ने हथियारों से लैस अंग्रेज सेना के विरुद्ध गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। उनकी वीरता और गोरिल्ला युद्ध-कौशल का अंदाजा इसी से लग जाता है कि इस जंग में जहाँ 80 से भी ज्यादा अंग्रेज सैनिक मारे गए, वहीँ मात्र 12 क्रांतिकारी योद्धा ही शहीद हुए। इसके बाद मास्टर दा किसी प्रकार अपने कुछ साथियों सहित पास के गाँव में चले गए, उनके कुछ साथी कलकत्ता चले गए लेकिन दुर्भाग्य से कुछ पकडे भी गए|

पुलिस किसी भी सूरत में मास्टर दा को पकड़ना चाहती थी और हर तरफ उनकी तलाश कर रही थी। सरकार ने मास्टर दा पर 10,000 रु. का इनाम घोषित कर दिया परन्तु जिस व्यक्ति को सभी चाहते हों तो उसका सुराग भला कौन देता? जब मास्टर दा पाटिया के पास एक विधवा स्त्री सावित्री देवी के यहाँ शरण लिए थे, तभी 13 जून 1932 को कैप्टेन कैमरून ने पुलिस व सेना के साथ उस घर को घेर लिया। दोनों तरफ से जबरदस्त गोलीबारी हुई जिसमें कैप्टेन कैमरून मारा गया और मास्टर दा अपने साथियों के साथ इस बार भी सुरक्षित निकल गए। इतना दमन और कठिनाइयाँ भी इन युवाओं को डिगा नहीं सकीं और जो क्रांतिकारी बच गए उन्होंने फिर से खुद को संगठित कर लिया और दोबारा अपनी साहसिक घटनाओं द्वारा सरकार को छकाते रहे। ऐसी अनेक घटनाओं में 1930 से 1932 के बीच 22 अंग्रेज अधिकारियों और उनके लगभग 220 सहायकों को मौत के घाट उतारा गया।

इस दौरान मास्टर दा ने अनेक संकट झेले, उनके अनेक प्रिय साथी पकडे गए और अनेकों ने यातनाएं सहने के बजाय आत्महत्या कर ली। स्वयं मास्टर दा सदैव एक स्थान से दूसरे स्थान बदलते रहते और अपनी पहचान छुपाने के लिए नए-नए वेश बनाया करते जैसे कभी किसान, कभी दूधिया, कभी पुजारी, कभी मजदूर तो कभी मुस्लिम बन जाते। न खाने का ठिकाना था न सोने का पर इस अप्रतिम योद्धा ने कभी हिम्मत नहीं हारी।

परन्तु 16 फरवरी 1933 को नेत्र सेन नामक व्यक्ति, जिसके यहाँ सूर्यसेन छिपे हुए थे, द्वारा दस हजार रूपये के इनाम के लालच में विश्वासघात किये जाने के कारण वे पकडे गये| नेत्र सेन भी इस इनाम के लेने से पहले ही सूर्यसेन के किसी साथी द्वारा उसके घर में घुसकर नरक पहुंचा दिया गया और उसकी पत्नी ने, जिसके सामने ही नेत्र सेन को मारा गया था, अपने विश्वासघाती पति के हत्यारे की पहचान करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे गद्दार की सधवा होने से अच्छा है विधवा होना| जब पुलिस जांच करने आई तो उसने निडरता से कहा ‘तुम चाहों तो मेरी हत्या भी कर सकते हो किन्तु तब भी मैं अपने पति के हत्यारे का नाम नहीं बता सकती क्योंकि मेरे पति ने सूर्यसेन जैसे भारत माता के सच्चे सपूत को धोखा दिया था जिसे सभी प्रेम करते हैं और सम्मान देते हैं। ऐसा करके मेरे पति ने भारतमाता का शीश शर्म से झुका दिया है।’ कितने विचार की बात है कि काश यदि उस समय अंग्रेजों के सभी समर्थकों, भारतीय अधिकारीयों व सैनिकों की स्त्रियाँ भी ऐसा ही सोचतीं तो शायद हमें स्वाधीनता बहुत पहले ही मिल जाती और इतने युवा पुष्पों को खिलती उम्र में असमय इस तरह मुरझाना नहीं पड़ता।

मास्टर दा के अभिन्न साथी तारकेश्वर दस्तीदार जी ने अब युगांतर पार्टी की चटगाँव शाखा का नेतृत्व संभाल लिया और मास्टर दा को अंग्रेजों से छुड़ाने जेल पर हमले की योजना बनाई लेकिन योजना पर अमल होने से पहले ही यह भेद खुल गया और तारकेश्वर, कल्पना दत्त एवं अन्य कई क्रांतिकारी पकडे गए और सब पर मुक़दमे चलाये गए|अनन्तर अपने दल के नेता को फांसी देने का प्रतिशोध अंग्रेजों से लेने के लिए 4 क्रांतिकारी नवयुवक जिनकी आयु 26-27 वर्ष से अधिक नहीं थी, पिस्तौलें भरकर चटगांव के क्रिकेट मैदान पहुंचे, जहां वही अंग्रेज अफसर क्रिकेट देख रहे थे जिन्होंने मास्टर दा को गिरफ्तार करने में प्रमुख भूमिका निभायी थी। उन क्रांतिकारियों ने उन अंग्रेजों पर बम फेंके और साथ ही गोलियां चलाईं जिससे कई अंग्रेज धराशायी हो गये। परन्तु जवाबी गोलाबारी में दो क्रांतिकारी हिमांशु चक्रवर्ती और नित्यसेन वहीं बलिदान हो गए। क्रिकेट मैदान में भारी संख्या में मौजूद सशस्त्र पुलिस दल ने अन्य दोनों साथियों हरीन चक्रवर्ती और कृष्ण चौधरी को गिरफ्तार कर लिया जिन्हें बहरामपुर के कारागार में फांसी दे दी गई।

कालान्तर में इसी दल के तीन फरार युवक शांति चक्रवर्ती, मणिदत्त और कालीकिंकर डे भी गिरफ्तार हो गये और उन्हें भी अंग्रेजों ने लम्बी सजाएं दीं। इसी दल के एक अन्य अतीव कर्मठ विप्लवी, जिनका नाम त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती था और जो अपने दो छद्म नामों ‘अनन्तकुमार’ और ‘कालीचरण’ (काली बाबू) से लंबे समय तक फरार रहकर कई पुलिस अधिकारियों को अपनी गोली का निशाना बना चुके थे, एक दिन गंगा नदी के घाट पर खड़ी अपनी नाव के पास कालीचरण मल्लाह के रूप में पकड़ लिए गए और उन्हें अंग्रेजों ने 30 वर्षों तक अण्डमान आदि की जेलों में कैद रखा। यही त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती (त्रैलोक्य महाराज) थे, जिन्होंने कोलकाता में डा. केशव बलिराम हेडगेवार को क्रांतिकारी दल में भर्ती किया था और सन् 1940 में विश्वयुद्ध के समय एक अन्य साथी योगेशचन्द्र चटर्जी के साथ नागपुर आकर डा. हेडगेवार से मिले थे।

स्पष्ट है कि उस युग में विप्लवी युवक जो प्राय: कालेज-छात्र ही होते थे, अपने साथियों के दमन और अपमान का प्रतिशोध उस अंग्रेज सरकार से लेना खूब जानते थे जिसके बारे में तब यह कहा जाता था कि ब्रिटिश राज्य में कहीं सूरज नहीं डूबता। उन दिनों ब्रिटिश शक्ति विश्व में प्रथम मानी जाती थी परंतु क्रांतिकारी छात्र उनकी चुनौती का उत्तर अनवरत निर्भयतापूर्वक देते रहे थे। मास्टर सूर्यसेन की फांसी का बदला चुकाने में 4 युवक बलिदान हुए और 3 काले पानी की सजा काटने अंडमान पहुंच गए किन्तु अंग्रेजों पर बम-पिस्तौलों से प्रहार करने में उन्होंने कभी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। आज भी शत्रुओं, आई.एस.आई. एजेन्टों और देश की आस्तीनों में पल रहे गद्दारों की भरमार से मातृभूमि त्रस्त है, परन्तु हमारे युवा रक्त में कहीं उबाल नजर नहीं आता। देश के टुकड़े करने की वक़ालत करने वाले युवाओं के नायक बन कर उभर रहे हैं और भारतमाता सिसकने पर मजबूर है।

खैर, हम पुनः आते हैं अपने नायक मास्टर दा पर। अंग्रेजी सरकार ने मास्टर सूर्यसेन, तारकेश्वर दस्तीदार और कल्पना दत्त पर मुकद्दमा चलाने के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की और 12 जनवरी 1934 को सूर्यसेन जी को तारकेश्वर जी के साथ फाँसी दे दी गयी। पर फांसी देने के पहले अंग्रेजी सरकार ने मास्टर सूर्यसेन पर भीषण अत्याचार किये और उन्हें ऐसी अमानवीय यातनाएं दी गयीं कि रूह काँप जाती है| हथोडों के प्रहार से उनके सभी दांत, सभी जोड़ और हाथ-पैर तोड़ दिए गये और सारे नाखून उखाड़ दिए गए, रस्सी से बांध कर उन्हें मीलों घसीटा गया और जब वह बेहोश हो गए तो उन्हें अचेतावस्था में ही खींच कर फांसी के तख्ते तक लाया गया। क्रूरता और अपमान की पराकाष्टा यह थी कि उनकी मृत देह को भी उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया और उसे धातु के बक्से में बंद करके बंगाल की कड़ी में फेंक दिया गया|

11 जनवरी को उन्होंने अपने मित्र को अपना अंतिम पत्र लिखा ”मृत्यु मेरा द्वार खटखटा रही है और मेरा मन अनंत की और बह रहा है। मेरे लिए यह वो पल है जब मैं मृत्यु को अपने परम मित्र के रूप में अंगीकार करूं। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूँ? सिर्फ एक चीज —मेरा स्वप्न, मेरा सुनहरा स्वप्न, स्वतंत्र भारत का स्वप्न। प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी। ” अंतिम समय में भी इस अप्रतिम सेनानी की आँखें स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देख रही थीं।

इस महान हुतात्मा की स्मृति में भारत सरकार ने 1977 में और बंगलादेश सरकार ने 1999 में डाक टिकट जारी किये| चिटगांव जेल के जिस स्थान पर सूर्यसेन को फांसी दी गयी थी, बंगलादेश सरकार ने उसे उनके स्मृति स्थान के रूप में समर्पित कर उनकी याद को सहेजने का प्रयास किया है| कोलकाता मेट्रो का एक स्टेशन भी उनके नाम पर है| सिलीगुड़ी में उनके नाम पर एक पार्क है ‘सूर्य सेन पार्क’, जहाँ उनकी मूर्ति भी स्थापित की गयी है। 18 अप्रैल 2010 को चत्तल सेवा समिति ने बारासात स्टेडियम में उनकी कांस्य प्रतिमा स्थापित की जिसका लोकार्पण मास्टर दा के ही साथी, जिनकी आयु 100 वर्ष से अधिक है, श्री विनोद बिहारी चौधरी जी ने किया। कल्पना दत्त जो बाद में कल्पना जोशी हुयी की बहू मानिनी डे ने इस महान बलिदानी पर ‘डू ऑर डाई’ नामक पुस्तक की रचना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है जिस पर कुछ समय पहले ही निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ने ‘खेले हम जी जान से’ नामक फिल्म का भी निर्माण किया गया था, जिसमें मास्टर दा का चरित्र अभिषेक बच्चन ने निभाया था|

मास्टर दा के चरित्र और उनकी वीरगाथा ने 1986 में आइआइटी खड़गपुर से इलेक्ट्रानिक्स में डिग्री हासिल करने के बाद पीएचडी करने कोलंबिया यूनिवर्सिटी चले गए और वहाँ से पढ़ाई के बाद नासा में बतौर वैज्ञानिक जुड़कर सीनियर रिसर्च साइंटिस्ट के पद तक पहुंचे वेदव्रत पाइन को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने अपनी सारी जमापूँजी लगाकर मास्टर दा और चटगांव शस्त्रागार मामले के ऊपर फ़िल्म बना डाली जिसने सिनेप्रेमियों के रोंगटे खड़े कर दिए। वर्ष 1932 की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘चिटगांव’ नामक इस फिल्म में भी चिटगांव शस्त्रागार हमले के सबसे कम आयु के सेनानी सुबोध राय उर्फ़ झुनकू की जुबानी मास्टर सूर्यसेन की बहादुरी को बखूबी उकेरा गया था, जिसमें मनोज वाजपेयी ने क्रांतिकारी सूर्यसेन उर्फ मास्टर दा की भूमिका निभाई है, जबकि राजकुमार यादव, नवाजुद्दीन सिद्दिकी समेत अन्य कई अभिनेताओं ने भी दमदार भूमिका निभाई है। चौदह वर्षीय सुबोध रॉय का चरित्र 3000 बाल कलाकारों में से चुने गए पुणे के नाट्यकला संस्थान से संबद्घ बाल कलाकार देलजाद हिवाले ने निभाया। इस फिल्म को कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में पुरस्कृत व प्रशंसित किया गया और फिल्म को 2013 में सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

मास्टर दा के साथी क्रांतिकारी अनंत सिंह ने अपने एक लेख में उनके बारे में लिखा है कि ”चटगाँव क्रांति में मास्टर दा का नेतृत्व अपरिहार्य था। मास्टर दा के क्रांतिकारी चरित्र वैशिष्ट्य के अनुसार उन्होंने जवान क्रांतिकारियों को प्रभावित करने के लिए झूठ का आश्रय न लेकर साफ़ तौर पर बताया था कि वे एक पिस्तौल भी उन्हें नहीं दे पाएँगे और उन्होंने एक भी स्वदेशी डकैती नहीं की थी। आडंबरहीन और निर्भीक नेतृत्व के प्रतीक थे मास्टर दा। ” इस महान क्रांतिकारी, हुतात्मा और अमर बलिदानी को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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