महेन्द्र प्रताप सिंह

29 अप्रैल का दिन भारत के प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार, लेखक, क्रांतिकारी और समाज सुधारक राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का निर्वाण दिवस है जो ‘आर्यन पेशवा’ के नाम से प्रसिद्ध थे। उनका जन्म मुरसान के नरेश बहादुर धनश्याम सिंह के घर 1 दिसंबर 1886 में हुआ था। राजा घनश्याम सिंह जी के तीन पुत्र थे, दत्तप्रसाद सिंह, बल्देव सिंह और खड़गसिंह, जिनमें सबसे बड़े दत्तप्रसाद सिंह राजा घनश्याम सिंह के उपरान्त मुरसान की गद्दी पर बैठे और बल्देव सिंह बल्देवगढ़ की जागीर के मालिक बन गए। खड़गसिंह जो सबसे छोटे थे वही हमारे चरित्र नायक राजा महेन्द्र प्रताप जी हैं जो हाथरस के नरेश राजा हरिनारायण द्वारा गोद लिये जाने के बाद खड़गसिंह से महेन्द्र प्रताप सिंह हो गए, मानो खड़ग उनके व्यक्तित्व में साकार प्रताप बनकर ही एकीभूत हो गई हो।

राजा साहब पहले कुछ दिन तक अलीगढ़ के गवर्नमेन्ट स्कूल में और फिर अलीगढ़ के एम.ए.ओ. कॉलेज में पढ़े जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ। राजा साहब को अलीगढ़ में सर सैयद अहमद ख़ाँ के आग्रह पर पढ़ने भेजा गया था, क्योंकि राजा साहब के पिताजी राजा घनश्याम सिंह की सैयद साहब से व्यक्तिगत मित्रता थी और इस संस्था की स्थापना के लिए राजा बहादुर ने यथेष्ट दान भी दिया था, जिससे एक पक्का कमरा बनवाया गया था, जिस पर आज भी राजा बहादुर घनश्याम सिंह का नाम लिखा हुआ है। इस कालेज में पढने का परिणाम यह हुआ कि राजा साहब का मुस्लिम वातावरण तथा मुसलमान लोगों से सहज ही परिचय हो गया जो बाद में जब राजा साहब देश को छोड़ कर विदेशों में स्वतंत्रता का अलख जगाने गये, तब मुसलमान बादशाहों से तथा मुस्लिम देशों की जनता से हार्दिक भाईचारा बनाने में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ। 

राजा साहब जब विद्यार्थी थे, उनमें जहाँ सब धर्मों के प्रति सहज अनुराग जगा वहाँ शिक्षा द्वारा जैसे-जैसे बुद्धि के कपाट खुले वैसे-वैसे ही अंग्रेज़ों की साम्राज्य लिप्सा के प्रति उनके मन में क्षोभ और विद्रोह भी भड़का। वृन्दावन के राज महल में प्रचलित ठाकुर दयाराम की वीरता के किस्से बड़े बूढ़ों और क्षोभ से भर जाता था और वह उनसे टक्कर लेने के मंसूबे बाँधा करते थे। जैसे-जैसे उनकी बुद्धि विकसित होती गई, वैसे अंग्रेज़ों के प्रति इनका विरोध भी मन ही मन तीव्र होता चला गया।

राजा साहब के विद्यार्थी जीवन में ही सन 1901 में जब वह केवल 14 वर्ष के थे, जींद नरेश महाराज रणवीरसिंह जी की छोटी बहिन बलवीर कौर से उनका विवाह हो गया और पिता हरिनारायण की मौत के बाद मात्र 20 वर्ष की आयु में हाथरस राज्य के राजा बने । उनके विचारों के कारण अंग्रेजों ने बेशक उन्हें राजा की उपाधि नहीं दी लेकिन जनता उन्हें राजा ही मानती थी। सरकारी कागजों में उन्हें कुंवर लिखा जाता और विदेशी राष्ट्र कुमार कहते थे। 1906 में अपने समधी जींद के महाराजा की इच्छा के विरुद्ध राजा महेन्द्र प्रताप ने कलकत्ता ने इन्डियन नेशनल काँग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया और वहाँ से स्वदेशी के रंग में रंगकर लौटे।

1909 में वृन्दावन स्थित महाराज दयारा सिंह के महल में उन्होंने प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। इस महाविद्यालय की कीर्ति जल्द ही सम्पूर्ण देश में फैल गयी जिसके परिणामस्वरूप महामना मदन मोहन मालवीय का प्रेम इस विद्यालय से लम्बे समय तक रहा। महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, लाला हंसराज, सुभाष चन्द्र बोस, सी.एफ. एण्डूज, रवीन्द्रनाथ टेगौर, सरोजनी नायडू सरीखे जाने-माने नाम प्रेम महाविद्यालय को देखने वृन्दावन आये और विद्यालय की हस्ताक्षर पंजिका में अपनी-अपनी प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ दर्ज की। 14 अप्रैल 1915 को महात्मा गाँधी ने अपना पूरा दिन इस विद्यालय में बिताया। इस विद्यालय की लोकप्रियता के किस्सों की फहरिस्त लम्बी है और यह एक समय यह विद्यालय क्रांतिकारियों की शरणस्थली बन गया था।

वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है। अपने शासन काल में राजा साहब ने शिक्षा संस्थाओं और ग़रीबों की ओर विशेष ध्यान दिया और उनके लिए राज साहब के द्वार सदा खुले रहते थे। अलीगढ़ के डी.ए.बी. कॉलेज और कायस्थ पाठशाला के लिए उन्होंने भूमि दान में दी थी और हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी को भी भेंट दी थी, इसलिए वे विश्वविद्यालय के बोर्ड के सदस्य भी थे। बुलन्दशहर ज़िले में राजा साहब की काफ़ी बड़ी जमींदारी थी और वहाँ भी उन्होंने अनेक संस्थाओं को हृदय खोलकर दान दिए। राजा साहब ने मथुरा के ज़िलाधिकारी को उस सस्ते जमाने में दस हज़ार रुपये दान दिए थे कि इस रकम से बैंक खोलकर उससे उनके मथुरा ज़िले के प्रजाजन किसानों को सहायता दी जाये। इसी प्रकार आपने 25 हज़ार रुपया देकर मथुरा ज़िले के अपनी ज़मीदारी के गांवों में प्रारंभिक पाठशालाऐं भी खुलवाईं।

राजा साहब जाति के आधार पर छुआछूत के उस समय भी घोर विरोधी थे, जब महात्मा गांधी इस देश में लौटे भी न थे। गांधी जी के अछूतोद्धार आन्दोलन आरम्भ होने से बहुत पहले ही उन्होंने वृन्दावन जैसी पुराण पंथी वैष्णवी नगरी में रहकर भी इस अन्याय पूर्ण प्रथा के विरुद्ध हल्ला बोल दिया था। यह वह युग था, जब सनातनी लोग तथाकथित अछूतों की छाया से भी छू जाना पाप मानकर स्नान करते थे और उन्हें बहुत ही हेय और घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। परन्तु राजा साहब ने सन 1911 में जब वे स्वास्थ्य लाभ के लिए अल्मोड़ा गये थे, एक टमटा के साथ भोजन कर लिया जो ऐसी जाति मानी जाती थी, जिसकी छूई हुई वस्तु अपवित्र मानकर फेंक दी जाती थी। ऐसे व्यक्ति के साथ राजा साहब भोजन करें, यह बात उनके किसी साथी को पसन्द न थी, जिस कारण चारों और काफ़ी कानाफूंसी हुई, परन्तु राजा साहब ने उस ओर कोई ध्यान नहीं दिया और हमेशा जाति के बधनों से स्वयं को ऊपर रखा।

देश को आज़ाद कराने की धुन मन में ठाने राजा साहब लाला हरदयाल और चम्पकरमण पिल्लई जैसे क्रान्तिधर्माओं से निरंतर संपर्क बनाये हुए थे और उनके द्वारा गुप्त रूप से भारत भेजे जाने वाले हथियारों को ना केवल क्रांतिकारियों तक पहुंचाते थे बल्कि उन्हें धन भी उपलब्ध कराते थे। इन गतिविधियों के चलते वो अंग्रेज जासूसों की नज़रों में चढ़ गए थे और यहाँ रहते हुए उनके लिए कोई बड़ा काम करना लगभग असंभव हो गया था। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की लपटों से यूरोप आक्रांत था, तब पुरुषोत्तम दास टंडन की सलाह पर विदेशों में जाकर देश की स्वाधीनता के प्रयासों को मजबूती देने और प्रथम विश्वयुद्ध से लाभ उठाकर भारत को आजादी दिलवाने के पक्के इरादे से वे 10 फरवरी 1915 को अपने साथ जितना संभव था उतनी संपत्ति लेकर मोहम्मद पीर के छद्म नाम से स्विट्जरलेंड होते हुए बर्लिन पहुंचे और जर्मनी के शासक कैसर से भेंट की जिसने आजादी की लड़ाई में हर संभव सहायता देने का वचन दिया। इस पर शासन ने उन्हें राजद्रोही घोषित कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली।

बुडापोस्ट, बल्गारिया, टर्की होकर वहाँ से वह अफगानिस्तान में हैरत पहुँचे और अफगान बादशाह से मुलाकात की और वहीं से 1 दिसम्बर 1915 में काबुल से भारत के लिए अस्थाई सरकार की घोषणा की जिसके राष्ट्रपति स्वयं तथा प्रधानमंत्री मौलाना बरकतुल्ला खाँ बने। अफगानिस्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया जिसमें सहायता के लिए वे रूस गये और लेनिन से मिले परंतु लेनिन ने कोई सहायता नहीं की। यहाँ पर इस बात को याद करना समीचीन होगा कि 1915 में राजा महेंद्र प्रताप ने जो बीज अफगानिस्तान में बोया था, उसे 28 वर्ष बाद 1943 में रासबिहारी बोस ने जापान में पूर्ण रूप से विकसित करके उनके अधूरे सपने को ना केवल पूरा कर दिया बल्कि पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के हाथों सौंप दिया जिन्होंने 1915 में देखे गए स्वप्न को चरम परिणिति पर पहुँचाया। 1920 से 1946 तक राजा महेंद्र प्रताप विदेशों में भ्रमण करते रहे और विश्व मैत्री संघ की स्थापना की।

वे भारत की ही नहीं, तो विश्व के हर देश की स्वाधीनता के पक्षधर थे। 1925 में उन्होंने न्यूयार्क में नीग्रो लोगों की स्वतंत्रता के समर्थन में भाषण दिया। सितम्बर 1938 में उन्होंने एक सैनिक बोर्ड का गठन किया, जिसमें वे अध्यक्ष, रासबिहारी बोस उपाध्यक्ष तथा आनंद मोहन सहाय महामंत्री थे। द्वितीय विश्व युद्ध में उन्हें बंदी बना लिया गया; पर कुछ नेताओं के प्रयास से वे मुक्त करा लिये गये। 1946 में भारत वापस आने पर उनका भव्य स्वागत किया गया और सरदार पटेल की पुत्री मणिबेन उनके स्वागत के लिए स्वयं उपस्थित रहीं। इसके बाद वे देश में जहां भी गये, देशभक्त जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया। स्वाधीनता के लिए मातृभूमि से 32 वर्ष दूर रहने तथा अपनी सारी सम्पत्ति होम कर देने वाले ऐसे त्यागी पुरुष के दर्शन करने लोग दूर-दूर से पैदल चलकर आते थे।

राजा महेन्द्र प्रताप पंचायती राज को ही वास्तविक स्वाधीनता मानते थे। वे आम आदमी के अधिकारों के समर्थक तथा नौकरशाही के अत्यधिक अधिकारों के विरोधी थे। उन्होंने 1957 से 1962 तक मथुरा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रतिनिधित्व किया। वे ‘भारतीय स्वाधीनता सेनानी संघ’ तथा ‘अखिल भारतीय जाट महासभा’ के भी अध्यक्ष रहे। 29 अप्रैल 1979 को उन्होंने इस दुनिया से विदा ने ली। दुर्भाग्य कि राजनैतिक कारणों से भारत सरकार ने उन्हें वह मान सम्मान नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिये था, सिवाय इसके कि 15 अगस्त 1979 को उनकी स्मृति में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया गया। उनके निर्वाण दिवस पर शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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