बालमुकुंद

बसंत कुमार विश्वास के साथ साथ 11 मई उन्हीं की तरह लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने वाले मामले में शामिल भाई बालमुकुंद का भी बलिदान दिवस है, पर इस कृतघ्न देश ने अन्य क्रांतिधर्माओं की तरह उन्हें भी भुला दिया। प्रख्यात क्रांतिकारी, ग़दर पार्टी के संस्थापक सदस्य, इतिहासकार एवं आर्य समाजी मनीषी भाई परमानंद के चचेरे भाई हुतात्मा भाई बालमुकुन्द का जन्म 1885 में वर्तमान पाकिस्तान के झेलम जिले के करियाला गाँव में भाई मथुरादास के पुत्र के रूप में हुआ था। उनका परिवार उन अमर बलिदानी भाई मतिदास एवं भाई सतिदास का वंशज था, जिन्होंने सिखों के नवम गुरु तेग बहादुर एवं एक अन्य साथी दयालदास के साथ तब अपना बलिदान देकर भी धर्म की रक्षा की थी, जब क्रूर औरंगजेब ने उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए बुरी तरह प्रताड़ित किया था।

हुआ ये था कि कश्मीर के ब्राह्मणों ने गुरु तेगबहादुर से ये प्रार्थना की कि उन्हें मुगलों के अत्याचारों से बचाया जाये जो उन पर धर्म परिवर्तन करने करने के लिए हर दिन अत्याचार करते हैं। नवम गुरु ने इन ब्राह्मणों को इस हेतु निश्चिन्त रहने को कहते हुए स्वयं दिल्ली के लिए प्रस्थान किया और मुग़ल शासक से कड़े शब्दों में अपने अत्याचारों को बंद करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि अगर मुग़ल शासक उन्हें और उनके शिष्यों को मुसलमान बनाने में समर्थ हो जाता है तो समस्त कश्मीरी पंडित भी मुसलमान बन जायेंगे और अगर मुग़ल शासन ऐसा करने में समर्थ नहीं हो पाता है तो भविष्य में वह इस हेतु कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार नहीं करेगा। काफी वाद विवाद के बाद जब गुरु और उनके चार साथियों से मुसलमान धर्म स्वीकार करने के लिए कहा गया तो इन लोगों ने स्पष्ट मना कर दिया।

काजी ने पाँचों को मौत के घाट उतारने का फरमान सुना दिया। ये हत्याकांड इतिहास के सबसे वीभत्स हत्याकांडों में शामिल है। सबसे पहले मतिदास के दोनों हाथोंको दोनों तरफ बाँध दिया गया और दोधारी आरे से सर से पैर तक चीर दिया गया, उनके छोटे भाई सतिदास खौलते तेल में फेंक दिया गया जिसमें वह जीवित ही जल गए, दयालदास के शरीर के छोटे छोटे टुकड़े कर के उनका वध किया गया और अंत में गुरु तेग बहादुर के सर को कलम कर दिया गया पर कोई भी उन्हें धर्म पथ से विचलित ना कर सका। नवम गुरु ने मतिदास और सतिदास के इस सर्वोच्च बलिदान को देख उन्हें सम्मानस्वरूप भाई की उपाधि से सम्मानित किया और उसके बाद से ये ‘भाई’ शब्द उनके परिवार की पहचान बन गया।

इसी परिवार में जन्में भाई बालमुकुन्द के मन में देश के लिए कुछ करने की भावना तभी से हिलोरें मारने लगी थी, जब वे विद्यार्थी थे। इसी दौरान वे भाई परमानन्द के साथ अपने गाँव के पास रहने वाले एक साधू के प्रवचन सुनने जाने लगे जिसके बारे में यह कहा जाता था कि वो कोई प्रसिद्द क्रांतिकारी है और लोगों के मन में देशभक्ति और बलिदानी भावना को जागृत करता है। इस संपर्क ने भाई परमानन्द के मन में देश के लिये सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा उत्पन्न की और वो लाहौर के युवकों को ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध संगठित करने लगे। यहीं से भाई बालमुकुन्द के मन में भी देश के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प हिलोरें लेने लगा। लाहौर के डी. ए. वी. कालेज से शिक्षा-स्नातक की परीक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षक का व्यवसाय अपनाया और समान विचारों वाले एक अन्य युवा अवधबिहारी के साथ कालेज में शिक्षक बन गए। पर देश की स्वतंत्रता के प्रति उनकी ललक ने उन्हें एक कट्टर राष्ट्रवादी बना दिया और धीरे धीरे वे पूर्ण मनोयोग से क्रांतिकारी गतिविधियों में संलग्न हो गए।

अब तक भाई जी कई क्रान्तिकारियों के संपर्क में आ चुके थे। वो ना केवल रासबिहारी बोस सरीखे क्रान्तिधर्मा से जुड़ चुके थे बल्कि दिल्ली के मास्टर अमीरचंद जैसे क्रांतिकारियों से भी उनके प्रगाढ़ सम्बन्ध हो चुके थे। भाई जी इनके संगठनों की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने लगे थे। उन्होंने बम बनाने और चलाने का प्रशिक्षण ले उसमें भी महारत कर ली थी। सन 1908 में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट किंग्स्फोर्ड पर बम फेंका। इस घटना से ब्रिटिश साम्राज्य थर्रा गया और पूरे देश में धर पकड़ शुरू हो गयी। ऐसे में भाई बालमुकुन्द ने भी लाहौर छोड़ दिया और वो दिल्ली में मास्टर अमीरचंद के पास आ गए, जो क्रांतिकारी गतिविधियों में अत्यंत सक्रिय थे। बाद में स्थिति ठीक होने पर भाई जी लाहौर लौट गए पर विचारक माने जाने वाले मास्टर अमीरचंद के साथ हुए उनके इस संपर्क लक्ष्य के प्रति उनकी सोच को और अधिक स्पष्ट कर दिया। क्रान्तिकारी गतिविधियों के बारे में स्पष्ट दृष्टिकोण होने के कारण क्रांतिकारी साहित्य के लेखन, प्रकाशन और प्रचार का पूरा भार धीरे धीरे भाई जी के कन्धों पर ही आ गया।

इसी दौरान बंगाल में क्रान्तिकारियों के बढ़ते दबाव के कारण अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में स्थानांतरित कर दी। प्रख्यात क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करने के लिए तत्कालीन वायसराय हार्डिंग पर फेंकने की योजना बनाई। इस योजना के क्रियान्वयन में भाई बालमुकुन्द ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए 21 सितम्बर 1912 को क्रांतिकारी अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसंत कुमार विश्वास दिल्ली के क्रांतिकारी अमीरचन्द के घर आ गये। दूसरे दिन 22 सितम्बर को रास बिहारी बोस भी दिल्ली आ गये। जोधपुर महाराज के पुत्रों के शिक्षक होने के नाते बने अपने प्रभाव के बल पर भाई जी ने बसंत कुमार को एक डाक्टर के यहाँ कंपाउंडर की नौकरी दिलवा दी जिससे किसी को को भी बसंत कुमार पर शक ना हो ।

23 दिसंबर को शाही शोभायात्रा निकाली गयी जिसमें हाथी पर वायसराय हार्डिंग्स सपत्नीक सवार था। साथ ही अंगरक्षक मैक्सवेल महावत के पीछे और हौदे के बाहर छत्रधारी महावीर सिंह था। लोग सड़क किनारे खड़े होकर,घरों की छतों-खिड़कियों से इस विशाल शोभा यात्रा को देख रहे थे। शोभा यात्रा चांदनी चौक के बीच स्थित पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुंची ही थी कि एकाएक भंयकर धमाका हुआ। बसन्त कुमार विश्वास ने उन पर बम फेंका लेकिन निशाना चूक गया। इस बम विस्फोट में वायसराय को हल्की चोटें आई पर छत्रधारी महावीर सिंह मारा गया। वायसराय को मारने में असफल रहने के बावजूद क्रांतिकारी अंग्रेज सरकार के मन में भय उत्पन्न करने में कामयाब हो गये। इस पूरे घटनाक्रम में भाई बालमुकुन्द की महत्वपूर्ण भूमिका रही और वो एक बुर्काधारी स्त्री के रूप में बराबर बसंत कुमार के साथ थे। इस घटना के लगभग पांच माह बाद 17 मई 1913 को लाहौर के लारेंस गार्डन में मौज मस्ती के लिए जमा कुछ वरिष्ठ अंग्रेज अधिकारियों पर भी एक बम फेंका गया और इस बार पूरी घटना के कर्ताधर्ता भाई बालमुकुन्द ही थे।

अंग्रेजों को चकमा देने के लिए भाई जी दिल्ली और लाहौर से अलग किसी दूसरे शहर में ठिकाना बनाने की उधेड़बुन में थे कि सौभाग्य से इसी समय जोधपुर के महाराज ने अपने पुत्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक हेतु समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया। प्राप्त अनेकों प्रार्थनापत्रों में से कुछ लोगों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया, जिनमें से एक भाई बालमुकुन्द भी थे। हालाँकि वहां पर आये अन्य अभ्यर्थियों के सामने वो ना केवल शैक्षणिक योग्यता के मामले में कम थे (भाई जी केवल स्नातक थे) बल्कि व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से भी कम प्रभावशाली थे क्योंकि जहाँ एक ओर बाकी सभी अभ्यर्थी बन ठन कर आये थे, भाई जी सीधी सादी भारतीय वेशभूषा में, सर पर बड़ी सी पगड़ी धारण किये हुए थे। पर सबकी आशाओं के विपरीत जोधपुर महाराज ने अपने पुत्रों की शिक्षा के लिए शांत स्वभाव वाले भाई जी का चयन किय। साक्षात्कार के समय जब महाराज ने उनका नाम पूछा तो उत्तर मिला भाई बालमुकुन्द। उत्सुकता से महाराज ने पूछा कि नाम में लगे इस भाई का प्रयोजन या कारण। उत्तर में भाई मतिदास और भाई सतिदास के परम बलिदान से सम्बंधित कथा सुनकर और ये जानकर कि सामने बैठा युवक ऐसे बलिदानियों का वंशज है, महाराज भावविव्हल हो गए और उन्होंने तुरंत भाई जी को अपने पुत्रों का शिक्षक नियुक्त कर दिया।

इस नियुक्ति से भाई बालमुकुन्द को दो लाभ हुए, प्रथम उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने का श्रोत मिल गया और द्वितीय जोधपुर महाराज के यहाँ कार्यरत होने से किसी को उन पर जल्द शक करने की संभावना कम हो गयी। पर जोधपुर में रहते हुए भी क्रांति का विचार उनके मन से एक क्षण के लिए ओझल नहीं हुआ। एक बार जब लार्ड हार्डिंग महाराज जोधपुर के निमंत्रण पर जोधपुर गया तो महाराज ने उसके सम्मान में भव्य समारोह का आयोजन किया। महाराज का प्रियपात्र होने के कारण भाई जी को भी समारोह का निमंत्रण दिया गया। वायसराय को मारने का अच्छा मौका जान भाई बालमुकुन्द अपने साथ बम भी ले गए पर उस पर फेंकने का सही अवसर ना मिल सका क्योंकि वायसराय पूरे समय महाराज जोधपुर के बिलकुल बगल में बैठा रहा।

उधर मामलों की जांच करते हुए पुलिस को ये पता लगा कि दीनानाथ नामक कोई व्यक्ति क्रांतिकारियों से जुड़ा हुआ है। इस सूत्र के आधार पर पुलिस ने आगे की जांच शुरू की और दिल्ली में दीनानाथ नाम का कोई ऐसा शख्स नहीं छोड़ा जिसे थाने ना बुला लिया हो। हर दीनानाथ से अलग अलग बम विस्फोट से सम्बंधित सवाल पूछे जाते और फिर उन्हें एक दूसरे कमरे में भेज दिया जाता। इसी सबके बीच जब एक और दीनानाथ को बुलाया गया तो उसकी भावभंगिमा से पुलिस को शक हो गया कि ये जरुर कुछ ना कुछ जानता है। कड़क आवाज में ये पूछते ही कि तुम इस सबके बारे में क्या जानते हो, वो दीनानाथ हडबडा कर बोला, नहीं साहब, मैं लिबर्टी (क्रांति के प्रचार के लिए भाई बालमुकुन्द एवं मास्टर अमीरचंद द्वारा लिखा गया पत्रक) या और किसी कागज के बारे में कुछ भी नहीं जानता। पुलिस के लिए ये समझने के लिए इतना तो बहुत था कि ये शख्स क्रांतिकारी गतिविधियों के बारे में कुछ न कुछ तो जानता ही है। दीनानाथ को माफ़ी का लालच देकर पुलिस ने उसे सरकारी गवाह बना लिया और उसके जरिये मास्टर अमीरचंद के दत्तक पुत्र सुलतान चंद तक पहुँच गयी और उसे भी सरकारी गवाह बना लिया।

इन दोनों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए उपरोक्त घटनाओं में शामिल सभी व्यक्तियों के नाम और पते पुलिस को दे दिए। फिर क्या था, पुलिस भाई बालमुकुन्द तक भी पहुँच गयी और उन्हें जोधपुर से गिरफ्तार कर लिया गया, जहाँ वह जोधपुर महाराज के पुत्रों के शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे थे। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, उनके घर से दो जिन्दा बम, एक रिवाल्वर और क्रांतिकारी साहित्य बरामद हुआ। उन्हें गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उनके पैतृक गाँव का हर घर छान मारा, उनके घर के फर्शों को खोद खोद कर देखा गया, छत उधेड़ कर तलाशी ली गयी पर पुलिस कुछ भी आपत्तिजनक बरामद नहीं कर पाई। उन पर मुकदमा चलाया गया, जिसे दिल्ली-लाहौर षड़यंत्र मामला कहा जाता है। भाई परमानन्द ने उन्हें छुडाने के लिए जी जान लगा दी पर सफल न हो सके। 5 अक्टूबर 1914 को उन्हें उनके साथियों मास्टर अमीरचंद, अवधबिहारी और बंसत कुमार बिश्वास के साथ फाँसी की सजा सुना दी गयी, जिसे सुनकर वह यह कहते हुए ख़ुशी से झूम उठे कि मैंने अपनी कुल परम्परा को आंच नहीं आने दी| मेरे पूर्वज भाई मतिराम ने धर्म के लिए बलिदान दिया था और मैं देश के लिए अपने प्राणों को अर्पित कर रहा हूँ। 11 मई 1915 को अम्बाला सेन्ट्रल जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी।

भाई बालमुकुन्द के इस बलिदान के साथ अगर उनकी पत्नी के समर्पण को याद ना किया जाये तो कृतघ्नता होगी। भाई जी का विवाह उनकी फांसी वाले दिन से लगभग एक वर्ष पूर्व ही हुआ था और उनकी पत्नी उस समय की प्रथा के अनुसार अपने मायके में थी और दोनों ने एक दूसरे को ठीक से देखा भी नहीं था। परम सुंदरी और समर्पिता उनकी पत्नी का नाम रामरखी था जिसे शादी के बाद बदलकर लज्जावती कर दिया गया था। जब लज्जावती ने सुना कि उसके पति को फाँसी होने वाली है तो उसने भी सती होने का विचार किया पर इसकी अनुमति उसे नहीं मिल पाई। फिर एक दिन वो अपने भाई के साथ भाई बालमुकुन्द से मिलने जेल आई और ये पता लगने पर कि उन्हें जो रोटियां दी जाती हैं उनमें बालू मिली होती है, जमीन पर कम्बल बिछाकर छोटी सी कोठरी में सोना पड़ता है और भीषण गर्मी में मच्छरों से बचने के लिए कम्बल लपेटना पड़ता है, वो अतीव दुःख से भर गयीं। वहां से लौटने के बाद अपने पति का उनके कष्टों में साथ देने के लिए वो भी बालू मिले आटे की रोटी खाने लगीं, अँधेरी कोठरी में जमीन पर कम्बल बिछाकर लेटने लगीं और भीषण गर्मी में भी कम्बल ओड़ कर ही सोने लगीं। अपने पति भाई बालमुकुन्द को फांसी लगने की नियत तिथि से कुछ दिन पहले उन्होंने अन्न-जल भी त्याग दिया। ऐसा कहा जाता है कि फाँसी वाले दिन वो विवाह के जोड़े में पूरा साज श्रृंगार के साथ समाधिस्थ हो गयीं और अपने तपोबल से अपने प्राण त्याग उस लोक में भी अपने पति की सहधर्मिणी बन गयीं।

दिल्ली-लाहौर षड़यंत्र केस के इन सभी क्रांतिवीरों की स्मृति में दिल्ली की तत्कालीन जेल के फाँसीघर, जो आज का मौलाना आज़ाद मेडिकल कालेज है, के एक कोने में शहीद स्मारक नाम से पार्क बनाया गया है पर सच तो ये है कि ये सिर्फ डाक्टरों और छात्रों के लिए एक पिकनिक स्पॉट से ज्यादा कुछ नहीं जिसकी गवाही यहाँ बिखरी बोतलें, कैन और अन्य सामान देते है। पार्क में कहीं भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन हुतात्माओं के बारे में सटीक और विस्तृत सूचना देता हो, जिनकी स्मृति में इसे बनाया गया है। भाई बालमुकुन्द जी के नाम पर एक स्कूल शहीद भाई बालमुकुन्द गवर्नमेंट सर्वोदय विद्यालय जरुर दिल्ली के सिविल लाइन इलाके में है पर इसके अलावा कहीं कुछ भी नहीं इस अमर बलिदानी की स्मृति अक्षुण रखने के लिए। इस कृतघ्न देश में इसकी आशा भी क्या करना। भाई बालमुकुन्द को शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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