“प्रौद्योगिकी विकास केन्द्र में नैतिकता”

”वैश्विक वित्तीय संरचना“पर विश्व स्तर पर भारत के दो राष्ट्रीय नेताओं ने अपने विचार लीक से हटकर अभिव्यक्त किये। मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह ने जेनेवा फोरम में कहा कि अवसरों को समानता के लिए नई वैश्विक व्यवस्था के विकास पर ध्यान दिया जाये, उन्होंने एक ऐसी दृष्टि के विकास पर जोर दिया, जिसमें प्रौद्योगिकी विकास केन्द्र में नैतिकता हो तथा जैव प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों का उपयोग कम करने तथा ज्ञान के समान विस्तार वाले विश्व के विस्तार में हो।

केन्द्रीय श्रम मंत्री डा. सत्य नारायण जटिया ने अंतराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के 88 वें सत्र में कहा कि आर्थिक उदारीकरण तथा पूंजी के भूमंडलीकरण के साथ-साथ श्रम का भी भूमंडलीकरण होना चाहिए। श्रम कौशल का अन्तर्राष्ट्रीयकरण किया जाये, उन्होंने मानव श्रम के बनिस्पत पूंजी की वरीयता से उत्पन्न खतरों को रेखांकित किया ।

विश्व कुटुम्ब के लिए उपरोक्त विचार खुली हवा की तरह हैं। नैतिकता आधारित प्रौद्योगिकी विकास नीति इसलिए आवश्यक है, कि मात्र प्रौद्योगिकी मानव मानस भ्रष्ट करती है। वेद में कहा है मात्र भौतिकता अंधकार में ढकेलती है। मात्र आध्यात्मिकता घोर घने अंधकार में ढकेलती है। स्पष्ट है दोनों को अलग-अलग देखना सटीक मानवीय दृष्टिकोण नहीं हैं। ”ज्ञान के समान विस्तार वाले विषय का निर्माण“ज्ञान के संघनन एक एकीकरण या सारीकरण (सार रूप संग्रह) के द्वारा ही संभव है। शायद वैदिक ऋषि ज्ञान संघनन या सारीकरण विद्या से परिचित थे, तभी तो उन्होंने ज्ञान का वेदों में सूत्रीकरण कर दिया है। जैव प्रौद्योगिकी तथा सूचना प्रौद्योगिकी वर्तमान में अमीरी क्षेत्र की विद्याएं हैं – मानवता का तकाजा है कि इन्हें गरीबी कम करने हेतु प्रयुक्त किया जाए। विश्व मानवता की ओर यह एक बड़ा कदम होगा।

श्रम की उत्पादन में केन्द्रीय भूमिका है। ब्रह्म श्रम, तप, ऋत (प्राकृतिक नियम) सत्य के सहारे सृष्टि की रचना तथा व्यवस्था करता है। मानव भी श्रम, तप, ऋत तथा सत्य के सहारे यशमयी रचना करता है। यश ग्राहक संतुष्टि से उपलब्ध मूल्य है। उत्तम उत्पादकता श्रम, नियम, तप की ही उपज है। श्रम महत्ता मानव के साथ-साथ है। मशीन या पूंजी कहीं भी मानव श्रेष्ठ नहीं है।

”मानव सर्वोत्तम मशीन है इस सृष्टि की

सीमित इनपुट पा असीमित आउटपुट देती“

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रम-कौशल का भूमंडलीकरण एक मानवतावादी दृष्टिकोण है, यह प्रशंसनीय है, वर्तमान की पूंजी प्रधान, मशीनों प्रधान मानव, गौण युग में श्रम भूमंडलीकरण सुखद उदात्त हवा है।

कांग्रेस भाजपा दो ध्रुव पार्टियां हैं। इनके दो दिग्गज नेता जब विश्व स्तरीय सम्मेलनों में भारतीय संस्कृति आध्ाारित विश्व व्यवस्था की बातें करते हैं, तो विश्व में भारत का मस्तक ऊँचा होता है। यदि भारत के सारे नेता विश्व स्तरीय सम्मेलनों मंे इसी प्रकार भारतीय संस्कृति मानव विचार रखने लगें, तो भारत की छवि विश्व राष्ट्रों में निखार पायेगी।

आज के युग की आवश्यकता है कि भारतीय संस्कृति के शांति मंत्र ”द्यौ शांति, अंतरिक्ष शांति, शांति पृथिवी, शांतिरापः, शांति औषधयः, शांति वनस्पतयः ………….“ का पर्यावरण परिभाषा, संगठन सूक्त – संगच्छध्वं संवदध्वं मंत्र को वर्क सर्कल परिभाषा, ”जीवेम शरदः शतम् – मंत्र को स्वास्थ्य – परिभाषा, अद्यमर्षण – पाप त्रुटि मर्षण मंत्रों को जीरो डिफेक्ट परिभाषा, दशरूपकम् विद्या को पर्ट परिभाषा, पूणमिदं पूर्णमदः मंत्र को अनंत परिभाषादि रूपों में प्रसारित कर भारत देश को उन्नत स्तर किया जाये।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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