‘‘प्रातः प्रबंधन’’

सोने वाला कलयुग है। करवट बदलनें वाला द्वापर है। उठकर खड़ा हो जाने वाला त्रोता है। चलने वाला सतयुग है। दौड़ने वाला अजयुग है। आज का आरंभ है अज। अज है प्रातः। प्रातः से ही करवट बदलना, उठना, चलना, दौड़ना, शुरू होता है। शुभारंभ अधर्् काम सम्पन्न है प्रातः काल का संदेश। इसके तत्व इस प्रकार है।

1.     प्रातः   प्र+अत ः-    प्रकृष्ट बढ़ना-समकक्षों में प्रथम बढ़ना।

2.     पुरूप्रियः      ः-    आसपास को प्रियता से घेर देना। आसपास से पार तक प्रिय होना।

3.     विशः        ः-    जन जन के ह्दस में घर करने वाला-समुह श्रद्वा पात्रा।

4.     स्तवेतः             ः-    यथावत जानने कहने वाला।

5.     अतिथि             ः-    पितर – वानप्रस्थी, सन्यासी, नियम, वियम, सयंम-यम सिद्व बोडर्स।

6.     विश्व        ः-    सभी-सब।

7.     अमर्त्व       ः-    अमर देव।

8.     हव्यम्        ः-    त्यागन, लक्ष्यन, संगठन का व्यवहार प्रारूप।

9.     मर्तास        ः-    मरण शीलता को पहचानता।

10.    इन्ध्ते         ः-    प्रदीप्र।

11.    अग्नि        ः-    अग्रणी, उध्गायी, अलिप्र।

समकक्षों में प्रथम व्यक्ति प्रकृष्ट   मति होता है। इसमें निम्नलिखित इस गुण होते है।

1.     यह इतना व्यवहार कुशल होता है कि इसकी प्रर्शास्त आसपास के पार तक पफैली हुई होती है। समस्त जन समूह ही इसके यश का स्वयं से पार विस्तार करता है।

2.     यह समस्त ज्ञात समूह की श्रद्वा का पात्रा होने के कारण उसकी शुभच्छाओं शुभकामनाओं से सना हुआ होता है। इसके द्वारा समूह स्वतः संगठित होता है।

3.     जो वस्तु जैसी है वैसी हीि यह उसे देखता है। उसका उपयोग करता है।

4.     यह अंहिसा, सत्य,अस्तेय, अपरिग्रह, ईश्वर, ब्रहमचर्य

5. ऋषित्व के माध्यम से यह अमृम्य देवों के साथ युजित होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, अवस्था, खन, ट्टचा ये सांत अमर देव है। वह इनमें क्रमशः गौतम, इष्टतम, जमदग्नि, विश्वामित्रा, विश्वकर्मा तथा वशिष्ठ ऋषि के माध्यम से गंध्, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, प्राण तथा वाक् द्वारा सयुक्त होता तप सिद्ध- त्रिदेव सिद्ध होता है।

6.     मृत्यु सत्य के साथ-साथ जगत स्थायी सत्य को पहचानता है। वह स्थाई अस्थाई नियम को समझते स्थायी सराक करता है।

7.     वह स्वयं को प्रदीप्र करते प्रदीप करते दीपक से दीपक संग्राम अन्य लोगों को भी प्रदीप्र करता जीवन यापन करता है।

8.     वह अग्नि के समान ज्योतित, उध्गायी, अग्रणी, गीला न करने वाला-अलिप्र रहता है।

उपरोक्त दस गुणों को जीवन में उतार लेने वाला व्यक्ति वास्तव में दशावतार होता है। दश गुण उतार, धार, व्यवहार, अपना लिये है जिसे हर पल जीवन में वह हर व्यक्ति दशावतार होता है। ऐसा व्यक्ति सच्चा सपफल प्रबंधक होता है। प्रातः प्रबंधक  प्र+अतः प्रकृष्ट आगे बढ़ने वाला प्रबंध्क होता! प्रकृष्ट बढ़ने का अर्थ है दौड़ना। कलयुग सोता है। द्वापर करवट बदलता है। त्रोता खड़ा होता है सतयुग चलता है। अजयुग दौड़ता है। प्रातः कई-कई सूरज उगाने के हर्ष से मस होता है। जया कदम नया सूर्य माना प्रकृष्ट बढ़ना है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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