”प्रशस्त प्रबन्धन“

स-अधिकार यथातथ्य कहना-करना प्रशस्ति है। जो व्यक्ति स-अधिकार यथावत कहता-करता है, वह प्रशस्त होता है। दिव्यता, शुद्धता, पवित्रता, ध्रुवता, ऋतुमयता, सत्वता और चैतन्यता ये प्रशस्तता के गुण हैं। इन सप्त गुणों से युक्त व्यक्ति सप्त रंग किरणों के सम्मलित रूप के समान प्रशस्त होता है। किरण तीव्रतम गतिशील है। प्रशस्त भी सतत गतिशील होता है। वह ज्योर्तिमय होता है। प्रशस्त प्रबन्धन मानव संसाधन परिष्कार प्रबन्धन है।

दिव्यता:- उदात्त वितरण का नाम दिव्यता है। ज्ञान वितरण, ज्योति वितरण, सद् वितरण, अमृत वितरण की ‘संज्ञा’दिव्यता है। ज्ञान ज्योति, सद, अमृत का प्रसार करना तथा ‘अज्ञान’तम, असत, मृत का हनन करना दिव्यता प्रबन्धन है, जो प्रशस्त प्रबन्धन का एक चरण है।

शुद्धता:- संस्कार शुद्धि-दा होता है। संस्कार में शून्यत्रुटिकरण के रूप में दोषमार्जनम्, टुट-फूट ठीक करने के रूप में हीनांग पूर्ति, तथा नवीनीकरण के रूप में अतिशयाधान ये त्रि प्रावधान शुद्धता देते हैं। स्थल का प्रशस्तीकरण के अन्तर्गत आता है। शुद्धता, त्रयी प्रबन्धन विधा है, जो प्रशस्त प्रबन्धन को ज्ञात होनी चाहिए।

पवित्रता:- पवित्रता मानव संसाधन के दोष रहित होने का नाम है। वेद ज्ञान पावमान है। बीज का सत्तार्थ, विचारार्थ, लाभार्थ, अर्थार्थ उपयोग करना पवित्रता है। कार्य की मानक अर्हताओं का कार्य क्षेत्र में प्रयोग प्रशस्त प्रबन्धन का एक तत्व है।

ध्रुवता:- लक्ष्य निर्धारण, लक्ष्य हेतु अयोजन, लक्ष्य सिद्ध करना, लक्ष्य पथ पर सतत् चलना, कार्य के दौरान लक्ष्य का दृष्टि से ओझल न होना ध्रुवता है। समय के साथ क्रमशः नियमबद्धता पूर्वक लक्ष्य के निकट ही होते जाना प्रशस्त प्रबंधन है।

क्रतुमयता:- हर कार्य या परियोजना के कई-कई उपकार्य, सहकार्य होते हैं। इन सबको लेकर मुख्य कार्य सम्पन्न करना होता है। प्रशस्त प्रबन्धन वह है जिसमें हर कर्मशील मानव को कार्य की शतक्रतुता या सहस्रक्रतुता का स्वरूप ठीक-ठीक समझा दिया जाता है। यह क्रतुमयता आपसी सांयजस्य की उपज होती है और प्रशस्ति कारक होती है। साधारण आलपिन जैसी चीज अगर एक एक व्यक्ति अलग-अलग बनाता है, तो जो उत्पादन होता है वह हर व्यक्ति के अंश-अंश निर्माण प्रक्रिया से बनाने पर सत्रहा गुना अधिक होता है। प्रशस्त उत्पादन प्रबन्धन के लिए शतक्रतु या सहस्रक्रतु या दशरूपकम संकल्पना आवश्यक है।

सत्वता:- हर कार्य का वह पच्चीस प्रतिशत सार भाग जो पचहत्तर प्रतिशत महत्वपूर्ण हो, उस कार्य का सत्व कहलाता है। सत्व को सिद्ध कर लेने से वह पचहत्तर प्रतिशत कार्य जो पच्चीस प्रतिशत महत्वपूर्ण है, अपेक्षाकृत आसानी से सिद्ध हो जाता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में धर्म सत्व है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास में ब्रह्मचर्य सत्व है। माता, पिता, आचार्य, अतिथि शिक्षक रूपों में माता सत्व है। कार्य सत्व समझना प्रशस्त प्रबन्धन का महत्वपूर्ण चरण है।

चैतन्य:- उत्कृष्ट जागरूकता का नाम चैतन्यता है। चैतन्यता के चार स्तर हैं। एक कलि इसमें चैतन्यता सोती रहती है। दो द्वापर इसमें चेतन्यता करवट बदलती है। तीन त्रेता, इसमें चैतन्यता उठकर खड़ी हो जाती है। चार सतयुग इसमें चैतन्यता चल पड़ती है। इनके पार है अति-चार युग जिसका नाम अज युग है। इसमे चैतन्यता-ब्रह्म संयुक्त अब होती है और सीधे ब्रह्म गुण धार दौड़ती है। प्रशस्त प्रबन्धक का प्रयास रहता है कि व्यवस्था सतयुग-अजयुग स्तर पर कार्य करें।

उपरोक्त सप्त दिव्यता, शुद्धता, पवित्रता, ध्रुवता, क्रतुमयता, सत्वता, तथा चैतन्यता किसी भी प्रबन्धन का भाग होकर उसे प्रशस्त प्रबन्धन में परिवर्तित कर देते हैं। प्रशस्त प्रबन्धन एक व्यापक प्रबन्धन है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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