पितर सिद्धान्त बनाम पीटर प्रिस्कृप्शन

पीटर प्रिस्कृप्शन

PETER PRESRIPTIONS

लारेस जे पीटर की प्रसिध्द पुस्तक ‘‘दी पीटर पुस्तक प्रबंधन के श्रेष्ठ में एक नया उद्बोध माना गया है। पीटर का मूल सिध्दंात यह है कि ‘‘अपनी पद सोपान व्यवस्था में हर कर्मचारी अक्षमता के स्तर तक उठने की ओर अग्रसर होता है।’’। EVERY EMPLOYEE TENDS TO RISE TO HIS LEVEL OF INCOMPETENCE.

       पीटर प्रिस्कृप्शन का आधार है मानव औद्योगिक कर्मचारी विशेष की परिस्थितियों, उम्र, शक्ति ह्रास पद के अनुरूप अक्षमता एवं उसमें सुधार हेतु व्यावहारिक सुझाव।

       पीटर सिध्दान्त का आधारभूत तथ्य है- (१) हर कार्य (श्रवइ) के लिए विश्व में कोई न कोई अक्षम व्यक्ति है। (२) बहुत लोगों के अक्षमता स्तर पर पहुंचने में जड़-काठ इकट्ठा होता है, लालफीताशाही अक्षमता उगती है, गुणवत्ता घटती है, मामूलीपन जीतता है, संस्थान फेल होते हैं, सरकारें गिरती हैं, सभ्यताएं धराशायी होती हैं, मानव भविष्य धुंधला जाता है। (३) गति ही उन्नति है। अक्षमता की ओर के ऊर्ध्वगमन नहीं। पीटर सिध्दान्त मानक व्यवहार आधारित है। परिस्थितिजन्य दर्शन उत्पन्न है।

       इस सिध्दात के तीन उप खण्ड हैं-

(१) अक्षमता की कुचलने वाली कुचलमशीन। Incompetence tread mill

(२) क्षमता संरक्षण। Protect your competence

(३) क्षमता प्रबन्धन। Manage for competence

       पीटर का सिद्धान्त है- आगे बढो, यह सच्ची प्रगती है। ऊंचे अक्षमता के स्तर चढ़ना सच्ची प्रगती नहीं है।

(१) अत्यधिक ऊंचा चढना किसी भी व्यवस्था को प्रदूषित कर सकता है। जटायु उड़ा था सूर्य छूने को, खुद जलकर झुलसा लौटा था। या शेक्सपीयर के शब्दों में-

who soars too near the sun

with golden wings

melts them to ruin his own

fortune brings.

(२) मात्र एक महामशीन संचालित है महाबौनों के द्वारा, उसका नाम है अफसरशाही या लालफीताशाही- एच डी बाल्जक।

(३) अफसरशाह यथा स्थिति के बचाव के तर्क देने का नाम है, जबकि लम्बे समय में यथा ही अपनी स्थिति खो देते हैं। एल. पीटर

Bureaucracy defends the status quo long past the time when the quo has lost its status. L Peter

(४) स्वचालनादि के कारण यह सूत्र उभरता है औरतें आदमियों से बेहतर हैं, बच्चे औरतों से बेहतर हैं और जानवर बच्चों से बहतर हैं। (तर्क का अगला चरण है- बच्चों से जड मशीनें बेहतर हैं।)

(५) विशेषज्ञ वह है जो कम से कम के बारे में अधिक से अधिक जानता है- एन बटलर।

(६) आज का शिक्षा-शास्त्री वह है- जो आसान विषय चुनता है और उसे कठिन बनाकर छोड़ देता है।

(७) चन्द्रमा तक सुरक्षत उड़ान भरकर सुरक्षित लौट आनेवाला मनुष्य सड़क पार करते समय दम तोड़ देता है।

(८) ‘‘उत्तम आरम्भ निकृष्ट अन्त’’- पडर नियम Pudder’s law ‘Any thing that begins well ends badly  

(९) कम्प्युटर का अक्षमता स्तर है ‘डाकनिक’ अर्थात् ‘‘डाल कचरा निकाल कचरा’’ GIGO = Garbage in Garbage out.

(१०) देखो मानव मशीन के हाथों की मशीन हो गया है- एच. थोरो।

(११) आज का कर्मचारी मानव व्यवहारिक कठपुतली (processionary puppet) रह गया है। वह गतिशील शक्ति समझा जाता है। उसे आम आदमी, मौन बहुमत, समूही आदमी, औसत आदमी या उपभोक्ता की संज्ञा दी जाती है।

(१२) नोकरी पाटों में दबा आदमी अर्थात विकृत आकार हुआ आदमी !

           pressed into service means pressed out of shape- R.Frost

(१३) मजाक यह है कि अत्युतम कार्य करता मनुष्य इनाम स्वरूप बाध्यकर काम से अलग करके ऊंचा चढ़ाकर पिंजराबद्ध किया जाता है। (भारत मे स्थिति यह है कि उसे बड़ा पद देकर छोटे कार्यपिंजरे से बाहर ही नहीं निकलने दिया जाता है।

(१४) जहां सब समान सोचते हैं वहां कोइ अधिक नहीं सोचता- डब्ल्यु. लिपमैन

क्षमता संरक्षण (protect your competence)

सभ्य आदमी की सामान्य समस्या अस्तित्व पहचान संकट (Identity crisis) की है। मानव की पहचान उसकी खुद के बारे में अवधारणाओं का संष्लेषण, उसकी खुद की दुनिया की दृष्टि, तथा उसकी आदर्श जीवन प्राणाली की संकल्पना का मिश्र रूप है।

पीटर नुस्खा १ :- पीटर तैयारी- तन का पुनर्शक्तिकरण करो (Reutilise your body)

पीटर नुस्खा २ :- हर दिन छुट्टी लो। बदन को पूर्णतः ढीला छोड़ दो, आंखे बंद कर लो, अपना मस्तिक सारे विचलन विचारों के साफ रखो।

पीटर नुस्खा ३ :- पीटर विहंगम- स्वयं की सर्वाधिक तुष्टिकारक गतिविधियों की सूची बनाएं, सुख स्टेशन नहीं है जहां तुम पहुंचो, पर सुख तो सफर के तरीके में है। एम रनबेक

पीटर नुस्खा ४ :- पीटर शुध्दीकरण- अपना जीवन अतीत के भूतों से आजाद रखो।

अतीत राखभरी बाल्टी है- सी सैंडबर्ग।

पीटर नुस्खा ५ :- पीटर चमक पुष्प- खुद खुद के हीरो बनो। प्रायः ऐसा होता है कि स्व अधिकारों के लिए सहजतः दृढ़ रहते व्यक्ति जननेता बन जाते हैं।

पीटर नुस्खा ६ – पीटर अभिमान (स्व)- स्वंय को, स्वंय किए को शाबाशी दो ! अनुमोदन एक सर्वाधक शाक्तिशाली इनाम है या पूनर्बलन है।

पीटर नुस्खा ७ :- पीटर व्यावहारिका- दुसरों के लिए कार्य करो। व्यावहारिक याने अनुभव से उद्भूत न कि सिद्धान्तों के प्रयोगों से उद्भूत। हम जो दूसरों की सेवा करते हैं वास्तव मे धरा पर अपने पक्ष का ऋण चुकाते हैं- डब्ल्यू. ग्रेनफेल।

पीटर नुस्खा ८ :- पीटर संकल्प- स्वंय में स्वयं के विश्वास का पुनर्जागरण।

पीटर नुस्खा ९ :- पीटर आकार-प्रकार- अपना व्यक्तिगत इतिहास ढूंढो।

पीटर नुस्खा  १० :- पीटर खोज उन संतुष्टियों को जांच करो जो तुम्हारे वर्तमान व्यवहार को कायम रखती हैं।

       भगवान दो ही हैं, जिनके पास पैसा है या जिन्हे पैसे की इच्छा नहीं है। -एल बटलर

पीटर नुस्खा ११ :- पीटर विस्तारीकरण- उन इनामों की पहचान करो, जो पद व्यवस्था में तुमसे ऊंचे पदों के हैं।

       पहली चीज आकर्षित होना है, दूसरी चीज गिरना है। -विलियम सेक्सपीयर

पीटर नुस्खा १२ :- पीटर सूक्ष्म निरीक्षणीकरण- असन्दर्भित प्रभावों से स्वंय को अलग रखना।

       वह जो स्वयं को हर किसी के उपयुक्त बनाने के लिए कांटता छांटता रहता है जल्द ही टुकडे हो जाएगा- आर हल

पीटर नुस्खा १३ :- पीटर पोल्का (नृत्य)- सफलता को दर किनारे करना ेपकम ेजमच जवूंतके ेनबमेण्

       घमासान युद्ध में वास्तविक नेतृत्व भावना आदेशाधिकार प्राप्त कर लेती है।

पीटर नुस्खा १४ :- पीटर खुदबुलंदी ;च्मतेवदंसद्ध- उस व्यक्तित्व की अवधारणा विकसित करो जो तुम होना चाहते हो।

       मानव जितना चाहे उतना बड़ा हो सकता है- जॉन. एफ. केनडी।

       विचारों की रेलगाड़ी उस पर सवार होने के लिए विकसित करो।

पीटर नुस्खा १५ :- पीटर दक्षता- अपने प्रयत्नों को अपनी क्षमता के क्षेत्रों में कन्द्रित करो।

       बहुत आधिक व्यक्तिगत असन्तोष तथा नोकरियों एवं उत्पादों में दोष इसलिए है कि कर्मचारियों की आंखे उच्च पदों पर ऊंची लगी रहती हैं। न कि हाथ के पद कार्य पर।

पीटर नुस्खा १६ :- पीटर प्राथमिकता- सहनशक्तिमय आह्लादों का चयन करो।

       जीवन गुणवत्ता सुधार इस तथ्य में निहित है कि तुम अपनी वर्तमान जीवन प्राणाली से प्राप्त क्षमता एवं सन्तोष में परितृप्त हो।

पीटर नुस्खा १७ :- पीटर विभव (Potential)& वास्तविक अतिरिक्त पथ का चयन करो।

       जीवन के लक्ष्य दो चीजों में समाहित हैं- प्रथम जो तुम्हें चाहिए वो मिले, द्वितीय जो तुम्हे मिला है उससे आनन्द पाओ। मनुष्य समूह में सर्वाधिक बुध्दिमान् ही दूसरे को प्राप्त करते हैं।

पीटर नुस्खा १८ :- पीटर अनुमानक- अपनी क्षमता के स्तर की भविष्यवाणी करो।

       प्रथम श्रेणी का ट्रक ड्राइवर होने में कहीं अधिक श्रेयता एवं संतोष है दसवीं श्रेणी का अधिकारी होने की तुलना में- वी. सी. फोब्स

पीटर नुस्खा १९ :- पीटर संतति (Progosis)& परिणामों का अनुमान करो। कितनी ऊंचाई मेरे लिए पर्याप्त ऊंचाई है।

       प्रतिदिन आठ घण्टे इमानदारी पूर्वक कार्य करके सन्तुष्ट तुम बास बन जाओगे, बारह घण्टे प्रतिदिन काम करने के लिए- आर फ्रोस्ट

पीटर नुस्खा २० :- पीटर सम्भावना- अन्य कार्य तलाशो।

       विश्व विद्यालय छोड़ने के पश्चात मैं दस साल डाक्टर, दो वर्ष समुद्री व्यापारी, आठ साल पत्रकार और पन्द्रह वर्ष उपन्यासकार रहा- जे विल्सन

पीटर नुस्खा २१ :- पीटर पथ- स्व-विवेक तुम्हारी पथ प्रदर्शक हो।

       दिव्य अग्नि की स्व-विवेक चिंगारी हृदय में जागृत रखने के लिये महनत करो- जी.वासिंगटन।

पीटर नुस्खा २२ :- पीटर बचाव- उच्च सोपान चढ़ना, मात्र चढ़ने के लिए की प्रवृत्ति से बचो।

       साधनों का ध्यान रखो, साध्य स्वंय स्वंय की चिंता कर लेगा- मोहनदास करमचन्द गांधी।

पीटर नुस्खा २३ :- पीटर नाटिका- अनावश्यक प्रमोशन पर के भय पर अक्षमता का बहाना करो।

       जब तुम डीन को मजाक सुनाते हो तो उसे बतादो कि वह मजाक है, अन्यथा वह हसेगा नहीं- आर क्लोपटन।

पीटर नुस्खा २४ :- पीटर दूरी रखना- (Parry) छत पर स्थित मनुष्य को गंभीरता से मत आंको !

प्रकृति का उधेडबुन सिध्दान्त :- तुम सफलता पूर्वक आरम्भ में ही नहीं बता सकते कि डबल रोटी में मख्खन किस और लगाया जाए।

पीटर नुस्खा २५ :- पीटर बकवाद (Palauer) शब्दो का प्रयोग रहस्य हेतु करें, न कि स्पष्टता के लिए। इसके दो सिध्दान्त हैं- (१) तुम्हारे कार्यक्षेत्र में संप्रेषण की योग्यता अक्षमता है। (२) अपने जॉब को बाहरी हस्तक्षेप से बचाने के लिए संप्रेषण टालने की योग्यता क्षमता की प्रतिक है। दो प्रकार के सरकारी आदेश-निर्देश होते हैं। प्रथम जिसे समझने मे सच्ची दिक्कत हो, दूसरा जो समझने पर विभ्रम पैदा करे।

अफसरशाही को निर्देश- (१) प्रभारी रहने पर सोचो। (२) मुसीबत में रहने पर कार्य स्थानातरित करो या डेलीगेट करो। (३) सन्देह में रहने पर बडबडाओ या अस्पष्ट बोलो। जे बोरेन

३) क्षमता हेतु प्रबंधन-

दो खराबों मे से एक भी न चुनो- सी स्परजियन।

       आज के उद्देश्य कल की वास्तविकताएं हैं। अतः उद्देश्य प्रबंधन क्षमता हेतु प्रबंधन है।

       यदि तुम नहीं जानते कि तुम कहां जा रहे तो तुम कहीं और जा पहुंचोगे- एल पीटर।

पीटर नुस्खा २६ :- पीटर प्रत्याशा या भविष्य दृष्टि- अपने उद्देश्यों की पहचान करो। उद्देश्य वह वर्णन है जिसके अनुरूप लक्ष्य प्राप्त होने पर वस्तुएं प्रतीत होंगी। दिशा एवं उद्देश्य में अंतर है। आर्थिक महत्वाकाक्षी व्यक्ति का चढ़ाव मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है।

       में भटक गया हूं आसामान में, पर मैं उड़ान समय का रिकार्ड बना रहा हूं- आकांश में पेसिफिक समुद पर भटका एक विमान चालक

       व्यवसायिक दया = मानव अंधेपन का दूध- जे मेसफील्ड।

पीटर नुस्खा २७ :- पीटर प्रस्ताव- सफलता भरी गुण सम्पन्नता की कसौटी तय करें, या आधार तय करें। भवन के नक्शे एवं अर्हताएं भवन की पूर्णता के प्रतीक हैं।

पीटर नुस्खा २८ :- पीटर पैनल- उद्देश्य निर्धारण में कर्मचारी भागीदारी हो। सर्वाधिक मूल्यवान उद्देश्य गहनता से समझे जाने चाहिएं तथा स्वीकृत होने चाहिएं।

पीटर नुस्खा २९ :- पीटर नीति- समूह लक्ष्य व्यतिगत लक्ष्यों के अनुकूल हो।

       जो शांतिमय क्रान्ति को असंभव बना देते हैं वे उथल-पुथल क्रान्ति को अवश्यम्भावी कर देते हैं- जान एफ केनडी।

पीटर नुस्खा ३० :- पीटर स्थिति या पद- उद्देश्य आवश्यकता पूर्ति हेतु हो, न कि आकार पूति हेतु। उत्पाद एवं तरीके परिवर्तनीय हैं, परन्तु मांगें एवं इच्छाएं सदायी हैं।

       संदेह कोई सुखद मानसिक स्थिति नहीं है पर निश्चयात्मकता हास्यास्पद स्थिति है- एफ.वोल्टेअर

       उसकी कोई परवाह न करेगा जो किसी को परवाह नहीं करता- टी जेफरसन।

पीटर नुस्खा ३१ :- पीटर व्यवहारिकता- उद्देश्य वह एक हो जो प्राप्य हो।

‘संभव’ या प्राप्य तथा तर्कसम्मत में अंतर है। दस वर्ष मे चन्दमा तक पहुंचने का अमेरिका का लक्ष्य खतरनाक था, पर संभव था।

       हर चीज सम्भाव्य सरल (सरल से सरल) बनाई जाए पर सरलतर (Simpler) नहीं- आल्बर्ट आंइस्टीन।

पीटर नुस्खा ३२ :- पीटर बिन्दु (Point)- उद्देश्य शब्दों एवं कर्मों द्वारा सम्प्रेषित करो।

(१) उद्देश्य ठोस रूप में अभिव्यक्त हो।

(२) उन मात्र के लिए इनाम जो उद्देश्य की और बढ़ें।

(३) उद्देश्य के अनुरूप कार्य हो, क्रियाएं हों।

       वह कमरे से उछला और उछलकर घोडे पर सवार हुआ और सारी दिशाओं पर पालगवत सवार हुआ- एस.ली.काक।

पीटर नुस्खा ३३ :- पीटर अंश या भाग- अन्यों को आन्तरिक उद्देश्य निर्माण प्रकिया में साथ लो। पीटर नुस्खा ३४ :- पीटर सटीकता- उद्देश्य विशिष्ट दिखते हुए या नापने योग्य होनें चाहिएं।

पीटर नुस्खा ३५ :- पीटर शान्ति- ‘‘संतुष्टि प्राप्त रुको’’ या रुकने पर संतुष्टि सुख तथा संतुष्टि भावना वर्तमान में ही घटते हैं।

विवेक प्रकिया (Rational Process)& विवेक पूर्ण प्रक्रिया ही मनुष्य को मनुष्यभिन्न जीवित जगत से भिन्न करती है और उसे घटनात्मक रूप से नष्ट होने से बचती है। विवेक बुध्दि का प्रयोग है।

       जब आप सडक पार कर रहे हो और तेज गाडी आ रही है तो यह महत्वहीन है कि तुम सामने कूदते हो या पीछे; मुद्दां यह है कि रास्ते से हट जाना है।

पीटर नुस्खा ३६ :- पीटर प्रकिया ‘‘विवेक पूर्ण निर्णय तरीके अपनाओ।’’

तीन विवेक प्रश्न :- (१) मैं कहां हूं ? (२) मैं कहां होना चाहता हूं ? (३) मैं कैसे जानता हूं कि मैं वहां पहुंच रहा हूं

       हर मानव में कई पवित्र चिन्ह हैं- आर एल स्टविंसन।

(१) जहां तुम हो वहीं से आरम्भ कर सकते हो।

       ठेठ सच छोड़कर हमारे जीवन बुरी तरह संकेतों और सुझावों के सेंटों में डूबे रहते हैं- ए.एन.हाइटहेड।

(२) उद्देश्य-निर्णय बाद अध्ययन करो कि समय, पैसा, प्रयास, दूसरे पथ तथा तरीके क्या है कि उद्देश्य की वास्तविेकेता का पता चल सके।

       (कार्यों) चीजों को ठीक करने की तुलना में ठीक चीज (कार्य) करना महत्वपूर्ण है- पीटर ड्रकर।

(३) जहां पहाड़ तकनीकी दक्षता से हट सकता है वहां उस विश्वास को जरूरत नहीं है जिससे पहाड़ हटे- ई हाफर।

       केवल वह आदमी ही मस्तिष्क वाला है, जिसका मस्तिष्क परिवर्तित होता है- ई वेस्टकाट।

पीटर नुस्खा ३७ :- पीटर समय अनुशासन- अपने निर्णय सटीेक क्रिया के लिए समय पर लो।

       सफल परिणाम एवं क्रिया के लिए सही समय पर निर्णय आवश्यक है।

       एक मोटा आदमी पहाड़ चढ़ना चाहता था। उसने अपने हाथ मजबूत बनाए। पहले पहाड़ियां चढ़ा, फिर बड़ा पहाड़, उबड-खाबड़ चढने लगा। खतरनाक ऊंचाई नीचे मौत की खाई और रस्सी टूटने लगी, नीचे मौत थी, उसने निर्णय किया कि मोटी रस्सी लेनी चाहिए। उसका निर्णय सही था, पर समय गलत था, उसके दिन समाप्त हो चुके थे।

पीटर नुस्खा ३८ :- पीटर तुरन्त (Prompt)& भय तथा उत्तेजना के मध्य संतुलन।

       उत्तेजना प्रायः उतम कार्य निर्णय में बाधा बनती है। लोगो की औसतः दो श्रेणियां होती हैं- १) वे निर्णय नहीं कर पाते हैं, २) वे निर्णय देर से करते हैं।

       समस्य आनन्द पद्यों या आनन्द गद्यों से उतम आनन्द शब्द है- ‘‘समय रहते क्रिया करो’’- एफ.पी.आदम।

       शायद मानव ने पर्यावरण का नवनिर्माण किया है, अन्ततः मानव लौटेगा, स्वनिमार्ण करेगा। डब्ल्यु.दुरान्त।

पीटर नुस्खा ३९ :- पीटर मितव्ययता :- अपने निर्णय तथा हल दिशित करो।

       अधिकांश असफल होते हैं कि निष्कर्ष लेते हैं कि मूलसिध्दान्त उन पर लागू नहीं होते हैं- एम एल सियान।

पीटर नुस्खा ४० :- पीटर विभाजन- लोक समस्या से हल को अलग करो।

       जब आधारभूत दुराग्रहों से जीतना सम्भव नहीं है तो उनके लिए प्रावधान रखो।

       में समस्त आधारभूत दुरग्रहों से मुक्त हूं, मैं हर एक से बराबर नफरत करता हूं- डब्ल्यू.सी.फील्ड।

‘‘दुराग्रह एक आवारा राय है जिसका आधार दिखता ही नहीं।’’

पीटर नुस्खा ४१ :- पीटर प्रतिज्ञा- उस निर्णय की तलाशों जो किसी ने तुम्हें लेने को नहीं कहा।

       समस्त भागती चीजों से तेज भागता है अवसर। यह दुबारा नहीं खटखटाता और कभी-कभी तो खटखटाता भी नहीं।

       एक सीमा है जहां सहनशीलता गुण नहीं रह जाती- ई.बर्क।

       यदि आप शेरों के देश में खरगोश का शिकार कर रहे हैं तो शेरों से अति सावधान रहें। पर अगर आप शेरों का शिकार कर रहे हैं तो खरगोशों को भूल जाएं।

पीटर नुस्खा ४२ :- पीटर सामर्थ्य- ‘‘क्रिया का साहस हो’’ तार्किक प्रक्रिया विचार स्पष्ट करती है। एक डरपोक को भी स्पष्ट सोचना सिखाया जा सकता है। बिना क्रिया के तार्किक विचार हिजड़ा या नपुंसक है। तार्किक प्रकिया गमन का भविष्य नक्शा देती है और तुम्हे अंत के निरर्थ विचार समूह से बचाती है।

       ‘‘कब्र भी बड़ी है उसे जिसे विश्व छोटा लगता रहा’’- सिकंदर जीवन निष्कर्ष।

भविष्य कथन का उपहार या भविष्य सामने है :-

मालीनोवस्सकी नियम :- विकसित सभ्यता को ऊंचाईयों के सुरक्षित स्थानों पर से देखने पर सहजतः दिखता है। जादू का भोंड़ापन तथा असन्दर्भितता।

       मानव व्यवहार का सीधा अवलोकन व्यक्तिगत भविष्य आकलन का सर्वोत्तम आधार है।

       उतम सलाह देने से उतम सलाह लाभ लेना आधिक बुध्दिमत्तापूर्ण है- जे.कालिनस।

       हम उस अनिश्चितता के विश्व में रहते हैं जिसमें मनुष्य सबसे बड़ी समस्या (रहस्य) है।

हार्वड नियम :- तापक्रम, दबाव, आयतन, आर्द्रता एवं अन्य परिवर्तनीय गुणों की सर्वाधिक कठोर नियन्त्रित परिस्थितियो में संस्थान वह सब करेगा जो उसे नारकीय प्रिय होगा- ए.एस.सुसन।

पीटर नुस्खा ४३ :- पीटर संभावना- वैज्ञानिक विधि भविष्य कथन का सच्चा उपहार मात्र तुम्हें आने वाली वस्तुओं (भविष्य) का अंदाज दे सकता है।

       निर्णय न लेने का निर्णय करना भी निर्णय है। विचार तब तक स्वप्न हैं जब तक उनके असर के लिए कोशिश नहीं की जाती- डब्ल्यू.शेक्सपियर।

       सटीक वैज्ञानिक अर्थ में सुविकसित, सुखांचित मनुष्य ही वह अद्भुत है जिसका हमें ज्ञान है। और विश्व के विविध व्यक्तित्व विश्व का सर्वोच्च वैभव है- जे.हक्सले।

       उस मनुष्य के लिए कुछ भी पर्याप्त नहीं है जिसके लिये पर्याप्त बहुत कम है- एपीकूरस।

पीटर नुस्खा ४४ :- पीटर विशिष्ट- कार्य की पूर्व परिभाषा तय करो पहले इससे कि व्यक्ति चयनित हो या प्रमोशन पाए।

       परिभाषांए अच्छी चीज है यदि हम शब्दों को सीमा में उन्हें न बाधें- जे रूसो।

पीटर नुस्खा ४५ :- पीटर प्रमाण :- खरीदने के पूर्व उपयोग अरचनात्मक मस्तिष्क गलत उत्तरों का पता लगा सकता है पर रचनात्मक मस्तिष्क गलत प्रश्नों का पता लगाता है- ए.जय।

       प्रायः आदमी उच्च योग्य मित्र-युवती को घटिया-योग्य गृह-पत्नी के प्रमोशन का पद दे देता है, यही सत्य औरत का भी है।

पीटर नुस्खा ४६ :- पीटर पूर्व जांच- गुप्र जांच सूत्र का प्रयोग- उदात्त से हास्यापद स्थिति में जाने के लिए मात्र एक कदम बढ़ाना पड़ता है। पर हास्यास्पद स्थिति से वापस लौटने की कोई सड़क नहीं है- एल.फ्रैंचवोडर।

       मुहब्बत और दक्षता अद्वितीय का निर्माण करते हैं- यों रीड।

पीटर नुस्खा ४७ :- पीटर नाटक- भविष्य की यथार्थ वास्तविकताओं को बढाओ- समूह गतिशीलता, सामाजिक नाटक एवं मनोवैज्ञानिक नाटकों ने सिध्द किया है कि यदि किसी को अभिनय करने दिया जाता है और नाटक अलिखित होता है तो अधिकांश अभिनेता अपने जीवन की वास्तविक स्थिति जैसा अभिनय करते हैं।

पीटर नुस्खा ४८ :- पीटर अपील- अस्थायी प्रमोशन की कोशिश करो- एक उत्तम कार्य करते व्यक्ति को अक्षमता के स्तर पर प्रमोशन देना एक दुःखद भूल है। उसे वापस लौटाना करीब असम्भव है। संवेदना पूर्वक किए गए अस्थायी जांच प्रमोशन कुछ स्थितियों लागू किए जा सकते हैं।

पीटर नुस्खा ४९ :- पीटर प्रचार या प्रजनन- नव पदोन्नत का विकास करो- कर्मचारी में प्रमोशन पर इज्जतवृद्धि, वेतन तथा अवसरवृद्धि की आकांक्षा होती है।

पीटर नुस्खा ५० :- पीटर संवेदनशीलता या अवधारणा- तीसरे कान से सुनो (छठी इन्द्रिय से महसूस करो) पहली बार नौकरी पानेवाला बेरोजगारी से रोजगार पता है। (लम्बी छलांग)

       साक्षात्कार सार रूप में लघु सैद्धान्तिक प्रर्दशन है।

       थोथे दूध में क्रीम का एहसास होता है।

       अक्षम प्रबन्धक भी कभी-कदा सही निर्णय ले लेता है, जैसे कि टाइपराईटर पर कूदते बंदर/चिपैंजी से कुछ सही शब्द भी टाईप हो जाते हैं।

क्षतिपूर्ति जादू या आदमी का आदमी के समान व्यवहार किसलिए :- हमारे समय के साथ यही दिक्कत है कि सारे सूचना फलक हैं और कोई लक्ष्य नहीं है। एक समय कार्य की क्षतिपूर्ति आजीविका थी। आद्योगिक युग में ज्यादा मानवीय तथा उदात्त तरीकों की आवश्यकता है।

       संसार की समस्त सुन्दर भावनाओं से एक सुन्दर कार्य का वजन अधिक है- जे लावेल।

       क्षतिपूर्ति का अंतिम लक्ष्य क्षमता है। यदि हमें हमारे राष्ट्र हमारी सभ्यता और हमारे महत्वपूर्ण संस्थानों को ढलती अफसरशाही से बचाना है तो हर पद व्यवस्था योग्य मानवों द्वारा भरी जानी चाहिए।

       घर में बच्चा खुशियों का झरना है- एम टपर।

       लोगो के आरंभ होने का सुन्दर रास्ता है बच्चे- डी हेराल्ड।

       जीवन का महान अंत ज्ञान में नहीं है, क्रिया में है- टी हक्सले।

       तैयार पैसा अल्लादीन का लैम्प है- लार्ड बैरन।

       परिणामों के ज्ञान का एक आकार है सामाजिक स्थिति या पद। स्व आकलन सर्वोच्च सार का शक्तिकरण है। इसे आंतरिक शक्तिकरण या स्व-प्रोत्साहन भी कहा जाता है। पूर्णतः वास्तविकृत व्यक्ति के आदर्श विकास का विवरण यह है कि स्वयं स्वयं के लिए लक्ष्य निर्धारण। लक्ष्यों की ओर प्रगति कायम रखना। स्व कार्य का आकलन एवं स्व-पथ में स्वयं सुधार करना। ऐसा व्यक्ति भाग्यवान है।

पीटर नुस्खा ५१ :- पीटर प्रशिक्षण शास्त्र- बच्चे के हर मानववादी व्यवहार को प्रतिबलित करो- बुजुर्ग द्वारा शब्दों द्वारा सम्प्रेषित वह अनुमोदन जो बच्चे को शिक्षापूर्ण तथा समाजवादी व्यवहार पर दिया जाता है, उसके मानववादी (आदमियत के) व्यवहार का विकास करता है।

पीटर नुस्खा ५२ :- पीटर युगल- जिस प्रतिबलनकर्ता का तुम विकास करना चाहते हो उसके समानांतर एक प्रतिबलनकर्ता प्रस्तुत करो। जब मां बव्चे को भोजन खिलाती, भोजन के साथ बातों का युगल बनाती है तो उसकी आवाज और शब्द शक्तिशाली संतोषप्रद होते हैं। जब प्रेमी प्रमिका को महकता फूल महकते शब्दो के साथ युगल कर प्रस्तुत करता है तो वृद्धिकर संतुष्टि मूल्य उत्पन्न होता है तथा भविष्य में उसे अधिक भावनात्मक उत्तर मिलता है।

       तरीफ एक प्रंशसनीय अवरोध है- ए ग्लासगो।

पीटर नुस्खा ५३ :– पीटर वेतन- वेतन उत्तम कार्यनिष्पादन के रूप में देय हो। विश्व जादुई करिष्मों से भरापूरा है। यह धीरजपूर्वक प्रतीक्षारत है कि हमारी बुद्धि पैनी हो- ई.फिल पाटस।

पीटर नुस्खा ५५ :- पीटर स्थिति (Place) स्थान या पद- योग्य कर्मचारी के कार्य पद जहां वह कार्यरत है को क्रमशः व्यवस्थित प्रतिबलन करते गरिमा बढाएं।

       हम भवनों को आकार देते हैं, कालांतर में भवन हमें आकार देते हैं- विन्स्टन चर्चिल।

       दफ्तर, सुविधाएं, सम्पन्नताएं कार्यपद प्रतिबलन है। आकाश की सबसे उजली बिटिया गुलाबी गालों गड्ढे पड़ती संतुष्टि है।

पीटर नुस्खा ५६ :- पीटर निष्पादन (Performance)& कर्मचारी के विश्वास को प्रोत्साहित करो कि इनाम निष्पादन आधारित है।

       खुशी तभी देय होती है, जब पूर्ण कर्तव्य पूरा होता है- आर पोलक।

       यदि तुम स्वंय से बात नहीं कर सकते तो कर सकते तो अपरिचितों से कैसे करोगे ?- जे.फिफर।

पीटर नुस्खा ५७ :- पीटर संबंध सूचक- अच्छे और खराब निष्पादन के लिए इनामों में दिखता हुआ अंतर हो। इनाम यदि देने हैं तो सम्मान जनक हो।

       जो सबकी तारिफ करता है, किसी की तारिफ नहीं करता है- एस.जानसन।

       सामान्यों को ५ प्रतिशत तथा विशेषों को १० प्रतिशत वेतन अभिवृद्धि अर्थहीन है।

       मेरी ताकतों के साथ सहानभूति रखते मेरी ताकत बढ़ाओ, मेरी कमजोरियों के साथ नहीं- बी.आलकाट।

पीटर नुस्खा ५८ :- पीटर लाभ- सम्पूर्ण संकाय (Operation) समस्त कर्मचारीयों द्वारा लाभ विभाजन द्वारा सहकारी समिति बने।

       हर मनुष्य के व्यक्तित्व की (व्यक्तिपन की) इज्जत हो, किसी मनुष्य का प्रतिमाकरण न हो- ए आईनस्टीन।

पीटर नुस्खा ५९ :- पीटर संरक्षण- सामयिक लाभ, सच्ची रक्षा एवं अर्थपूर्ण इज्जत।

       कब अवसर पर झपट्टा मारना चाहिये के पश्चात सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कब लाभ त्याग देना चाहिए- बी.दिशराली।

पीटर नुस्खा ६० :- पीटर गोदाम (Pantry)- क्षतिपूर्ति सुविधाएं जो कर्मचारी को मिलनी हैं, उनका प्रकार कर्मचारी स्वयं चुनें।

पेन्ट्री- सुखाद्य भंडार में विविध प्रकार के खाद्य पदार्थ रहने से हर एक की भूख मिट सकती है।

पीटर गोदाम धारणा कैफेटेरिया या सुपर बाजार धारणा के समान है। कर्मचारी सुविधाओं में चयन हो।             अब समय आ गया है की सब अच्छे आदमी अपनी मदद आप करें- एफ नेलसन।

पीटर नुस्खा ६१ :- पीटर आभिप्राय (Perpose)& कर्मचारियों को क्या प्राप्त करना है, इसे सही-सही संप्रेषित एवं प्रतिबलित करें और वे कैसे उद्देश्यपूर्ति प्राप्त कर रहे है इसका वापसी संप्रेषण या फीडबैक कम्युनिकेशन- खाली कुओं से खाली बाल्टीयां खींचते हुए ‘‘कुठ न’’ निकालते ‘‘बुढापा आ जाना’’- डब्ल्यू.कापर।

पीटर नुस्खा ६२ :- पीटर भागीदारी- समूह निष्पादन को इनाम दो। इससे समूह भागीदारी भावना बढ़ती है। लोक बहुत अधिक दीवारें उठाते हैं, खींचते हैं, पर पर्याप्त पुल नहीं बनाते- डी.पिरे।

पीटर नुस्खा ६३ :- पीटर शक्ति- व्यक्तिगत उत्साह पूर्वक आरम्भन भावना के लिए नए अवसर प्रदान करो, जिससे कि उनकी क्षमतायोग्य निष्पादन का मूल्यांकन हो।

       जब प्रबंधन क्षमतावान व्यक्तियों के प्रति आदर दिखाते हुए उनके व्यक्तिगत उत्साह को कुछ रूप में उन्हें रस्मों व्यवहारों से स्वतंत्रता देता है तो व्यवस्था की प्रभावशीलता बढ़ जाती है।

पीटर नुस्खा ६४ :- पीटर प्रशंसा- क्षमता के विशिष्ट कार्यों के लिए अनुमोदन संप्रेषित करे। प्रशासन वह प्रक्रिया है जिसमें संगठन, प्रतिनिधित्व (Deputation)] निरीक्षण, निर्णय करना, कार्यक्रम बनाना, सहयोग करना, समन्वय करना, प्रशंसा करना एवं नियंत्रण करना शामिल है। कई व्यक्तियों को प्रभावशाली अतिरिक्त गुण ज्ञात नहीं हैं। वे है सहानूभूति पूर्ण समझ, लगन, सदिच्छा, मित्रता और दयाभाव।

       उस व्यक्ति द्वारा प्रशंसा पाना भला लगता है जिसकी सब प्रशंसा करते हैं- टी.होव्ही।

पीटर नुस्खा ६५ :- पीटर प्रतिष्ठा- सभी पदों के सुयोग्य सहायकों के साथ संप्रेषण- प्रतिष्ठावान पुरुष का सानिध्य सभी लोक चाहते हैं।

       सम्पूर्ण सहजतर है, इसके समस्त अवयवों के योग से- डब्ल्यू.गिब्स।

पीटर नुस्खा ६६ :- पीटर करीब-करीब (Proximity)& व्यवहार आकारित करो- निश्चित उद्देश्य की ओर बढ़ने के लिए क्रमशः करीब-करीब प्रतिबलन करते-करते अंतस् के मामलों में बहुमत का कोई स्थान नहीं है- मोहनदास करमचन्द गांधी।

       हर मानव का व्यवहार हर समय ठीक नही दुहरता है, इसलिए उसके व्यवहार को निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर मोड़ा जा सकता है।

       जिसे दयावान होना है, उसके पास पर्याप्त अमीरी है- सर टी.ब्राउन।

       तुम्हे देर न हो जाए ! यह मत भूलो, जिन्दगी का व्यापार व्यापार नहीं है, जीना है- बी.सी.फोब्स।

पीटर नुस्खा ६७ :- पीटर आयोजन (Plan)-    

अह! कब हर आदमी का बेहतर शासन होगा, और विश्वशान्ति भूमि पर प्रातः धूप टुकड़ेवत फैलेगी- ए.टेनिसन।

       जीने की कीमत बढ़ती जा रही है पर जीने के अवसर घटते जा रहे हैं- फिलिप विल्सन।

       तकनीकी उन्नति मूलतः पाप नहीं है, पर बिना समानांतर सामाजिक, शैक्षणिक और मानवतावादी विकास के व्यवस्था अवरुद्ध हो गई है।

       यदि हम नया विश्व गढ़ना चाहते हैं तो हमारे पास परिस्थितीयां तैय्यार हैं। पहली बार भी विश्व अव्यवस्था से ही उत्पन्न हुआ था- आर.क्विलन।

       मानव जाति मात्र के सामने एक महान प्रश्न है जिसका उत्तर पाने के लिये मैं जीवित नहीं रहूंगा वह यह है कि मानव मात्र किस तरह स्वयं को इच्छित और योग्य करेगा कि वह स्वयं जी सके- डब्लू.लिपमैन।

       मानव मात्र अक्षमता के सहारे नही रह सकता।

पुस्तक सार संक्षेप – दी पीटर प्रिस्कृप्शन- (हाउ टू मेक थींग्स गो राइट)

डा. जे.लारेंस पीटर

पितर सिद्धान्त

       भारतीय संस्कृति में पितर शब्द एक महत्वपूर्ण सिध्दान्त है। इसके साथ श्राद्ध व्यवस्था तथा यमलोक व्यवस्था जुड़ी हुई है। इस सिद्धान्त का आधारभूत तथ्य पीटर प्रिस्किप्शन का समुन्नत रूप है।          पद सोपान की जीवन व्यवस्था में उम्र सम्बन्ध (रिश्ते) सामाजिकता में अनुभव वात्सल्य ज्ञान श्रेष्ठ व्यक्ति (पितर) के प्रति श्रद्धान्वित होते उस स्तर तक स्वयं को उदारता पूर्वक उठाना, उसमें भी आगे बढ़ना पितर सिद्धान्त है।

       पितर सिद्धान्त का मूल आधार है सर्वश्रेष्ठ याने परमा पद तक सीढ़ी दर सीढ़ी श्रेष्ठों के कदमों से कदम मिला क्रमशः गमन एवं परमोत (परमा+उत) से सानिध्य।

       पितर सिद्धान्त का मूल आधारभूत तथ्य है- (१) अनुभव सिद्ध घनिष्ठ, वरिष्ठ-कनिष्ठ सम्बन्ध, (२) श्रद्धा, (३) यम, नियम संयम। पितर सिद्धान्त सकारात्मकता से परिपूर्ण है तथा मानव स्वभाव के मूल स्वरूप आन्तसिक स्वरूप से समन्वित है। इस सिद्धान्त में अष्टांग योग की, रिश्तों की, अनुभव रहितों की क्रमबद्धता में पूर्ण वैज्ञानिकता है।

       इस सिद्धान्त के तीन उपखंड हैं। (१) क्षमता का उच्चतम स्तर, (२) क्षमता अभिवृद्धिकरण, (३) क्षमता सर्वोच्च से व्यवहार जीवन लबालब करना। यमलोक पुस्तिका (योग-दर्शन) में इस सिद्धान्त का सम्पूर्ण विवरण है। (१) समाधिपाद, (२) साधनपाद, (३) विभूतिपाद एवं (४) कैवल्यपाद पितर सिद्धान्त है।

       क्षमता अभिवृद्धि पितर सिद्धान्त है। क्षमता अभिवृद्धि करते ऊंचे चढ़ो और ऊंचाइयां बिखेरते आगे बढ़ो। ‘‘क्षमता का उच्चतम स्तर पांच सिद्धि स्तर है। ‘‘जन्मौषधिमंत्रतपः समाधिजाः सिद्धयः।’’ जन्म, औषधि, मन्त्र, तप एवं समाधि सिद्धियां देते हैं।

(१) जन्म सिद्ध :- पशु तथा मानव योनि के सहज कर्म। प्राणीमात्र की योनिपद व्यवस्थाएं कर्म अनुसार हैं। मानवयोनि एक पद व्यवस्था में चार कर्म पद हैं। इन चार कर्मपदों को आधुनिक मानव ने अफसरशाही के अनेक पदों में बाट दिया है। यही पीटर की अक्षमता की कुचलने वाली कुचल मशीन है, जो प्रायः सहज कर्म रूढ़ कर दी जाती है। अहंवादी फिख्ते ने अपने पुत्र के तृतीय पुरुष से प्रथम पुरुष तक उतरने पर पार्टी दी थी। ब्रहमवादी व्यास के पुत्र शुकदेव ने चौरासी लाख योनियों से आजाद रहने की बात कही थी।

(२) औषधिजा सिद्धि :- १. रोग मुक्ति, २. उन्माद उत्पति।

(३) मन्त्रजा सिद्धि :- स्वाध्याय से इष्ट प्राप्त- वर्तमान वैज्ञानिक उन्नति औद्योगिक युग क्रान्ति का आधार मन्त्रजा सिद्धि है। मननात मंत्र नवीनकरण वाज है।

(४) तपोजा सिद्धि :- द्वन्द-युगल के सम सहन द्वारा काया तथा इन्द्रिय की अक्षमताओं का क्षय तथा अक्षमताओं की वृद्धि तपोजा सिद्धि है। प्रमोशन-अप्रमोशन भी द्वन्द हैं। पीटर के अक्षमता स्तर का यह दोहरा इलाज है- १. तटस्थता तथा २. क्षमतावृद्धि।

(५) समाधिजा :- सर्वोच्च आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक क्षमता। यह व्यवहार की आदर्श अवस्था है। इससे उच्चावस्था कैवल्य है; पर वह व्यवहारावस्था नहीं है। सिद्धान्तावस्था है।

(अ) समाधिजा अवस्था में मननात मन्त्र से वाणी में अर्थवेद उतरते हैं। ऐसा मानव ज्ञान कर्म निष्णान्त होता है। ऐसा मानव जब कम्प्युटर का उपयोग करता है तो कम्प्युटर गीगो हो जाता है। कम्प्युटर का सर्वोत्तम क्षमता स्तर है- डाप्रनिप्र = डाल प्रभु निकाल प्रभु। अर्थात् गॉड इन गॉड आऊट। प्रभु से यहां तात्पर्य है प्रभु के गुण।

(ब) समाधिजा अवस्था में सरिताओं के समान (वाणियां अन्तस = आत्मस्थल परा से मुख गुह्वर तक ऋग्वेदमय उससे तथा मन- यजुर्वेदमय, प्राण वाक् को वाणी करता है सामवेदमय) पवित्र होती हुई सम्यक् (सहज-सम-सौम्य) अंदर से प्रवाहित होती है। स्वर्णिम ज्योतित के ब्रह्म गुणों के तेज के मध्य में वेगवती ब्रह्म गुण धाराओं को सुस्पष्ट जीता हूं। (युजर्वेद १३/३८; वेदालोक १ पृष्ठ ८)

निष्कर्ष :- (१) क्षमतावृद्धि मशीन वेद है। (२) अत्यधिक ऊंचाई परमात्म गुण मानव को सम्यक् सौम्य कर देते हैं। (३) मानव महामशीन समाधि संचालित है। (४) मूल गुणाधारित अर्थात् ज्ञान, शौर्य, ऐश्वर्य, शिल्प एवं सेवा = अंगूठा, तर्जनी, बडी ऊंगली, अनामिका तथा कनिष्ठायुक्त हाथ के समान संचालित पद मशीन सर्वोत्तम व्यवस्था है। (५) ब्रह्मचालित प्रकृति ऋत जड़ है। जो स्वचालित प्रतीत होती है। इससे चैतन्य मानव हर स्थिति बेहतर है। जो देव स्वनियन्त्रित हो सकता है। (६) समाधिजः आप्त या ऋषि या विशेषज्ञ है। (७) ब्रह्म गुणों के गर्भ मे स्थित हित प्राप्त करता, विद्यार्थी को ज्ञान गर्भ में निकटतम रख परिष्कार करता (द्विज बनाता) पुरोहित शिक्षा शास्त्री है। (८) श्रेष्ठ आरम्भ सर्वश्रेष्ठ पुनरारम्भ। (९) गॉड इन गॉड आऊट याने डाब्रनिब्र अर्थात् डाल ब्रह्म (ज्ञान) निकाल ब्रह्म (सर्वगुण)। (१०) देखो मानव स्वर्णिम गुणापूर्त परम चैतन्य हुआ। (११) स्व नियन्त्रित याने प्रज = स्वतंत्र है आदमी। (१२) प्रजतन्त्र (मात्र योग्यता अनुभव आधारित व्यवस्था में) सटीकाकार आदमी। (१३) अव्याहत गति शिवसंकल्प शुभ ही शुभ है इनाम। (१४) जहां सब समान उच्च सोचते हैं। लहरवत एक लक्ष्य गतित फुटबाल टीम हो जाते हैं। यह पितर पद व्यवस्था, निर्णय व्यवस्था सांतसा (सांस्कृतिक तकनीक सामाजिक) है।

‘‘क्षमता अभिवृद्धिकरण’’

       पितर सिध्दान्त का आधार है संस्कार। अर्थात् पूरी उम्र क्षमता अभिवृद्धिकरण। संस्कार अस्तित्व पहचान प्रदाता है। संस्कार योजना में बारह (सोलह में से) संस्कार ब्रह्मचर्यावस्था के हैं। संस्कार सम्यक् भूषण-भूत कृतिकरण है। इससे बालक (१) दान, (२) पूजा, (३) संगीतकरण, (४) समाजिकरण, (५) पितरों के प्रति श्रद्धा, (६) गुणवत्ता, (७) पर्यावरण संरक्षण, (८) जीवन चलन आर्दश (रोल मॉडल), (९) कार्य समूह अंग बनना, (१०) व्यापकत्व सीखता है। (११) उसका उम्र संधियों पर सम-संक्रमण होता है।

पितर सूत्र एक :- पितर सतत :- पचास पार अनुभववृद्ध- यमलोक (पांच यम, पांच नियम, तीन यमाः, तीन नियमाः, संयम) निवासी या साधक पितर श्रद्धेय है। पचास वह उम्र है जहां अक्षमता स्तर औसतः आ धमकता है। पितर सतत सर्वागणीय पुनर्शक्तिकरण है।

ये समानाः समनसः पितरो यम राज्ये। तेषा लोकः स्वधा नमो यज्ञो देवषु कल्पताम्।। (यजुर्वेद १६/४५) जो पितर है, यमराज्य में है, स-मान है, स-मन उसके क्षेत्र, ऊंचाइयां (स्वधा), नमन तथा यज्ञ (वितरण, लक्ष्य, संगठन) देव समर्थ हैं।

यज्ञेन आयुः कल्पताम् इरगॉनमिक्स (कार्य परिस्थितिकी) से ऊंची समर्थ अवस्था है यज्ञो देवेषु कम्पताम्।

पितर सूत्र दो :- स्थिरं सुखम् आसनम्- सूर्योदय से प्रति साड़े सत्तावन मिनट बाद सुषम्ण स्वर अवस्था में कमर, पीठ, गर्दन, सीधी रख सांस प्रश्वास पर प्राणः प्राणः मन्त्र ने साथ चिन्तन करने से व्यक्तिगत क्षमता तथा शान्ति में २० से १० प्रतिशत वृद्धि होती है।

पितर सूत्र तीन :- यम-आलोक- अहिंस्य व्यवहार, यथावत जानना, आचरना, धन-द्रव्य-अधिकार न्यायपूर्वक ही लेना, ज्ञान आचरण तथा अनावश्यक सुविधाओं का सहज त्याग पांच यम हैं। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरगुण अनुरूप साधना नियम हैं। स्थिरता, प्राणयाम, प्रत्याहार ये तीन यमाः हैं। धारणा, ध्यान, समाधि नियमाः हैं। सध गए तीन नियमाः संयम है। यह यम-आलोक सतत क्षमता गति है। विहंगम गति है।

पितर सूत्र चार :- पितर व्यक्त चरैवेति- समय की एक शब्द में परिभाषा है व्यक्त। जो व्यक्त नहीं है वह भूत है। आदि में अव्यक्त, मध्य में व्यक्त, अन्त में पुन अव्यक्त मानव जीवन है। व्यक्त मानव के हाथ में है। अवसर दौड़ता चलता है और ढीले कपडे नहीं पहनता है। उसे निकल जाने पर कोई नहीं पकड़ सकता है। वह पीछे से गंजा है। दोनों ‘कल’ काल राक्षस हैं जो उजला आज खातें हैं।

       चरैवेति महामन्त्र है जो व्यक्त में ही सार्थक है। व्यक्त चरैवेति ! सोया कलयुग है, करवट बदलता द्वापर है, उठकर खड़ा त्रेता है, और चलता कृतयुग है। कृतयुग अक्षम नहीं होता। समय से तेज चलता है जो, वह क्षमता से क्षमता, सफलता से सफलता के सफर तय करता है।

       योग चित्तवृत्ति निरोध का नाम है। यह सतत गति का नाम है। यह सतत गति का नाम है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा सब ‘भू-भ’ हैं। भू-भ (भूत-भविष्यत्) निरोध योग है। प्रमाण में प्रत्यक्ष तत्काल भूत है। अनुमान दीर्घ भू-भ है। शब्द भी भू-भ है। विपर्यय अतद्रूप- मिथ्या ज्ञान भी भूत है। दूध की ठोस पदार्थरूप मान्यता आधार पर दूध में दूध ढूंढना विपर्यय है। विकल्प हवाई भविष्य का नाम है। निद्रा शून्य का अवलम्बन है। अभाव में लीनता प्रत्यक्ष नहीं है। भूत को वर्तमान करने का निरर्थ प्रयास स्मृति है (अनुभूत-विषय-असम्प्रमोषः)।

       अ-तद्-रूप नहीं है- यथावत ज्ञान अनुसार जो उसका आचरण तथा भविष्य का वर्तमान करने का निरर्थ प्रयास का उदाहरण है- न सूत न कपास और आपस में लट्ठम्-लट्ठा।

       पितर व्यक्त चरैवेति के महामन्त्र का सारभूत अपने जीवन में मैंने जीने का प्रयास करते क्षमता से क्षमता-उच्च का सफर तय किया है।

पितर सूत्र पंाच :- पितर धेनु ब्रह्म-

धीति वा ये अनयन् वाचो अग्रे मनसा वा ये ऽ वदन्नृतानि। तृतीयेन ब्रह्मणा वावृधानास्तुरीयेणामन्वत नाम धेनोः। स वेद पुत्रः पितरं स मातरं स सुनूर्भुवत स भुवत् पुनर्मघ स द्यामौर्णोदन्तरिक्षं स्वः स इदं विश्वमभवत्।। (अथर्व. ७/११-१२) वे तो बुद्धि से ब्रह्म धेनु दुहते वाक के अग्र को ले गए, वे तो मन से ब्रह्म धेनु दुहते ऋत अधिपति हो गए, तृतीय चित्त से ब्रह्म धेनु दुहते प्रचेतना प्रचेतित वे बिना रुके सतत गति तुरीय से तुरीयातित धेनु नाम ब्रह्म- अक्षर ब्रह्म तक जा पहुंचे।           यह वेद पुत्र (ऋग्वेद वाणी अग्र पर, यजुर्वेद मन में, सामवेद प्राणों में, अर्थव. इन्द्रियों में) पिता-माता धेनु ब्रह्म को जानता ताजग शिशु हो गया। वह दुग्ध ऐश्वर्य, दुग्ध-क्रीम हो गया। वह द्यौ, अंतरिक्ष, लोकान्तर, आनन्दस्वरूप, सर्वस्व धेनु-ब्रह्म अहसासित हो गया।

उससे सज्जित शोभित हैं।

द्यौ अंतरिक्ष लोकांतर व आनंद

मुझ ब्रह्म-शिशु की पौशाकें।

ब्रह्म धेनु है सर्वस्व

वत्स यह मैं उसका

अनथक ज्ञान पान करता

अनथक ज्ञान साक्षात जीता।।

       इस पितर सूत्र पर आरोप लगाया जा सकता है कि आदर्शवादी है। नियम है कि आदर्श को व्यवहार से गंदला नहीं करना        चाहिए, अपितु व्यवहार को आदर्श से उजाला करना चाहिए। भूखे व्यक्ति को ऐसे ही मूंह चलाते कल्पना में सूखी रोटी नहीं खानी चाहिए।

       बुद्धि, मन, चित्त भौतिक-धेनु ब्रह्म-धेनु संयुक्त हो। ऋतानि वह ज्ञान है जो प्रकृति नियमों के अनुकूल है। अऋतानि वह ज्ञान है जो प्रकृति नियमों के प्रतिकूल है। मानव प्रकृति संयुक्त है। प्रकृति अनुकूल चलने में, नियमबद्ध होने में उसे स्व-संतोष प्राप्त होता है। आल्हाद चिन्ह है प्रगति का। उत्, उत्तर, उत्तम प्रकृति पताकाओं द्वारा प्रगति धेनु ब्रह्म की ओर अक्षमता हनन का वह पथ है जो आत्म संतोष की थपकियों से भरा-पूरा है। यह आत्म साधुवाद साक्षात है।

पितर सूत्र छै :- पितर स्वरूप- अभि तिष्ठ पृतन्यतः

       द्यौ तेरी रीढ़ है, धरा तेरा सह स्थान है, अन्तरिक्ष तेरी आत्मा है, समुद्र योनि है, प्रसिद्धिकृत आधारों को देखकर तू संघर्षशीलों- विपरीतों के सम्मुख डट जा। (यजुर्वेद ११/२०) योनि का अर्थ है निमित्त। अंतरिक्ष व्यापकता का नाम है।

       पितर का स्वरूप व्यापक है। ब्रह्माण्ड उपमेय है। यथापूर्व ज्ञानों से परिपूर्ण दृष्टि उसके भविष्य हेतु वर्तमान कार्य निर्णयों का आधार है। विपरीतों पर भी चिन्तन कर उनसे संघर्ष ही इसकी विजय कहानी लिख सकते हैं।

       सुख-दुःख गढ़े हैं तुझमें ही। खं है ब्रह्माण्ड, खं है इन्द्रियों का जगत जो ब्रह्माण्ड अनुभूत कराता है। सुखम् है ओऽम् खं ब्रह्म। इन्द्रियों को उदात्तता से परिपूर्ण कर लेना सुखम् है। इन्द्रियों को सुआहारित करना है सुखम्। सत-रज-तम आहार है। आरोहण करो इस सुखम् इन्द्रिय घोड़े युक्त रथम् का। स्वः रूप का अर्थ है आनन्द रूप। खम् के अनुशासन से उत्तरोत्तर आनन्द उभरता है। ऐसा व्यक्ति स्वयमेव कहता है- वाह रे इन्द्रिय तुझसे ग्रहण सुखद है, तुझसे त्याग सुखद है, तुझसे मैं सुखद हूं, शाबास रे यह मैं।

पितर सूत्र सात :- पितर न मम- दो अक्षर सामाजिक मृत्य देते हैं और तीन अक्षर सामाजिक अमृत देते हैं। ‘मेरा’ सामाजिक मृत्य है, ‘‘न-मेरा’’ सामाजिक अमृत है। डॉ.मैक्सनिफ का दहलीज प्राकल्पना सिद्धान्त याद रखो। सामान्य रोटी कपडा मकान से अधिक संचय व्यक्ति को दुःखी कर देता है। दहलीज पर न मम हो जाओ वरना मम के मृत्यु से मृत्यु पथ भटकने लगोगे।

       त्रि ऋण पटाओ। यज्ञ सर्वोत्तम न-मम है। यज्ञित औषधियों धूम (घृत+जल+औषधियों का सूक्ष्म रूप) तुम्हारे समेत सर्वहितकारी है। यदि सिगरेट का धुंआ कैंसर पैदा करता है, तथा यह तथ्य है तो यह भी तथ्य है कि हवन का धूम प्रतिकैसर या सर्वाधिक स्वास्थ पैदा करता है।

       पितर न मम का सर्वोत्तम रूप ज्ञान वितरण है। इसमें कोई कंजूसी न बरतें, कोई पेटंट भी न मानें। ज्ञान का उन्मुक्त निःशुल्क वितरण करना ‘पितर’ की मूल भावना है।

       पिछले तीस वर्षों से मैं निर्धन बस्तियों बच्चों को खेल, भजन सिखाना, धर्म-कथा सुनाना, खिलौने बांटनादि कार्य कर रहा हूं। मेरे करीब सौ से भी अधिक केन्द्र हैं। आज वे ही बच्चे बड़े होकर दुकानदारादि हो गए हैं परिणामतः मुझे सब्जियां आनाजादि सटीक माप सटीक गुणवत्ता स्वतः ही मिलते हैं। हजारों लोगों का सद्-व्यवहार, पहचान-व्यवहार दूसरी सुखद उपलब्धि है।

       आप शिक्षित हैं घर से बढ़कर समाजकार्य करिए। धरती पर अपनी जगह का भार उतारिए।

पितर सूत्र आठ :- पितर काया-कल्प, पितर स्व-नवीनीकरण- यदि दुनियां को नया देखना चाहते हो तो खुद का नवीनीकरण कर लो। दुनिया धीमी बदलती है, व्यक्ति तेज बदलता है।

       मेरे मुख में वाक् (त्रि संपृक्त) है। मेरी नस-नाड़ियों में प्राण = प्र+आम प्रकृष्ट गति (दस) है। मेरी आंखों में दृष्टि शक्ति है। मेरे कानों में श्रुति है। मेरे केश अश्वेत हैं (युवा हैं अनुभव पक्व हैं) मेरे दांत अविकृत धवल रंग मोती हैं। मेरी बाहों में बल है। उरुओं में ओज है। जघाओं (कदमों) मे वेग है। पैरों में दृढ़ता है। मेरे सारे अंग आरिष्टानि हैं। अनष्ट हैं, सम्पूर्ण स्वस्थ हैं। मेरा आत्मा अ-नि-भृष्ट = अतिपतन न न है, वह अति उन्नत- उत्कृष्ट है, अच्युत है। (अथर्ववेद १९/६०/१२)

       शत शारद है मानव। मानव को स्मरण रखना है कि उसे शतवर्ष तक तथा उससे भी अधिक अदीन रहना है। नव्य-नव्य नाम है मानव का। नव्य-नव्य वह है जो नित नया-नया भरता है स्वयं में और नित नवीनीकृत होता है। लकीर के फकीरों नें नया कदम बढ़ाया नया सूर्य गढ़ लिया। लकीर का फकीर होने से पहले ही नया कदम बढ़ाओ, नया सूर्य गढ़ लो।

       मेरा एक मित्र है, उससे पूछो सुना यार क्या हाल है ? उत्तर देता है- क्या साली जिन्दगी है, उठो आफिस जाओ, वापस आओ, समान लाओ, टी.वी. देखो, खाओ, सो जाओ। में हंसते कह देता हूं- अरे यार.. जिन्दगी तेरी बीबी की बहन ही तो है, और साली बड़ी प्यारी चीज होती है। पर वह हंस नहीं पाता है। जिन्दगी की लकीर फकीरी, घर की लकीर फकीरी, नौकरी की लकीर फकीरी से बचो। नये कदम उठाओ। आंख, कान, नाक, मुंह, सृष्टि है, ब्रह्माण्ड है। इन्हें पूरा खोलो तो.. दुनिया में, साहित्य में, धर्म में, विज्ञान में आल्हाद भरा है। सम्यक्-भूषण-भूत होने की कोई सीमा नहीं है। संस्कार करो स्वयं का, परिवार सदस्यों का। साहित्य, धर्म, घर आने दो। घर को साहित्य धर्म तक जाने दो। जिन्दगी अत्यंत नजदीकी सबन्ध वाली (साली) हंसती गाती हो जाएगी।

पितर सूत्र नौ :- पितर अयोध्या- अजेय अयोध्या के मालिक हो तुम। आठ चक्र- (१) ब्रह्म, (२) आज्ञा, (३) ललना, (४) विशुद्धि, (५) अनाहत, (६) मणिपूरक, (७) स्वाधिष्ठान, (८) मूलाधार; नौ द्वार- दो नेत्र, दो नासिका रंध्र, दो कान, दो निष्कासन, एक मुख। इन सत्रह युक्त अजेय देवों की पांच हिरण्यकोशमयी (अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनंद), ज्योति आच्छन्न यह आनन्द गमनपुरी अयोध्या सदा तुम्हारे साथ है। मालिक हो तुम इसके। क्या दिव्य वस्त्र हैं तुम्हारे। और तुम्हारा इतिहास- वेद, आरण्यक, ब्राह्मण, उपनिषद, दर्शन, गीता, पुराण, बाईबल, कुरान आदि तक फैला तुम्हारा सफर साधन है। जीवन कितना भरा-पूरा है तुम्हारा। यह आकार-प्रकार है तुम्हारा। विशाल चैतन्य वट-वृक्ष हो तुम ऊर्ध्व-वृक्ष। मूल ऊर्ध्व वृक्ष तुम पर आनंद पक्षियों को ही चहचहाना है।

       अयोध्या बंगला चौबीस घण्टे साथ रहता है। आफिस आठ घण्टे घर-बंगला दस बारह घण्टे साथ रहते हैं। अयोध्या बंगला प्रथम है, घर बंगला द्वितीय, आफिस बंगला तृतीय। यह प्राथमिकताएं समझने का प्रश्न है। अंधी दौड़ में लोग अयोध्या बंगले को आफिस बंगले, घर बंगले बनाने की चिंता में बरबाद कर लेते हैं और अयोध्या बंगले की सोन-चिरैया (आत्मा) कराहती है। पितर अयोध्या बंगला समझ का नाम है।

पितर सूत्र दस :- पितर स्वः, स्वाहा- स्वः का स्वरूप स्वाहा होने के पश्चात समझ में आता है। स्वः नाम है सर्वोच्च आनंद का। व्यवहार क्षेत्र में कई स्वः है। आदर्श क्षेत्र में स्वः मात्र एक है। व्यवहार क्षेत्र में भी आदर्श का सिद्धान्त नष्ट नहीं होता है। यहां भी यथार्थ स्वः एक एकांक है बाकी उसके प्रारूप हैं। आम आदम के लिए समस्त शोरांको (डेसिबलों) में कोई एक डेसिबल युक्त एक विशिष्ट स्वर मानव मस्तिष्क श्रवण भाग को सर्वाधिक उर्वर करता है। यह दस से बीस डेसिबल के मध्य कहीं है। यही स्थिति गंधांक, स्वादांक, स्पर्शांक, प्रकाशांक की भी है। इनमें स्व का स्वाहा होता है। तब कान का कान, आंख की आंख आदि का अहसास होता है। तब ‘‘प्रत्यक्ष प्रमाण’’ की प्रत्यक्षता होती है, अन्यथा आदमी भ्रमों में रहता है।

       एक विश्व कम्पनी का एजेंट सारा संसार घूमा हुआ था। उसने सारे देशों की शराबें पी थी और वह शराब दक्ष हो गया था। सारी शराबों के स्वाद उसकी जबान की नोंक पर थे। एक बार उसने एक बड़ी पार्टी में दावा किया कि मैं हर शराब का स्वाद आंख बंद कर चख कर बता सकता हूं। पार्टी मालिक ने दावा मंजूर कर लिया। शराब दक्ष न आंख बंद की। उसे शराबें चखाईं गईं। उसने कहा- अमेरिकन ब्लैक एंड व्हाईट, दूसरी बोतल- रशियन वोडका, तीसरी बोतल- फ्रांसीसी वाट ९९, चौथी- जर्मन स्काच २००१, पांचवी- भारतीय फेनी, छटवी- कीनियन किंडी, सातवी- आफ्रिकन कोनयागी आदि आदि। वह शराबदक्ष स्वाद चख सतत नाम बताता गया। महफिल में मैं भी था जिसने जीवन में एक ही शराब पी थी। मैंने कहा- भाई शराबदक्ष मेरी शराब का भी नाम बता दो और मैने गिलास उसके सामने कर दिया। उसने शराब चखी, संसार की सवसे कड़वी शराब जैसा मुंह बनाया और कहा- यह शराब मैंने जीवन में कभी नहीं चखी, पर मैं बता सकता हूं की यह शराब दुनिया में चलेगी नहीं, चल सकती ही नहीं। यथार्थतः उस गिलास में जीवन को जिसकी लालसा रहती है वह जल था।

       स्वः जल है जिसकी जीवन को लालसा रहती है, जो जीवन तृप्त करता है। यह लालसा स्वाभाविकतः, सहजतः होती है। स्वः ज्ञान है, आनंद है, इन्हें बांटना स्वाहा होना है। इसमें स्वः भरपूर है। क्षमतावृद्धि सूत्र है स्वः – स्वाहा।

       ‘‘स्वः स्वाहा’’ का सरल अर्थ है- हर कार्य में अन्त्य लक्ष्य को स्पष्ट परिभाषित कर उसके अनुरूप कार्य पथ पर चलना। पितर यह व्यक्ति है जिसने आदर्श जीवन में सिद्ध कर लिए हैं तथा उन्हे वह उन्मुक्त वितरित करता है। संन्यास अवस्था स्वः स्वाहा है।

       धन से बड़ा होकर, ज्ञान से बड़ा होकर पितर हो जाना पहली आवश्यकता है स्वः स्वाहा की।

पितर सूत्र ग्यारह :- पितर न्याय- प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव (वैज्ञानिक विधि), तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निगहस्थान (अभिनति त्र ठपें) इन सोलह के ज्ञान तथा उसके अनुसार आचरण से मिथ्या ज्ञान या अज्ञान का नाश होता है इससे दोष अर्थात् राग, द्वेष, मोह नष्ट होते हैं, इससे प्रवृत्ति नष्ट होती है इससे दुःख का अभाव होता है, दुःख अभाव से अदृष्ट का अभाव होता है, उससे अपवर्ग सर्वोच्चावस्था क्षेत्र प्राप्त होता है।

       एक नया पैसा ज्ञान प्राप्त करना तथा एक नया पैसा ज्ञान जीना घटिया स्थिती है शतप्रतिशत ज्ञान पाने से और शून्य ज्ञान जीने से। ज्ञान पाने का प्रयास पवित्र कर्म है तथा शत-प्रतिशत ज्ञान प्राप्त में शत-प्रतिशत ज्ञान जीने की संभावनाएं हैं पर एक प्रतिशत ज्ञान प्राप्त एक प्रतिशत जीने वाला संभावना शून्य है। सौ मील योजनायुक्त आदमी हर स्थिती निन्यानबे मील योजना रहित एक मील चले आदमी से बेहतर होता है। एक मील चला आदमी लक्ष्य से एक सौ एक मील दूर भी हो सकता है।

       पितर न्याय सटीक होने का नाम है। यथार्थ ज्ञान का साधन प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम) तथा अवयय (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन त्र भ्लचवजीमेपेए व्इेमतअंजपवदए क्ंजं बवससमबजपवदए म्गंउचसमए ब्सेंपपिबंजपवद ंदक ैवसनजपवद) वैज्ञानिक विधि है। जिस वस्तु को जानना है वह प्रमेय है (मानव अस्तित्व स्वरूप तथा सह सम्बन्ध), प्रमेय का ज्ञान प्रमिति है। जाननेवाला प्रमाता है। प्रमाता तभी जान सकता है जब तटस्थ है। नीची भूमि धारण कर लेने का नाम निग्रह है।

       सरल उदाहरण- बस में सफर करते समय बस कंडक्टर ने आठ आने वापस नहीं किए। मैंने वे वापस मांगे। मेरे दोस्त ने नहीं मांगे। मैंने कहा वह तुम्हारा हक था, उसने कहा – प्रधानमंत्री करोड़ो खा गया यह बेचारा तो आठ आने खा रहा है। साधर्म पा विधर्म में सीमित हो सोचने का ‘जाति’ तटस्थता-हत्या कहतें हैं। निग्रह-स्थान छब्बीस और जाति-चौबीस इस प्रकार कुल पचास मानसिक पतन अवस्थाओं आदि से बचने के ‘‘पितर न्याय’’ का पालन उद्योग-युग में उत्पादकता वृद्धि के लिए, गुणवत्ता के लिए तथा सटीकता के लिए एक आवश्यकता है। पितर न्याय के बिना उद्योग में हर पद सोपान व्यक्ति भटकता ही रहेगा।

       ‘वाद’ वह है जो तटस्थता की उपज है। पक्ष या प्रतिपक्ष का वह अंगीकार जिसमें प्रमाणों से और तर्क से सिद्ध करना या प्रतिषेध हो, जो सिद्धांत कसौटी के अनुरूप हो तथा पांचो अवयवों से युक्त हो वाद कहलाता है।

       उद्योगों में ‘‘चार सिद्धांत’’ कार्य करते हैं।

१. सर्वतन्त्र- जो सारे उद्योगों में लागू हो- गुणवत्ता, सुरक्षा, प्रबन्धन, संविधान, कारखाना अधिनियम आदि।

२. प्रतितंत्र सिद्धांत- जो विशिष्ट उद्योगों में विशिष्ट हो जैसे इस्पात या सीमेंट या पाइप या स्टेनलेस स्टील आदि।

३. अधिकरण- जिसकी सिद्धि दूसरे पर आश्रित हो। जैसे लोहे से इस्पात, स्लैग से सीमेंट, कपास पर वस्त्र, आदि।

४. अभ्युपगम- अर्थात कापी-राइट व्यवस्था। दूसरे की बात मानकर उस पर विचार करना।

       कारण के संभव से (बीजाधारित) तथ्य जानने की युक्ति को तर्क कहते हैं।

       प्रमाण, तर्क, सिद्धांत, अवयव आधारित जाति एवं निग्रह रहित न्याय है।

       पहली चीज प्रवृत्ति, दूसरी चीज दोष, तीसरी चीज फल, चौथी चीज दुःख है। पितर न्याय दुःख से आरम्भ में ही बचाता है। यही शेक्सपीयर के पहली चीज आकर्षित होना है, दूसरी चीज गिरना है। पितर सूत्र १२ :- पितर धारणा- चित्त का विषय-विशेष में बांधना है धारणा। यह विषय-विशेष उदात्त होना चाहिए। मैंने एक जंगल देखा, उस जंगल में हजारों सिर, हजारों नेत्रों, हजारों पैरों, हजारों हाथों वाला एक पुरुष था। वह पुरुष हजारों पैरों दौड़ता था। हजारों नेत्रों चीजो को देखता था, उन्हें लेने लपकता था। इत्-उत्-तित् भटकता था। दौड़ भटकन, लपकन में वह पुरुष लहु-लहान हो गया था। घबरा कर पुरुष कुंए मे कूद गया जहां कीड़े-मकौडे-बिच्छु-झींगुरादि उस पर चिपकने लगे। वह पुरुष वहां से निकल कदलीवन में आया जहां मैंने उसे देखा-पहचाना। फिर उसके हजारों हाथ गल गए, हजारों पैर गल गए, हजारों आंखें गल गईं, हजारों सिर गल गए। वह शान्त हो गया।

       असंख्य त्रि-दौड़ों से भरी है यह दुनिया। त्रि-एषणाओ की असंख्य अंधी दौड़ें। ये पद दौड़ें, ये मोह दौड़ें, ये पैसा दौड़ें। सारा आदमी लहु-लुहान हुआ जा रहा है। संसार वह जंगल है, मन वह राक्षस है हजार पैरोंवाला, हजार आंखोंवाला। एषणाएं वे चीजें हैं, बाधाएं-कण्टक हैं। नौकरी तथा गहस्थी वह कुंआ है, इसके सम्बन्ध बिच्छु-कीड़े-मकोड़े हैं तथा कदलीवन है- ज्ञान-समुन्द्र में वह विवेक है धारणा जिससे हजारों हजार गल जाते हैं।

       पद दौड़ बडी ही विचित्र है। एक पद दौड़ में सफल व्यक्ति का सिध्दान्त है कि वरिष्ठ की बात का समर्थन करो। यदि क ख ग घ ङ च छ ज पद व्यवस्था है तो उनका नियम यह है (वे ‘घ’ पद पर हैं) कि क ख हों तो ‘क’ का समर्थन, ख ग हो तो ‘ख’ का समर्थन, ग घ हों तो खुद का, ङ च हो तो ‘ङ’ का आदि। वास्तव मे वह व्यक्ति एक लिजलिजा-पिघला-ठंडा खबर है, तथा टुकड़ा टुकड़ा है, पर पद व्यवस्था में बड़ा सफल है। पदेषणा ने उसे ऐसा कर दिया है। यह व्यक्ति रिटायर हुआ। उसने वही व्यवहार कायम रखा। उसका नाम लतखोर हो गया। पहले वह लतखोर तथा प्रमोशन खोर तथा प्रमोशन खोर था। अब मात्र लतखोर रह गया। धारणा सिद्धि आदमी की रीढ़ है तथा सत्य निर्णय में उसकी सहायक है। धारणा युक्त सत्यधारी व्यक्ति को लात मारने वाले की लात टूट जाती है।

       एक उदाहरण मेरे जीवन का- मैंने नियमपूर्वक विदेश नोकरी हेतु फार्म भरकर भेजा। आफिस में प्रबंधक (कार्मिक) ने उसे बिना हस्ताक्षर अग्रेषित कर दिया। मेरा चयन हो गया। कार्मिक विभाग ने अस्वीकार कर दिया। में विभाग प्रमुख (कार्मिक) से मिला। उन्होनें मुझे सुना, कहा- तुम तो सनम्र अनुरोध भाषा भी नहीं बोलते हो। मैंने दृढ़ स्वर कहा- ‘‘भीख कभी ब्रह्म से भी न मांगी। तुम तो हो बौने से आदमी।’’

       मेरा विदेश जाना नियमबद्ध हक के अंतर्गत है। वह पदेषणा आवेग में क्रोधित हुआ। उसने लिखा पत्र पर त्रिलोकी नाथ क्षत्रिय को एक कदम भारत में एक कदम तनजानिया में रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती पद व्यवस्था लिजलिजी ने उसका समर्थन किया।

       धारणाधरित सत्य नियम अन्तर्गत मैंने संघर्ष किया। पहले मन्त्रालय फिर सेल मुख्य कार्यालय ने मेरा सख्त समर्थन किया। उसी विभाग-प्रमुख (कार्मिक) ने मुझे दो कदम भारत सिर तनजानियां में रखने की लिखित अनुमति दी। धारणा-सत्य वह मजबूत ढाल है जिस पर लात मारने वाले भी लात टूट जाती है।

पितर सूत्र तेरह :- पितर ‘‘तदेजति-तन्नैजति’’ अकंपनीय है स्वयं कम्पनों का जन्मदाता। अनृतन करता नृतनों से आल्हादित। तदेजति-तनैजति का स्थूल रूप है कठपुतलियां नियामक।

       उसने शाश्वत बीजों के आधार पर चर्चा पश्चात नियम रचे। स्व-जीवन पर तथा अपने मातहतों पर लागू किए। और फिर वह निश्चिन्त हो गया। यही पितर अनृतनशील नृतन है। देवता का काव्य पूरा नृतनशील है। नियमबध्द नृतनशील है। अनुशासनबद्ध है। मानव काव्य भी नियमबद्ध शाश्वत अनुशासनबद्ध हो जाए तो सारे जीवन अनुशासन के लेफ्ट-राइट पर चलते सा रे ग म प ध नी हो जाए, एक शास्त्रीय राग आल्हाद हो जाए।

       पितर यम, नियम, संयम लोक में कर्मचारी अधिकारी तदेजति-तन्नैजति होकर नियन्ता होते हैं और नियंता हर स्थिति अक्षमता के स्तर से ऊंचा ही कार्य करता है। तकनीक मानव का सम्बन्ध अद्भुत है हर तकनीक है मानव के लिए और मानव है शाश्वत ब्रह्म के लिए।

पितर सिध्दान्त चौदह :- पितर अयमात्मा ब्रह्म- ब्रह्म में है हर आत्मा। इसका अहसास नहीं है हर किसी को। ब्रह्म में अर्थात निकटतम ब्रह्म के। ओ निकटतम ब्रह्म के ! ब्रह्म गुणों की अन्तहीन कतार पे होता जा सवार। कोई अव्यवस्था तेरी सवारी न कर सकेगी। तू कभी अक्षमता के स्तर न जिएगा।           पढना – परीक्षा क्या है ? परीक्षा मे सफलता क्या है ‘‘अयमात्मा ब्रहम ‘‘ की सिध्दि की साधना के विभाग परिमाप है । पढना है पुस्तक मे सर्वव्यापक होना और परीक्षा है इस सविव्याापकता की जांच ! सर्वव्यापकता की जांच ! सर्वव्यापकता के गुण का अन्य माप हैं परमात्मा जो हर परीक्षा में शतप्रतिशत अंको का सहत हकदार हैं। जो उस सीमा त ही मिलेग उसे अंक।

       वह परियोजना प्रबंधक सर्वादीक अकल होगा जा हैं परियोजना में सर्वण्यापन। सर्वण्यापक का अर्थ हैं सिद्धांत एवं कार्यात्मक दानो ही रूपो में। यह हें अन्य लक्ष्य। इस लक्ष्य की ओर हे मानव सतत गतित रही कार्य की वानी सीमाए टूटती चली जाएगा स्तर क्षमता वृद्धि की ओर बढता चला जायेगा।

       परमात्मा के गुण परमात्मा है अनंत अवतार। महापुरूाो को देखो वे सारे हैं अशावतार। अशावतार हुए इतने सक्षम तुम हा सकत और अधिक सक्षम। राम थे द्वापषी उर्च द्वादष अवताए। कृष्ण थे भाोडसी या भाोडस अवतार। प्रत्यक आत्या अंश व्यत्क ब्रहम हैं। अंश विकास आत्मा का सबसे बडा हक है। तु राम, कृष्ण, ईसा, हजरत अंश व्यक्त ब्रहम का सरल अर्थ हैं अंश अव्यता ब्रहम व्यता की डोर से अण्यता में गति जीवन लक्ष्य हैं तुम्हारा।

       एक राजा का जेल हो गई। ऊंचो दीवारों उसे कैद कर दिया गया। उसने अपने मंत्री से बात करने की अनुमति मांगी। उसका मन्त्री जो विदेशी राजा के अधीन मजबूरन कार्य में रख लिया गया था, उससे सलाह करने आया। उसने उसे ‘‘डोर से डोर’’ सिद्धांत समझाया। एक रात राजा भाग निकला और आजाद हो गया।

       डोर से डोर सिद्धांत हैं क्षमता-वृद्धि सिद्धांत। आजाद होने का सिद्धांत। अयमात्मा ब्रहम होने का सिद्धांत। राजा ने अपने लम्बे केशव को जोड जोड के एक धागा बनाया जेल की अंदर की दीवार पर नियत स्थान पर एक चींटे के पेर से बांध दिया बाहर मंत्री तक वह बाल धागा पहुंचा उससे मोटा धागा उससे रस्सी राजा ने अंदर खीची और राजा जेल से बाहर हो गया। डोर से डोर सिद्धांत याद रखो। अंश व्यक्त ब्रहम से अव्यक्त ब्रहम तक का सफराुद होता हैं असमात्मा ब्रहम से अक्षमताए तुम्हे रोक न सकेंगी।

       पितर सूत्र पन्द्रह :- पितर दृग्योनय :- दृग् योनियां पांच हैं पर इनकी संख्या आठ है। इनका नाम ज्ञान योनियां है। नेत्र, श्रोत्र, घ्राण, रसना एवं त्वचा। ये पांच ज्ञान के साधन हैं इन साधनों के सटीक होने से कर्म भी सटीक होते हैं। इनके ठीक करने की साधनाएं हैं। नेत्र ठीक रखने, करने की (अ) बाह्य दृष्टि, (ब) अन्तर्दृष्य, श्रोत्र ठीक रखने के लिए अन्तर्मौन, घ्राण के लिए अन्तर्गन्ध, रसना के लिए अन्तर्रस, त्वचा के लिए अन्तर्स्पर्श। पितर के ये दृग् साधन स्वस्थ होते हैं। पूरी दुनिया आदमी इन संसाधनो के अपूर्ण होने पर पहचान नहीं पाता।

       कु.श्री सप्रे मैं मिलने गया। श्री सप्रे एक अत्याधुनिक लड़की है खुले उन्मुक्त ख्यालों की। उससे कुछ चर्चा हुई। मैंने कहा- ओह श्री तुम कितनी स्ट्रांग हो कि इतनी स्ट्रांग काफी पी लेती हो, फिर भी सहज रहती हो। मुझे तो इतनी स्ट्रांग काफी पीने से चक्कर आ जाता है। श्री मुस्कुराते बोली- नहीं भैया आप गलत कह रहे हो, आप स्ट्रांग हो कि आपको थोडी सी तेज काफी पीने से चक्कर आ जाता है। तुम ठीक कहती हो- मैं उसकी बात का आधार पकड़ते बोला।

       संवेदन सूक्ष्म होते हैं, सूक्ष्मतर होते हैं, सूक्ष्मतम होते हैं। इसी प्रकार इनकी स्थूल, स्थूलतर तथा स्थूलतम श्रेणियां भी हैं। सूक्ष्मतम संवेदन सर्वाधिक शक्तिशाली होते हैं। ध्यान रखो तुम दृग्योनि क्षेत्र में स्थूल की ओर तो गति नहीं कर रहे। सावधान तुम अक्षमता स्तर ही की ओर बढ़ रहे हो।

       गलत या अंशमात्र दर्शन के आधार पर लिए कर्म निर्णय, अंशदर्शन के आधार पर किए कार्य हमेशा अंश पूर्ण ही होंगे। अपने क्षमता स्तर की सीमा सटीक रखो। यदि किसी कारणवश वह सटीक नहीं हैं तो उसके आधार (कर्म) पर ही निर्णय लेना उपयुक्त होगा। हर मानव हर स्पर्श का अहसास नहीं कर सकता। हर मानव हर दृष्य का अहसास नहीं कर सकता। हर गंध, हर स्वाद, हर शब्द हर मानव नहीं सुन सकता। इन पांचों की सूक्ष्मतम से स्थूलतम तक कई श्रेणियां हैं। फिर इस मिश्र-विमिश्र विभाग हैं। स्व क्षमता सटिक रखोगे तो कार्य सटीक होने की अधिक संभावना होगी।

       बाह्य दृग्योनि साधनों द्वारा क्षमता वृद्धि क्षमता क्षय सीमा का ध्यान रखने में आवश्यक है। बाह्य साधनानुभूति का सत्य अधिक आपेक्षिक है यह ध्यान रखना हैं।

       सटीकता अक्षमता की दुहरी दुश्मन है।

पितर सूत्र सोलह :- पितर त्रिविवेक- त्रिविवेक है प्राथमिकता निर्धारण। इसके दो रूप हैं, एक सामान्य दुसरा विशिष्ट। सामान्य का स्वरूप है त्रिगुण- सत, रज, तम या अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव। इन त्रि का विवेक प्राथमिकता निर्धारण में जो करता है वह पितर है। पितर एक मानसिकता है। मानसिकता की कोई उम्र नहीं होती। विशेष प्राथमिकताएं आपात प्राथमिकताएं हैं। प्राणरक्षा का प्रश्न हो तो तामस भोजन भी लिया जा सकता है यदि सत-रज उपलब्ध न हों।

       त्रिविवेक स्व, अन्य, अपर अन्य के सम्बन्धों के आधार पर भी लिया जा सकता है।

       त्रिविवेक भूत-भविष्यत्-वर्तमानकाल के आधार पर भी किया जा सकता है।

       सच्चिदानन्द, सच्चित्, सत् भी आधार हो सकते हैं त्रि विवेक के।

       अ ब स विश्लेषण भी त्रि विवेक है। पच्चीस पचहत्तर सिद्धान्त भी त्रि-विवेक के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।

       त्रि विवेक का एक परिष्कृत रूप दशरूपकम् भी है।

पितर सूत्र सत्रह :- पितर दशरूपकम्- जीवन लक्ष्य की ओर ले जाने वाले तथा कार्य संधियां अधिकारीक हैं। लम्बी दूरी तक समानांतर चलने वाले कार्य पताका हैं तथा कम दूरी तक समानांतर चलने वाले कार्य प्रकरी हैं। जीवन में दशरूपकं समझ आवश्यक है। अधिकारिक-प्रताका-प्रकरी विवेक त्रि-विवेक हैं।

       अधिकारिक में चार आयु विभाजन (आश्रम) हैं, चार कर्म विभाजन (वर्ण) हैं, सोलह संस्कार हैं, चार पुरुषार्थ हैं, ऋतुएं हैं, दिन-रात हैं, मुहूर्त-प्रहर-निमेष हैं। इन पर अधिकार रखना आवश्यक है। शतवर्ष ३६५०० दिन आदर्श नियत हैं अधिकारिक की लम्बाई के। संधियों में ७५ गुणा ५ गुणा ३६५ पंच यज्ञ संधियां हैं ब्रह्मचर्च, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की। इसी में सोलह संस्कार उम्र-संधिया हैं। चार आश्रम-कर्म ज्ञान, अर्थ, धर्म, मोक्ष-साधना संधियां हैं २५ गुणा ३६५ दिनों की अबोध की। प्रति दिवसीय संधियों में प्रतिवार सूर्य-स्वर, चन्द्र-स्वर परिवर्तन की संधियां हैं। सूर्य स्थिति परिवर्तन से ऋतु परिवर्तन की संधिया हैं। इन अधिकारिक संधियों को जीवन में साधना व्यवहारिक रूप में जीवन आनंद की एक आवश्यकता है।

       माता, पिता, भाई, बहिन, दोस्त, चाचा, चाची, दादा, दादी, मामा, मामी, नाना, नानी, बुआ, मासी, जीजा, भाभी, पति, पत्नी, बहू, दामाद, सास, ससुर, गुरु, शिष्य आदि आदि रिश्ते तथा तत् सम्बन्धी कर्म पताकाएं हैं जो जीवन में अधिकारिक से आरंभ होकर समानांतर चलती हैं। इनमें विभिन्न वर्ष दूरियां होती हैं। पति-पत्नी पताका अधिकतम उम्र पचास वर्ष निर्धारित है।

       नौकरी तथा नौकरी सम्बन्धी वितान तो मात्र प्रकरी है। पद व्यवस्था, स्थानांतर, संस्थान-परिवर्तन आदि आदि की प्रकरियों का इसमें अवधी समावेश है। ये सब प्रकरी संधियां हैं।

       मानव की अक्षमता के स्तर, मानसिक तनाव का कारण नोकरी की प्रकरी का अधिकारिक से अधिक महत्वपूर्ण हो जाना है।

       प्रकरी, पताका, अधिकारिक त्रि-विवेक आदमी को जीवन युजित कर देता है। ऐसा आदमी बड़ा आदमी होता है। आज जिन्दगी में छोटे से छोटे पद पर भी बड़े-बड़े आदमी मिलते हैं ओर बड़े-बड़े पदों पर छोटे-छोटे आदमी मिलते हैं।

       किशन सिंह लाल लोहा पीट हंसिया-चाकू बनाता है। चार फुट ऊंची, पांच फुट लम्बी, छें फुट चौड़ी झोपड़ी में रहता है। उसकी बस्ती में होता झगड़ा देख मैं रुक गया। वहीं किशन सिंह भी खड़ा है।

       क्यों भाई ये लडते क्यों हैं ?- मैंने उससे स्व-वार्तालाप स्वर में पूछा। जो झगड़े से छोटा रह जाता है वो झगड़ता है, इसलिए झगड़ते हैं- उसने भी स्व-वार्तालाप स्वर में कहा। मैं चौंका, मुझे लगा मैं अर्जुन कृष्ण से बात कर रहा हूं।

       तुम नहीं लडते कभी ? साहब मैं झगड़े से कभी छोटा नहीं हुआ- बडे आदमी ने कहा। कहा तक पढे हो ? ठेठ अंगूठा छाप हूं साहब- किशन सिंह बोला। तुम्हें यहां झोपड़ी में कोई तकलीफ तो नहीं है ?

       साहब तकलीफ है, यहां पुलिसवाले बीच-बीच में तलाशी लेते हैं- उसकी पत्नी ने कहा।

       उं हां..! किशन सिंह ने मक्खी उड़ाते कहा वो अपना काम करते हैं, उनका काम है संदेह करना। पर साहब उन्हें कभी कुछ न मिला, न मिलेगा।

       किशन सिंह बड़ा आदमी है। उसकी कुल जमा-पूंजी तथा जीवन चक्र सौ किलो लोहा है जिसे वह हंसिए, चाकू आदि में बदलता है, बेचता है, फिर लोहा लेता है और समझ सन्तुष्ट है।

       दुसरा चित्र मैं अधिशासी निदेशक से प्रगति रिपोर्ट दिल्ली भेजने की बात कर रहा हूं। रिपोर्ट आज ही फेक्स करनी है। मैं अधीक्षण अभियन्ता हूं।

       क्या कचरा रिपोर्ट बनाई है ?- उन्होने कहा। मेरे बनाने के बाद मुख्य अभियन्ता ने संशोधित की है, उनका उस पर दस्तखत है- मैंने कहा।

       पूरा कचरा है, दस्तखत भी कचरा है, ये नया तथ्य इसमें नहीं है- उन्होने अपनी डायरी देखते कहा कल शाम फोन आया था यह उपकरण भेजा जा चुका है।

       मुझे या मुख्य अभियन्ता को इसकी सूचना नहीं दी गई- मैंने कहा। ए.डी.ई. (सहायक क्षेत्रीय अभियन्ता) जैसे बात मत करो, रिपोर्ट कचरा है- वे चीखे।

       यही बात मैं आपके लिए कहूं तो ? मैंने कहा। और उन्होने सारी फाइलें, सारे कागज तमतमाते चेहरे से फेक दिए, चिल्लाए- चले जाओ यहां से, भाग जाओ यहां से।

मैंने चुपचाप फाइलें उठाईं उनके सामने ही उसे तरतीब में रखा, बांधा और आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कह बाहर चला आया।

       शाम सवा-चार बजे मेरे टेबल पर मेरा स्थानांतर पत्र रखा था, मैं हंस रहा था, और साढे चार बजे अधिशासी निदेशक के टेबल पर नए जोन में मेरी जॉइनिंग रिपोर्ट रखी थी।

       किशन सिंह की भाषा में अधिशासी निदेशक कचरा रिपोर्ट से घटिया कचरा होकर बात कर रहा था। मैं जानता हूं कि नौकरी प्रकरी है और प्रमोशन प्रकरी के प्रकरी।

पितर सूत्र अठारह :- पितर विवेकख्याति- सारा अक्षमता संकट अस्तित्व पहचान संकट से उत्पन्न हुआ है। जीवन को कार्यों में मानव के तीन रूप होते हैं एक जैसा वह स्वयं को समझता है, दूसरा जैसा उसे कोई दूसरा समजाता है, तीसरा जैसा वह स्वयं होता है। विशिष्ट कार्य करने की भूमिका में मानव को अपने उस खुद को सटीक न समझ पाने को अस्तित्व पहचान संकट कहते हैं जो स्वयं से सम्बन्धित है। कुछ न कुछ अस्तित्व पहचान संकट से हर कोई त्रस्त रहता है। असल में जैसा मानव है और जैसा वह स्वयं को समझता है इनमें अंतर स्व अस्तित्व पहचान संकट है। तथा जैसा मानव हैं तथा जैसा (उस भूमिका में) दूसरा उसे समजता है यह पर-अस्तित्व-पहचान-संकट है। ये दोनों संकट ही मानव के अक्षमता के स्तर पर कार्य करने के कारण हैं।

       भारतीय उद्योग शास्त्र की अवनत अवस्था का कारण ये अस्तित्व पहचान संकट ही हैं। इसमें जातिवाद प्रान्तवाद और बढ़ावा देते हैं। अस्तित्व पहचान संकट का एक और रूप जो उद्योगों में उभर कर सामने आ रहा है वह है पूर्ण पाश्चात्य प्रभावित मकाले शिक्षामशीन से गुजरा पाश्चात्य प्रत्यय प्रभावित अधिकारी वर्ग तथा भारतीय तुलसी, रामायण, नानक के माध्यम से वेद संस्कृति जुडा श्रमिक वर्ग। दोनों में संप्रेषण महा-भंग इस स्थिति की दुसरी समस्या है।

       उपरोक्त समस्या का निदान विवेक ख्याति है। समझे जानेवाले अस्तित्व से प्रतिबिंबित चित्त (फैली बुद्धि) का नाम अस्मिता है। यह अस्मिता क्लेश है। यह अस्मिता क्लेश ही राग, द्वेष, अभिनिवेश (मोहग्रस्तता) क्लेश है। इसकी जननी अविद्या- (अनित्य मे नित्य- स्थायी-अस्थायी अविवेक, अशुद्ध में शुद्ध, अनियमों में नियम, अमानकों में मानक, दुःख में सुख- खराब इन्द्रियों का अच्छी इन्द्रियां समझना, खैनी, नशा आदि द्वारा कार्य निष्पत्ति समझना अनात्मा में आत्मा है। विवेकख्याति अवस्था वास्तविक अस्तित्व से प्रतिबिंबित चित्त का नाम है। इससे अस्मिता क्लेश निवृत्ति तथा अविद्या क्लेश की परिवार सहित विनष्टि होती है।

       विवेकख्याति बडी ऊंची अवस्था है। भौतिक अवस्थाओं की भूमिका (जिसमें आदमी को अर्थ के कारण रहना है) का स्तर विवेकख्याति प्राप्त मानव खूब समजता है। विवेकख्याति पीटर अक्षमता के स्तर का उलट सिद्धान्त सूत्र है। पीटर कहता है कि हर पद के लिए कहीं न कहीं अक्षम व्यक्ति उपलब्ध है। पर विवेकख्याति प्राप्त व्यक्ति हर पद के लिए सक्षम व्यक्ति है।

पितर सूत्र उन्नीस :- पितर ओऽम्- ओऽम् वाक् है। वाक् के चार चरण हैं। अ ो ऽ म् । ये चरण परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी सम्पूर्णतः दर्शाते हैं। ओऽम् उच्चारण से चारों चरणों का स्पर्श होता है।  अ परा, ो पश्यन्ती, ऽ मध्यमा, म् वैखरी। विश्व में प्रचलित सारे परमात्मा के नाम चाहे भारतीय हों या अभारतीय पूरे वाक् को सुव्यवस्थित नहीं छूते हैं। अन्य सारे नाम वाक् अंश रूप में ओऽम् अंश हैं।

       इसके समानांतर आदमी का निज नाम है। आदमी का निज नाम एक सातत्य है, जो बिखरा-बिखरा है। आदमी औसतः यह बिखराव ही जीता है। तथा यह बिखराव ही जिन्दगी है। आदमी के निज नाम से हटे बिखराव के नाम हैं डाक्टर, इन्जीनियर, कैशियर, मजदूर, सुपरवाइजर, कम्पाउंडर, पिता, माता, बेटा, बहन, भाई, चाचा, चाची, मामा, मामी, दादा, दादी, आदि आदि तथा आदमी विभिन्न अंश निज से हटकर ही जीता है।

       एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ‘‘मेरे पति मेरी नजर में’’ कार्यक्रम रखा गया। सर्वाधिक उच्चाधिकारी की पत्नी ने अपने भाषण में एक स्थल कहा- जब शाम को चेयरमेन साहब घर आते हैं तो में समझती हूं उन्हें तनिक आराम तथा चाय की जरूरत होती है। मानो वह पत्नी न हुई, आफिस का चपरासी हुई। यह निज हटा बिखराव है। चेयरमेन साहब का बस्ता घर जाता है, सारा आफिस काफिला भी घर आता है। घर भी श्री ‘क’ का नहीं है, वह चेयरमेंन का है।

       तनिक सोचा जाए तो पता चलता है कि यह कितनी घटिया अवस्था है। भूमिका-भंग है यह सब। विशिष्ट अक्षमता रोग है। एक मजदूर इससे बेहतर स्थिति जीवन-यापन करता है।

       निजता आत्म-निकटता है। बाकी सब प्रतिबिंब है। प्रतिबिम्बों में फिट हो जाना खांचित रह जाना है जो नौकरी व्यवस्था की दयनीयता है। इसमें आदमी के निज को ऊपर-नीचे से ठोक कर खांचे मे फिट करने के सतत प्रयास किए जाते हैं। इसमें आदमी दुःआकारित विकृत हो जाता है।

       पद आदमी का एक टुकडा है जिसमे निज है। पति या पत्नी एक टुकडा है जिसमे निज है। सारे सम्बन्ध टुकडे हैं जिनमें निज है। यह निज पहचानना पितर हाकना है। पितर होने के बाद पितर ओऽम् सूत्रसिद्धि पर मानव निजता में ब्रह्मगुण भरता है तथा अक्षमता के स्तर से सदायी ऊंचा हो जाता है। क्षमता उसके कदम चूमती है।

पितर सूत्र बीस :- पितर नवीयो पदम् अक्रमुः – लकीर क्रम तोड़ नया कदम बढाओ, नया सूर्य गढ़ो। लकीर फकीरों ने जब-जब नया कदम बढ़ाया, नया सूर्य गढ़ा। स्वयं को नया करने के दो तरीके हैं (१) स्वयं नवीनीकृत होना। (२) नया कदम बढ़ाना प्रथम चरण अप्रयास भी होता है, सप्रयास भी होता है। अप्रयास नवीनीकृत होना भौतिकी संकल्पना है। सप्रयास नवीनीकृत होना भौतिकी तथा वैचारिकी प्रकल्पना है। आदमी की कोषिकाओं में परिवर्तन, उम्र में परिवर्तन भौतिकी नवीनीकरण है। मननात मंत्र नव विचार तथा विचार धारण अनुपालन भौतिकी तथा वैचारिकी संकल्पना है। मानव कोषिकाओं के परिवर्तन को औषधिजा या शुभम् द्वारा सुपरिवर्तित कर सकता है। जो यह परिवर्तन स्वयं नहीं करता चिकित्सक उसे यह परिवर्तन करने बाध्य कर देता है।

       नौकरी की दुनिया का एक अनवीनीकरण उदाहरण- मैं भिलाई इस्पात संयन्त्र अस्पताल में पैदा हुआ। बिस्तर कारखाने में उत्पन्न लोहे का था। घर में जिस पालने झूला झूला वह भी कारखाने के लोहे का था। कारखाने के लोहे से बने रेठे के सहारे मैं डुगुर-डुगुर चला। कारखाने के फार्मों में उगी सब्जियां अनाज ने मेरा तन बनाया। कारखाने के विद्यालय में पढ़ा। कारखाने के लोहे इस्पात से बने साइकिल स्कूटर चलाए। कारखाने के स्टेनलेस स्टील बर्तनों मे खाना खाया। कारखाने के लोहे से बने घर में रहा। कारखाने में ही नौकरी लगी। उसका धूल प्रदूषण खाया। बच्चों को भी वही सब दिया जो मुझे मिला। या खुदा.. इससे पहले कि इसी कारखाने के लोहे से बने मरघट में दफन जाऊं मुझसे कारखाना छुड़ा। जो नया कदम नहीं उठाते हैं वे मृतवत जीते हैं। नवीयो पदम अक्रमुः।

       लकीर का फकीर होने से ठीक पहले नया कदम उठाओ नया सूर्य गढ़ो। स्थानांतर से घबराओ मत। परिवर्तन का स्वागत करो। परिवर्तन न आए तो स्वयं परिवर्तन करो। स्व में ज्ञान भरो। भरा ज्ञान संभावनाओं का ज्योतित आकाश है।

पितर सूत्र इस्कीस :- पितर वाक् वाक्- सारे संसार मे चार तरह के आदमी होते हैं जो वाक् स्तर के अनुरूप होते हैं। एक व्यापारी चार-चार पुतले लाया। आठों सामान दिखते थे। पर उनका मूल्य अलग-अलग था। पहले चार तथा दूसरे चार पुतलों का मूल्य क्रमशः था कौड़ी, चवन्नी, अठन्नी तथा रुपया। राजा ने व्यापारी से मूल्यान्तर का कारण पूछा। उसने कहा महाराज इनके कान में पहले यह तार डालिए फिर मुंह में डालिए तो आपको मूल्यान्तर पता चल जाएगा। राजा ने वैसा ही किया। पहले पुतले के कान में तार गई ही नहीं। दुसरे के कान से सीधी जाकर दूसरे से बाहर निकल गई। तीसरे के कान से जाकर मुंह से निकल गई और चौथे के अंदर चली गई। मुंह से तार डालने पर पहले के मुंह तक गई, दूसरे के कण्ठ तक, तीसरे के हृदय तक और चौथे को नाभि तक।

       पहले चार में पहला पुतला किसी को सुनता ही नहीं था, दूसरा एक कान से सुन दूसरे से निकाल देता था, तीसरा कान से सुन तत्काल मुंह से निकालता था ओर चौथा सुन कर गुनता था। दुसरे चार में पहला बेखरी था, दूसरा मध्यमा था, तीसरा पश्यन्ती था और चौथा परा था।

       वाक्-वाक् का अर्थ है मानव परा स्थल तक किसी से संप्रेषण करे। परा स्थल आत्मा बुद्धि स्तर विचार पैदा होता है। पश्यन्ती स्थल मन में विचार आकारित होता है। मध्यमा स्थल वायु शब्दित होती है। वैखरी स्थल आवाज पैदा होती है। यह वाक विज्ञान है।

       जो गुनता है मोती पाता है। जो परा है वह सम्पूर्ण संप्रेषणमय है। वही पितर है। परा सत्य की खान है। सत्य की खान मानव को सटीक करती है। सटीक मानव दायित्व सहज होता है। दायित्व सहज मानव क्षम होता है।

       वाक् शत प्रतिशत नियंत्रित हो सकती है। वाक्-वाक् याने द्वि-वाक्। सुकरात प्लेटो एवं अरस्तु द्वि-वाक् द्वारा अभिव्यक्त हैं। प्लेटो की दोनों आखें अपने गुरु सुकरात की सीख के कारण सुकरात के समान आकाश पर लगी थीं। अरस्तु की एक आंख आसमान पर थी, एक जमीन पर।

       वाक्-वाक् में प्रथम वाक है आदर्श वाक्। आदर्श वाक् याने वेद सम्पृक्त वाक् या ब्रह्मगुण परिभाषाएं और द्वितीय वाक है व्यवहार वाक्। आदर्श वाक् का व्यवहार धरातल पर प्रयोग है वाक्-वाक्। शुभ ही शुभ बोलें यह सम्भव है। इन्द्रियों में चक्षु, श्रोत्र, त्वक (स्पर्श) एवं रस में मात्र वाक् ही है जो पूर्णतः सहज नियंत्रित हो सकती है। जो पूर्णतः हमारे अधिकार में है। हम सब कुछ देखते हैं, सब कुछ सुनते हैं, सब कुछ सूंघते हैं, चखने पूर्व चख हर बार नियंत्रित नहीं कर सकते हैं पर आवश्यक नहीं कि हम हर कुछ बोलें। हमारे लिए सहज संभव है कि हम मानक ही मानक आधारित बोलें। परिभाषा ही परिभाषा आधारित बोलें, सत्य ही सत्य बोलें, ऋत ही ऋत बोलें। सत्य, ऋत, मानक, परिभाषा कभी भी कटु नहीं होते हैं, पर असत्यवादी, अनृत, अमानकी, अपरिभाषायुक्त को कटु लगते ही हैं। यह कटु लगना सहज स्वाभाविक है। इस कटु लगने की हम परवाह न करें। हमारे ब्यूरोकेसी के प्रचलित दोषों जिनके परिणाम उच्च-रक्तदाब, तनाव, अनिद्रा, अवसाद, निराशा, आदि आदि हैं से आसानी से बच सकते हैं। ओऽम् वाक् वाक् का पालन करें।

       ओऽम् प्राणः प्राणः, ओऽम् चक्षुः चक्षुः, ओऽम् श्रोत्रं श्रोत्रम्, ओऽम् रसनं रसनं की हम वाक् वाक् अनुरूप साधना करें। ओऽम् कोई धार्मिक मात्र नाम नहीं है। यथार्थ में परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी (अ ो ऽ म्) होने का महान सप्त ऋषि विज्ञान है जो पितर स्तर ले जाता है।

पितर सूत्र बाइस :- पितर सयुजा सखाया- दो सम्पूर्ण हैं, समायु-समयुजित। सर्वयुजित सर्वसमायु है ब्रह्म। अतः किसी के अतिक्रमित होने का कोई अर्थ ही नहीं होता है। यह शाश्वत तथ्य है।

       जीवन में मानव-मानव समायु नहीं होते हैं। प्रति जीवन ‘आयु’ अंतर हैं। परमात्म-नियम अद्भुत हैं। मानव कोशिकाएं उम्र के साथ ही परिपक्व होती हैं। खान-पान रहन-सहन समान होने पर दो बालक बड़े होते हैं। और एक उम्र में तीन वर्ष बड़ा है, तथा छोटा पढ़ता है, बड़ा नहीं पढ़ता है, पर दोनों का खान-पान समान रहता है तथा एक उम्र मोड़ बड़ा निर्णय करता है कि उसे भी पढ़ना है। और वह पढ़ना शुरु करता है तो बड़ा दो-तीन (दस-तेरह वर्ष दोनों की उम्र होने पर) वर्ष में ही छोटे के बराबर पढ़कर उससे आगे भी निकल जाएगा शर्त यह है अन्य परिस्थितियां समान हों। यह एक शाश्वत नियम है तथा ब्रह्म सोपान नियम है। स्पष्ट है कोई व्यक्ति स्वयं न चाहे तो अतिक्रमित ;ैनचमतबमंकमद्ध हो ही नहीं सकता है।

       पद कौड़ी योग्यता नहीं बढ़ाता। योग्यता शिक्षा, प्रशिक्षण, तथा उम्र के अनुरूप ही बढती है। वे व्यवस्थाएं अधिक सक्षम होती हैं जो योग्यता के संदर्भ में शिक्षा प्रशिक्षण तथा उम्र मात्र के मापदण्डों का पालन करती हैं। अमेरिका व्यवस्था पश्चात्य प्रथम शिक्षा प्रशिक्षण-भारित है। जापानी व्यवस्था उम्र-भारित। भारतीय सांस्कृतिक व्यवस्था पितर व्यवस्था शिक्षा प्रशिक्षण तथा उम्रानुरूप है पर व्यवहार में प्रयुक्त व्यवस्था का कोई आधार नहीं हैं। भारतीय व्यवस्था के अक्षम होने का एक मात्र कारण पद योग्यता के नियमों का अस्त-व्यस्त लागू करना है। प्रजातंत्र इसी कारण सर्वाधिक अक्षम व्यवस्था है। विश्व मानव (सारा इतिहास यह सिद्ध करता है) प्रजातंत्र युग में सर्वाधिक दुःखी है।

       प्रेमचन्द्र की कहानी ‘‘बड़े भाई साहब’’ जिसमें बड़ा भाई छोटे भाई से परीक्षा क्षेत्र मे पिछड़ने की अन्य सम्भावना पर उसे उम्र वरीयता की शाश्वतता समजता सिर पर से उड़ती कटी पतंग लेकर भाग जाता है में पद-योग्यता के उम्राधार की ओर उत्तम इंगन है।

       याद रखो शाश्वततः तुम सयुजा सखाया हो। अपेक्षिततः तुम एक जीवन उम्र में छोटे बड़े हो। छोटी व्यवस्था या अव्यवस्था ही तुम्हे अतिक्रमित करा सकती है। अव्यवस्था की परवाह मत करो। तुम्हारी योग्यता अनुभव उम्र तुम्हारी निजता है। तथा तुम्हारा अस्तित्व नौकरी के बाहर तक भी है।

पितर सूत्र तेइस :- पितर अमृतं गमय मृर्त्योमा।

       पितर सद्-गमय असतो मा।

       पितर ज्यातिर्गमय तमसो मा।

‘‘अमृत की ओर बढ़ो मृत्यु की ओर नहीं, सत् की ओर चलो असत् की ओर नहीं, ज्योति की ओर चलो तम की ओर नहीं।’’

       मुर्दा व्यवस्था

       मुर्दे ही निर्णायक

       मै सबसे निग्न सीढ़ी पर..

       मैं कितनी जीवित..!

       मुर्दे निर्णायकों की नजरों में श्रेष्ठ बनने के लिए तुम्हें कब्र में प्रवेश करना पड़ेगा। कब्र में प्रवेश मत करो कि तुम्हें ऊंचा पद मिले। अनियम, अऋत, निऋत, ममेति, कब्रें हैं। सात प्रशस्ति-पत्र होने पर भी एक वर्ष ‘सी’ सी-आर होने के कारण मेरा प्रमोशन नहीं हुआ। विभागाध्यक्ष ने कहा सर्वाच्चाधिकारी से मिल लो, वे तुम्हारा केस जानते हैं। मैं सर्वोच्चाधिकारी से मिला। उसने चर्चा के मध्य में कहा मै तुम्हें प्रमोशन दे सकता हूं तथा बाद मे दे दूंगा। मैंने फौरन कहा प्रमोशन बहुत ही घटिया सी चीज हैं, मैं तो आपसे मिलना चाहता था कि इस व्यवस्था में सांतसा लागू हो। उसने सांतसा देखी कहा- तुमने बडी ऊंची चीज लिखी है। और उसे दर किनार कर दिया। मैने उसे दर किनार कर दिया वह मुर्दा था।

       जो व्यवस्था मुर्दों की है, उसमें प्रमोशन किसी एक व्यक्ति के हाथ होता है, जिसे मुर्दे चापलूस अपने हाथ में ले लेते हैं। मृत्यु नहीं अमृत की ओर चलो ऐसी व्यवस्था को हर व्यक्ति द्वारा नकारना ही किसी राष्ट्र की उन्नति का आधार है। जाति-निग्रह उन्मुक्त अवयव (वैज्ञानिक विधि) आधारित मापदण्ड जिस व्यवस्था में लागू हैं, वह व्यवस्था अमृत है। उसमें एक असन्तुष्ट व्यक्ति भी व्यवस्था संतुष्ट रहता है।

       नियमबद्ध तटस्थ व्यवस्था में व्यक्ति व्यवस्था को सर्वव्यापक समीप पाता है। इसलिए आश्वस्त रहता है। तथा सहजता से सब कार्य होते रहते हैं। व्यक्ति तथा व्यवस्था में एक लय स्थापित हो जाती है। तब जो रस स्त्रवित होता है वह सद् रस है, ज्योति रस है, अमृत रस है।

पितर सूत्र चौबिस :- पितर जगत्यां जगत्- समाजी समाज के लिए नियमबद्ध। चाणक्य नियम है- एक कुटुम्ब के लिए व्यक्ति का, परिवार के लिए कुटुंब का, नगर के लिए परिसर का, देश के लिए नगर का और वसुधा के लिए देश का त्याग करो। इसका अगला चरण है ब्रह्म के लिए वसुधा का त्याग करो। अल्प सर्व हेतु एक महान नियम है। जहां सर्व अल्प के लिये रह जाते हैं, वे व्यवस्थाएं डूब जाते हैं।

       प्रजातंत्र व्यवस्था विकृत बीज व्यवस्था है। इसमें सर्व अल्प के लिए रह जाते हैं। परिणामतः जापानी सर्वोच्च भ्रष्टाचार भटकते हैं, इटली राष्ट्रपति आत्महत्या करते हैं, भारतीय नेता भ्रष्टाचार धन कब्रों के बोझ तले जेल-स्वर्ग भोगते हैं। प्रजातंत्र से प्रशासन भी विकृत है। प्रजातंत्र में पाच या चार वर्षीय अस्थायी व्यवस्था के लिए सवायी स्थायी प्रशासन व्यवस्था उपयोगित होने लगती है जो शाश्वत जगत्यां जगत नियम का उल्लंघन है।

       समाजी समाज के लिए नियमबद्ध ही स्वतंत्रता है। ‘स्व’ के मानकों के अनुसार आत्मनुरूप सुख दुःख आनंद आल्हाद तत्वों का विचार पूर्वक दूसरे से व्यवहार स्वतंत्रता है। नौकरी व्यवस्था में हमारा पद अमर है, हमारा विभाग अमर है, हम मर्त्य हैं, मरण धर्मा हैं। अतः पद के व्यक्तिगत उपयोग या उपभोग के स्थान पर हमारा दायित्व पद के लिए उपयोगित होने का है। स्थायी को उपयोगित करना खुद को छोटा करना है। अपनी क्षमता का कमी-करण है। उस दर्जी से कोई कपड़े नहीं सिलवाता जो ग्राहक के कपडों से रुमाल या अपने शिशु के कपड़े सिलवा लेता है। भिलाई नगर में जसवंत दर्जी इसीलिए प्रसिद्ध है कि वह ग्राहक कपड़े का ध्यान रखता है।

       जगत्यां जगत् पर एक सुन्दर उक्ति कथा है। एक हरा-भरा वृक्ष उस पर पंछी चहचहाते थे। अनेक घोंसले थे, एक बार ग्रीष्म ऋतु वृक्ष सूख चला, पक्षी फिर भी उसी पर रहे। उस वृक्ष के पत्तों में लकड़ी की रगड़ से आग लग गई, पत्ते तो पत्ते पक्षी भी जलने लगे।

       एक राहगीर ने प्रश्न किया-

       आग लगी इस वृक्ष पर

       जलने लगे सव पात

       तुम क्यों जलते पक्षियों

       हैं पंख तुम्हारे पास

              पक्षियों का उत्तर था

       फल खाए इस वृक्ष के

       गंदे कीने थे सब पात

       यही हमारा धर्म है

       जल मरेगें इसके साथ।

       वे संगठन मरते-मरते भी जी उठते हैं, उच्च सोपान जा पहुचते हैं, जिसमें संस्थान समर्पित काम करते हैं। संस्थान रक्षक सदा ही संस्थान में सक्षम होता है। संस्थान भक्षक अक्षम होता है।

पितर सूत्र पच्चीस :- पितर मनः शिव संकल्पमस्तु- शुभ बूझिए, शुभ समझिए, फिर शुभ सोचिए, बूझ-समझकर सोचिए कि हमारे विचार, हमारी अवधारणाएं, हमारी संकल्पनाएं सारे शरीर की जैविक तथा रसायनिक प्रक्रियाओं को जागृत करती हैं। इन सक्रिय उद्दीपनों के द्वारा ही संवेदन पैदा होते हैं तथा मस्तिष्क के सूक्ष्म संदेश चाहे वे सहज हो या सप्रयास कोशिकाओं तक पहुंचते हैं तथा कोशिकाओं को सशक्त, सदृढ़, स्वस्थ, गुणवत्तामय करते हैं। आदमी सूक्ष्म धरातल पर सोच का, विचार का, चिन्तन का ही बना है। क्षमताओं का अथवा अक्षमताओं का आधारभूत बीज रूप कारण कारण सोच ही है।

       ‘सम्प्रज्ञात’ शुभ कार्यक्षेत्र में क्षमता स्तर बनाए रखने की विधि है। सम्प्रज्ञात शुभ में मन की सोच पर शुभ ही शुभ द्वारा रोक के चार भेद हैं-

१) वितर्क :- किसी भी शिव-शुभ स्थूल विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

२) विचार :- किसी भी शिव-शुभ सूक्ष्म विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

३) आनंद :- किसी में शिव-शुभ अहंकार विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

४) अस्मिता :- किसी भी शिव-शुभ अहंकार रहित अस्मिता विषय में चित्तवृत्ति की एकाग्रता।

       इन एकाग्रताओं से तन में स्वस्थता उन्मेष होते हैं, आह्लाद होता है, मानव के जीवन में एक चमक आती है। वेद सम्पृक्त एकाग्रता अस्मिता है। इससे ऊंची अवस्था असम्प्रज्ञात शुभ है जो व्यक्तिनिष्ठ संष्लष्ट है।

       यह सुव्यवस्थित विज्ञान है। इस विषय में वर्तमान विज्ञान अंधेरे में हाथ पैर मारता शिशु है। वर्तमान विज्ञान उस खोज में लगा है कि हमारे सोचने का नजरिया हमारे शरीर में रयासन उत्पन करता है, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं।

       समग्र चिकित्सा के जनक आधुनिक वैज्ञानिक कार्ल सिमोटोन सोच चिकित्सा का एक स्वरूप-सोच इस प्रकार देते हैं-

       ‘‘आप अपनी आंखें बंद कीजिए। तनाव रहित हो जाइए। कल्पना कीजिए कि आप एक मजबूत किले, दीवारोंवाले किले के विस्तृत हरे-भरे पार्क में लेटे हैं। इस विशाल पार्क के प्रत्येक दरवाजे पर सशस्त्र सैनिक तैनात हैं तथा सफेद विशालकाय प्रशिक्षित कुत्ते आपकी हिफाजत के लिए इधर-उधर घूमते हुए आपकी सुरक्षा को दूर-दूर तक सूंघ रहे हैं। अचानक उन कुत्तों में से कोई एक कुत्ता एक घुसपैठिए को पहचान लेता है, जो कि भीतर घुसने की कोशिश कर रहा है। एक काला-कलूटा नाटे कद का व्यक्ति भीतर घुसना चाह रहा है। कुत्तों की सारी फौज उसपर टूट पड़ती है। वह घुसपैठिया भागने की कोशिश कर रहा है। अचानक सुरक्षा सैनिक की धांय से चली गोली से वह घायल हो जाता है। चुस्त और कृद्ध कुत्ते उसके चिथड़े कर डालते हैं और जब हड्डियों के अलावा कुछ नहीं बचता तोते मुंह में हड्डियां दबाकर पार्क से बाहर चले जाते है।

       इस रूपक में घुसपैठिया- कैंसर, सुरक्षा सैनिक की गोलियां- ‘विकरण चिकित्सा’ सुरक्षा सैनिक- शरीर के सुरक्षा तंत्र, प्रतिरक्षात्मक घटक हैं। सिमोंटेन के अनुसार जब इस प्रकार की सकारात्मक सोच- पोजिटिव थिकिंग- गम्भीरतम रोगियों में विकसित की गई तो इस सोच के बड़े ही चमत्कारी प्रभाव हुए। सिमोंटेन तथा उनकी पतनी स्टेफनी इसे ‘सोच चिकित्सा’ कहते हैं। वे रोगी के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक तीनों स्तरों के उपचार के समर्थक थे।

       सिमोंटेन विचार सार यह है कि मस्तिष्क रसायन न केवल प्रतिरक्षातंत्र को नियंत्रित करते हैं बल्कि प्रतिरक्षातंत्र से संवाद भी रखने की क्षमता रखते हैं। जैसे कि तंत्रिका तंत्र के अंग रखते है। ये रसायनिक सन्देश सम्पूर्ण शरीर को बेक्टीरिया, वायरस और ट्यूमर्स के सम्बन्ध में पूरी जानकारी देते हैं। रोग संक्रमण के दौरान ‘‘प्रतिरक्षा कोषिकाएं’ न केवल रोगाणु से लड़ती है वरन युद्ध के दौरान मस्तिष्क की भांति ही हृदयगति, निद्रा, तथा शारीरिक तापक्रम को भी नियंत्रित करती है। यह ‘‘प्रतिरक्षा तंत्रिकाएं’’ मस्तिष्क के संवेदना तथा विवेक केन्दों से भी बतियाति हैं और उन्हें समझाती हैं कि बीमारी के दौरान रोगी क्यो उद्विग्न हो जाता है। उसकी मानसिक स्थिति क्यों डांवाडोल होती है। सिमोंटेन इस छठी इन्द्रिय को ‘‘स्वायत्त चेतना प्रतिरक्षा तंत्र’’ कहते हैं।

       नेशनल इन्स्टीट्यूट आज मेटल हेल्थ की न्युरोफार्मेलाजिस्ट कैंटेड पर्ट की खोज है कि मस्तिष्क विशिष्ट उत्तेजक परिस्थितियों में न्यूरोपेप्टाइडस् उद्दीपक तैय्यार करता है जो साइको एक्टिव या उतेजक दवाओं (वेलियम, हेरोइन, फेसीक्लीडाइन, एंजिलडस्ट आदि) के समान कार्य करता है। यह उद्दीपक सनक, झक्कीपन के लिए जिम्मेवार होता है।

       मनः शिवसंकल्पमस्तु वह उच्च धारण है जो सौम्य, सहज, उच्च-स्तरीय शांतिमय धाराएं मस्तिष्क में सृजन करती है। रथ पहियों में आरे के समान चारों वेद पिरोया मन, सुअश्व लगाम युक्त मन जो बुद्धि ज्योति आवृत दिव्य पुरी अयोध्या, यज्ञेन आयु कल्पतां, ऋत-सूक्त, धरा-सूक्त, पुरुष-सूक्त, संज्ञान-सूक्त, संगठन-सूक्त, स्कम्भ-सूक्त, स्वस्ति-सूक्त, अघमर्षण-सूक्त आदि-आदि वे मनः शिवसंकल्पमस्तु अवधाराणाएं हैं जिनके सामने सिमोंटेन की सोच चिकित्सा समुद्र मे बुंदवत या आकाश में बिन्दुवत या सूर्य में एक किरणवत है।

       शिवसंकल्पयुक्त मनवाला अक्षम हो ही नहीं सकता। भिलाई इस्पात संयन्त्र की नौकरी में मैंने सर्वाधिक प्रमोशन खोए हैं। पर शिवसंकल्पयुक्त मन से सर्वाधिक योग्यता अर्जित की है तथा सर्वाधिक क्षमतायुक्त जिन्दगी जी है। कार्य क्षेत्र का हर मजदूर, हर रेजा, हर अभियंता इसका सुगवाह है। मैंने श्रमिकों की सुरक्षा के शुभ संकल्प के साथ काम किया है। मृत्यु मुंह से उन्हें जीता-जागता बचाया है। उच्चाधिकारी तो सुरक्षित हैं, उनके लिए मुझे काम करने की क्या जरूरत ? मनः शिवसंकल्पमस्तु महा सूत्र है। सब गलत हों, सब छोड़ दो। अक्षम से समझोता मत करो।

       मन की पांच अवस्थाए हैं- १) मूढ़, २) क्षिप्त, ३) विक्षिप्त, ४) एकाग्र, ५) निरुद्ध। निरुद्ध मन में शुभ संकल्पता, सार्थकता अधिकतम होती है।

क्षमता व्यापकीकरण :- ‘सवितुर्वरेण्यम्’ एक महामन्त्र है। सु-उत्पत्ति धारण, चालनकर्ता का वरण चिन्तनपूर्वक करना सवितुर्वरेण्यम् है। श्रेष्ठ का नाम है ‘वर’। वर का ही होता है वरण। अवर का वरण है अवरण। रण में विजय हेतु होता है वरण। रण में हार हेतु होता है अवरण। हम अयोग्य के अन्तर्गत कार्य न करें। अयोग्य के अन्तर्गत कार्य करने का दुःख जिस व्यवस्था में होता है वह व्यवस्था पतन को प्राप्त होती है। शिक्षा, अनुभव, उम्र योग्यता के परिचायक हैं। ‘सवितुर्वरेण्यम्’ सु-उत्पत्ति, सु-धारण, सु-चालनकर्ता शिक्षा-अनुभव-उम्र त्रि-समृद्ध होगा ही। हम जीवन में त्रि-समृद्ध का आश्रय लें अन्यथा अक्षमता के स्तर भटक जाएंगे।

       मानव हेतु सुउत्पत्ति, सुधारण, सुपालन, सुचालन, सुसंचालन जीवन-मन्त्र संस्कार योजना है। नौकरी का जीवन-समृद्धिकरण हेतु भी संस्कार-योजनाएं हैं। इन संस्कार योजनाओं का नाम है- प्रशिक्षण, संगोष्ठियां, कार्यशालाएं तथा सेमिनार। इन्हें संस्कारवत नियमबद्ध करना एक महान उद्योग सेवा होगी। इनके स्वरूप में रचनात्मक परिवर्तन करना आवश्यक है। वर्तमान में ये पदाधारित हैं। इन्हें पांडित्याधारित करना होगा। राष्ट्रीय सेमिनार नेता आधारित होते हैं। अयोग्य सेमिनार अक्षमताकारक होते हैं। धन-समय-योग्यता की बरबादी होते हैं। इनमें रखे भव्य लंच, डिनर, हाई टी तथा भेटें इनके सार स्वरूप तथा ज्ञान-स्वरूप को खा डालते हैं। मोटी भाषा में कहा जाए तो ये सेमिनार चालू लोगों के आमोद-प्रमोद के साधन हो गए हैं। अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों में सारे विश्व-विद्वानों के हेवि लंच के बाद सोते ऊँघते चित्र मेरे पास हैं। ‘सवितुर्वरेण्यम्’ स्वरूप से इन्हें निखारना होगा।

       तकनीकी संस्थानों, धर्म संस्थानों, साहित्यिक संस्थानों, सामाजिक संस्थानों को प्रजातन्त्र रोग हो गया है अतः ये ‘सवितुर्वरेण्यम्’ नहीं रह गईं हैं। इन्हें प्रज-तन्त्र आधारित करना होगा कि तकनीकी मानव सक्षम हो सके। ‘‘आम-राय’’ बड़ी खतरनाक स्थिति है। ‘‘श्रेष्ठ-राय’’ ने ही विश्व इतिहास रचे हैं। आम-राय ने विश्व इतिहास रचयिताओं को मिटाने के असफल प्रयास किए। एनेक्सगोरस, सुकरात, स्पिनोजा, गैलेलिओ, दयानन्दादि इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं।?

       विश्व इतिहास रचयिता जग-ठोकर या आम राय ठोकर पर तेज दौड़े।

पितर सूत्र छब्बीस :- पितर तरत् धावाति- तेज चलो वक्त से। तैरते से दोड़ो, दौड़ते से तैरो। गिरने से सदा बचे रहोगे। गिरने की सम्भावना से बचना है तो दौड़ते से तैरो, तैरते से दौड़ो।

       न गिरने का सरल सा नियम है- ठोकर लगे तो दौड़ो वरना गिर पडोगे। चलते आदमी को अचानक ठोकर लगती है तो वह स्वतः दौड़ता है। जो दौड़ता है गिरने से बच जाता है। जो नहीं दौड़ता है वह गिर जाता है। हम जब बचपन में किसी लड़के को अचानक सामने चलते देखते थे तो पीछे से उसके उठे पैर में धीर स दुसरे पैर तरफ चाट मारते थे.. कोई लड़का गिर जाता था, कोई लड़का दौड़कर संभल जाता था। जो नहीं दौड़ता था वो गिर जाता था।

       ‘‘ठोकर लगे दौड़ो’’ एक मूल नियम है। त्रुटि की क्षति-पूर्ति गति है। असीम को पता चला कि वरिष्ठ अधिकारी उससे रुष्ट हैं, उसने कार्य-क्षेत्र जाना दुगना कर दिया, सब अपने आप ठीक हो गया। नमित हमेशा पहला-दूसरा आता था, अचानक छै-माही परीक्षा में गणित में बहुत कम अंक मिले ठोकर लगी उसने दुगनी मेहनत की, अगली तिमाही वार्षिक में क्षतिपूर्ति हो गई। ‘‘ठोकर लगे दौड़ो’’ नियम की सहज व्याप्ति है- तैरते से दौड़ो गिरने से बचे रहोगे।

       इस सामान्य नियम का परिष्कृत रूप है-

       तरत् समन्दी धावति। धारा सुतस्य अंधसः।।

       ‘‘ब्रह्म-गुणों का आल्हाद समुन्दर बह रहा है, वह आल्हादी इसमें तैरता सा दौड़ता है, दौड़ता सा तैरता है।’’ जो ब्रह्म-गुण-आपूर्त सा दौड़ता है या जीवन में तीव्र गति चलता है उसे ठोकर लगने का प्रश्न ही नहीं उठता है। इतिहास गवाह है ऐसे व्यक्ति को ठोकर देते व्यवस्थाएं लड़खड़ा जाती हैं।

       वह सुकरात था जिसे पांच सो एक न्यायाधीशों की जड़ व्यवस्था ने ठोकर दी थी मृत्यु-दंड दिया था कि सुकरात नव-दिव्यगुणों तैरता सा दौड़ता था। पांच सौ एक न्यायाधीश मृत्यु को प्राप्त हुए, सुकरात आज भी अमर है।

       पितर सिद्धान्त याद रखो तरत् समन्दी धावति। वह दयानन्द था, ब्रह्म-गुण दैदीप्यमान हजारों ठोकरें ढह गईं, वह तरत समन्दी धावति रहा। वह गांधी था, ब्रह्म-सत्यगुण-साधक, ब्रिटिश व्यवस्था ढह गई।

       तरत् धावति ठोकरों को ठोकर दे ढहा देने का नाम है। तरत् धावति क्षमता का नाम है। यहां अक्षमता का प्रवेश भी नहीं है।

पितर सिद्धान्त सत्ताइस :- पितर त्यक्तेन भुंजीथाः – स-त्याग उपभोग। विद्या तथा धन गणित पहचान जीवन समृद्ध करती है। विद्या जितनी-जितनी बढ़ती है आदमी को हल्का करती है। ‘‘न च भारकारी’’ विद्या के लिए अर्ध-सत्य गणित है। पढ़ना बोझ है, विद्या के विषय में मूर्खतम गणित है। ‘‘सा हि तु सूक्ष्मकारी’’ विद्या का सत्य गणित है। विद्या ही मात्र सूक्ष्मकारी या विमुक्तिकारी है। इससे अमृत मिलता है। धन का सर्वोत्तम उपयोग है विद्याप्राप्ति हेतु व्यय।

       धन गणित की समझ विद्या गणित जितनी सरल नहीं हैं कि धन स्थूल है। धन गणित की समझ-रेखा है ‘‘तेन त्यक्तेन भुजीथाः’’। ‘तेन’ शब्द महत्वपूर्ण है। राजहरा में दो सर्वोदयी भाई थे। तब मैं बिनोबा का काम करता था। ये भाई भृत्य की नौकरी करते थे सहज धार्मिक थे। बिनोवा भावे के भूदान, ग्रामदान से अति प्रभावित होकर इन्होंने अपनी सारी भूमि दस-दस एकड़ दान कर दी, नौकरी छोड़ दी और खुद भीख मांगने लगे। यह ‘‘त्यक्तेन असुविधा’’ है ‘‘त्यक्तेन भुंजीथा नहीं है। त्यक्तेन भुंजीथा भी बडी विचित्र स्थिति है। पैसा पैसा खींचता है।

       एक ग्रामीण ने यह मुहावरा सुना कि पेंसा पेंसा खीचता है। वह गरीब था, अशिक्षित था। दुहरा गरीब था। बड़ी मुश्किल उसने दस रुपए उधार लिए। शहर गया। एक सेठ का मुनीम नोट गिन रहा था। यह ग्रामीण वहां जा जाकर दस के नोट को चुम्बक जैसा ले जा-जा कर खींचने लगा। मुनीम ने देखा कहा- क्या करता है ? इसने कहा- पैसा पैसा खींचता है यह प्रयोग करके देख रहा हूं। मुनीम ने कहा नोट दिखा जरा। इसने नोट दिखाया। मुनीम ने वह नोट दस-दस के रुपयों में गिन दिया। यह मुर्ख देखता रहा। काफी देर बाद इसने कहा- मेरा नोट लाओ। मुनीम ने कहा- कोन सा नोट ? इसने कहा- दस का नोट। मुनीम ने कहा- यहां तो हजारों दस के नोट हैं, कौन जाने तेरा नोट कौन सा, कहां है। तू जा यहां से। यह ग्रामीण लौट के घर आया। इसे समझ आ गया कि पैसा पैसे को खींचता है। पैसा-गणित विचित्र है।

       मैं थोडा बड़ा था, मेरा ममेरा भाई अनिल ग्रोवर छोटा था। हम बाजार गए, उसके पास अधन्नी (दो पैसे) थे, मेरे पास दुअन्नी थी उसने अधन्नी के शहतूत लिए। मैंने भी अधन्नी के शहतूत लिए। दुकानदारिन ने उसकी दी अधन्नी मुझे दे दी। वह रास्ते भर मुझसे अपनी अधन्नी मांग रोता रहा। घर घर में मामाजी के सामने अत्याधिक जिद करके उसने वह अधन्नी ले ली। मैं भी थोडा बड़ा था, मैंने मामाजी से जिद करके एक इकन्नी ले ली। विचित्र है पैसा-गणित। अधन्नी त्याग इकन्नी लेना, अधन्नी के शहतूत मुफ्त खाना भी त्यक्तेन भुंजीथाः है। सेठ धूर्त बनिए दो पैसे का लालच दे, दो पैसे त्याग दस पैसे मुनाफा कमातें हैं, यह भी त्यक्तेन भुंजीथाः रूप है। बचपन में कहानी पढ़ी थी- सेठ रुपयों की थैली ले जा रहा था। एक ठग ने कुछ सिक्के जेब से गिराए, सेठ चुनने लगे, ठग ने थैली पार कर दी। इस लिए तेन शब्द महत्वपूर्ण है- ‘‘तेन व्यक्तेन भुंजीथाः’’।

       धन एक सीमा मात्र तक ‘‘न च भारकारी है’’। यह सीमा रोटी, कपडा, मकान, तक की है। इसके बाद धन भारकारी होता चला जाता है। और इसे जमा करता आदमी कब्र होता चला जाता है। इस सीमा को जहां से धन भारकारी होता है दहलीज सीमा कहते हैं। दहलीज सीमा प्राप्त करते ही तेन त्यक्तेन भुंजीथाः जीने वाला मानव अपनी क्षमता में अभिवृद्धि करता चलता है, कि स्वयं को वह हल्का करता चलता है।

       दहलीज सीमापार धन का विद्या ग्रहण हेतु उपयोग सर्वोत्तम उपयोग है। विद्या जिस धन पर सवार नहीं होती है, दहलीज सीमा पार वह धन हास्यास्पद होता है। एक बार मैं भिलाई के सर्वाधिक घनियों में से एक के निवास किसी कार्य से गया। उस घर में सुसज्जित बैरे, नौकर थे। वे सज्जन घर में नहीं थे। मैने एक बैरे से एक कागज देने को कहा। वह एक पैड़ लाया, जो इम्पोर्टेड सनबोर्ड कागज का लेटरहेड था। मैंने लिखते-लिखते नाम शिक्षा जो ऊपर लिखा था पढ़ी। लिखने के बाद मैंने कहा- क्या मैं एक लेटरहेड ले सकता हूं। बैरा हस दिया बोला- साहब ये नायाब है तीन-चार ले जाइए। मैं तीन-चार कागज़ लेटरहेड के ले आया। मेरे मित्रों में भी उसके लिए छीना-झपटी मची। उस मंहगे लेटरहेड पर धन कब्र स्याही से बाची ओर एक नाम छपा था और दाहिनी ओर उसकी शिक्षा स्वर्णिम अक्षरों लिखी थी ज्ीम ंकउपतमत व`ि जीम पिसउ ेजंत त्ंरमदकतं ज्ञनउंतण्

       धन मुर्दा-बोझ न हो अतः उसका धर्म, ज्ञान-त्याग से आवरणित होना आवश्यक है।

पितर सिद्धांत अठाइस :- पितर अपापविद्धम्- अपाप से युक्त होकर सिद्ध हो जाओ। दो व्यवस्थाएं होती हैं १) पाप-विद्धम्, २) अपाप-विद्धम। तीन तरह के आदमी होते हैं १) निरक्षर, २) साक्षर, ३) नाक्षर। निरक्षर वह है जो अक्षर नहीं पढ़ सकता। सारा प्राणी जगत् निरक्षर है। हर मानव मूलतः निरक्षर नहीं है। जब भौतिक अक्षर नहीं थे, तो अक्षर ज्यादा सशक्त थे। श्रुती अक्षर थे। इन्द्रियों के माध्यम से दुनिया पढ़ना पढ़कर यथावत निर्णय लेना, आचरण करना हर मानव में स्वनिर्मित है। वह मानव निरक्षर हैं जो जगत् पढ़ कर निर्णय न ले। यथार्थवादी निरक्षर हैं। व्यंगवादी निरक्षर हैं। व्यंग मे यथार्थ लिख रहे हैं अनिर्णय अवस्था रहते। परिणामतः भ्रष्टाचार बढता जा रहा है। मैंने शेर देखा, मैंने शेर लिखा, उसके भयानक पंजे, भयानक जबड़े, उसका झपटना लिखा और शेर ने मुझे खा लिया। यह यथार्थवाद की भयावह नियति है। इससे हटकर भी एक स्थिति है- गुरु दत्तचित्त शिष्यों को पढ़ा रहे थे, शिष्य शब्द-अर्थ-व्युत्पत्ति पूछ रहे थे। गुरु दत्तचित्त समझा रहे थे। वहां व्याघ्र आ गया.. शिष्य चिल्लाया व्याघ्र.. गुरु समझाने लगे- व्याघ्र जो भयानक झपट्टा मारकर खा जाए उसे…। और व्याघ्र ने गुरु को खा लिया। शिष्य सब भाग गए थे। घटना विवेचन पाठकों पर है।

       साक्षर वह मानव है जो वस्तुओं को यथावत देखता है तथा यथावत आचरण करता है। जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही देखना तथा वैसा ही आचरण करना साक्षरता है। अपाप साक्षरता की उपज है। अपाप-विद्धम् वह व्यक्ति है जो हर कहीं सत्य कह सकने में दृढ़ है।

       मैं जानता हूं कि अपाप-विद्धम् होना याने भय-रहित, अहसान-रहित, असत्य-रहित, अभयता सहित, अभार-सहित, सत्य-सहित आदि होना है। यह स्थिति जीना कठिन है। तब मैं आफिसर्स एसोसिएशन का प्रतिनिधि था। एक समय मीटिंग चल रही थी। उसमें महा प्रबन्धक (कार्मिक) तथा ओ.ए. की कार्यकारिणी थी। मीटिंग में जो कुछ हुआ वह पाप था। दूसरी मीटिंग में भी वही हुआ, मैंने विरोध किया, व्यंग किया, पर सभी प्रजातंत्र चयनित थे, कुछ ना हुआ।

       साल के अंत मे ओ.ए. प्रबंधन की महामीटिंग हुई जिसमे एम.डी. समेत सारे के सारे महाप्रबंधन, अधिशासी निदेशक तथा प्रतिनिधि थे। एम.डी. ने कहा- साल भर ओ.ए. तथा प्रबंधन के संबंध बडे ही कार्डियल, सामंजस्यपूर्ण रहे। इसके सिवाय भी लम्बा भाषण था। अंत में एम.डी. ने पूछा- कोई कुछ कहना चाहता है ? मैंने हाथ उठाया, कहा- सच कहा आपने प्रबंधन तथा ओ.ए. के सबंध बडे ही सांमजस्य पूर्ण रहे। एक मीटिंग का उदाहरण दूं, मीटिंग में ओ.ए. अध्यक्ष ने कहा- अब हम पर्सनल विभाग की समस्याओं पर चर्चा करेंगे। महाप्रबन्धक कार्मिक ने कहा- आपकी रुचि किसमें है ? अध्यक्ष ने कहा- श्री …. श्रीवास्तव में ! महा प्रबंधक बोले- वे तो साढ़े ग्यारह बजे आते हैं, और अभी सवा तीन बजे है, बाहर आप देखें तो जा रहे होगे..! ओ.ए. अध्यक्ष बोले मेरी रुचि उसमें हैं। और मीटिंग खत्म हुई। बाद में श्री… श्रीवास्तव ने चार योग्यों का अतिक्रमण कर उन्हें सुपरसीड़ कर प्रमोशन पाया। यहां ओ.ए अध्यक्ष हैं, जी.एम. हैं, कार्यकारिणी सदस्य हैं। क्या कोई कह सकता है, मैंने झूठ कहा ?

       सारी मीटिंग हक्की-बक्की रह गई। पाप-विद्ध व्यवस्था हक्की-बक्की, नंगी खड़ी थी। ईमानदार एम.डी. ने कहा- मैं समझ गया। अगले प्रमोशन अपेक्षाकृत काफी अधिक अपाप-विद्ध थे कि एम.डी.खुद अपाप-विद्ध थे। मेरी नौकरी के इतिहास में वे अकेले एम.डी. पदस्थ अपाप-विद्धम् थे।

       ‘पाप-विद्धम्’ व्यवस्था घोर अक्षम है। ‘पाप-विद्धम्’ व्यक्ति भी अक्षम है। आज दुःखद तथ्य है कि सेमीनार, मन्दिर, मसजिद, गिरजे, दुर्गोत्सव, दशहरा उत्सव आदि व्यवस्था को ‘पाप-विद्धम्’ कर अक्षम करते हैं। इन सबमें ठेकेदारों से लिया ‘पाप’ पैसा लगता है- भिलाईनगर इसका जीता-जागता फलता-फूलता उदाहरण है। इसकी सारी पार्टियां विदाई से लेकर सारे धर्म संस्थान तथा सारे ठेकेदार संस्थान उत्तरोत्तर ‘पाप-विद्धम्’ व्यक्तिगत एवं सरकारी के ज्वलंत तथा जीते-जागते यथार्थ हैं। मैं जीता-जागता गवाह हूं कि इस व्यवस्था का सर्वाधिक सक्षम समझे जाने वाले वास्तविक अक्षम व्यक्ति सर्वाधिक ‘पाप-विद्ध’ हैं। तथा वह जिन्दा है ही नहीं, उनके भेष में दवाइयां, अंधविश्वास महा जिन्दे हैं।

       तुम अपनी क्षमता बचाना चाहते हो तो ‘अपाप-विद्धम्’ रहो। भिलाई इस्पात संयंत्र के परियोजना सुरक्षा विभाग की सारे सेल संयत्रों या भारतीय इस्पात उद्योग में अप्रचारित सर्वश्रेष्ठ सर्वाधिक सक्षम होने का कारण उसका अपाप-विद्धम् होना है।

पितर सिद्धांत उन्तीस :- पितर साक्षर- स-अक्ष-र = साक्षर। स-अ-क्षर = साक्षर। अ-क्षर = अक्षरण जुड़ना साक्षरता है। स-अक्ष-र = अक्षों के माध्यम से उत्तम रमण पुस्तकों या दुनिया में करते जाना साक्षरता है।

       आज व्यवस्था भयानक है। हर सिगारेट पैकट पर लिखा है कि स्वास्थ्य के लिए हानिकर है। शराब बोतल पर लिखा है कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकर है। और इसे वैधानिक चेतावनी कहा गया है और आदमी सरे आम सिगरेट, शराब खरीदकर पी सकता है। विधान के सामने बेच सकता है, खरीद सकता है। यह विधान सिगरेट चेतावनी तथा साथ ही साथ आदमी तथा व्यवस्था का सबसे बड़ा मजाक है। इसे कहते हैं नाक्षर व्यवस्था। नाक्षर सरकार नाक्षर लोग। मुझे शराब पीकर मर जाने का हक है, पर आत्म-हत्या का हक नहीं है। वैधानिक चेतावनी का स्वेच्छया उल्लंघन कर सकता हूं तथा यह दंडनीय अपराध नहीं। सरकार भी वैधानिक चेतावनी के खिलाफ कार्य कर सकती है तथा वैधानिक चेतावनी बरकरार है। इससे नाक्षर व्यवस्था तथा इसके नाक्षर व्यक्तियों की अक्षमता स्वतः सिद्ध है। नाक्षरता कई-कई स्तरीय अक्षमताएं पैदा करती है। १) विधान या नियम मजाक बन कर रह जाता है। २) गंभीरता समाप्त हो जाती है। ३) मूल्य-हीनता व्यक्तियों की आदत हो जाती है। ४) कथनी-करनी की दोहरी खाई उत्पादकता को ले डूबती है। ५) ज्ञान का भौतिक स्तर तथा मानसिक स्तर ह्रास होता है।

       पितर सिद्धान्त मूलतः वानप्रस्थ, संन्यास अवधारणाओं के निकट होने के कारण सत आधारित साक्षर सिद्धांत है। इसमें अक्षमता का नाक्षरता के रूप मे प्रवेश असम्भव है।

पितर सिद्धांत तीस :- पितर जन्माद्यस्य यतः – उत्पत्ति-स्थिति-लय सिद्धान्त क्षमता पितर सिद्धान्त है। हर कार्य, हर पद, संस्थान में हर व्यक्ति, समाज में हर व्यक्ति पर जन्माद्यस्य यतः याने उत्पत्ति, स्थिति, लय सिद्धान्त लागू होता है। जिस व्यवस्था इन सबका ध्यान नहीं रखा जाता वे व्यवस्थाएं अक्षम होती हैं।

       एक सक्षम व्यवस्था का नाम संस्कार है। इसमें उत्पत्ति, स्थिति, लय का ध्यान रखा गया है। गर्भपूर्व, गर्भ अवस्था, जन्म, शिक्षा, आजीविका, आश्रम, अन्त्येष्टि समन्वित सम्पूर्ण है यह। पंचयज्ञ भी उत्पत्ति, स्थिति, लय का ध्यान रखती व्यवस्था है। अधुनातन उद्योग शास्त्र इस क्षेत्र में अभी-अभी जन्म ले रहा है। इसके उत्पत्ति, स्थिति, लय नियम पर्याप्त अपूर्ण हैं।

       उद्योगों में प्रशिक्षण व्यवस्था संस्कार का ही स्वरूप है। इसका सम्बन्ध उत्पत्ति से है। कार्य के मध्य मानक प्रचालन प्रणाली ;ैण्व्ण्च्द्ध परिचय स्थिति है तथा सेवा निवृत्ति व्यवस्थाएं लय है। वे व्यवस्थाएं अधिक सक्षम होती हैं जिसमे उत्पत्ति, स्थिति, लय सुव्यवस्था होती है। उत्पत्ति अवस्था के ‘कु’ होने का परिणाम यह होता है कि ठट्ठ के ठट्ठ लोग अर्ध दिवस कार्य करते हैं। स्थिति अवस्था कु होने पर आधे लोग क्षमताधिक्य क्षेत्र में कम कार्य के कारण तथा आधे लोग क्षमताह्रास क्षेत्र में अकारण अनायास डाल दिए जाते हैं। लय अवस्था के नियोजन की व्यवस्था शायद ही किसी संस्थान में हो। इस अवस्था में लोग सात-सात साल तक उल्टी गिनती गिनते पाए गए हैं। जाने कितने पत्ते नौकरी के वृक्ष से जुड़े रहने पर भी घर की हवा खाते रहते हैं तथा व्यवस्था अकारण ह्रास-ग्रस्त रहती है।

       उत्पत्ति-स्थिति-लय जन्माद्यस्य यतः के अभाव में उत्पन्न अस्तित्व पहचान संकट अपनी तदर्थ भूमिका से अनभिज्ञता का संकट व्यक्ति को अक्षमता के स्तर पर ढकेल देता है। सारी व्यवस्थाओं में लयावस्था में व्यक्ति को घटिया अंक देने की परम्परा उन व्यक्तियों की कमर तोड़ के रख देती है तथा व्यवस्था के लय अंग को लकवा दे देती है। अंधो को अंधे की रेवड़ी व्यवस्था है यह।

       लयावस्था का संन्यास संस्कार अतिथि-वत जीवन सर्वोत्तम विधान है। इस रूप मे व्यक्ति प्रयोग व्यवस्था को अधिक सक्षम कर सकता है। ‘समादरणीय’ पद व्यवस्था के अन्तर्गत कार्य क्षमता वृद्धि में लाभ-प्रद हो सकता है।

पितर सिद्धान्त इकत्तीस :- पितर सावयव- पैर में ठोकर लगने पर अगर सावयव न दौड़े वो पैर नहीं गिरता सावयय गिर पड़ता है। उस व्यवस्था को क्या कहोगे जो अपरे पैर को खुद ठोकर देती है ? निश्चय है व्यवस्था को लड़खड़ाना पड़ेगा। रावण ने विभीषण को सावयव नहीं माना, रावण व्यवस्था गिर पड़ी।

       मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय, उदर वैश्य, पग शूद्र सर्वोत्तम सावयववाद है। ऐसी व्यवस्था कोटि-कोटि नेत्र कोटि-कोटि पाद ज्योतित होती पल्लवित होती है। हाथ विश्व के सर्वोत्तम औजार हैं। पानी पीने इनके चुल्लू मुद्रा, सुई में धागा डालती मुद्रा, तमाचा मुद्रा, घूसा मुद्रा, मुट्ठी मुद्रा, मिट्टी भरना मुद्रा, घुग्घू बजाना मुद्रा, कोण नापी मुद्रा, ऊंगली दिखा दिशा निर्देश मुद्रा, लिखना मुद्रा, गाल थपथपाना मुद्रा, सिर पर हाथ फेरना मुद्रा, लड्डू बनाना, रोटी बेलना, आटा गूंथना, सब्जी काटना, कुल्हाडी चलाना, सरौते से काटना, कैंची से काटना, कागज कपडा फाड़ना, ताला खोलना, सामान उठाना, समान बटोरना आदि आदि हर मूद्रा में पंच उंगली समूह जो अंगूठे से क्रमशः ज्ञान, शौर्य, संसाधन, शिल्प तथा सेवा प्रतीक पंच समूह है, अदभुत रूप में कार्य करता है। हर ऊंगली व्यवस्था मुद्रा स्वयमेव सक्षम सहयोगी है। मानव समूह यह व्यवस्था हो तो सावयव सार्थक हो।

       हर कार्य करनेवाला व्यवस्था सावयव होने की कोशिश करके अपनी क्षमता में वृद्धि कर सकता है। वे अलग थे, दर्द ने एक कर दिया, भय ने एक कर दिया, खुशियों ने एक कर दिया और सावयव हो गए।

पितर सिद्धांत बतीस :- पितर शास्त्रयोनित्वात्- लक्ष्य इन्द्रिय पहुंच से परे है। वह तत्काल प्रत्यक्ष का विषय नहीं है। अनुभव उसे दर्शाता भर है। शास्त्र उसका तत् स्वरूप दर्शाता है। लक्ष्य शास्त्र-प्रमाणक है।

       शास्त्र में लक्ष्य निश्चयात्मक रूप से अभिव्यक्त न होने से भटकाव होता है, भटकाव होने से निरर्थ श्रम होता है, निरर्थ श्रम होने से क्षमता ह्रास होता है, सतत क्षमता-ह्रास से अक्षमता स्तर होता है।

       सहज लागू किया जाने वाला ज्ञान शास्त्र नहीं है। न लागू किया जा सकने वाला ज्ञान शास्त्र नहीं है। शास्त्र प्रमाण है। शास्त्र ज्ञान का लागू होना चरमावश्यक है। यही ‘‘शास्त्र योनित्वात्’’ है। उद्योग नवीनी करण, उद्योग क्षमता वृद्धिकरण की यह आत्मा है।

       सांतसा शास्त्र योनित्वात् है। शास्त्र योनित्वात् सक्षमता का लक्षण है ‘‘शुद्धम् अपाप-विद्धम्’’।

पितर सिद्धांत तैतीस :- शुद्धम् अपाप-विद्धम्- पितर दशरूपकम् का विकृत रूप अमेरिकाने पर्ट तथा ब्रिटिश परियोजना प्रबन्धन के रूप मे सारे विश्व में फैला है। यह रूप प्रत्यक्षतः अक्षमता है। इसमें अक्षमता स्वयं बुनी प्रत्यक्ष दिखती है पर अज्ञानियों को नहीं समझती है।

       एक महा-प्रबंधक (परियोजना) कार्य मीटिंग ले रहे थे। अचानक परियोजना सलाहकार मेकन के इन्जीनियर ने भेल द्वारा दिए कामूआत (कार्य मूल्यांकन आकलन तकनीक) पर्ट के बारे में कहा- यह विचित्र पर्ट है जिसमें सारी क्रियाएं न्यूनतम समय हैं, सारी एक्टिविटी क्रिटिकल हैं। मेरे मन में दशरूपकम् कौंध गई। बाद में मैंने उस इन्जीनियर तथा उसके मित्र से चर्चा की और कहा आपने जो अचानक कहा वह आदर्श सत्य हैं। परियोजना पर्ट में आदर्शतः झोल या स्लेक या नाम क्रिटिकल पाप-विद्धम् है, अशुद्धम् है। दशरूपकम् में झोल या पाप नहीं हैं। काफी बहस के बाद वे मेरी बात मान गए। हर ब्रिटिश, हर अमेरिकन विधि से बनाए गए पर्ट में झोल या नान क्रिटिकल क्रिया होती ही है। यह परियोजना का पाप है, शास्त्रयोनित्वात् का उल्लंघन है। इसका एक मात्र कारण अशुद्धम् है या पाप विद्धम् है।

       दशरूपकम् में अधिकारिक (क्रिटिकल पाथ) तथा पताका प्रकरी आदि व्यवस्था शास्त्रयोनित्वात् या शुद्धम् अपाप-विद्धम् है। इसमें पूर्ण शास्त्रीय गुंथन है। संधियों में हर संधि मध्य क्रिया क्रिटिकल है। पताका, प्रकरी तथा पताका स्थानक, प्रकरी स्थानक एवं अद्भुत समावेश भी क्रिटिकल है। समानांतर क्रियाओं का झोलमय या नान क्रिटिकल होना लाजिमी है। समानांतर क्रियाओं का झोलमय या नान क्रिटिकल होना तब होता है जब गलती से कोई नान क्रिटिकल क्रिया अधिकारिक के क्रम में या क्रिटिकल पाथ में समाविष्ट कर ली गई हो, यही अशुद्धम् है। इसी प्रकार असामंजस्यपूर्ण समानांतर क्रिया पाप है। दशरूपकम् परियोजना प्रबंधन अझोल शुद्धम् अपाप-विद्धम् है। ‘‘अशुद्धं पाप विद्धम्’’ में उतने ही शब्द हैं जितने शुद्धम् अपाप-विद्धम् में है पर अंतर जमीन-आसमान का है। प्रथम अक्षमता का स्वतः स्तर है, द्वितीय क्षमता के सातों समुन्दर हैं। दशरूपकम् का हर कार्यक्षेत्र प्रयोग, सटीक प्रयोग ही क्षमता स्तर बढ़ा सकता है।

पितर सूत्र चौतीस :- पितर सच्चिदानन्द- सत = अस्तित्वमान द्रव्य, सच्चित् = कार्य निष्पादक सच्चिदानन्द = सत्, सच्चित् को बांधते नियम जिनसे आनंद झरे तथा ज्ञानपूर्वक ही हो।

       हर व्यवस्था त्रि तत्वीय है। प्रथम- संसाधन जो जड़ है, द्वितीय- सच्चित् जो जड़ व्यवस्थापक है, जड़ का उद्देश्य हेतु नियामक है और तीसरा- दोनों के मध्य कार्य करते नियम जो एक उच्च सच्चित् द्वारा निर्मित है तथा नियंत्रित है।

       असली व्यवस्था आत्मा- सच्चिदानन्द है। यह उल्लंघनीय न होने पर ही कार्य अक्षमता की स्थिति उत्पन्न होती है। सच्चिदानन्द सर्वव्यापक होना भी आवश्यक है। इसमें सत् का हितपूर्वक, सच्चित् का हितपूर्वक प्रयोग होना चाहिए तभी व्यवस्था आनन्दपूर्वक पूर्ण होगी एवं स्वतः सक्षम होगी। हित पूर्वक का सम्बन्ध सदायी स्थायी से होना आवश्यक है।

       सत् कभी भी ‘कु’ नहीं होता है। सच्चिदानन्द भी अपक्षाकृत कम ही कु होता है। सच्चित् सु-कु दोनों हो सकता है। सच्चित् की क्षमता-अक्षमता सीधी सच्चिदानन्द के अनुरूप-प्रतिकूल होने से जुड़ी हुई है।

       कहीं-कहीं ‘सच्चिदानन्द’ ही नाम विरुद्ध होता है, जैसे कि प्रजातन्त्र में। वहां यह तय है कि सारी अव्यवस्था ही अव्यवस्था हो, सारी अक्षमता ही अक्षमता हो। यही कारण है कि श्रेष्ठ जन प्रजातन्त्र छोड़ दिया करते हैं। अमेरिका जैसे देश में भी मात्र पैतालिस प्रतिशत प्रजा मताधिकार प्रयोग करती है। सच्चिदानन्द व्यवस्था श्रेष्ठतम से ही उपज सकती है।

       व्यवस्था में कार्यकर्ता कर्मचारी शत-प्रतिशत स्वतंत्र होना चाहिए पर उसे हर व्यवस्था उल्लंघन का निश्चित दण्ड मिलना चाहिए। यह दण्ड न मिलना तत्व व्यवस्थाओं को ले डूबता हैं। व्यवस्था कैसे डूबती है इसका एक उदाहरण-

       व्यवस्था नियम हैं कि व्यक्ति आकस्मिक छुट्टियां पन्द्रह ले सकता है। स्वघोषित तीन, चिकित्सा छुट्टियां (होने पर) ले सकता है। अर्जित अवकाश भी ले सकता है। अब एक व्यक्ति के पास तीनों अवकाश हैं वह चिकित्सा कारण से विलम्ब से आता है और उसे उचित ठहरा दिया जाता है, वह अन्य कार्य से विलम्ब से आता है, तथा उसे उचित ठहरा दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि व्यवस्था पाप-विद्धम् हो जाती है। ऐसे अवसरों लोग मानवता की दुहाई देते हैं। मूर्ख हैं वे लोग और वे व्यवस्थाएं जो इन दुहाइयों को सुनते हैं। अवकाश प्रावधान ही मानवता के कारण है यह तथ्य उन्हें नहीं समझता है।

       मानवता व्यक्तिगत प्रत्यय है, नियम सार्वजनिक प्रत्यय है। व्यक्ति को कार्यालय में मानवता जीने का हक नहीं दिया जा सकता है। एक अधिकारी ने यह हक सबको उन्मुक्ततः दे दिया। परिणामतः वह कार्य-अक्षम हो गया। सच्चिदानन्द व्यवस्था पालक ही कार्य-सक्षम हो सकता है। नियमान्तर्गत पूर्ण कार्य स्वतन्त्रता तथा विश्वास सक्षमता की आवश्यकता है पर नियमों की जवाबदेही भी इसके साथ है।

       बाबूलाल मेरे पास एन.एम.आर. में काम करता था। उस समय उसकी प्रतिदिवसी वेतन सोलह रुपए पचास पैसे था। वह एक दिन कार्य आया, उपस्थिति भरी, आधा घण्टा काम किया और चला गया। दूसरे-तीसरे दिन भी उसने ऐसा ही किया। वह एक निर्धन पर अच्छा व्यक्ति था। तीन दिवस बाद चौथे दिन वह आया तो उससे मैंने पूछा कि उसे अनुपस्थित क्यों न कर दिया जाए और उसने मुझसे पूछे मिले बिना ऐसा क्यो किया ? उसने लगभग रोते कहा। महोदय गरीब आदमी हूं, वेतन से ही गुजारा चलता है। मेरी श्रीमतीजी की जचकी होने वाली थी, इसीलिए जाना पड़ा। तुम्हें पुत्र प्राप्त हुआ या पुत्री ?- मैंने पूछा। पुत्र- उसका उत्तर था। तो उसकी मिठाई कहां है ? मेरी सहजतः से वह आश्वस्त हुआ बोला- कल ला दूंगा। फिर मैंने उसे हाजिरी रजिस्टर में तीन दिन के लिए अनुपस्थित लिख दिया। वह बोला साहब गरीब आदमी हूं, मर जाउंगा तथा उसकी आंखे भर आईं। मैं मानवता हीन नहीं था। मेरा जीवन महा-मन्त्र है-

       मानवता अपनी देवी है, ज्ञान हमारा भैय्या है, मेहनत अपनी बहना है, हमें धरती मैय्या की गोदी में, सत्य जीवन साथी संग, जय विश्व जीते रहना है।

       सत्य का भी साथ निभाना है, मानवता भी निभानी है, और सच्चिदानन्द व्यवस्था भी पालनी है। ज्ञान ने मेरा साथ दिया- मैंने जेब से पचास रुपये का नोट निकाल कर उसे दे दिया कि ये लो तुम्हारी तीन दिन की तनखाह। पर पंजीयन पुस्तिका पर वह अनुपस्थित रहा।

पितर सिद्धान्त पैंतीस :- पितर अवरोह-आरोह क्रम- परमपुरुष – पुरुष – अहंकार – बुद्धि – मन – ज्ञानेन्द्रियां – कर्मेन्द्रियां – पाच तन्मात्राएं – पांच सूक्ष्मभूत – पांच स्थूलभूत।

       सत्-रज-तम का अवरोह क्रम है तथा इसके विपरीत तम-रज-सत का क्रमशः आरोह क्रम है। आरोह क्रम क्षमता अभिवृद्धिकरण है, अवरोह क्रम क्षमता कमीकरण है।

       स्थूलभूत को सत नहीं किया जा सकता है। सूक्ष्मभूत, तन्मात्राओं आदि को भी सत नहीं किया जा सकता है। पर इनमें से ‘ब्रडाब्रनि’ सिद्धान्त के अनुरूप मात्र सत चुना जा सकता है। ‘‘ब्रह्म डाल ब्रह्म निकाल’’ का स्थूल स्वरूप है- ‘‘सत डाल सत निकाल’’। सप्तऋषि आधार हैं इसके। सप्त हो गए हैं आप्त जिसके क्रमशः आरोह साधना करते-करते वह अक्षमता का क्षमता द्वारा पूर्ण अतिक्रमण कर जाता है।

       पीटर सिद्धान्त यह है कि हर पद के लिए कहीं न कहीं अक्षम व्यक्ति है, और हर व्यक्ति को अक्षमता के स्तर तक पहुंचना है। पितर सिद्धान्त है कि सप्तऋषि धारित हैं जो वह हर पद के लिए सच्चिदानन्द व्यवस्था गढ़ के हर पद के लिए सदा सक्षम है।

पितर सिद्धान्त छत्तीस :- पितर कार्यक्रमो अविद्यास्थ शक्तिभिः – अविद्या की शक्ति से कार्यक्रम व्यवस्था- क्रमबद्ध कार्य का नाम कार्यक्रम है। इसी का नाम कामूआत (कार्य, मूल्यांकन, आकलन, तकनीक) या दशरूपकम् है। रूपकम् कृत्रिमता है। कृत्रिमता अविद्या है। दशरूपकम् सिद्धान्त का कार्यों में पालन कार्यक्रमो अविद्यास्थ शक्तिभिः है।

       एक व्यक्ति ताला खोलने में दक्ष था, तथा ताला खोल चोरियां किया करता था। उसे कई बार जेल हुई पर उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। उस व्यक्ति से एक बार मेरी भेंट हो गई। मुझे उसके बारे में पता चला मैंने उसे ऐसे ताले बनाने के कार्य में लगा दिया जिन्हें कोई भी न खोल सके उसने चोरी करना सदा के लिए छोड़ दिया और समाज को चोरों से रक्षित भी कर दिया।

       कार्यक्रमो अविद्यास्थ शक्तिभिः दक्षता अभिवृद्धि का महान सिद्धान्त है जो उद्योग क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला सकता है। इससे टुकड़े-टुकड़े फैलती अविद्या प्रवृत्ति पर रोक लग सकती है तथा उसकी शक्ति का आरोह क्रम में उपयोग हो सकता है।

       व्यक्ति स्वयं भी अपनी अविद्या का शक्ति से कार्यक्रम निरुपित कर उन्नति के सोपान चढ़ सकता है। भिलाई इस्पात सयंत्र में मैं नोकरी की जिन्दगी में व्यवस्था के प्रति कटु खंडनात्मक प्रवृत्ति विद्रोहात्मक प्रवृत्ति रखता था पर वह नकारात्मक थी। मेरी मूल प्रवृत्ति आज भी है। आज भी मैं व्यवस्थां का कटु खण्डन करता हूं। पर मेरी प्रवृत्ति सकारात्मक हो गई है। वर्तमान में मैं सारे कारखाना अधिनियम, सुरक्षा विभाग का दुर्घटना आधारित होने के कारण कटु खण्डन करता हूं। पर खण्डन का आधार है सुघटना संस्कृति की स्थापना। और इसमें मेरा कोई सानी नहीं है।

पितर सिद्धान्त सैंतीस :- पितर ‘‘ईक्षते न अशब्दम्’’- ईक्षण से शब्द प्रमाणरहित नहीं है। अर्थात इक्षण से शब्द प्रमाण है। समय आयोजन विधा तथा प्रदत्तीकरण ;क्मसमहंजपवदद्ध का महा-सूत्र है। ईक्षते नाशब्दम्- इक्षण से न अशब्द है। ‘‘न अशब्दम्’’ का प्रयोग अतिविशिष्ट है। इसे सीधा ‘शब्दम्’ भी कहा जा सकता था। न-ईक्षण से अशब्द है अतः ईक्षण से शब्द है।

       न ईक्षण अक्षमता स्तर है। ईक्षण क्षमता स्तर है। इक्षण की परिभाषा है- ‘‘यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्’’। इतने बड़े सृष्टियज्ञ को व्यक्त-अव्यक्त में परिवर्तित कर रहा है। ऋतु-ऋतु की ऋतायोजित सन्धियों (समय) में नियोजित कर पलक झपकानेवत सहजता से वह यज्ञ का देव ब्रह्म यह ईक्षण है।

       जब कर्मचारी समय नियोजन कर लेता है तब ईक्षण की ओर गति करता है। मेरे स्टाफ में दो-तीन बातूनी हैं, कहें खेत की, सुने खालियान की है। जब मैं मीटींग लेता था, तो ये सारी मीटींग को चौपट कर देते थे। मैं बाजार जा रहा था, तो वहां एक बच्चों का खिलौना बिक रहा था। साधारण सा दो रुपए का खिलौना है वह। एक कांच की नालिका में पानी भरा है, तथा उसमें धीरे-धीरे डूबनेवाले तथा तैरनेवाले चमकते परतपार टुकड़े। इन परतदार टुकड़ो का पूरा डूबने या तो उबरने में समय लगता है। प्राचीन रेत घड़ी का एक प्रारूप है यह। मैंने वह खरीद लिया। आफिस ले आया।

       अगली मीटींग रखी। सबको पहले बता दिया कि प्रति व्यक्ति खिलौने के परतदार टुकडों के डूबने या उबरने मात्र तक बोलने की स्वतन्त्रता होगी। पहली दो मीटिंग में बातूनी कसमसाए, असुविधा में पड़े। बाद में उन्हें शब्द समय सबंध समझ आने लगा और मीटिंग सुव्यवस्थित चलने लगी।

       ‘‘ईक्षते न अशब्दम्’’ की ओर इंगन करता यह एक छोटा सा उदाहरण है। शब्दम् है अक्षरम्। अ- अज, अजर, अमर- उत्पत्ति-स्थिती-लय में सम रहते जो पल-प्रतिपल नियन्ता है क्षरणशील प्रकृति का वह है शब्दम्। ईक्षण शक्ति है सामर्थ्य उसकी।

       वह अधिकारी या कर्मचारी ही शब्द सार्थक होता है जो सामर्थ्यपूर्ण है। साख है जिसकी धाक है उसी की। जिसकी साख नहीं उसकी धाक नहीं। एक सेठ की सुन्दर गुणवती कन्या थी। वर पद हेतु कुछ युवक आए। सेठ बाजार में दुकान पर था। सेठ ने युवकों से कहा- हजार रुपये दे सकते हो ? सबने पर्स निकाले.. सेठ ने कहा- इस बाजार से दिला सकते हो ? सारे युवक पैसे का व्यवहार करने चले गए। एक युवक ने कहा- सेठ जी नोकर को किसी भी दुकान भेज दीजिये कहना कि कल्लू ने हजार रुपए मंगवाए हैं, आपको मिल जाएंगे। सेठ ने नौकर भेजा, रुपए मिल गए। सेठ ने कल्लू की साख देखी, उसे घर जमाई बना लिया। असल में बाजार में एक सत समूह बनाकर व्यापारियों की गुंड़ों की दादा-गिरी आदि से निजात दिलाई थी। सत समूह रूप वह एक से अनेक हो गया था। उसकी सामर्थ्य फल गई?

       ‘इशते न अशब्दम्’ में दो चरण हैं। एक समय आयोजन और दूसरा प्रदत्तीकरण था डेलीगेशन।

पितर सिद्धान्त अड़तीस :- पितर ‘‘बहुस्यां प्रजायेयेति’’ मैं बहुत होऊं, प्रजावाला हाऊं- पद व्यवस्था सत्ता एवं कार्य का खेल है। सत्ता के साथ आती है जिम्मदारी या दायित्व। सत्ता रक्षण के लिए है आधिकार और इनके सहारे करने होते हैं कार्य निष्पादन। सत्ता, दायित्व, अधिकार और कार्य पद के चार भाग हैं। सत्ता एवं दायित्व तथा अधिकर एवं कार्य दो-दो युगल हैं। मैं बहुत होऊं, प्रजावाला होऊं शब्द महत्वपूर्ण है। प्रजावाला होने का अर्थ है प्रजा मेरे लिये हो। प्रजा को जो मेरे लिए है कार्य दूं तथा अधिकार दूं। पर सत्ता एवं दायित्व मेरे ही रहें यह बहुत होने का तात्पर्य है। सत्ता एवं दायित्व वे सूत्र हैं जो सारी की सारी प्रणाओं में पिरोए रहने चाहिए ताकि वे अधिकारों का दुरुपयोग न करते हुए कार्य कर सकें।

       ईक्षण के लिए बहुत होना आवश्यक है। बहुत होने के लिए अधिकृत करना आवश्यक है। अधिकृत करने में कार्य विभाजन आवश्यक है। कार्य के लिए संसाधन आवश्यक हैं। संसाधनों के साथ संसाधन व्यवस्था आवश्यक है। ब्रह्म ईक्षण सार्थक है। क्योंकि- १) संसाधन-व्यवस्था सत व्यवस्था पूर्णतः नियमबद्ध है। २) सच्चित् को पूर्ण कर्म स्वतंत्रता है। ३) सच्चित् को नियमबद्ध संसाधन उपलब्ध हैं। ४) पूर्ण ज्ञान उपलब्ध है। ५) सत्ता ब्रह्म के ही हाथ है। ६) मोक्ष सच्चित् का निर्धारित लक्ष्य है। ७) कर्म-फल ब्रह्म के हाथ है तथा नियमबद्ध नियत है। (८) उसकी सत्ता सर्वव्यापक है, अव्यक्त है, नियम (ज्ञान) अभिव्यक्त है।

       पद व्यवस्था में सक्षम होने के लिए कई शर्तें है। १) समय आयोजन, २) कार्य प्रदत्तीकरण, ३) अधिकार प्रदत्तीकरण, ४) सत्ता सुरक्षित, ५) दायित्व जिम्मेवारी सुरक्षित, ६) नियमबद्धता, ७) कर्म तथा फल अनुपात हमेशा एक अर्थात फल हमेशा कर्म के समानुपाती हो। ८) कार्य प्रदत्तीकृत को समुचित महत्ता, ९) प्रदत्तीकृत क्षेत्र सुव्यवस्था आश्वस्ति। उपरोक्त समस्त नियमों का नाम है। ‘‘बहुस्यां प्रजायेयेति’’।

पितर सूत्र उन्तालीस :- पितर पंच बाह्य तुष्टि- शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध तथा इनके अहसास के पांच साधनों कर्ण, त्वचा, आंख, जिह्वा, नासिका के लक्ष्य प्राप्ति पूर्व तथा लक्ष्य प्राप्ति के पश्चात संतुष्ट होने की दो स्थितीयां होती हैं। पूर्व तुष्टि अक्षमता स्तर की तथा पश्चात तुष्टि क्षमता स्तर की परिचायक है।

       यहां ‘कडाकनि’ तथा ब्रडाब्रनि या ईडाईनि ;ळ१ळ० . ळ१ळ०द्ध सिद्धान्त कार्य करता है। शब्द का ब्रडब्रनि (ब्रह्म डाल ब्रह्म निकाल) या ईडाईनि (ईश्वर डाल ईश्वर निकाल) सिद्धान्त है। शुभ ही शुभ उदात्त ही उदात्त कहना या ओऽम् सिक्त या वेदसिक्त वाणी का ही प्रयोग करना या परा, पश्यंती, मध्यमा वैखरी का एक होना या अक्षर की जीवन सिद्धि या ईक्षते नाशब्दम् की अत्यंत उच्चावस्था है। रूप की ब्रडाव्रनि या ईडाईनि अवस्था है- शुभ ही शुभ देखना। देवं वहन्ति केतवः प्रकृति सत् नियमबद्ध शुभ ही शुभ है प्रकृति के नियमों के माध्यम से देव तक पहुंचना शुभ ही शुभ देखना है। समुन्दर के किनारे बैठा ब्रह्माण्ड समुन्दर के किनारे बैठा नियम पत्थरों से खेलता उन्हे ढूंढ़ता न्यूटन था ओऽम् चक्षु-चक्षु। उसकी आंखों में ब्रह्म नियमों के माध्यम से ब्रह्म भरा हुआ था। कानों का ब्रडाब्रनि नियम निराला सुमित्रा नंदन पंत ने मौन को सुनते तथा चुप को सुनते अहसास में जिया था। रस स्पर्श भी तैंतीस अक्षरीय हैं। रस के तैंतीस अक्षर जीभ के विभिन्न स्थलों पर हैं। स्पर्श के तैंतीस अक्षर त्वक् पर फैले बिखरे हैं। गंध के तैंतीस अक्षर नासिका संवेदनों में बिखरे हैं। इन पंच तैंतीस अक्षरों की समर्थ्यता का नाम है क्षमता स्तर। यह अन्तर्तुष्टि या पश्चात तुष्टि की अंत्य अवस्था का नाम है।

       अन्तर्तुष्टि के पूर्व ही संवेदनों की सूक्ष्मता को न समझते संवेदन हत्या पर स्थूल संवेदनों के साथ संसार में जीने में संतोष कर लेना तथा यह कहना कि सारे संसार के लोग तो ऐसे ही जीते हैं, हम भी तो संसारी जीव है पंच बाह्य तुष्टि है तथा अक्षमता का स्तर है। पंच अन्तर्तुष्टि के प्रति जागरूकता एवं कार्य सतत क्षमता वृद्धि देते हैं।

पितर सूत्र चालीस :- पितर अणोरणीयान महतो महीयान- पितर सूक्ष्मतम महतम। सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रकट होते ही महान से महान वितान है। पितर अ से क्ष तक सिद्धान्त का नाम है।

       डा. फैन्मेन भौतिकी के नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक से पूछा गया, यदि संसार के सारे ज्ञान को नष्ट होने के आदेश पर आपको मात्र एक वाक्य बचाने को कहा जाए तो आप कौन सा वाक्य बचाना चाहेंगे ? डा. फैन्मेन ने फोरन कहा कि- सब कुछ छोटे-छोटे परमाणुओं से बना है। यदि यह वाक्य बचता है तो इससे सारा ज्ञान विकसीत हो जाएगा।

       डा. फैन्मेन के वाक्य का भी बीज सूत्र है- अणोरणीयान महतोमहीयान। वृक्ष विकास का आधार है बीज। सूक्ष्मतम बीज अव्यक्त वृक्ष है। जड़ अंकुर से क्रमशः विकास होते वृक्ष दुहरा बढ़ता है। वह वृक्ष बीज के सामान्य विकार निकटतम विकसित होता है जिसे समुचित वायु, जल, सूर्य पोषण व्यवस्था मिलती है। बिना बिज को जाने जो व्यवस्थाएं पोषण व्यवस्था करती हैं या मात्र मध्य पर निर्णय लेती हैं या अन्त्य निर्णय मात्र लेती हैं वे अक्षमता के स्तर गढ़ती है।

       एक चरवाहे परिवार के पास हजारों भेड़ों का झुंड था। दो मेमने चोरी हो गए। एक बूढ़ा चरवाह बारम्बार बोला- मेमनों को ढ़ूंढो। पर किसी ने ध्यान न दिया। सबने कहा दो मेमनों की हजारों भेड़ों में क्या औकात। आठ-दस दिन बाद चार भेड़ें चोरी चली गईं। बूढ़ा बोला वो मेमने ढूंढ़े होते तो भेड़े नहीं जाती। लड़के बोले बूढ़ा सठिया गया है। कुछ दिनों के बाद दो सौ भेड़ें चोरी चली गईं। अणोरणीयान महतो महीयान। सांत अनंत से जुड़ा है।

       एक विभाग की सच्ची घटना है- ढाल पर एक नाला खोद पुलिया बनी जो बेकार रही। काम पर लीपा-पोती कर दी गई। एक ओटा छज्जा खुर्सीपार स्कूल काम में गिरा। व्यवस्था मौन रही। एक बडा छज्जा अस्पताल सेक्टर नौं में गिरा। व्यवस्था ने अभियन्ता बचाव किया। वर्कशाप जोन पूरी गेबलवाल गिर गई। फिर खुर्सीपार के टैंक दो तिहाई पानी से अधिक पानी वजन न ले सके। और फिर सेक्टर के स्कूल भवन के आडीटोरियम की छत गिर गई। अंततः रशियन काम्प्लेक्स का वाटर टैंक गिर गया। सारे सम्बन्धित लोग इतने हिले मिले थे कि सबको प्रमोशन मिले। एक बूढ़े ने मेमना ढ़ूंढ़ने की बात बार-बार कही। मिनिस्टरों तक कही पर वरिष्ठ सबसे सुपरसीड हुआ। आज प्रधानमन्त्री भी भ्रष्ट है। अणोरणीयान महतो महीयान।

       विकृत बीज विकृत वितान, सुकृत बीज सुकृत वितान। अणोरणीयान महतो महीयान।

पितर सूत्र इकतालिस :- पितर आसीनः सम्भवात्, मन्त्रः मननात्- आसन से संभव है एक प्रत्यय प्रवहण। मन्त्र- लक्ष्य हर स्थिती मननीय है।

       ‘‘तेज चल- ठहर चल- ठहर तेज चल !’’ यह नियम क्षमतावृद्धि नियम है। ठहर आसीनः है या आसन है। तेज चल सूर्य स्वर है। चल चन्द्र स्वर है। ठहर सुषुम्णा स्वर है। यह एक महा क्षमता सिद्धान्त है। इस ठहर या सुषुम्णा स्वर में लक्ष्य आकलन चिन्तन जोड़ देना दिशा सूचक है। ‘‘तेज चल’’ तथा ‘चल’ दिशा बोध से रहित है, वे दशा बोध है। दशा बोध तथा दिशा बोध में सन्तुलन आवश्यक है। ये शारीरिक, मानसिक, भौतिक स्थितिया हैं। सुर्य स्वर, सुषुम्णा स्वर, चन्द्र स्वर शरीर में दस प्राणों की कार्य स्थितियां हैं। इन स्थितियों के अनुरूप तेज चल, ठहर, चल, ठहर तेज चल दिवस कार्यक्रम मानव साध ले तो वह हर स्थिति सक्षम हो जाता है।

       उद्योगशास्त्र में एल्टन मेयो ने उपरोक्त सिद्धान्त का अधकचरा सा प्रयोग किया। उसने प्रति घण्टा पांच मिनट श्रमिकों को सामाजिकता विश्राम दिया और उत्पादकता में तेरह प्रतिशत वृद्धि पाई। एल्टन मेयो के विश्राम या ठहर तत्व का स्वरूप बडा स्थूल था। आसीनः सम्भवात् मन्त्र मननात् का स्वरूप वैज्ञानिक है। ढाई-ढाई घडी (एक-एक घण्टा) सूर्योदय से नियमानुसार चन्द्र स्वर, इडा स्वर या मृदु कर्म स्वर तथा सूर्य स्वर पिंगला स्वर या कठिन कर्म स्वर अमावस्या पूर्णमासी से विभिन्न तिथियों विभिन्न स्वर चलते हैं। दिवस-रात्रि या रात्रि-दिवस सन्धि काल में तथा हर स्वर परिवर्तन के मध्य करीब पांच मिनट सुषुम्णा स्वर (दोनों स्वर) चलते हैं। स्वर क्रम को स्कूल नाम गंगा (इडा), जमुना (पिंगला) सरस्वती (सुषुम्णा) भी दिऐ गए हैं।

       आसीनः सम्भवात् सरस्वती स्वर काल में सर्वाधिक प्रभावशील होता है। इसी काल मननात मन्त्र का लघु या दीर्घ प्रयोग होता है। दिवस काल में लघु लक्ष्य चिन्तन आकलन तथा सन्ध्या एवं प्रभात काल में दीर्घ लक्ष्य चिन्तन उपयुक्त होते हैं।

       लक्ष्य का कार्य लक्ष्य होना ही आवश्यक नहीं है। मननात् मन्त्र में मन्त्र शब्द उदात्त से व्यावहारिक अर्र्थों में क्षमता विकास हेतु प्रयुक्त होना भी आवश्यक है।

       उपरोक्त सिद्धान्त का अनुपालन परियोजना विभाग के कुछ विभागाध्यक्ष आंशिक रूप में कर पा रहे हैं। उससे उन्हें क्षमतावृद्धि, तनाव-रहितता का लाभ प्रत्यक्षतः मिला है। अरुण ब्रह्मचारी तथा इन पंक्तियों के लेखक के जीवन की कर्म-क्षमता पर भी उस नियम का प्रभाव है।

पितर सूत्र ब्यालिस :- पितर उपाधिर्भिद्यते न तु तद्वान्- उपाधि का भेद होता है, परन्तु उपाधिवाले का भेद नहीं होता है।

       मैं तनजानिया के सोंगेया प्रांत में, सोंगेया शहर में रीजनल वाटर इजीनियर के दफ्तर में बैठा था। उसने मुझसे पूछा- तुम किसके अन्तिर्गत कार्य करते हो ? मैंने कहा- रिजनल वाटर इजीनियर के अन्तर्गत। वह कटु हो उठा- याने मेरे अन्तर्गत काम नहीं करते ? नहीं आपके अन्तर्गत उसी सीमा तक कार्य करता हूं जिस सीमा तक याद आप रीजनल वाटर इजीनियर हैं। उसने पूछा- ये रीजनल वाटर इजीनियर क्या है ? मैंने उतर दिया- अधिकारों, दायित्वों के अतर्गुंथित समूह से निर्मित पद है जिस पर आज आप हैं।

       मैं कहता हूं तुम मेरे अन्तर्गत कपयेला के अन्तर्गत कार्य करते हो। जानते हो मैं तुम्हें अभी गिरफ्तार करा दे सकता हूं, जेल भिजवा दे सकता हूं।

       मैंने दायित्व सीमा में काम किया है। कोई रीजनल वाटर इंजीनियर मुझे गिरफ्तार नहीं करा दे सकता। मैं कपयेला के अन्तर्गत कार्य नहीं करता।

       उसने अपनी सेक्रेटरी को फोन किया कहा कि वह रीजनल पुलिस कमिश्नर से बात करेगा। उसने रीजनल पुलिस कमिश्नर आफिस से बात की, मेरी गिरफ्तारी कराई।

       मैंने उसी आफिस से रीजनल डेवलपमेंट डायरेक्टर से इस बारे में बात की। रीजनल डायरेक्टर उसी समय आया। सामान्यतः अफ्रिकन अफसर अफ्रिकन अफसर को डांटता नहीं है पर आर.डी.डी. ने उससे सख्त आवाज में कहा- तुम घटिया व्यवहार बंद करो, भविष्य में सावधान रहो, बात समझा करो।

       प्रशासन में हर उपाधिवाला उपाधि सीमा के अन्तर्गत कार्य करता है। उसे उपाधि सीमा, उपाधि अधिकार, उपाधि दायित्व ज्ञात होने चाहिएं। न्यायालय व्यवस्था में अधिकार क्षेत्र ;श्रनतपेकपबजपवदद्ध इसका उत्तम उदाहरण है।

       ‘‘उपाधिभेदे ऽ प्येकस्य नाना योगः’’ उपाधि भेद से भी एक के नाना भेद होते हैं। अन्यथा भी कई भेद होते हैं।

       सफल कर्मचारी वह है जिसका एक भाग वह हमेशा ज्ञान कर्म योग से बड़ा नियमबद्ध करता रहता है तथा उपाधि भाग हमेशा ही उससे छोटा रहता है।

       शाश्वत, ऋत सत्य से युजन उपाधि नियमों को सहज कर देता है। तटस्थता बुद्धि की आत्मा है सिद्धान्त उपाधि क्षेत्र में कार्यक्षम होने में अपरिमित योग देता हैं। प्रजातंत्र व्यवस्था मूलरूप में स्वरूपतः ही अक्षमता स्तर पर कार्य करती है। ‘प्रजामत’ का योग्यता आधार ही अयोग्यता है। इसमें एक क्षमता बढ़ाने का पैमाना प्रजानुरूप घटिया होना है। जो घटियापन में जितना अधिक होता है उसे उतने उंचे पद या उपाधि से लाद दिया जाता है। ‘‘बड़ी उपाधि में घटियातम एक’’ प्रधान मंत्री राष्ट्रपति मुख्यमन्त्री हो जाती है। और देश बरबाद हो रहे.. विश्व बरबाद है।

       उपाधिवाला जब उपाधि से भेदित या प्रदुषित हो जाता है तो जो स्थिति होती है उसका एक चित्र इस प्रकार है-

       अच्छा बेटा था,

       अच्छा पति था,

       अच्छा पिता था,

       अच्छा भाई था,

       अच्छा दोस्त था,

       एक दिन एम.डी., प्रधानमन्त्री या दुकानदार हुआ बस एम.डी., प्रधानमन्त्री या दुकानदार रह गया।

       ‘‘उपाधिवाला एक’’ उपाधि से हमेशा बड़ा होना योग्यता, पद अधिकार व्यवस्था की महान आश्यकता है। संस्थान एवं व्यक्ति दोनों के प्रयास से ही यह आवश्यकता पूर्ण होती है। समय के साथ ही साथ संस्थान नवीनीकरण एवं व्यक्तिनवीनीकरण उपाधि एवं एक के उपयोग का सर्वोत्तम पथ है।

पितर सूत्र तिरतालीस :- पितर जन्मादि व्यवस्थातः पुरुषबहुत्वम्- जन्म आदि की व्यवस्था से पुरुष में बहुत्व होता है।

       संसार में जन्म व्यवस्था संस्कार जाति, आयु, भोग विपाक परिपक्वता तीव्र-मंद कर्म विपाक युक्त स्वतन्त्र है। काल व्यतिक्रम इस व्यवस्था में नहीं होता। बड़ा भाई छोटा भाई नहीं हो सकता। भविष्य तिथि भूतकाल में नहीं भोगी जा सकती है। समय वह संसाधन है जिसे दो दिशा नहीं जिया जा सकता है। इसलिए भी जन्म से बहुत्व होता है। जन्म का बहुत्व शाश्वत है।

       प्रशासन में ‘‘जन्मादि व्यवस्थातः पुरुष बहुत्वम्’’ नियम का सीधा क्रम सहजतः वरिष्ठता से जोड़ा जाता है। ब्रिटेन, तनजानिया, जापानदि देशों में समान शिक्षा होने पर इस नियम का वेतनादि के सन्दर्भ में दृढ़ता पूर्वक पालन होता है। व्यवस्था में प्रवेश की तिथि व्यवस्था से जन्म मानी जाती है। कभी-कभी सुबह शाम का अन्तर पद व्यवस्था के अन्तर का भी कारण बन जाता है। यह बड़ा ही संवेदनशील तथ्य है। ‘‘जन्मादि व्यवस्थातः पुरुष बहुत्वम्’’ अत्यधिक चिन्तनीय तथ्य है।

       तब मैं तेईस वर्ष का था। शिक्षा के कारण एक विभाग का प्रमुख बना दिया गया। मेरे अन्तर्गत एक बुजुर्ग सज्जन थी कुलकर्णी कार्य करत थे। ते मुझको साहब कह नम्रतापूर्वक अभिवादन करते थे। एक-दिन, दो-दिन, तीन-दिन मैंने उन्हें नम्रता पूर्वक उसके लिए मना किया। वे मान न सके। एक दिन प्रातः वे मेरे आफिस रोज की तरह सुबह आए। मैं अपनी जगह से उठा तत्काल उनके पांव छू लिए, कहा आशीर्वाद दीजिए। उन्हाने आशीर्वाद दिया। ‘जन्मादिव्यवस्थातः’ बाद में उन्हाने मुझे जो सहयोग मेरे जीवन को अपने अनुभव से दिया वह मेरी नौकरी के आरम्भिक दिनों की रौशनी है।

       सांस्कृतिक परिवार में जन्मादिव्यवस्थातः बड़ी प्रबल होती है। मात्र आठवी पास गमछा-छाप निर्धन बड़े भैय्या के एक वर्ष छोटा भाई चीफ इन्जीनियर टीप-टाप करोड़पति जब स-आदर चरण छू धुलि सिर लगा लेता है तो जन्मादिव्यवस्था संस्कृति पर मन गदगद हो जाता है।

       कुछ वर्ष पूर्व की बात हैं- मैं बिलासपुर सड़क पर जा रहा था। वहीं मुझे चौथी/तीसरी में पढ़ानेवाले दुबले-पतले मेट्रिक पास गयाप्रसाद गुरुजी जा रहे थे। मैंने जन्म-संस्कृतिव्यवस्था उनके चरण छू लिए। उन्होने पहचाना नहीं। मैंने बताया.. उनके मुंह से निकला- बेटा तुम तो भिलाई में इन्जीनियर हो न.. और खूब-खूब पढ़े हो न..? वे गदगद कम हुए, मैं ज्यादा हुआ।

       काश कोई व्यवस्था प्रशासन की इतनी उदार हो सके। प्रशासन की सारी खामियां मोग की तरह गल जाएंगी, कपूर की तरह उड़ जाएंगी।

       शायद पितर सूत्र कभी यह उद्योगक्रान्ति कर सके जो भारत को सिरमौर बना सके।

पितर सूत्र पैंतालिस :- पितर विदितबन्धकारणस्य दृष्ट्या तदरूपम्- जिसने बन्ध का कारण जान लिया रूप जान लिया। रूप सम सत्य है। भारत में एक कहावत प्रचलित है तथा हर भारतीय उसका सहज प्रयोग करता है वह है ‘‘भारतीय समय’’। भारतीय समय का पाबन्द नहीं है या भारतीय समय-तोड़ है। समय-तोड़ भारतीय क्रमशः वादा-तोड़ भी होता जा रहा है। इसका कारण है कि भारतीय को बन्ध का कारण ज्ञात नही है। बन्ध का कारण अविवेक है।

       रूसो की नौकरी लगी। उसे दस बजे ड्यूटी पहुंचना पड़ता था। रूसो की सारी जिन्दगी आवारागर्दी में बीती थी। दस बजे ड्यूटी पहुंचना उसके लिए कठिन कार्य था। सवा नौ बजे से दस बजे की घंटी बजने लगती थी। रूसो समझदार था, एक दिन उसने तंग आकर घड़ी उतारी। उसे खलबत्ते में कूटकर फैंकते हुए कहा- ये गई घड़ी और ये गया आफिस। फिर आराम से बिस्तर पर लेटते कहा- आज मैं दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति हूं।

       भारतीय काश घड़ी कूट सकते। पर वे घड़ी नही कूटते, घड़ी कलाई पर पहने-पहने घड़ी देखते समय को खलबत्ते में कूटते रहते हैं। और दुनिया के सबसे दुखी व्यक्ति होते रहते हैं।

       एक था बेनी.. सच्चा, सरल, सीधा, धार्मिक, ईमानदार। उसकी नौकरी लगी। पहले दिन से आखिरी दिन तक सतत ड्यूटी समय आठ बजे से पांच मिनट पूर्व वह कार्य पर उपस्थित रहता रहा। एक भी बार उसकी घंटी नहीं बजी। वह कभी भी समयबद्धता से परेशान न हुआ। बन्ध कारण जीत था वह।

       बद्धता का कारण जीत लेना ही रूप पहचानना है। रूसो ने बद्धता का रूप पहचाना बेनी ने बंध का कारण पहचाना। मध्य में जीते भारतीय समय-हत्या के माध्यम से स्व-हत्यारे हैं। उनके लिए असूर्य नाम का लोक है, जिसमें भूख, आवेग, दुःख, वितण्डा, चिन्ता आदि भरे हुए हैं। क्षमता वृद्धि के लिए रूसो होना या बेनी होना होगा।

       ‘‘सा रे ग म प ध नि’’ बन्ध हैं, जीवन अनुशासन बन्ध हैं। ‘‘सा रे ग म प ध नि’’ का कारण भावलय साधना से जाना जाता है। जीवन राग-रगिनी के रूपों के आल्हाद से भर जाता है। जीवन अनुशासन बन्धों का कारण जान लिया जाए तो मानव ऋत्विज (ऋतु-ऋतु सन्धियों का सुज्ञाता, उपयोग कर्ता) दिव्य हो जाता है। उसका जीवन ब्रह्मलय हो जाता है।

पितर सिद्धान्त छियालिस :- पितर नान्धा ऽ दृष्ट्या चक्षुष्मतामनुलम्भः – अन्धों के न देखने से आंख वालों को अनुपलब्धि नहीं होती।

       तर्क प्रतितर्क

       खूब खूब चला

       फिर एक ने कहा

       दूसरे ने कहा

       तीसरे चौथे ने कहा

       पांचवे ने भी कहा

       चीं पों ऽ

       मैंने कहा- दर्शन आइना।

       सारे मुझपर चीखे

       गधा..!

       मैं सहजतः जीत गया।

       अन्धों में देखनेवाले एनेक्सगोरस, सुकरात, स्पिनोजा, गेलीलिओ, कांट आदि पाश्चात्य चिन्तक तथा भारत में कृष्ण, जैमिनी, बादरायण, गौतम, कपिल, पतंजलि, कणाद आदि की उपलब्धियां अन्धो द्वारा न पढ़ी, समझी जाने पर कम नहीं होती। प्रजातंत्र व्यवस्था के उल्लू इनका उपयोग करें या न करें हर व्यवस्था की वास्तविक उपलब्धि का आधार उन आंख वालों के सिद्धान्त ही रहेंगे। आंख वालों में आंखवालों का आधार ज्ञान वेद है। वेद से वेदज्ञान न लेने से वेद का कोई नुकसान नहीं होता, अन्धों का ही नुकसान होता है।

       निर्माण विभाग में कार्य करने के मानक हैं, ठैके के शर्तें हैं, प्रमोशन के नियम हैं। ये नियम आंखवालों ने गढे हैं। एक समय छज्जे में नीचे लोहा लगाने वाले, ढाल पर पुल बनाने वाले श्री.आर.एस.आयरन, वर्कशाप की ग्लोबलवाल गिराने वाले श्री.राठी, अस्पताल में छज्जा, खुर्सीपार में छज्जा गिरानेवाले श्री सांवले, खुर्सीपार में टैंक कमजोर- मात्र दो-तिहाई क्षमता पर काम मे आनेवाले, सारे मैन होलों में कम तथा गलत लोहा लगाने वाले श्री.झा एम.पी., जमीन से ऊपर मैन होल बनाने वाले श्री.शर्मा आदि-आदि अन्धों को व्यवस्था के अन्धों ने सक्षम मानते हुए प्रमोशन दे दिए। उससे उन नियमों का मूल्य कम नहीं हुआ। वे नियम आज भी सत्य हैं। इन परिस्थितियों मेरा प्रमोशन न हुआ, मैंने एक कविता लिखी थी तब-

       मुर्दो से प्रतिद्वन्द्विता,

       मुर्दे ही निर्णायक,

       मैं सबसे सहज विजित

       मैं कितना जीवित।

       मेरे जीवित होने के जीवन प्रमाण उपलब्ध थे। दल्ली राजहरा के लिए योजना स्लरी डिस्पोजल की ;ैसनततल क्पेचवेंसद्ध रूस के इन्जीनियरों ने बनाई। तरते पाइप योजना। योजना हेतु डिजाइनर थे बी.ई.डी.वी तथा मेकान तथा रूसी डिजाइन संस्थान ग्रिपोरूद। योजना में सारे स्लरी टैंक तालाब में ४०० मिली मीटर के ६ मीटर लम्वे फ्लैंजो से जुडे पाइपों को जोड़कर बड़ी-बड़ी लकड़ी के चौकों से तैराते उसमें स्लरी पंप करते छै-छै मीटर वर्गों में पाइप निकालते स्लरी वितरण की उस समय बत्तीस लाख रुपए की लागत थी। किनारे तक पाईप में ८० मीटर का पंपिंग हैड था।

       धोखे से योजना मेरे पास आई। मैंने संस्थान की इच्छा विरुद्ध लिखित सुझाव दिया कि योजना अनावश्यक है। मात्र किनारे पर लचीला जोड़ पाइप टुकड़ा लगा देने से स्लरी टैंक में वितरित हो जाएगी। मेकान के इंजीनियरों ने योजना में परिवर्तन किया, उनकी योजना इस प्रकार की थी- लचीली जोड़ के साथ पी.वी.सी. पाइप ४०० मिलीमिटर का फ्लैंज जोड़ो का टैंक जितनी लम्बाई का पानी भरे टैंक में तैरेगा तथा उसे मोटरबोट से घुमा-घुमा कर विभिन्न स्थानों छै-छै मीटर दूर स्लरी जमा की जाएगी। मैंने अकेले असंदर्भित होने पर भी इसका विरोध किया। लिखित रूप में अपनी योजना पुनः भेजी। मेकान के इंन्जीनियर श्री अम्बेकर तथा मैं टाटा की नोवामुंडी तथा किसबुरा की खदानों में स्लरी वितरण व्यवस्था देखने भेजे गए। वहा स्लरी पंप करके किनारों पर नालियों में छोड़ दी जाती तथा पूरे टैंक में वितरित हो जाती देखी। नोवामुंडी की स्लरी का आपेक्षिक घनत्व हमारी दल्ली योजना की स्लरी से अधिक था। मैंने रिपोर्ट बनाई। मेकान के श्री.अंबेकर ने खुद के विरुद्ध, मेकान योजना के विरुद्ध रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। मैंने अकेले रिपोर्ट दी तथा रिपोर्ट साथ नया सुझाव दिया कि स्लरी (गुरुत्व के आधार पर गणना करके) सीधे पाइप से टैंक में छोड़ी जाए लथा पंपो के प्रयोग द्वारा टैंक से पानी पुनः वापस प्राप्त कर लिया जाए।

       महाप्रबन्धक (खदान) श्री.विमलेन्दु मुखर्जी ने महा मीटिंग बुलाई। मिटिंग में रूसी इन्जीनियर, मेकान के इंजीनियर, खदान के इंजीनियर बी.ई.डी.वी. के इन्जीनियर और सबसे छोटे पद का इंन्जीनियर मैं था। पूरी चर्चा में मैं अकेला था। लम्बी बहस हुई। अन्धों के न देखने से सत्य नहीं बदलता। आंखवालों के गलत देखने से भी सत्य नहीं बदलता। मेकान तथा रूस की योजना रद्द की गई। मेरी आधी योजना (वापस पंपिंग छोड़कर) मान ली गई।

       केवल यह नहीं इसी समय में करीब दस लाख की कोक ओव्हन बाई प्रोडक्ट प्लांट के १५०० मि.मी. पाइप के स्थान पर ऊचाई पर खुली ट्रफ लगाने की योजना तकनीकी मानकों पर दृढ़ रहते अकेले बी.ई.डी.वी. तथा कोक ओव्हन इंन्जीनियरों से संघर्ष कर निरस्त करवाई। राजहरा नगर जल प्रदाय योजना के स्वरूप में कैम्प खुर्सीपार योजनाओं के स्वरूपों में परिवर्तन कर जनलाभ बढ़वाया। इन सबके लिखित प्रमाण उपलब्ध हैं। और सस्ते इन्जीनियरों के खिलाफ मेरा प्रमोशन न हुआ। पर सत्य जगमगाता रहा।

       अव्यवस्था के कारण यथार्थतः सारी उपलब्धियां आंखवालों की ही हैं। श्रेय भले ही अन्धे ले लें।

       प्रमोशन न होने पर मैंने तेरह साक्षात्कार लेनेवालों को सुकरात के शब्द जो उसने पांच सौ एक न्यायाधीशों से कहे थे लिखित रूप में साहस पूर्वक समर्पित किए। लिखित सूचना दे, दो दिवस उपवास किया कि व्यवस्था सद्बुद्धि पाए।

       ‘जनवाणी’ में वह पत्र भेजा। पत्र पर पी.चिदम्बरम् से लिखा पूरी जांच की जाए। इस्पात मंत्री ने सेल चेयरमैन को दिया। सेल चेयरमैन श्री कृष्णमूर्ति ने लिखा- व्हाट इज धिस ? तत्कालीन एम.डी. ने उसकी प्रतियां विजिलेंस तथा कार्मिक विभाग प्रमुखों को दी। कार्मिक विभाग प्रमुख ने मेरे विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रस्तावित की। उसके प्रतिनिधि की जोशी ने कार्यवाही की सूचना मेरी प्रतिकिया जानने मुझे दी। और मैं हंस दिया जोर से। श्री जोशी आश्चर्य चकित हुए। मैंने उन्हें कारण बताया- आप कार्यवाही करोगे तो क्या मैं मूर्ख हूं जो आपको उत्तर दूंगा, मैं उत्तर दूंगा पी.चिदम्बरम् को। अव्यवस्था की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

       व्यवस्था में टुकड़े-टुकड़े आंखवालों ने व्यवस्था को लाभप्रद रखा है। ये मजबूत रीढ़ के लोग हैं। इनमें श्रम, तप, नियम, ज्ञान, यश, शोभा हैं। इनकी इज्जत व्यवस्था भी करती है। ये धूर्तता से धूर्त हो लड़ नहीं सकते कि प्रमोशन के लिए इन्हें घटिया होना स्वीकार नहीं हैं। ये देखने वाले हैं, अन्धों के न देखने से इन्हें फर्क नहीं पडता। काश कोई व्यवस्था ऐसी हो जहां आंखवाले टुकड़े न हों बल्कि सारे हों। पर यह सम्भव नहीं है।

पितर सूत्र सैतालिस :- पितर ईश्वरासिद्धेः – ईश्वर असिद्ध है। यह एक महा प्रशासन वाक्य है। इसका अर्थ कठिन है। इसमें दो वाक्य हैं- ईश्वर हैं। ईश्वर असिद्ध है। यह वाक्य मानव के सन्दर्भ में लिखा गया है। मानव जीवन में ईश्वर पूर्ण सिद्ध नहीं हो सकता है- ईश्वर-असिद्धेः।

       ईश्वर वास्तविक सर्वोच्च है। ईश्वर सर्वोच्च मानक भी है। हर मानक आधार ईश्वर है। ईश्वर असिद्ध का अर्थ है मानक शत-प्रतिशत मानव जीवन में नहीं उतर सकता है। मोक्षावस्था मानव की सर्वोच्चावस्था है। इस सर्वोच्चावस्था में भी ईश्वर जीवन में सिद्ध नहीं होता है, एवं मानव को मोक्षावस्था से पुनर्जन्म में आना पडता है। ईश्वर असिद्ध वह महान अहसास है, जो हर पल मोक्षावस्था में भी ईश्वर के प्रति जिज्ञासा को सतत कायम रखता है।

       ईश्वरासिद्धेः से जीवन व्यवस्था या प्रशासन व्यवस्था का महान सूत्र मानकासिद्धेः का प्रादुर्भाव होता है। इस सूत्र का विवेकपूर्वक उपयोग उद्योग को महा उन्नति दे सकता है। इस सूत्र का दुरुपयोग उद्योग को अवनति के क्ष़ेत्र मे धकेल दे सकता है, धकेल दे रहा है। मानकासिद्धेः अतः मानक के लिए अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए यह सूत्र का विवेकपूर्वक प्रयोग है। मानकासिद्धेः अतः मानक के लिए प्रयास ही छोड़ देना चाहिए तथा अनियमितता का पालन करना चाहिए यह इस सूत्र का अविवेकपूर्वक प्रयोग है।

       दो नए उच्च अफसर सूक्ष्म सर्वेक्षण ;ळमेकमजपब ैनतअमलद्ध विभाग में आए। उन्होंने थ्योडोलाइट का फेस लेफ्ट फेस राइट नियम सीखा जिससे त्रुटि न्यून होती है। उसी समय दल्ली राजहरा का बोरीडीर पाइप लाइन की ले आऊट का काम आया। जिसका सर्वे करना था। उन्होने त्रुटिरहित सर्वेक्षण जो कारखाने में होता है के अनुरूप योजना बनाई। जिसका मानक धन ऋण एक मिलीमीटर होता है। उन्होने तीन सर्वेक्षण टीमें छै माह समय के लिए अनुमति ली। मुझे टीम लीडर बना दिया गया। कार्य योजना मुझे नहीं बताई गई, कार्य बताया गया। पाइप लाईन की लम्बाई करीब १२ किलोमीटर थी। मैंने कहा कार्य दो टीमों द्वारा पन्द्रह दिनों में पूरा कर वापस आ जाऊंगा। उन्होने व्यंगात्मक शैली में कहा- ठीक है, जाओ पूरा करके आओ..! दो टीमें गईं, कार्य ग्यारह दिन में पूरा हो गया। ट्रांसीशन तरीके का प्रयोग किया गया। चार दिन में प्लाटिंग तथा चेकिंग की गई। वापस आ मैंने रिपोर्ट दी। उन्होने सवोच्चाधिकारी से शिकायत की- इसने फेसलेफ्ट फेसराइट नहीं किया अतः सर्वे ठीक नहीं हुआ। मैंने कहा महोदय जंगल भूमि में त्रुटि सीमा ऋण धन एक मीटर तक हो सकती है। काम पाइपलाइन का है अतः कारखाने के मानकानुसार काम आवश्यक नहीं है। उच्चधिकारी सब समझ गया। मुझे उनके सामने उसने शाबाश कहा, गुड कहा।

       कारखाने की शर्त कि मानकासिद्धेः उपस्करों के लिए ऋण धन एक मिलीमीटर है। जंगल में पाइपलाइन के लिए मानकासिद्धेः ऋण धन एक मीटर है। जबकि कई मीटर जंगल ही जंगल है। मानकासिद्धेः या ईश्वरासिद्धेः नियम कारखाने में क्षमतावृद्धि का महान नियम है।

       सारे ऋण धन नियमों का उत्पत्ति नियम, फैक्टर आफ सुरक्षा के नियम कामुआत में झोल नियम, आटो प्लान में रिसोर्स एलोकेशनादि ईश्वरासिद्धेः या मानकासिद्धेः का रूप हैं।

       यह कार्य का सैद्धान्तिक कम व्यवहारिक नियम अधिक है। इसमें नियमसिद्धि तथ्य लोग प्रायः भूल जाते हैं तथा नियम-असिद्धि को अनियम-सिद्धि समझ लेते हैं। अनियम सिद्धि का व्यापक फैलाव हो जाने पर व्यवस्थाएं चौपट हो जाया करती हैं। वर्तमान प्रजातन्त्र का विकासशील देशों में यही चोपट स्वरूप लागू है।

       किसी भी व्यवस्था में लचीलापन ईश्वरासिद्धेः नियम के कारण ही है। यह लचीलापन कार्य साधकता के लिए जरूरी है।

पितर सूत्र अडतालिस :- पितर स हि सर्ववित् सर्वकर्ता- वही सर्वज्ञ और सर्वकर्ता है। यथार्थतः सटीक नियमों के कारण ही सारे के सारे कार्य होते हैं। एक भी कार्य अनियमों के कारण नहीं होता है। ईश्वर असिद्धि से कम पर कार्य ठहर जाते हैं। यदि रेफ्रिजिरेटर में न्यूनतम सह मानक (मानक असिद्धेः) से कम वोलटेज हो तो अनियम हो जाता है तथा वह जवान दे देता है।

पितर सूत्र उन्चास :- पितर ईदृशेश्वर सिद्धा- इस प्रकार ईश्वर सिद्ध है। इस प्रकार नियम सिद्ध है। अनियम असिद्ध है।

       उपरोक्त तीन सूत्र एक उत्तम शंका समाधान है। जिसका उद्योगशास्त्र उपयोग कर सकता है। एक रोचक तर्क बातचीत में दिया जाता है कि गिलास आधा भरा है या गिलास आधा खाली है कुछ भी कह लो। यह तर्क से विचार करने पर पता चलता है कि गलत है। तथा दोनों बातें समान नहीं हैं। इसे जरा सरल तर्क के रूप में लें तो आधा काम उपाया आधा काम नहीं हुआ है तथ्य उभरता है। इससे तीन तरह के चिन्तन उमरते हैं १) आधा काम बाकी है। २) आधा काम हुआ है। (३) आधा काम हुआ हैं तथा आधा काम बाकी है। स्पष्ट है तीसरा चिन्तन सही तथा पूर्ण है। पहले दोनों चिन्तन आधे-अधूरे हैं।

       ईश्वरासिद्धेः स हि सर्ववित् सर्वकर्ता ईदृशेश्वर सिद्धि। ये तीनों सूत्र गिलास आधा भरा है तथा आधा खाली है के आधार पर सम्पूर्ण के आधार पर चिन्तन देते हैं सकारात्मक हैं।

पितर सूत्र पचास :- पितर ब्रह्मण्याधाय कर्माणि- ब्रह्मत्व के (शाश्वत नियमों के या ब्रह्म गुणों या लक्ष्यों के) आधाय (समर्पण या आधार) पर कर्म समूह हैं। दशरूपकम विधा में अधिकारिक के आधार पर (अधिकारिक सीधी लक्ष्य युजित है) पताका-प्रकरी आदि हैं।

       मैं निराकार हूं ब्रह्म सर्वव्यापक निराकार है। ब्रह्मण्याधाय कर्माणि की ओर इंगन करता यह एक लघु दृष्टान्त है। मैं निराकार हूं अव्याहत गति मेरा लक्ष्य है। मेरी निराकारिता प्रकृति से भी सूक्ष्म होने की निराकारिता है। चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद में क्या नताऊं कि मैं कौन हूं की निराकारिता और इस निराकारिता का उद्योगों में कार्यात्मक पालन ब्रह्मण्याधाय कर्माणि रूप है।

       देश के सन्दर्भ में संविधान के प्रथम पृष्ठ की उद्देश्यिका में कर्मों का आधाय हो। उद्योग के सन्दर्भ में सविधान उद्देश्यिका साथ-साथ उद्योग के साथ कार्य समझौता शर्र्तों में कर्मों का आधाय हो। इन कर्म आधायों के आधार पर मेरा कार्य हो। मेरे हर कर्म का आधाय लक्ष्य हो।

       ब्रह्मत्व का अर्थ ज्ञानत्व, नियमत्व, ऋतत्व है। सोलह नवम्बर मैं छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस में यात्रा कर रहा था। मध्यप्रदेश सरकार के व्यवहारकुशल, दक्ष वन एवं खनिजमन्त्री श्री सत्यनारायण शर्मा से ब्रडाब्रनि पर मेरी चर्चा हो रही थी। उन्होने एक सरल व्यवहार तर्क दिया कि मानव के पास इन्द्रियां हैं तो इन्द्रिय सुख अच्छे लगते हैं, लगेंगे ही। यह एक साधारण नियम है। आंखे हैं तो कही भी रूपसी होगी। जहां-जहां अच्छा रूप होगा उसकी लालसा होगी ही। मैंने कहा इस नियम को उत्कृष्ट रूप में सुबाधित किया गया है पत्नी के आधेय से। पत्नी के लावण्य रूप पर माहित होने शतप्रतिशत हक है इन्सान को। और वेद में उपमा में कहा भी हुआ है वेद विद्या हकदार के सम्मुख अलंकृत पत्नी की तरह विवस्त्रित होती है।

पितर सूत्र इक्यावन :- पितर अब्रह्मण्याधाय अकर्माणि- अब्रह्मत्व के धारण से अकर्म होते हैं। चौपट व्यवस्था से सब चौपट होते हैं।

       पिएंगे सिगरेट और कहेंगे हम नियमबद्ध कर्म करेगें। पिएंगे शराव और कहेंगे हम न्यायप्रिय हैं। कितने भोले लोग हैं.. और कितने भोले हैं वे लोग जो इनकी नियमबद्धता, न्याय पर विश्वास करते हैं।

       कई व्यवस्थाएं हैं- निरक्षर- जो कुछ पढ़ती ही नहीं। साक्षर- जो पढ़ती है, समझती है, जीती है। अक्षर- जो शाश्वत है, क्षरणशील नहीं है। अक्षर जो यथार्थवादी है। अक्ष के माध्यम से देखती भर है। क्षर- जो परिवर्तनशील है। सबसे घातक व्यवस्था है नाक्षर। हां क्षर से भी घटिया। जो पढ़ती है कुछ, समझती है कुछ और करती है कुछ। इसमें दुहरे-तिहरे विक्षेप होते हैं। विक्षेप १) व्यवस्था शराब बेचने की अनुमति देती है। २) व्यवस्था उस पर लिखाती है- शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। ३) व्यवस्था उस पर अत्यधिक लाभ कमाती है, अतः उसकी और बिक्री बढ़ाती है। ४) उसके विज्ञापन पर भी लाभ कमाती है। ५) उसके बेचनेवालों को भारी कमीशन देती है। ६) इस पर लिखे को पढ़कर भी लोग इसे पीते हैं। ७) पीकर बार-बार बहकते हैं। ८) छोटे-छोटे हो जाते हैं, समझते खुद को बड़ा-बड़ा हैं। यह व्यवस्था अब्रह्मण्याधाय अकर्माणि है। ‘‘अनियमत्वाधाय अशिक्षित’’ या नाक्षर इसके नाम हैं। इसे भ्रष्टाचार के घटियातम स्तर पहुंचना ही है।

       क्या वह व्यक्ति जीवन में कभी ईमानदार हो सकता है जो स्वास्थ के लिए हानिकर पढ़कर भी हानिकर को खरीदे, उपयोग करे ? आत्महना ही यह कर सकता है और आत्महना एक अंधकार का लोक खुद के लिए और दूसरे के लिए गढ़ता है।

       ‘‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि’’ से कई सूत्र उभरते हैं- ब्रह्मण्याधाय अकर्माणि, अब्रह्मण्याधाय कर्माणि तथा अब्रह्मण्याधाय अकर्माणि। इनकी श्रेणियां क्रमशः घटिया होती चली गई हैं।

       व्यवस्था व्यवस्थापक अपनी गति जान सकते हैं तथा उसके अनुरूप उन्नयन योजना बना सकते हैं। ‘‘अब्रह्मण्याधाय अकर्माणि व्यवस्था में पद-व्यवस्था अक्षमता के स्तरधारियों से भरी रहती है।

पितर सूत्र बावन :- पितर नेति नेति- यह नहीं है, यह नहीं है। यह वास्तविक स्थिति नहीं है। यह दूसरी भी वास्तविक स्थिति नहीं है। ‘‘नेति नेति’’ क्षमता के स्तर का महान चिन्तन है।

       एक थे मिस्टर जैकब अतिरिक्त मुख्य अभियन्ता। एक दिन मुझसे बोले- पांच साल और एक दिन। मैंने कहा- मैं समझा नहीं। वे बोले- अब मेरी नौकरी के पांच साल एक दिन भर बचे हैं। और इसी तरह वे रोज एक-एक दिन गिनते। वे अक्षमता के स्तर पर बुरी तरह लड़खड़ा रहे थे। श्री प्रकाश डी.जी.एम. इनके भी गुरु थे। उन्होने दरवाजे के पीछे पूरा बाकी दिनों का केलेंडर बना रखा था और एक-एक दिन काटते जीते थे। हर दिन वे सेवा निवृत्ति के नजदीक पहुंचते रहे। ये दिन गिनना तो ऐसा है मानों सेवा निवृत्ति दिवस न हुआ वह मृत्यु दिवस हुआ। हर नौकरीपेशा एकाध अपवाद छोड़ सेवानिवृत्ति प्रभावित होता है। कोई-कोई तो बिलकुल पागलवत व्यवहार करता है। मैं विभिन्न व्यवहारों का चश्मदीद गवाह हूं।

       ये सारे पढ़े-लिखे जी.एम., डी.जी.एम., मुख्य अभियन्ता सेवानिवृत्ति के वर्षों पूर्व के घोर अनिश्चितता, आत्मविश्वास-हीनता की स्थिति दस-दस, बारह-बारह लाख रुपए की राशी मिलने पर भी भोगते हैं। कारण ये पद से बहुत छोटे-छोटे इति इति हैं। इनकी तुलना में पद्मा चौदह साल की कचरा बीनती लड़की से भविष्य की बात करो तो वह हंस देती हैं। कहती है- भैया भिलाई में पेट तो कुत्ता भी भर लेता है, मैं तो आदमी हूं। वह नेति नेति है कि उसका पद बहुत छोटा है।

       छोटे से पद पर नेति नेति होना ज्यादा उल्लासपूर्ण, उत्साहवर्धक है। बड़े-बड़े पदों पर इति होने के स्थान पर।

       सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, निराकारादि ब्रह्म वह ज्ञेय-अज्ञेय सम्मिश्र है जिसे नेति नेति ज्ञात परे तक विस्तृत होने के कारण कहा गया है। ब्रह्मत्व धारणीय कुर्सी या पद की अपेक्षा न इति न इति नेति नेति आरम्भ से अन्त तक होता है। वह सेवा निवृत्तनहीं होता कुर्सी उससे सेवा-निवृत्त होती है।

पितर सूत्र तिरपन :- पितर तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा- सारा दृष्य द्रष्टा के लक्ष्य प्राप्ति के लिए है। द्रष्टा दृष्य के लिए नेति नेति ही होना चाहिए। दृष्य के प्रति दृष्टा का इति इति हो जाना हेय (घटिया अक्षमता) हेतु है। हेय का नाम है त्याज्य दुःख। द्रष्टृ दृश्ययोः संयोगो हेयहेतु है। त्याज्य दुःख तब आदमी को लील लेता है जब द्रष्टा आदमी का संयोग बन्धन दृष्य से हो जाता है या साध्य साधन से बन्ध जाता है।

       निकटतम को यह छोड़ता नहीं, निकटतम को यह देखता नहीं। देवता का अमर काव्य देख देवता युजन हो जाएगा। बडा सरल सूत्र है यह। सत्-चित्-आनन्द। सत है ब्रह्म रचित प्रकृति (प्रकृति मनुष्य रचित भी अशंतः होती है पर वह सत्-असत् होती है) सच्चित् है जीवात्मा और सच्चिदानन्द है परमात्मा। तीनों स्वरूपतः क्रमशः निकटतम हैं।

       कई बार रेलगाड़ी में सफर करते मैं धर्म-चर्चा करता हूं। मैं प्रश्न करता हूं सबसे कि इस सृष्टि में सारा कुछ सत् है नियमबद्ध है। लोहे, सोने, चांदी आदि के परमाणु इनसे निर्मित यौगिक, गुरुत्वाकर्षण खिंचे घूमते धती, सूर्य, तारे, आकाशगंगाएं सभी कुछ सत् है, नियमबद्ध है। बताइए इस सब में अनियमित क्या है ? सब प्रायः मौन सोचते रहते हैं। मैं कुछ समय बाद उत्तर देता हूं- आदमी या मनुष्य। परमात्मा या वेद के नियम तो छोड़ ये खुद-खुद के नियम भी तोड़ता है। कोई प्रश्न करता है- आदमी नियमतोड़ क्यों है ? मैं उत्तर देता हूं क्योकि वह शत-प्रतिशत स्वतन्त्र है कर्म करने में। वह सच्चित् है, चैतन्यता के कारण कर्म में स्वतन्त्र है पर फल भोगने में परतन्त्र है। जहर खाकर जीने में स्वतन्त्र नहीं है। सिगरेट पैकेट पर पढ़ता है स्वास्थ्य के लिए हानिकर है, उसे पीता है अनियमित आदमी कि स्वतन्त्र है। पर बाद में खांसी स्वास्थ्य ह्रास से बचने में स्वतन्त्र नहीं है। वहां सच्चिदानन्द के नियमों से परतन्त्र है। सत् में नियम देख सच्चिदानन्द उसको प्राप्तव्य है।

       क्या सिगरेट छूट सकती है ? -एक व्यक्ति पूछता है।

       बेशक, -मैं उत्तर देता हूं।

       नहीं साहब वह नहीं छूटती है -दो तीन व्यक्ति कहते हैं।

       अच्छा एक बात बताइए इस सीट ने मुझे पकड़ रखा है क्या ?

       सीट केसे पकडेगी ?

       अगर मैं कहूं कि सीट मुझसे नहीं छूटती है.. क्या आप इसे मानोगे ? मैं पूछता हूं।

       नहीं मानेंगे साहब, सीट को आप नहीं छोड़ेंगे तो वह कैसे छूटेगी ? -वे करते हैं।

       सीट भी जड़ है, सत् है। सिगरेट भी जड़ है, सत् है। जैसे मैं सीट को किसी भी पल छोड़ सकता हूं आप सिगरेट किसी भी पल छोड़ सकते हैं। इसी पल सिगरेट फेक दीजिए और छोड़ दीजिए, आप सच्चित् हैं, शत प्रतिशत स्वतन्त्र -मैं कहता हूं। और दो-तीन व्यक्ति सिगरेट छोड़ देते हैं। भिलाई में भी कई ऐसे व्यक्ति हैं जो समझ कर बीड़ी सिगरेट छोड़ चुके हैं।

       दृष्य द्रष्टा के ब्रह्मप्राप्ति के लिए हैं, उससे बन्धने के लिए नहीं। ब्रह्म निकटतम है इसकी प्राप्ति का रास्ता ब्रह्मत्व जो निकटतम प्रकृति में ऋत नियमों में हैं से होकर जाता है। सत् में ऋत देख ऋतज्ञ हो सत् छूट जाएगा, ब्रह्म दीख जाएगा, मिल जाएगा।

       लक्ष्य की प्राप्ति के साधनों में नियमों को देख, नियमबद्ध हो जा, लक्ष्य की सिद्धि हो जाएगी। यदि साधन से बन्ध गया तो लक्ष्यसिद्धि नहीं होगी।

       ठेकेदार, ठेका, संसाधन सत् हैं। जो नियम की शर्तों से इन्जीनियर के निकटतम कार्य के सम्बन्ध में है। कार्य पूर्ति लक्ष्य है जो इन्जीनियर के निकत्तम है। इन्जीनियर ठेकेदार से बद्ध हो गया, उसका अहसान मंद हो गया किसी भी कारण से तो परियोजना कभी भी सटीक तथा सही समय पर पूरी नहीं होगी। इन्जीनियर लक्ष्य से भटकता रहेगा। दीवाल, छज्जा, टैंक गिरते रहेंगे। पद अपमानित होते रहेंगे। इति इति सत्य समझा जाएगा। सिगरेट, शराबों से लोग बन्धे रहेंगे। नियम सच्चित् मानव का लक्षण तथा गुण है। पशुता सत् से आबद्ध होने का नाम है। जड़वत जीवन है, जो जीवन होता है पर कम स्तरीय होता है, अक्षम होता है।

       द्रष्य द्रष्टा के लक्ष्यप्राप्ति के लिए है।

पितर सूत्र चौवन :- पितर तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा- उसकी सात स्तरीय अवस्था वाली प्रज्ञा है।

१) जान लिया, २) दूर किया, ३) साक्षात किया, ४) करना था किया (पूर्ण-रूपेण), ५) अधिकार शेष नहीं रहा, ६) कारण लय हो गए साधन, ७) लक्ष्य सिद्ध हुआ।

       प्रज्ञा के ब्रह्म उपलब्धि नियम अद्भुत रूप में पद कार्यों पर भी लागू होते हैं।

१) जान लिया कि साधन मात्र (नियम रहित साधन) गुण-वृत्ति-विरोध के कारण हेय है।

२) साधन संयोग का कारण (निहित स्वार्थ- परिचित को नौकरी लगवाना, मंदिर बनवाना, घर बनवाना, कारादि संसाधन उपयोग करना, संस्था हेतु दान लेना आदि) दुर कर दिया। द्रष्टा दृष्य संयोग हेयहेतु दूर कर दिया।

३) लक्ष्य को नियम साधन सहित साक्षात ज्ञान किया।

४) लक्ष्य साक्षात हेतु सौम्य शान्त विप्लवरहित प्रयास कर लिया।

५) अधिकार लक्ष्य प्राप्ति पर छोड़ दिए क्रमशः।

६) मूल कारण लक्ष्य सिद्धि का ग्रहण कर लिया साधनों के संदर्भ में।

७) नियमों के माध्यम से नियमों से परे लक्ष्य की सिद्धि हुई।

       ‘‘सप्तधा प्रान्त भूमिः प्रज्ञा’’ कार्य निष्पादन की उच्चावस्था है। सप्त ऋषि ब्रडाबनि अवस्था में ही उतरती है। समूह सप्त ऋषि ब्रड़ाब्रनि वह अन्य लक्ष्य हैं जो ऋग्वेद के संगठन सूक्त में दिया गया है।

       उपरोक्त का व्यवहारिक उदाहरण जो मुझे समय आता है मेरे द्वारा सांतसा लिखना तथा अरुण द्वारा उसे प्रकाशित करना है। सांतसा में पितर सिद्धान्त भी शामील है।

पितर सूत्र पचपन :- पितर द्रष्टुः दृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्- द्रष्टा और दृश्य से सना हुआ चित्त पूर्ण आकार रंगा या सना होता है।

       चित्त सत् है- एक स्थिति। चित्त सच्चिदानन्द आपूर्त है- दुसरी स्थिति। चित्त प्रकृति आपूर्त है- तीसरी स्थिति। आपूर्ति माध्यम सच्चित है। प्रकृति से पूर्ण सने चित्त की एक घटना- तीन शराबियों, कबाबियों ने ठेकेदार से शराब-कबाब पार्टी रखी। उनका लक्ष्य नम्बर १ था। नम्बर १ बियर पी रहा था। तीनों बारी-बारी ढाल रहे थे। एक दो तीन। एक दो तीन। एक दो तीन। नम्बर वन ने कहा- आज कुछ ज्यादा हो गई है। एक हंसा- नहीं सर अभी तो शुरूवात है। वह दसवां ग्लास था। नम्बर वन ने खलास किया, चिल्लाया- ‘‘तिरसठ दिन’’। एक दो तीन चिल्लाए- हां सर तिरसठ दिन। ग्लास ग्यारह-बारह होना ही था, त्रि शेयर था न वह.. बास छै हाथों में झूल गया। छै हाथ दो हाथों के ही बराबर रह गए थे। वहां भी तो ढल गई थी न ? मेरे हाथ चार हाथ थे। मुझको साथ जाना पड़ा। बास का घर.. छै हाथ, तीन आवाजें, एक स्वर- ‘‘ए स्टार सर..!’’ बास का स्वर ‘‘अ.. हं.. हां.. ए… स्टा….’’। तीनों के चेहरे चमक उठे।

       चार दिन बाद डी.पी.सी. तीनो ने द्रष्टृ दृष्योपरक्तं चित्तं सर्वाथम् के घटिया प्रयोग में सफलता पाई थी। तीनो ‘‘ए स्टार’’ रहे। आज तीनों तेरहों से ऊपर मुख्य अभियंता हैं। प्रकृति सना चित्त माफ नहीं करता। इन मुख्य अभियन्ताओं द्वारा निर्मित परियोजनाएं फलागम (कमिशनिंग) के दो-दो साल बाद भी सटीक चालू नहीं हो सकीं। अक्षमता का स्तर हमेशा दुहरी तिहरी मार करता है।

       चित्त सत् है, अर्थात् उसका खुद का स्वरूप है। बाह्य प्रकृति आपूर्त चित्त दृष्य आपूर्त है। चित्त दृष्य आपूर्त होने से लक्ष्य दृष्टि से ओझल हो जाता है। क्षाणिक दृष्य सामने रहता है। दृष्य संयोग सना होना आवेग सना होना है। सह वृत्ति-सारूप्यावस्था का भी घटिया रूप है। यह क्षमता (पुरुष सच्चित्) का अक्षमता स्तर (प्रकृति- तमतत्व) युजन है।

       पद व्यवस्था निरर्थ उतार-चढ़ाव व्यवस्था है। हर चढ़ाव बाद घटियातम (पद स्थिति उस श्रेणी में) का उतार भाव मानव में आता है और वृत्ति में तेजी से परिवर्तन होता है। आल्हाद अवसाद हो जाता है। शत प्रतिशत शिक्षा, अनुभव, उम्र मात्र आधारित पद सोपान व्यवस्था मानव को एक ठहराव देती है। यह चित्त की सद् वृत्ति के अनुरूप है इससे व्यवस्था में अधिक ठहराव आता हैं।

पितर सूत्र छप्पन :- पितर कैवल्यं स्वरूप प्रतिष्ठा- स्वरूप में प्रतिष्ठित होना केवल ही केवल अस्तित्व है। ‘कैवल्यम्’ शब्द उद्योग के लिए बड़ा महत्वपूर्ण शब्द है। फलागम निर्वहण अवस्था की समाप्ति अवस्था हर कार्य योजना की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था है। परियोजना के लिए ‘‘शुन्य समय सक्षम उत्पादन क्षमता परियोजना समाप्ति के साथ ही’’ कैवल्य अवस्था है।

       ‘‘येन केन प्रकारेण’’ पूरी की गई परियोजनाएं येन केन प्रकारेण आरम्भ बड़ी मुश्किल से होती हैं। तथा येन केन प्रकारेण ही चलती हैं। यह देश के साथ विश्वासघात है। कैवल्यम् न समझने वाले अधजल-गगरी इन्जीनियरों के इन विश्वासघातों के कारण नए घरों में रहते लोग छत टपकने, फर्श धंसने, दीवारें दरारित होने से परेशान रहते हैं। प्रदूषण नियंत्रण की बड़ी-बड़ी लागत लगी सफेद हाथी योजनाएं मात्र बीस-तीस प्रतिशत कार्य करती हैं। सड़कें बनते ही सुधार मांगने लगती हैं। सौ वर्ष उम्र के भवन, पुल आदि तीस-चालीस कभी-कभी पंद्रह-बीस वर्षों में ही ढह जाते हैं। संयन्त्र के एकक उत्पादन ह्रास के माध्यम से द्रुत सुधार माध्यम से कम समय मे पूर्ण की गई परियोजना के कम समय का महान मूल्य चुकाते हैं।

       ‘‘पुरुषार्थ शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः’’ कैवल्यम् पूर्व गुण या कर्म कारण में लीन हो जाने चाहिएं। पुरुषार्थ रहितावस्था प्राप्त होनी चाहिए। हरपल दक्षता, नियमबद्धता से यह अवस्था प्राप्त होती है। इस अवस्था में व्यक्ति केवल ही केवल सन्तुष्ट रहता है। स्वयं-स्वयं से आत्मालाप करता है। सक्षमता सन्तोष से आपूर्त रहता है।

पितर सूत्र सत्तावन :- पितर ‘अथ’- आरम्भ शुभ। अथ का अर्थ है- अनुबन्ध चतुष्टय- विषय, प्रयोजन, अधिकारी एवं सम्बध। परियोजना या कार्य के बारे में चारों पक्ष सोचने आवश्यक हैं।

(१) विषय- कार्य का आधारभूत विषय क्या है ? परियोजना का आधारभूत विषय अलग-अलग होता है। पी.डब्लू.डी. में परियोजना का अर्थ सिविल निर्माण होता है।

       शिक्षा के शब्द में शोध, बड़े उद्योगों के सन्दर्भ में सिविल, मेकेनिकल, विद्युत, रिफ्रेक्टरी, उपस्कर, स्वचालनादि विभिन्न आयामों की साथ चलते अन्तर्सम्बन्धित रूप में कार्य परियोजना है। विषय सम्पूर्णता का नाम है।

(२) प्रयोजन- जो पूरे विषय का लक्ष्य हो। ऐसा लक्ष्य जिसमें दांत निकलने की समस्या ;ज्ममजीपदह च्तवइसमउेद्ध का या फलागम समय ;ळमेजंजपवद च्मतपवकद्ध या च्वेज ब्वउउपेपवदपदह च्तवइसमउ का कोई प्रावधान या गुंजाइश न हो। प्रयोजन निश्चयात्मक हो। सटीक प्रयोजन के अभाव में परियोजनाएं लड़खड़ा जाती हैं। सटीक शब्द प्रयोजन शब्द के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण है। यह अधिकतम नहीं है, न्यूतनम भी नहीं है, सटीक है। पितर के लिए सटीक उम्र पचास वर्ष है। समावर्तन की सटीक उम्र चौबीस वर्ष है। द्विज उम्र है यह। सटीकता का तत्व हर प्रयोजन तथा विषय से ही नहीं अपितु अधिकारी से भी जुड़ा है।

(३) अधिकारी- विषय तथा उद्देश्य जिसके अधिकृत होते हैं, वह अधिकारी है। योग का अधिकारी मुमुक्षु है। अधिकारी पूर्ण योग्यता सहित ही होता है। अयोग्य अधिकारी नहीं हो सकता है।

(४) सम्बन्ध- प्राप्य-प्रापक भाव सम्बन्ध है। उसकी जटिलताएं सम्बन्ध हैं। यह समुच्चय है, पर समुच्चय एक गिना जाना चाहिए।

       उपयोग ‘अथ’ नियम पद पर भी सटीक बैठता है। पद का विषय स्पष्ट परिभाषित हो। उद्देश्य स्पष्ट तथा सटीक हो। प्रजातन्त्रीय राजनीतिक पदवत हवा हवा घना घना तथा घना हवा हवा घना ऊजजलूल न हो। एक प्रधानमन्त्री के सड़क से गुजरने के कारण अगर एक प्रसवपीडा युक्त महिला को सड़क  पर किनारे बच्चा जनना पड़े तो प्रधानमन्त्री पद सटीक नहीं है। प्रधानमन्त्री या कोई भी पदेन आम व्यक्ति नहीं है। और उससे आम व्यक्ति के गमन मे असहजता उत्पन्न होती है या पदेन की गति असहज है तो संविधान लाश है। जन में पदेन का सटीक माप सड़क बाजार में हर पदेन का सटीक माप आम आदमी ही है।

       पद उद्देश्य, पद अधिकारी, सम्बन्ध निश्चित कठोर आरेखण बन्द हो। पद, प्रयोजन, अधिकारी, सबन्ध रहितता या अपूर्णता के कारण ही अक्षमता स्तर है। इनका नियतीकरण पक्ष अपेक्षाकृत पूर्ण रहता है। अनुपालन पक्ष प्रायः अपूर्ण रहता है। पहले दिवस से इनका अनुपालन ही ‘अथ’ है। ‘अथ’ शब्द द्वारा शुभारम्भ अर्ध कार्य सम्पन्न मुहावरा सार्थक है।

पितर सूत्र अट्ठावन :- पितर साधना- साधना = साध-ना, सा-धना, साधन-आ, स-आध-ना। साधना शब्द एक विज्ञान समुच्चय है।

१) स-आध-ना = जो आधे सहित कभी न छूटे, जो पूर्णता की ओर खींचती ले जाए।

२) साधन-आ = जिसमें साधन इन्द्रियों के आवरणित होते चले जाएं। और आवरणित होते होते समाप्त होते चले जाएं तथा दिव्यता क्रमशः उतरती चली जाए।

३) सा-धना = रत्नधातमम् – रत्न धा, सा-रत्ना – ज्योतित, ज्योतियों धारक।

४) साध-ना = एकक ज्योति मगन, एक ही एक दर्शक, साध- लालसा रहित सर्व प्राप्त।

       पाश्चात्य जगत से आसन, प्राणायाम, जप स्तरों के अत्यन्त कम व्यवहार रूप पितर यम-लोग अनभिज्ञ लोगों में मानसिक तनाव मुक्ति के व्यवहार तरीकों के रूप में प्रसिद्ध हो रहे हैं तथा बड़े महंगे बिक रहे है।

       हर्बट फैन्सटरहीम एवं जीन बेअर ;भ्मतइमतज थ्मदेजमतीमपउ. च्ीण्कण् ंदक श्रमंद ठंमतद्ध की व्यवहार पुस्तक क्वदश्ज ेंल लमे ूीमद लवन ूंदज जव ेंल दव में दी गई साधनाओं का संक्षिप्त रूप देते हम यहां  साधनाओं के स्वरूप की ओर इंगन कर रहे हैं।

       पूर्ण शिथिलीकरण प्रकिया ;थ्नसस त्मसंगंजपवद म्गमतबपेम पृष्ठ ५९५ए २५९.२६५ तकद्ध

       लेट जाओ, आंख बन्द, भुजाएं, बगल, ऊंगलियां खुलीं, स्वयं को उत्तम सुविधापूर्वक महसूस करो, घटिया विचार खुद को ना कहते रोको। उन्हें धकेलो और जो कर रहे हो उस पर ध्यान दो।

       कमर से नीचे के भाग को (पैरों से क्रमशः) पूरा तनाव देखो, अंग अंग तनाव देखो, तनाव तनाव तनाव (पांच सेकंड रुको) फिर तनाव ढीला छोड़ो (अंगूठे से गुदा व्दार तक क्रमशः) सारा तनाव बाहर (दस सेकंड तक)। फिर पेट की मांसपेशियों को सिकोडते पूरा तनाव दो (दस सेंकड) तनाव तनाव तनाव, इसके बाद दस सेकंड तनाव रहितता।

       इसी प्रकार क्रमशः पीठ, रीढ, छाती, ऊंगालियां, भुजाएं, कन्धे, मुट्ठियां, कोहनी, पैंतालिस अंश भुजाएं उठाते, गर्दन, चेहरा, नाक, मस्तक, आंख, जबडा, जीभ, चिबुक, गाल, मुख, को क्रमशः एक एक कर तनाव दो, ढीला छोड़ो। इसके बाद साधना का तीसरा भाग- अपने सुखद दृष्य की कल्पना करो। समस्या होने पर शांत ;ब्।स्डद्ध शब्द का चित्र बनाओ। केवल चित्र नहीं पर आवाज गन्ध आदि भी अहसास करो। यदि दिमाग भटकता है, उसे सुखद दृष्य की ओर वापस लाओ। और जब चित्र देखते हो तो अपने अंगूठे की (पैर की ऊंगलियों की) जांघ की, कुल्हे (चूतड) की, मांसपेशियों को ढीला छोड़ो। सुखद दृष्य देखते रहो। दिमाग भटकाव रोको। पेट, पीठ, छाती की मांसपेशियां क्रमशः ढीली छोड़ो, सुविधापूर्वक सांस लो। हाथ की ऊंगलियां, भुजाएं, कन्धों की मांसपेशियां ढीली छोड़ो (क्रमशः रुक रुक ढीली छोड़ो) गर्दन माथे की मांस पेशियां तनावरहीत करो सुखद चित्र देखते रहो। पलकों, नाक, जबड़े, गाल, गले, की मांसपेशियां ढीली छोड़ो। कही भी तनाव हो उसे ढीला छोड़ो (तीस सेकंड)। सुखद दृष्य देखो (दस सेकंड) उसके बाद तीन दो एक गिनो, बैठ जाओ, आंखें खोलो।

       यह शिथिलीकरण की प्रक्रिया बेशक लाभ प्रद है, पर आधी-अधूरी सी है। मन के मूल गुण कि मन एक समय एक ही वस्तु केन्द्रित होता है तथा साध-ना के ही विरुद्ध है। आसन तथा प्रत्याहार की कसरत जुड़ी प्रकिया है। साधारण सा भारतीय साधक इसका अधूरापन समझ सकता है। यह योगनिद्रा का एक उथला स्वरूप है। भारतीय पितर व्यवहार साधना का स्वरूप तथा गहन साधनाओं का इंगन इस प्रकार है- तन-शिथिलीकरण साधना-

       शवासन में लेट जाएं। दोनों पैरों में एक से डेढ़ फीट का फासला। दोनों हाथों की हथेलियां आकाश की ओर कमर से आधे फीट की दूरी पर। सहज शान्त लेटते हुए आंखें कोमलता से बन्द करें। शरीर ढीला छोड़ दें। आती जाती सांस का निरीक्षण करें (एक मिनट)।

चलन सुस्थिर संस्थानं सहजं शान्तम्।

पग संस्थानं सहजं शान्तम्।

उरू संस्थानं सहजं शान्तम्।

कटि संस्थानं सहजं शान्तम्।

स्कन्ध संस्थानं सहजं शान्तम्।

भुजा संस्थानं सहजं शान्तम्।

कर संस्थानं सहजं शान्तम्।

नाभि संस्थानं सहजं शान्तम्।

हृदय संस्थानं सहजं शान्तम्।

कण्ठ संस्थानं सहजं शान्तम्।

शिर संस्थानं सहजं शान्तम्।

चालन-सुस्थिर संस्थानं सहजं शान्तम्।

सुखं स्वस्थं शुद्धं पवित्रम्।।

नवद्वार संस्थानं सहजं शान्तम्।

पायु संस्थानं सहजं शान्तम्।

उपस्थ संस्थानं सहजं शान्तम्।

मुख संस्थानं सहजं शान्तम्।

नासिका संस्थानं सहजं शान्तम्।

चक्षु संस्थानं सहजं शान्तम्।

श्रोत्र संस्थानं सहजं शान्तम्।

नवद्वार संस्थानं सहजं शान्तम्।

सुखं स्वस्थं शुद्धं पवित्रम्।।

द्वि-अव्यक्तद्वार संस्थानं सहजं शान्तम्।

नाभि-सुप्तद्वार संस्थानं सहजं शान्तम्।

ब्रह्मरन्ध्र सुप्तद्वार संस्थानं सहजं शान्तम्।

सुखं स्वस्थं शुद्धं पवित्रम्।।

अष्टचक्र संस्थानं सहजं शान्तम्।

सहस्रार चक्रं सत्यं पवित्रं सहजं शान्तम्।

आज्ञा-चक्रं भूः पवित्रं सहजं शान्तम्।

ललना-चक्रं भुवः पवित्रं सहजं शान्तम्।

विशुद्धि-चक्रं स्वः पवित्रं सहजं शान्तम्।

अनाहत-चक्रं महः पवित्रं सहजं शान्तम्।

मणिपूरक-चक्रं जनः पवित्रं सहजं शान्तम्।

स्वाधिष्ठान-चक्रं तपः पवित्रं सहजं शान्तम्।

मूलाधार-चक्रं सतः पवित्रं सहजं शान्तम्।

अष्टचक्र खं ब्रह्म पवित्रं सहजं शान्तम्।।

सर्व संस्थानं सहजं शान्तम्।।

सुखं स्वस्थं शुद्धं पवित्रम् आनन्दं कैवल्यं पुरुषं खं ब्रह्म।।

स्वस्थ जागरणम्।

अष्ट-चक्र स्वस्थ जागरणम्।

द्वि-अव्यक्त द्वार स्वस्थ जागरणम्।

नवद्वार स्वस्थ जागरणम्।

स्थिर संस्थानं स्वस्थ जागरणम्।

चालन संस्थानं स्वस्थ जागरणम्।

सर्व संस्थानं स्वस्थ जागरणम्।

       मन्द गति से आती-जाती सांस का निरीक्षण करें (एक मिनट)। उठकर बैठ जाएं। आंखें खोलें।

       इन साधनाओं के १) स-आध-ना, २) साधन-आ, ३) सा-धना, ४) साध-ना स्वरूप हैं।

पितर साधना द्वारा- १) तटस्थता, बुद्धि की आत्मा उपलब्धि, २) सप्तेन्द्रिय सशक्तता, ३) दशावतार सिद्धि, ४) पोडष अवतार सिद्धि द्वार, ५) द्वादश अवतार गुण अस्तित्व में उतरते हैं तथा मानव सक्षमता का कृष्ण एवं राम स्वरूप प्राप्त करता है। शास्त्र योनित्वात्- शास्त्र द्वारा आदर्श निरूपित होना चाहिए। मानव दायित्व है चरण-चरण आदर्श जीवन में उतारना। ‘‘आदर्श-असम्भव’’ आम मूर्खों की भाषा है, प्रजातन्त्र संविधान की भाषा है जो धारा उन्नीस में बाएं हाथ की तर्जनी से अधिकार देता है और दाहिने हाथ से उसको छीनता है।

पितर सूत्र उनसठ :- पितर श्रवण चतुष्टय- श्रवण-दर्शन के चार चरण हैं- १) दर्शन श्रवणादि, २) मनन, ३) निदिध्यासन और ४) साक्षात्कार।

       दर्शन श्रवणादि (साधनित अंग परिष्कार पश्चात) मनन, निदिध्यासन (गहन, व्यापक, परिशुद्ध, तटस्थ अवस्था की सत्यनिकटता), साक्षात्कार की विधि द्वारा ज्ञान, सत्ता, लाभ, विचार के लिए, दर्शनों के प्रतिपाद्य विषयों (हेय, हेय हेतु, हान, हानोपाय) प्रश्नों का प्रमाण, तर्क, द्वारा सिद्धान्तों के अनुरूप प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन, द्वारा वेदों से हल पाकर जीवन-यापन हेतु सिद्धान्तों की व्यवहार स्थापना एवं अनुपालन वैदिक वैज्ञानिक आदर्श जीवन है।

       दर्शन-श्रवणादि, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार वे चतुः स्तर हैं जिन पर पहुंचकर ही अधिकारी अधीनस्थ उन्नतिमय संघर्ष ‘‘वाद-प्रतिवाद-संवाद’’ प्रगति कर सकते हैं। मात्र दर्शन श्रवणादि चर्चा बकवाद होकर रह जाती है। उसके साथ मनन युक्त चर्चा बातचीत होती है। इसके साथ निदिध्यासन चर्चा वार्ता होती है, जो अपेक्षाकृत उत्तरोत्तर होती है। इसके साथ साक्षात्कार स्तर, चर्चा वाद-प्रतिवाद-संवाद स्तर क्रमशः उन्नति दायक एवं क्षमतावृद्धिकर होती है।

       सामान्य युनियन प्रबन्धन मीटिंगें यूनियन एकतरफा चीत चीत ही होती है। इनमें प्रबन्धन वर्ग को विशेष हिदायत रहती है- वह कुछ न बोले, बात न करे। चीत चीत अवस्था बकवाद से भी घटिया होती है। इसमें युनियन प्रतिनिधि ही आपस में एक दूसरे का खंडन करने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। तथा कभी कोई निष्कर्ष नहीं निकलता है। निष्कर्ष खाना-पीना, मस्ती-मौज रहता है। मैंने ऐसी कई मीटिंगों में भाग लिया है तथा मीटिंगों को चूंचूं का मुरब्बा होने से बचाने का प्रयास किया है। पर मेरे प्रयास उन मीटिंगों में ही अर्ध-सफल रहे हैं जिनमें मैं मीटिंग सचिव रहा, पर वे मीटिंगें भी मात्र अर्ध मनन स्तर तक सफल रहीं।

       श्रवण चतुष्टय एक ऊंची पितर सैद्धान्तिकता है। प्रबन्धन पद योग्यता (अर्ध) व्यवस्था तथा यूनियन की प्रजातन्त्र पद व्यवस्था की सारी मीटिंगें उपरोक्त सीधे पैर तथा सर के बल खड़ी व्यवस्थाओं के कारण अक्षमता स्तर से ऊपर नहीं उठ सकेंगी। ये मात्र मारे जाने वाले चूजों की निरर्थ चूं चूं ही रहेंगे।

       ‘श्रवणचतुष्टय’ व्यक्तिगत अधिकारी एवं उसके तत्काल सहायकों के मध्य भी संप्रेषण का आधार है। संप्रेषण का उच्चतम स्तर साक्षात्कार स्तर है। इस स्तर विभाग क्षमता अधिकतम होती है। क्योंकि कार्य का विभाजन तथा स्थानान्तरण पूर्ण होता है।

       अधिकारी मात्र में भी चतुष्टय गुण होना उसके क्षमता के स्तर को ऊंचा ही रखता है। श्रवण चतुष्टय की उच्च शास्त्र योजना है। गर्भाधान से विद्याध्ययन दस संस्कारों सें संस्कारित शब्द-अर्थ-सम्बन्ध ज्ञान पश्चात् श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार के क्रम को क्रमशः १) वेदान्त (श्रवण), २) न्याय-वैशेषिक (मनन), ३) सांख्य-योग (निदिध्यासन), ४) वेद (साक्षात्कार) द्वारा सैद्धान्तिक रूप में प्राप्त कर सिद्ध करे तो हर अक्षमता स्तर से व्यापक ही रहेगा।

पितर सूत्र साठ :- पितर शतं चैका च- सौ और एक- एक सौ एक। हृदय से एक सौ एक नाड़ियां निकलती हैं। उनमें से एक मूर्धा में जाती है। शरीर विज्ञान के अनुसार यह एक नाडी अत्याधिक महत्वपूर्ण है। मूर्धा इस नाड़ी द्वारा हृदय प्रकम्पन करती है। उसे भी रक्त ओषजन हृदय से ही मिलता है। सौ और एक एक सौ एक। यह एक सार है.. यह एक अतिरिक्त विशेष है। मूर्धा स्वर ऋ एवं लृ हैं। ये शब्द मात्र संस्कृत हिन्दी में हैं। मूर्धा स्वाद भी तालव्य है। योग की खेचरी मुद्रा जिसमें जीभ को उलटकर तालव्य गुव्हर में बढ़ाने का अभ्यास किया जाता है। उसी मूर्धा के जागरण का प्रयास है। खेचरी मुद्रा की शांतता एक साधक ही जानता है। सुषुम्ण स्वर भी इस साधना का एक सशक्त साधन है। एक सौ में एक और अतिरिक्त है जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह प्रथम एक से युजित है। प्रगति एक एक ही होती है। शत से एक और प्रगति ही अक्षमता पार करना है।

       व्यवस्था में एक ठहराव का नाम है शत। पद पर ठहराव का नाम है शत। ‘‘शत चं एका च’’ इस ठहराव के पार जाने का नाम है। शरद शतात् भावना है एक सौ और एक। नवीयो पदम् अक्रमुः है शतं च एकं च।

       भारतीय संस्कृति में जन-जन में शतं च एकं च सिद्धान्त सहज पिरोया गया है। दान, अनुदान हमेशा ‘एक’ अतिरिक्त होता है ग्यारह, इक्कीस, इन्क्यावन, एक सौ एक, पांच सौ एक, यह एक अतिरिक्त प्रगति, उत्थान, नव कदम, क्षमता वृद्धि का महान प्रतीक है। नव आरम्भ नव स्फुरण है यह एक।

       सारे व्यय एक से शुरू होते हैं। यह एक व्यय का प्रतीक है। संचय का प्रतीक शत है।

       पानी बाढ़ा नाव में घर में बाढ़े दाम।

       दोनों हाथों उलीचिए सही सयानो काम।।

शतं चैका च दहलीज प्राकल्पना का सिद्धान्त है। शतम् के पश्चात अतिरिक्त त्याग करो। मृत्यु सबके लिए नियत है। अतिरिक्त निरर्थ है। उसे सार्थक कर लो, सुपात्र में वितरित करलो।

       मानव बंटने से बढ़ता है। क्षमतावृद्धि पाता है। शत हस्त समाहर सहस्र हस्त संकिर का आरंभ एक सौ एक से ही होता है। कई सूत्रों का सूत्र है शतं चैका च।

पितर सूत्र बासठ :- पितर तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ बीजम्- वहां अतिशय रहित सर्वज्ञता का बीज है। इस सूत्र के साथ सूत्र इकसठ संयुजित है।

पितर सूत्र इकसठ :- पितर क्लेश कर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः – क्लेश, कर्म, विपाक, आशय, से स्पर्श रहित या इन पर अधिपत्य युक्त या इनसे परे सजग।

       क्लेश, कर्म, विपाक, आशय ये चारों अक्षमता की सीमाएं हैं, अक्षमता के बोझ हैं। ये कमाधिक प्रदर्शित करती हैं। ये स्तर दर्शाती हैं। ये सातिशय- अतिशय युक्त कमाधिक हैं। क्लेश पांच है अविद्या, अस्मिता (धन लुटने पर मैं लुट गया की मम मृत्यु वृत्ति), राग (सुख-बंधन) द्वेष (दुःख-बंधन), अभिनिवेश (तन अमरता की चाह)। फल बंधन युक्त कार्य कर्म हैं। परिपक्व कर्म फल जाति आयु भोग त्रय रूपी विपाक है। अपरिपक्व कर्म फल जाति आयु मोग आशय है। इन पंच से आबद्ध कमाधिक्य होगा ही। अतिशय होगा या सातिशय होगा। स्तरीय गति ही होगी उसकी। पद सातिशय का बच्चा खेल है। निरतिशय क्षमता का शिशु दायित्व है।

       निरतिशय मानव का स्वरूप है वाक (परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी) ऋचा सिक्त, इन्द्रियों युक्त मन यजुः सिक्त, उन्यास पवन तथा दश प्राण साम सिक्त, इन्द्रियोंमय समुच्चय अथर्व सिक्त अस्तित्व ऋत बीज सिक्त। यह निरतिशयं स्वरूप है।

       हर व्यक्ति यह सोचता है कि मैं ठीक-ठीक जानता हूं, यह अतिशय स्थिति है। जब उच्चतर उच्च स्तर पहुंचता है तो सोचता है कि पूर्व स्थिति मैं ठीक-ठीक नहीं जानता था, यह सातिशय स्थिति है। जब व्यक्ति का वैदिक सर्वोच्च माप बेंच मार्किंग के क्षेत्र (कुछ) में ताल-मेल हो जाता है तो वह निरतिशय स्थिति का आभास पाता है और जब सब वैदिक सर्वोच्च मापों का उसके जीवन से ताल-मेल हो जाता है तो वह निरतिशय हो जाता है। निरतिशय के लिए अक्षमता शब्द ही समाप्त हो जाता है।

       निरतिशय असम्भव शब्द नहीं है। सारा संसार निरतिशय पर टिका हुआ है। सारी की सारी परिभाषाएं निरतिशय स्थिति विशेष दर्शाती हैं। जापानी, जर्मनी की उन्नति का मूल कारण निरतिशय स्थितियों का उद्योग शास्त्र में अनुपालन है। उद्योग शास्त्र में गुणवत्ता, कार्य समूह, पर्यावरण, शून्य त्रुटि विधा, सामाजिकता, सुरक्षा, मूल्य, बेंच मार्किंग आदि के प्रत्यय लागू करना निरतिशय स्थिति की ओर ही गति है।

       निरतिशय सर्वज्ञ बीजम् निरतिशय के बीज सर्वज्ञता में हैं। कर्मों का आधार ज्ञान है। जिस कर्म के पूर्व ज्ञान नहीं है वह कर्म भटकाव है। ज्ञान, बल, क्रिया एक समुच्चय है। ऋतं एवं शृतं ज्ञान के निरतिशय रूप हैं। प्रकृति के शाश्वत नियमों को ऋतं कहते हैं। सच्चिदानन्द के शाश्वत (नैतिक) नियमों को शृतं कहते हैं। इन दोनों नियमों की अनुरूपता बल युक्त क्रिया से ही हो सकती है। इन नियमों पर आस्था का नाम श्रद्धा = श्रत + धा है।

पितर सूत्र तिरसठ :- पितर ज्ञान बल क्रिया स्वाभाविकी- स्वाभाविकी ज्ञान, बल, क्रिया का विवरण ईक्षते नाशब्दम् में है। ईक्षते नाशब्द का सर्वाच्च रूप ब्रह्म है। जिस ईक्षण के कारण हर कार्य ऋत तथा शृत होता है। क्या मानव यह अवस्था प्राप्त कर सकता है ? बेशक पा सकता है। इस अवस्था से संयुक्त हो सकता है। सच्चिदानन्द स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया च है।

       मानव जीवन में उपरोक्त नियम का व्यवहार रूप क्या सम्भव है ? निःसन्देह सम्भव है। ईक्षते अशब्दम् क्यों होता है। ईक्षते शब्दम् क्यों होता है, कब होता है ? ईक्षते न शब्द की व्याख्या इसी से हो सकती है। मानव क्षेत्र में एक शब्द है- सीमारेखा या जुरिस्डिक्शन। पांच हजार रुपए की सीमा रेखा (जुरिस्डिक्शन) वाले न्यायाधीश का पांच हजार रुपए एक नया पैसा जुर्माना करने का निर्णय अशब्द है, अवैध निरर्थ है। पांच हजार सीमा तक उसका निर्णय ईक्षते शब्द है। ज्ञान, बल, क्रिया स्वाभाविकी ईक्षते शब्द का सहज पालन मानव अपनी सीमा रेखा के अन्तर्गत कार्य करते कर सकता है। क्षमता सीमा रेखा से बाहर कार्य करने का प्रयास ईक्षते अशब्दम् है।

       मानव स्वतन्त्र है अपनी क्षमता सीमारेखा में अभिवृद्धि करने के क्षेत्र में, पर क्षमता सीमा रेखा बाद निर्धारित सीमा रेखा बाहर कार्य करने के मामले में स्वतन्त्र नहीं है। ‘‘प्रत्येक आत्मा एक अव्यक्त ब्रह्म है’’ -यह उसकी सीमा रेखा वृद्धि का सम्भावना वाक्य है। अक्षमता यही है कि मानव अपनी क्षमता सीमा रेखा के बाहर ज्ञान, बल, क्रिया क्षेत्र में कार्य करे और स्वयं की अयोग्यता न समझे।

       एक व्यक्ति ने देवी की महत अर्चना कर एक शंख प्राप्त किया। वह शंख इक्षते शब्दम् था। उसकी अर्चना कर जो मांगा जाता था, वह दे देता था। उस व्यक्ति ने शंख अर्चना कर उससे एक लाख रुपए मांगे। शंख ने दे दिए। कुछ दिनों में वह व्यक्ति समृद्ध हो गया। एक पड़ोसी ने छिपकर शंख रहस्य जान लिया। उसने शंख चुरा लिया। प्रथम व्यक्ति ने पुनः देवी अर्चना की, समस्या बताई। देवी ने उसे उस पड़ोसी का नाम बताते उसके सामने एक दूसरे शंख की जो रंग-रूप में वैसा ही था, एक बार अर्चना करने का कहा तथा वह शंख उसे दिया। इसने उस पड़ोसी के सामने उस शंख की अर्चना की। शंख से कहा- पचास हजार रुपए दो। शंख ने कहा- एक लाख ले लो। लालची पड़ोसी ने सोचा यह शंख दुगना देती है। रात को उसने शंख बदल दिया। नया शंख की घर में अर्चना की उसने कहा- लाख रुपए दो। शंख बोला- दो लाख ले लो। यह बोला- दो लाख दो। शंख बोला- चार लाख ले लो। इसने कहा- तो दो न चार लाख। शंख बोला- आठ लाख लो न।

       द्वितीय शंख ईक्षते अशब्दम् था। क्षमता बाहर मात्र शब्द था। ज्ञान बल क्रिया अस्वाभाविकी था। प्रजानन था, प्रजातन्त्र की उपज था। पहला शंख प्रज-जन था, प्रज-तन्त्र की उपज था। प्रजानन प्रजा के मतों से जीता क्षमता से अधिक अधिकारों लदा उच्च पदासीन ज्ञान बल क्रिया अस्वभाविकी एम.पी., एम.एल.ए., आदि हैं। प्रज-जन योग्यता अनुभव के आधार पर प्रजा द्वारा श्रद्धा प्राप्त योग्यता अनुभव के अनुरूप पदधारी ज्ञान बल क्रिया स्वाभविकी है।

पितर सूत्र चौंसठ :- क्रियायोग- तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः – तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग है। इनका सांसारिक रूप शर्धं-शर्धं, गणं-गणं तथा व्रातं-वातम् है। जान अडेयर अफ्टर की वर्तमान के नेतृत्व की धारणा जिसे क्रियात्मक नेतृत्व या एक्शन लीडरशिप कहते हैं स्व-विकास ;कमअमसवच पदकपअपकनंसद्ध समूह निर्माण तथा लक्ष्य प्राप्ति ;इनपसक जमंउ ंदक ंबीपमअम जेंाद्ध है। क्रियात्मक नेतृत्व शर्धं, गणं, व्रातम् तथा तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान का त्रि समुच्यच क्रमश उत्तरोत्तर उत्तम स्थितियां हैं। क्षमता के त्रिक्षेत्र हैं- शारीरिक, प्राज्ञिक एवं आध्यात्मिक। तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान के बाद की क्रियायोग है। योग लक्ष्य युजन का नाम है। सार्थक लक्ष्य युजित क्रिया सिद्धि पश्चात ही सम्भव है।

       शरीर, इन्द्रियां, प्राण, मन के साधने को तप कहते हैं। तप के पश्चात् द्वन्द्व मानव सहज सहन कर सकता है। द्वन्द्व सहन करना शरीर, इन्द्रियों, प्राण, मन का क्षमतायुक्त होना है। सर्दी-गर्मी, हर्ष-शोक, मान-अपमान, भूख-प्यास, सुख-दुःख, पद-अपद में सहजता तप फल है। तप पूर्वक लक्ष्य से एकजुटता हेतु कार्य ही क्षमतावृद्धि कर सकता है। विलासिता तप की दुश्मन है। विलसिता क्षमता की दुश्मन है। विलसिता का जन्म ही आवेग अवसाद के क्रम से है। अतः पर क्षमता की, तप की शुत्र है।

       मजबूरन तप के कारण ही एक श्रमिक की कार्यक्षमता करीव दो सौ प्रतिशत ओसतन होती है। श्रमिक को मानक का आधा वेतन अव्यवस्था दे रही है। अतः श्रमिक चार सौ प्रतिशत की क्षमता पर कार्य कर रहा है। वह पूजनीय श्रम-देव है। उसकी तुलना में कालीनी कक्षों में, वातानुकूल कक्षों-कारों में, सुवासों में, सुविधाओं में, चकाचक योधियाता जीवन जीते प्रजाननों के प्रजानन विलासिता में आकण्ठ आ-अस्तित्व डूबे, सरकारी पैसे से डूबे मन्त्री, प्रधान पांच से दस प्रतिशत स्वघोषित कार्य क्षमता पर कार्य करते हैं। ये सब घट-देव हैं, पत-देव हैं, घटिया पतित देव हैं। उस पर भ्रष्ट भी हैं। टी.वी., रेडिओ, समाचार पत्रों पूजित हैं। व्यवस्था आदरणित, मानित हैं। तप देवों, श्रम देवों की प्रतिशत क्षमताधारित आदर व्यवस्था समाज में लागू करते ही हर मानस सटीक सत्य उतरते ही व्यवस्था सक्षम हो जाएगी।

       श्रमिक मजबूरन तप करता है। प्रजानन कुआदतन अतप करता है। स्वेच्छया सहज तप क्षमतावृद्धि की मांग है।

       स्वाध्याय का आधार भी तप ही है। बहुज्ञता से बढ़ते-बढ़ते कदम सर्वज्ञता के क्षेत्र में आते हैं। कार्य सर्वज्ञता क्षमता का प्रथम प्रमाण है। सारा कारखाना अधिनियम, सारी सुरक्षा व्यवस्थाएं विश्व की दुर्घटना आधारित हैं। यह हास्यापद तथ्य है। कि शून्य दुर्घटना इनका लक्ष्य है। अतः ये दुर्घटनाएं रोकने में असमर्थ रही हैं। सुरक्षा का आधार दुर्घटना घोर अल्पज्ञता है। युद्ध द्वारा शान्ति जैसी असम्भव बात है। सुघटना शब्द सारे पाश्चात्य साहित्य में नहीं है। भिलाई इस्पात सयंत्र के परियोजना विभाग मात्र में सुघटना आधारित सुरक्षा व्यवस्था लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। वहां सुरक्षा व्यवस्था भारतीय इस्पात उद्योग क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ है। सर्वज्ञता क्षमता का प्रथम सूत्र है। स्वाध्याय पूर्ण ज्ञान से स्व को जोड़ने का नाम है। नियम पूर्वक उसका पथ है। यह पथ असमाप्त रहता है क्षमता वृद्धि की सीमा भी तप स्वाध्याय पथिक साधक के लिए हमेशा सीढ़ी दर सीढ़ी बढ़ती ही रहती है। ईश्वर अन्तहीन है। तप स्वाध्याय ईश्वर की ओर गति है। ईश्वर परम लक्ष्य है। ईश्वर प्रणिधान का सरल अर्थ है ईश्वर के ईश एवं ऐश्वर्य से समरूपता प्राप्त करना। ईश एवं ऐश्वर्य गुण के कारण ही ईश्वर जगत को ऋत रखता है। ईश एवं ऐश्वर्य क्षमता के प्रमाण हैं।

       उद्योग में भी क्रिययोग क्षमता का आधार है। तप, स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधान के त्रितलों के मूलाधार पर ही परियोजना विभाग के औसतः शत अभियन्ताओं ने एक के बाद दस महत कार्य प्रति महत कार्य शत करोड़ रुपए, शत दिवस समय, शत लघु ठेकेदार, दश महत ठेकेदार, दश विभिन्न संस्थान सामंजस्य, सहस्र श्रमिक, सहस्र वर्ग मीटर क्षेत्र, दस अनजानी चुनौतियों, दस तलो (छिद्रित) पर कार्य, दस इन्जीनियरिंग विधाओं से युक्त समय-सीमा में पूरे किए।

       इनमें तप था, प्रति अभियंता ने बारह बारह घण्टे कभी कदा चौबीसों घण्टे विषम परिस्थितियों धूल, गंध, शोर, चमकादि में अनथक कार्य स्वाध्याय था। सभी का मीटिंगों के माध्यम से सर्व तत्त्व ज्ञान तथा विभिन्न पार्टियों द्वारा सामाजिकता समझ एकजुटता तथा ईश्वरप्रणिधान था। कार्यपूर्ति की लक्ष्य तिथि तथा चुनौतियों की सहयोग लक्ष्य तिथियों के प्रति एकजुट समर्पण। ये अभियन्ता अनुभव-दक्ष ज्ञान-दक्ष थे।

पितर सूत्र पैसठ :- पितर आरुरुक्षो मुनेर्योगं कर्मकारणमुच्यते- आरुरुक्षु मननशीलों के लिए कर्म को कारण (साधन) कहा गया है। आरुरुक्षु का अर्थ है सर्वोत्तम धन। ं१) एकता, २) समता, ३) शील, ४) सत्यता, ५) स्थिति, ६) अहिंसा, ७) आर्जव का आरोहण कर इन से उपराम होना। मुनि का अर्थ है वेदों के अर्थों पर मनन करके उनके तत्वों को द्योतित करनेवाले। कर्म का कारण हो जाने का अर्थ है कर्म का लक्ष्य प्राप्ति पश्चात लक्ष्य में समाहित हो जाना।

       परियोजना निर्माण के क्षेत्र मे परियोजना प्रबन्धन के सारे कार्य दशरूपकम् पर आरोहण द्वारा पूरे होते हैं। तथा फलागम (कमिशनिंग) पश्चात परियोजना अभियन्ताओं के सारे कार्य पूरे किए संयन्त्र में सिमट जाते हैं एवं उपराम अवस्था अभियन्ता प्राप्त करते हैं।

       आरुरुक्षु शब्द व्यवहार सातत्य तथा व्यवहार समाप्ति का प्रतीक है। अनुभव दक्षों, ज्ञान दक्षों द्वारा क्रियायोग पूर्णता स्थिति आरुरुक्षु के करीब-करीब की है। तप, स्वाध्याय इसकी आवश्यता है। कर्म का कारण में लय कर्मफल त्यागावस्था है।

       हर संयन्त्र की आरम्भावस्था में निर्माण विभाग मात्र होता है, जो कारखाने के निर्माण का आरम्भ करता है तथा आरम्भ में यह विभाग महत्वपूर्ण तथा बड़ा होता है। जैसे-जैसे निर्माण कार्य पूर्ण होता जाता है यह विभाग अपने कार्य द्वारा कारण में सिमटता जाता है। इस प्रकिया में औसत अभियंन्ता महत्ता ह्रास के कारण क्षमता-ह्रास की अवस्था को प्राप्त होते अक्षमता के स्तर की ओर बढ़ने लगते हैं।

       आरुरुक्षु शब्द परिभाषा उपरोक्त क्षमता ह्रास अवस्था को समाप्त करती है।

पितर सूत्र छियासठ :- पितर सत्यैरेरर्यामा कृतेभिः – सत्यैः कृतेभिः आ इरयाम- सत्य कृतो के साथ इरना करें। इरना बड़ी उच्च प्रशासनिक क्रिया है। यह सत्य कृत के साथ ही उजागर होती है। इरना का अर्थ है प्रेरणा तथा याचना करना। प्रेरित करना एवं याचना करना सत्य कृतता के बिना हो ही नहीं सकता है। ऋतम् तथा शृतम् के अनुरूप कर्मों का नाम है सत्य कृत कर्म। ऋतम् तथा शृतम् के अनुरूप कर्म करने से प्रेरणा स्वयमेव ही हो जाता है। सत्य कृतता के कृत्य कभी भी ठहरे नहीं रहते हैं, वे सर्वदिश द्रुत गतित होते हैं।

       पुष्प सुगंध का मल दुर्गंध मात्र हवा की दिशा में प्रवाहित होती है। पर सत्य कृत सुगन्ध या असत्य दुर्गंध सर्व दिश फैलती है। सत्यकृत कृत्य इसी कारण स्व-प्रेरण होते हैं। स्व-प्रेरण शब्द अधिकृतों, समकक्षों के लिए अधिक उपयोगी होता है। तथा उनकी क्षमतावृद्धि के साथ सत्यकृत की भी क्षमतावृद्धि होती है। सत्यकृत कृत्यों के साथ याचना अधिकृत हो जाती है। अधिकृत याचना टालना या अस्वीकारना किसी के लिए भी कठिन होता है। सत्यकृत की याचना अधिकार होती है जो सत्यकृत के साथ ही जुड़ा रहता है। यह सत्यकृत को उच्चाधिकारियों से सहज प्राप्त होता है। अतः उसकी क्षमता की धार में प्रेरण-याचन सफलता से दूहरी अभिवृद्धि होती है।

       ‘‘सत्यैः कृतेभिः आ इरयाम’’ क्षमतावृद्धि का महासूत्र है। इस सूत्र की प्रतिवृत्ति हैं ‘‘असत्यैः कृतेभिः ना इरयाम’’ असत्य कृत या अनृत तथा अशृत कृत न प्रेरण तथा नयाचन करते हैं। इसे नाक्षरता के सिगरेट पीने शराब पीने के दुर्नियम द्वारा भलीभांति सिद्ध किया जा चुका है। जो सरकार स्वास्थ के लिए हानिकर तख्ती लगाकर सिगरेट या शराब बेचना अधिकृत करती है वह अनृत एवं अशृत है। ऐसा राष्ट्र देर-अबेर पतित होगा ही। निर्बाध विचार स्वतन्त्रता वाले देशों का पतन भी उपरोक्त ‘‘सत्यैः कृतेभिः आ इरयाम’’ या शास्त्र योनित्वात् नियमों के उल्लंघन के कारण नियत है। विश्व में उन नियमों के उल्लंघनों के कारण एक सार्वजनीन अवनति स्पष्ट परिलक्षित है।

पितर सूत्र अडसठ :- यथापूर्वे संजानाना- पूर्व को यथावत सम जानते हुए यथावत प्रस्थपितवत आचरण करते हुए।

       यथावत प्रस्थापित का एक उदाहरण ऋत है जिसकी परिभाषा इस प्रकार है-

       ऋत – ब्रह्माण्ड के शाश्वत (तब, अब तब तक रहनेवाले यथावत) नियम का विस्तार निश्चय ही द्युलोक (चांद, तारे, ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाओं से लेकर जुगनुओं क्वांटम सिद्धान्त के नन्हे स्फुरणों तक, महान अन्तरिक्ष (द्युलोक के साथ वायु लोक स्तरों के धारण कर्ता) पर्यन्त, प्रशस्यतमा पृथिवी, अग्नि, ज्योति स्फुलिंग (शून्य अस्तित्व सीमा रेखा कण निर्मित गतित आधार) विद्युत, उदान, प्राण, वायु, पालन शक्तियुक्त (शरीर के भौतिक नियम) समस्त शुद्ध पवित्र बलवालों शक्तिशालियों के समुच्चय (सम्मिलित स्वरूप) धारण करते हैं तथा ये ही उसका (ऋत का) ज्ञान कराते है। (ऋग्वेद १०/९२/४)

       भौतिकी के नोबल पुरस्कार प्राप्त चिन्तक वैज्ञानिक डॉ.रिचर्ड फेन्मेन के अनुसार पदार्थ परमाणु निर्मित है बीज से सारा ज्ञान विकसित किया जा सकता है। उपरोक्त वेद मंत्र इस नियमानुसार, सारे ज्ञान विज्ञानों का यथावत आदि बीज है। वैदिक संस्कृत का मैंने तो मात्र अर्थाभास ऊपर दिया है। मूल मंत्र तो कई गुना महत् भावयुक्त है।

       ऋतस्य हि प्रसितिर्द्यौरुरुव्यचो नमो मह्य ऽ रमति पनीयसी। इन्द्रो मित्रो वरुणः संचिकित्रिरे ऽ थो भगः सविता पूतदक्षसः।।

       यथापूर्व एक महान विधा है जो नवीयो पदम् का आधार है। प्रस्थापित आचरण रते हुए ही ज्ञान के आधार पर अज्ञात क्षेत्रो का मापन, आकलन, प्रस्थापन करते चले जाना विश्व व्यवस्था की मांग है।

       इस विश्व व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है ब्रह्म। ब्रह्म से ही सारी व्यवस्थाएं उद्भूत होती हैं। इन व्यवस्थाओं का नाम ऋत, शृत, शृद्ध, सृज, धृत, ऋज आदि हैं। ऋत प्राकृतिक व्यवस्था है जो अनेकानेक संधियों-पर्वों अन्तर्संबन्धों को दर्शाती है। इसका ज्ञाता ऋत्विज है। शृत नैतिक व्यवस्था है जो

चैतन्य स्व-क्रियाओं, आपसी सम्बन्धों, व्यवहारों को दर्शाती हैं। ऋत व्यवस्था तकनीकों को जन्म देती है। ऋत व्यवस्था मानव संसाधन विकास-आधार देती है। शृद्ध व्यवस्था मानव द्वारा उपरोक्त दो (शृत और ऋत) व्यवस्थाओं को आचार में उतारने के लिए तैयारी का नाम है। सृज व्यवस्था उपरोक्त व्यवस्थाओं का व्यवहार प्रयोग करते सुरचना प्रक्रिया है। धृत व्यवस्था सृज प्रक्रिया के निष्कर्ष हैं जिन्हें यथावत या पूर्वजांचित कहते हैं। ऋज वह व्यवस्था है जिसमें सारी व्यवस्थाएं स्वतः स्फूर्तवत अपनाई जाती हैं। ऋत्विज की तरह शृत्विज, शृध्विज, सृज्विज, धृत्विज, ऋज्वित आदि तत्तत् व्यवस्थाओं के नियामकों के नाम हैं। ये ऋषि हैं, जो अत्यन्त उच्चकोटि के प्रबन्धक हैं। इन्हें देवगण कहते हैं। ये इन व्यवस्थाओं को परमात्मा के निकट ले जाने का प्रयास सतत करते रहते हैं। अर्थात् परमात्म व्यवस्थाओं की उपासना करते हैं।

       इनके सिवाय एक अन्य श्रेणी के लोग हैं जो इनसे उच्च कोटि हैं। इनका नाम ‘पितर’ है। ये वे लोग हैं जो व्यवहार में ऋत, शृत, शृद्ध, सृज, धृत, ऋज आदि जी चुके हैं। वे वर्तमान व्यवस्थाओं पर गहन मात्र चिंतन कर उनका ब्रह्म व्यवस्थाओं तक उन्नयन करने की सोचते हैं और ‘अतिथि’ धर्म निभाते इसका प्रचार-प्रसार करते हैं।

       इन उच्चतम ब्रह्म उद्भूत मेधा का जो देवगण तथा पितर उपासनीय है का इसी पल से हम ऐसा धारण करें कि वह हमें उच्चस्तरीय कर्मों से ओतः प्रोत कर दे। और हम इसे स्व-अर्पित कर दें। यह क्षमतावृद्धि का अचूकास्त्र है। इस मेधा-दा मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है-

ओऽम् यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते। तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा।। (यजुर्वेद ३२/१४) अस्तित्वित तुम। चैतन्य तुम। उत्कर्ष तुम। ओऽम्। जिस ब्रह्म उद्भूत मेधा की देवगण तथा पितर सतत धारणा कर उसके निकट होने की आकांक्षा करते हैं उस उच्च मेधा से इसी पल ज्योतित होकर मैं मेधावी (मेधा-आपूर्त) कर्म करुं। विश्व के सारे अक्षमता स्तर इस मन्त्र के द्वारा पार किए जा सकते हैं।

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