पाठ : (२२) षष्ठी विभक्ति (१) + श्चुत्व सन्धिः

संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।

पाठ : (२२) षष्ठी विभक्ति (१) + श्चुत्व सन्धिः

(सम्बन्ध का बोध कराने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है।)

इदं रामस्य पुस्तकमस्ति = यह राम की पुस्तक है।
एषः सीतायाः सेवकोऽस्ति = यह सीतायाः का सेवक है।
तक्षकः तक्षण्या हस्तस्याऽङ्गुलीः अप्यतक्षत् = बढ़ई ने रंदे से हाथ की ऊंगलियां भी छील दीं।
ग्रामीणाः बालाः ग्रामस्य विद्यालये पठितुं नेच्छन्ति = गांव के बच्चे गांव के विद्यालय में पढ़ना नहीं चाहते हैं।
किं रामस्य पिता दशरथो रामं वनं प्रैषयत् ? = क्या राम के पिता दशरथ ने राम को वन में भेजा था ?
कर्मकाण्डे विविधानां यागानां षोडश ऋत्विजः भवन्ति = कर्मकाण्ड में विविध यागों के सोलह ऋत्विग् होते हैं।
अतिप्रयोगात् घटस्य तले छिद्रं जातम् = अधिक प्रयोग के कारण घड़े के तले में छेद हो गया है।
लब्धप्रतिष्ठाः पुष्करस्य पयोऽपूपाः = पुष्कर के दूध के मालपूए विख्यात हैं।
घृतस्य घटः चिक्कणोऽस्ति, सम्यक् मार्जय = घी का घड़ा चिकना है ठीक से साफ कर।
रामस्य सेतुरिदानीं नष्टप्रायः संजातोऽस्ति = राम के द्वारा निर्मित पुल अब प्रायः नष्ट-भ्रष्ट हो गया है।
चन्दनचौराः चन्दनस्य वनं प्राविशत् = चन्दनचोर चन्दन के वन में घुस गए।
वने रावणो रामस्य सीतां अपजहार = वन में रावण ने राम की सीता का अपहरण किया।
अरबदेशस्य खर्जुराणि संसारे प्रसिद्धानि सन्ति = अरब देश के खजूर संसारभर में प्रसिद्ध हैं।
रामोजीरावस्य चलचित्रनगरं जगति प्रसिद्धमस्ति = रामोजीराव की फिल्मसिटि जगप्रसिद्ध है।
रे मूर्खा ! सेटकस्य स्थाल्यां सेटकतण्डुलान् पचति = अरे मूर्ख स्त्री ! एक किलो की पतीली में एक किलो चावल पका रही है।
बकस्य धौर्त्यं ‘बकभक्ति’ इति नाम्ना जगति प्रसिद्धमस्ति = बगुले की धूर्तता ‘बगुलाभक्ति’ नाम से जगविख्यात है।
एकडद्वयस्य क्षेत्रे गुरुकुलाय भवनं निर्मातुमिच्छति = दो एकड़ के खेत में गुरुकुल के लिए भवन बनाना चाहता है।
रथे नियुक्तं विवाहस्य घोटकं चालयितुं चालकः वाद्यं वादयति = रथ में जोते हुए विवाह के घोड़े को चलाने के लिए चालक बाजा बजाता है।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्।। = कोयल की शोभा स्वर के कारण से है, स्त्रियों की शोभा पतिव्रत धर्म से है, कुरूपों की शोभा विद्या से है और तपस्वी लोग क्षमा से शोभायमान होते हैं।
यस्य पुत्रो न वै विद्वान्न शूरो न च धार्मिकः।
अप्रकाशं कुलं तस्य नष्टचन्द्रेव शर्वरी।। = जिसका पुत्र न विद्वान् हो, न शूरवीर हो और न धार्मिक हो उसका कुल उसी प्रकार प्रकाशरहित (प्रसिद्धिरहित) रहता है जैसे चन्द्रमा से रहित रात्रि।
संसारतापदग्धानां त्रयो विश्रान्तिहेतवः।
अपत्यं च कलत्रं च सतां संगतिरेव च।। = संसार के तापों (कष्टों) से तप्त (त्रस्त) व्यक्ति के लिए शान्ति प्राप्ति के तीन ही साधन हैं- पुत्र, पत्नी और सज्जनों की संगति।
अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबान्धवाः।
मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्या दरिद्रता।। = पुत्र रहित मनुष्य का घर सूना होता है। बन्धु-बान्धव से रहित मनुष्य की चारों दिशाएं सूनी होती हैं। मूर्ख का हृदय सूना होता है और दरिद्र व्यक्ति का तो घर दिशादि सब कुछ सूना होता है।
अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि देवतम्।
प्रतिमा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनः।। = द्विजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) का देवता अग्निहोत्र अर्थात् यज्ञ है। मुनियों का देवता हृदय में रहता है। मूर्खों का देवता प्रतिमा अर्थात् मूर्ति है और समदर्शियों के लिए सर्वत्र देवता विराजमान है।
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या अधनानां महाधनाः।
वाराऽङ्गनाः कुलस्त्रीणां दुर्भगानां च सुभगाः।। = मूर्खों के शत्रु विद्वान् हैं, निर्धन धनिकों से शत्रुता रखते हैं। कुलीन स्त्रियां वेश्या से द्वेष करती हैं और विधवाएं सुहागिन नारियों से द्वेष करती हैं।
सुखस्य मूलं धर्मः। धर्मस्य मूलमर्थः।। = सुख का मूल (कारण) धर्म है और धर्म का मूल (आधार) अर्थ (धन) है।
मम माता मम पिता ममेयं गृहिणी गृहम्।
एतदन्यं ममत्वं यत् स मोह इति कीर्त्तितः।। = मेरी माता, मेरे पिता, मेरी पत्नी, मेरा घर.. यह और अन्य सब प्रकार के ममत्व (आसक्ति) को मोह कहते हैं।
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च।। = प्रवास (यात्रा) में विद्या मनुष्य का मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है। रोगी का मित्र औषध है और मरे हुए (पतित व्यक्ति) का मित्र धर्म है।
उद्यन्त्सूर्य इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे। = जैसे उदय होता हुआ सूर्य सोए हुए आलसियों के तेज को हर लेता है, उसी प्रकार मैं (वीर) शत्रुओं के तेज को खींच लेता हूं।
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्।। = सन्तोषरूपी अमृत से तृप्त और शान्त चित्तवाले मनुष्य को जो सुख-शान्ति मिलती है, वह धन के लोभ से इधर-उधर भागनेवाले मनुष्य को नहीं मिल सकती।
यस्याऽर्थास्तस्य मित्राणि यस्याऽर्र्थातस्य बान्धवाः।
यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोके यस्याऽर्थाः स च जीवति।। = संसार में जिसके पास धन है उसी के सब मित्र होते हैं, उसी के सब बन्धु-बान्धव होते हैं। वही लोक में श्रेष्ठ पुरुष गिना जाता है और वही सुख से जीता है।
वाचं शौचं च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
सर्वभूते दया शौचं एतच्छौचं परार्थिनाम्।। = मन और वाणी की पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, प्राणिमात्र पर दया और धन की पवित्रता यही परोपकारियों (मुमुक्षुओं) की शुद्धि (पवित्रता) मानी गयी है।
सुखार्थी च त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी च त्यजेत्सुखम्।
न विद्यासुखयोः सन्धिस्तेजस्तिमिरयोरिव।। = सुखाभिलाषी को विद्या की आशा छोड़ देनी चाहिए और विद्यार्थी को सुखप्राप्ति की अभिलाषा छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि विद्या और सुख का मेल ऐसे ही असम्भव है जैसे प्रकाश और अन्धकार का मिलन।
लुब्धानां याचकः शत्रुर्मूर्खाणां बोधकः रिपुः।
जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चोराणां चन्द्रमा रिपुः।। = मांगनेवाला (याचक) लोभियों का शत्रु होता है। सदुपदेशक मूर्खों का शत्रु होता है। पति व्यभिचारिणी स्त्रियों का शत्रु होता है और चोरों के लिए शत्रु चन्द्रमा हुआ करता है।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ?
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ? = बुद्धिहीन का कल्याण वेदादि शास्त्र उसी प्रकार नहीं कर सकते, जैसे नेत्रविहीन के लिए दर्पण बेकार होता है।
आत्माऽपराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्।
दारिद्र्यरोगदुःखानि बन्धनव्यसनानि च।। = दरिद्रता, रोग, कष्ट, दुःख, बन्धन और आपत्तियां ये सब मनुष्य के अपने ही किए पापरूप वृक्ष के फल हैं।
यद् व्यङ्गाः कुष्ठिनश्चान्धाः पङ्गवश्च दरिद्रिणः।
पूर्वोपार्जितपापस्य फलमश्नाति देहिनः।। = अपंग, कोढ़ी, नेत्रहीन, लंगड़े तथा दरिद्र लोग वास्तव में अपने पूर्वोपार्जित पापों का फल ही भोग रहे होते हैं।
बहूनां चैव सत्त्वानां समवायो रिपुञ्जयः।
वर्षधाराधरो मेघस्तृणैरपि निवार्यते।। = संगठित मनुष्यों का समूह शत्रु के छक्के छुड़ा सकता है, जैसे मूसलाधार वर्षा के वेग को क्षुद्र तिनके (छप्पर के रूप में) रोक देते हैं।
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवति यादृशी।
तादृशी यदि पूर्वं स्यात् कस्य न स्यानमहोदयः।। = अशुभ कर्म कर चुकने के उपरान्त जैसी बुद्धि पछतानेवाले मनुष्य की उत्पन्न होती है वैसी बुद्धि कर्म करने के पूर्व में हो जाए तो किसका मोक्ष नहीं होगा ? अर्थात् सभी का कल्याण होगा।
स जीवति गुणा यस्य यस्य धर्मः स जीवति।
गुणधर्मविहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम्।। = वह जीवित है जिसके पास गुण हैं, वहभी जीवित है जिसके पास धर्म है। गुण तथा धर्म से रहित व्यक्ति का जीवन निष्फल तथा व्यर्थ है।
संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितं च सुस्वादु सङ्गतिः सुजने जने।। = संसार रूपी कड़वे वृक्ष के अमृत के समान मधुर दो ही फल हैं। रसीला प्रिय वचन और सज्जनों की संगति।
पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरा।
शङ्खो भिक्षाटनं कुर्यान्नाऽदत्तमुपतिष्ठते।। = समुद्र जिसका पिता है, लक्ष्मी जिसकी बहन है, चन्द्रमा के समान चमकता हुआ शंङ्ख भी यदि भीख मांगता फिरे तो समझ लेना चाहिए कि बिना दान दिए धन नहीं मिलता।
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके।
वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वाङ्गे दुर्जने विषम्।। = सांप का विष उसके दांत में, मक्खी के सिर में, बिच्छु के पूंछ में होता है। जबकि दुर्जन व्यक्ति के तो अंग अंग में विष होता है।
परोपकरणं येषां जागर्त्ति हृदये सताम्।
नश्यन्ति विपदस्तेषां सम्पदः स्युः पदे पदे।। = जिन सज्जनों के हृदय में परोपकार की भावना जागृत रहती है, उनकी आपत्तियां दूर हो जाती हैं और कदम कदम पर उन्हें सम्पत्तियां प्राप्त होती हैं।
परोपकारशून्यस्य धिङ् मनुष्यस्य जीवितम्।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति।। = परोपकाररहित मानव के जीवन को धिक्कार है अर्थात् उनका जीना बेकार है। जिनका मरणोपरान्त चमड़ा भी उपकार में लगता है ऐसे पशुओं का जीना सार्थक है।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते। = योगभ्रष्ट व्यक्ति पवित्र और श्रीमन्त लोगों के घर में जन्म लेता है।

श्चुत्व सन्धिः

{(स्तोः श्चुना श्चुः) सकार या तवर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) से पहले या बाद में शकार या चवर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ञ्) कोई भी हो तो सकार और तवर्ग को क्रमशः शकार और चवर्ग हो जाता है। (अर्थात् ‘स्’ को ‘श्’, ‘त्’ को ‘च्’, ‘थ्’ को ‘छ्’, ‘द्’ को ‘ज्’, ‘ध्’ को ‘झ्’ और ‘न्’ को ‘ञ्’ हो जाता है।)}

श्/तवर्ग + स्/तवर्ग अथवा स्/तवर्ग + श्/चवर्ग है तो स् = श् तथा तवर्ग = चवर्ग।

रामस् + च = रामश् च = रामश्च।
सत् + चित् = सच् चित् = सच्चित्।
यद् + ज्योतिः = यज् + ज्योतिः = यज्ज्योतिः।
याच् + ना = याच् ञा = याच्ञा

यद् + ज्योतिर् = यज्ज्योतिर्।
यज्ज्योतिरन्तरमृतम्प्रजासु तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु। = जो ज्योतिस्वरूप शरीर के अन्दर विद्यमान, उत्पन्न हुए समस्त पदार्थों में अविनाशी है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पवाला होवे।
तत् + चक्षुर् = तच्चक्षुर्; उत् + चरत् = उच्चरत्।
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। = वह सबका मार्गदर्शक, देवों का हितकारी, शुद्धस्वरूप सामने उपस्थित है।
सत् + चित् = सच्चित्।
ईश्वरः सच्चिदानन्दस्वरूपोऽस्ति = ईश्वर सत्, चित् व आनन्दस्वरूप है।
कस् + चिद् = कश्चिद्।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।। = हजारों में कोई एकाद योग सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। यत्न करनेवालों में कोई एकाद ही मुझे यथार्थरूप में जान पाता है।
योगात् + चलितमानसः = योगाच्चलितमानसः।
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।। = हे कृष्ण ! श्रद्धायुक्त हो योगमार्ग पर चलनेवाले साधक का मन उसका यत्न पूरा न होने के कारण योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगसिद्धियों को प्राप्त न करके किस गति को प्राप्त करता है ?
यत् + चन्द्रमसि = यच्चन्द्रमसि; यत् + चाग्नौ = यच्चाग्नौ।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्।। = सूर्य में विद्यमान तेज जो सकल जगत को प्रकाशित करता है, और जो चन्द्रमा तथा अग्नि में विद्यमान है, वह मेरा ही तेज है ऐसा जान।
कस् + चिद् = कश्चिद्।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति। = हे तात ! कल्याण करनेवाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

प्रबुद्ध पाठकों से निवेदन है कृपया त्रुटियों से अवगत कराते नए सुझाव अवश्य दें.. ‘‘आर्यवीर’’

अनुवादिका : आचार्या शीतल आर्या (पोकार) (आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, आर्यवन न्यास, रोजड, गुजरात, आर्यावर्त्त)
टंकन प्रस्तुति : ब्रह्मचारी अरुणकुमार ‘‘आर्यवीर’’ (आर्ष शोध संस्थान, अलियाबाद, तेलंगाणा, आर्यावर्त्त)

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