“पर्यावरण सांस्कृतिक स्वरूप”

संस्कृति का अर्थ है संस्कारित करना । नारी सुन्दर वस्त्रों आभूषणों तथा श्रृंगार के साथ लज्जा, वात्सलय, प्रेम आदि गुणों से संस्कारित होती है । संस्कार का अर्थ है – सम्यक भूषण भूत करना । सम्यक भूषण भूत का अाि है वाह्य एवं आंतरिक रूप से अलंकार पूर्ण । मानव का अस्तित्व पर्यावरण में है । पर्यावरण सत अर्थात अस्तितवशील है । मानव सत चित् अर्थात अतित्व युक्त चेतन्य है । यही कारण है कि पर्यावरण में रहते मानव पर्यावरण को शुद्ध या अशुद्ध विभिन्न उपायों से करता है ।

उन समस्त वाह्य परिस्थितियों के योग को जिनमें (मानव या प्राणी या वस्तु) पर प्रभाव डाले पर्यावरण हैं । पर्यावरण शब्द से यही परिभाषा अभिव्यक्त होती है । परि + आवरण अर्थात आस पास ऊपर नीचे का समस्त आवरण । आधुनिक पर्यावरण वैज्ञानिक जे.के. मान्क हाऊस भी पर्यावरण से यही अर्थ लेते हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरण पर एक दूसरे प्रकार का चिन्तन भी उपलब्ध है उसके अनुसार वे वाह्य शक्तियां जो हमें प्रगति की ओर अग्रसर करती हैं, पर्यावरण है । पर्यावरण वैज्ञानिक शंस की धारणा इस चिन्तन से मेल खाती है । पर्यावरण का सांस्कृतिक स्वरूप में उपरोक्त दोनों धारणाओं का समन्वय है ।

पर्यावरण की सांस्कृतिक परिभाषा इस प्रकार है । वह त्रिस्थानीय देवताओं के लिए हित कारक सम पवित्र ज्ञान तेज मेरे सामने उदित हो गया है । सर्वत्रीय उसकी इस व्यापक जयोति में हम सब कम से कम सौ वर्ष देखें, सौ वर्ष सुनें, सौ वर्ष चर्चा करें, सौ वर्ष बढ़ें, सौ वर्ष बोध प्राप्त करें, सौ वर्ष पुष्ट रहें, सौ वर्ष भव्य हों, सौ वर्ष स्वतंत्र अदीन रहें और सौ वर्ष से भी अधिक आयु प्राप्त कर आनंद से रहें ।

त्रि स्थानीय देवता व्यवस्था इस प्रकार है । यास्क के निघण्ड, में पृथ्वी स्थानीय देवताओं में प्रुमख हैं अग्नि, जातवेद, त्वष्टा, वनस्पति, आदः, अश्व, शकुनि (पक्षी), मण्डकाः (जलचर), नदियां, तृषम, ओषधयः, रथः आदि, अंतरिक्ष स्थानीय मंे प्रमुख है – वायु, वरुण, इन्द्र, इन्द्र, प्रजन्य, यम, मित्र, सविता, वातः, अग्नि, वेन (किरणें) ऋतु, प्राणवायु, अहिस्मेध, श्येन (पक्षी) चन्द्रमा, धाता, विधाता अंगीरस, सरमा (वाणी), गौ, स्वस्ति, उषा आदि और स्थानीय देवता इस प्रकार दिये गये हैं: अश्विन, सूर्य, उषा, अग्नि, पूषा, विष्णु, अज एक पात, अथवा, आदित्या, सप्त ऋषयः, साध्याः, देवाः विष्णु विभिन्न स्थानीय सूर्य, देवशक्तियाँ आदि ।

विश्व और शरीर में देवताओं में सामंजस्य हैं ।
विश्व में देवता शरीर में देवता
द्यु लोक सिर
सूर्य, अंगीरस नेत्र
आदित्य नेत्र
अग्नि मुख वाक
दिशा कान
अंतरिक्ष उदर
रूद्र, वायु प्राण अपान
विद्युत जठराग्नि

एक और स्वरूप देवता व्यवस्था का ऐतरेय उपनिषद में इस प्रकार है:
देवता देवतांश भौतिक स्थान
विश्व में अंतस में शरीर में
अग्नि वाक् मुख
वायु प्राण नासिका, फेफड़े
आदित्य चक्षु नेत्र
दिशा श्रोत्र कण
औषधि त्वक् त्वचा
चन्द्रमा मन हृदय
मृत्यु अपान नाभि
आप रेत शिश्न

इसके साथ ही साथ एक मूल स्वर शब्द ब्रह्म से उत्पन्न ”अ“ से पांच स्वर इ ऋ लृ ड और इनसे तैंतीस वर्ण जो पंच स्थानी (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठा) है बने । इनमें से हर वर्ण देवता है । इस प्रकार पंच स्थानीय होने के साथ ही साथ इन तैंतीस देवताओं को तीन ग्यारह ग्यारह के समूह पृथ्वी, अंतरिक्ष, एवं घी स्थानीय भी है ।

संक्षेप में यह सर्व से अंश ( ) की एक तहत योजना है जो पर्यावरण के व्यापक अर्न्तसंबंधित स्वरूप को दर्शाती है । यहां केवल उसकी ओर इंगन मात्र किया गया है ।

ब्रह्म ज्योति इन देवताओं के लिए हितकारी है इस ज्योति के प्रकाश में ही कम शत वर्षीय सुखद जीवन, शतालिक वर्षीय आल्हाद मय जीवन सृष्टि के नियमानुसार जी कर ही प्राप्त कर सकते हैं ।

सांस्कृतिक पर्यावरण एक व्यापक वृहत धारणा है । जिसमें संपूर्ण पर्यावरण में प्राकृतिक स्थैर्य, समता और संतुलन की पवित्र भावना की गई है ।

समस्त चमकीले छुतिशील पदार्थों में तलों में जल, प्राण, ताप, द्रव, वायु – प्रवहण शील पदार्थों में, अंतरिक्ष में, वायुमंडल के तीन स्तरों में, पृथिवी में, समस्त आधार तलों में जल, प्राण, ताप, द्रव, वायु प्रवहण शील पदार्थों में, औषधियों में जीवन बढ़ाने वाले पदार्थों में, वनस्पति जगत में, प्राणी जगत में तथा विद्वान जगत में जो प्राकृतिक संतुलन एवं स्थैर्य है वह सहज प्राप्त हो । यह सांस्कृतिक पर्यावरण में पिरोई गई भावना है । अधिभौतिक, अधिदैनिक, तथा आध्यात्मिक शांति (व्यवस्था + संतुलन + स्थैर्य) सबको सहज सरल हो।

उपरोक्त सांस्कृतिक पर्यावरण धारणा की पवित्रता से उत्पन्न भारतीय सांस्कृतिक जीवन छत्तीस अनुशासनों से आबद्ध है । ये अनुशासन हैं (अ) चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष । (ब) चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास (स) सोलह संस्कार – गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जन्म जातकर्म, नामकरण अन्न प्राशन, चूड़ा कर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास एवं अन्त्येष्टि हर संस्कार पर होम + दान + अर्चना + संगतिकरण (यज्ञ) (द) पांच यज्ञ ब्रह्म, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, बलिवेश्य यज्ञ, अतिथि यज्ञ । (इ) गृहस्थाश्रम में चार वर्ण – ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शिल्पकार, और इन सब अनुशासनों के साथ जुड़ी है -उपयोगी वृक्ष आम, पीपल, बड़, आंवला, नीम, तुलसी को जल खाद दे उनकी पूजा ।

हर ऋतु की संधि पर पर्वों द्वारा वातावरण की शुद्धि योजना भी सांस्कृतिक पर्यावरण कर्म हैं ।

भारतीय सांस्कृतिक पर्यावरण धारणा जीवन में जीने पर मानव पुनः समुन्नत हो सकता है । भारत इसे भी पुन विश्व सिरमौर हो सकता है ।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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