परियोजना प्रबंधन

परियोजना प्रबंधन वह जटिल विज्ञान है जो अभी विकासशील आवस्था में है। परियोजना प्रबंधन की आवश्यकता विश्व में बढ़ती जा रही है। क्योकि परियोजनाओं के निर्माण में औसतः अनुमान से कहीं अधिक समय लग रहा है। करीब करीब हर परियोजना का विलम्ब से पूरा होना प्रबंधकों, ठेकेदारों की मजबूरी हो गया है।

परियोजना प्रबंधन का महत्वपूर्ण सहाय (टूल) है परियोजना का प्रगति रेखा चित्रा। इस क्षेत्रा मे ंपिछले चालीस-पचास वर्षों में महान परिवर्तन हुए हैं। इन परिवर्तनों का क्रम इस प्रकार है। दण्ड तालिका-शेष मात्राएं वक्र पथ विधि वर्ग क्रांतिक पथ विधि-कामूआत-(कार्य मूल्यांकन आकलन तकनीक)-स्व आयोजन। स्व आयोजन कामूआत, का ही कम्प्यूटर की मदद से परिवर्तनीय परिस्थितियों में संसाधन आकलन आदि हैं। दण्ड तालिका मात्रा प्रगति तालिका थी। कामूआत तकनीक मात्रा प्रगति तालिका न होकर पूर्ण परियोजना का संरचनात्मक आकारात्मक चित्रा है। कामूआत प्रारूप को देखते ही हम परियोजना की वास्तविक प्रगति एवं पिछ़डाव पहली ही दृष्टि में देख सकते हैं। न केवल प्रगति पिछड़ाव वरन् इस प्रगति पिछड़ाव के परियोजना पर सकारात्मक एवं नकारात्मक तथा तटस्थ प्रभाव भी कामूआत से पता चल जाते हैं। विभिन्न कार्यों के अन्तर्सम्बन्धों, संसाधन व्यवस्थाओं, मानव शक्ति आवश्यकताओं आदि का चित्राण कामूआत तथा उसके विकसित रूप आटो प्लान या स्व आयोजन में मिल जाता है।

परियोजना प्रबंधन का तरीका इतना क्लिष्ट या जटिल, कठिन क्यों है? इसलिए कि परियोजना की परिभाषा में ही कुछ अनिश्चित्तता के तत्वों का समावेश हैं। ‘वह जटिल कार्य समूह जो एक ही सम्पूर्ण हो, जिसमें बृहत लागत लगनी हो, जिसे नियम समय में पूर्ण करना हो, जिसमें अनेकानेक समय और मूल्य के सम्बन्ध में अन्तर्संबन्धित क्रियाएं हों, जिसमें न केवल दुहराव का अभाव हो वरन मुकाबला पूर्ण चुनौतियां तथा विशेष सुरक्षा व्यवस्था हो वह परियोजना है।’ दुहराव का अभाव तथा मुकाबला पूर्ण चुनौतियां परियोजना की आत्मा है। यही तत्व हर परियोजना को विशिष्ट करता है तथा विशेष परियोजना प्रबंधन की मांग करता है।

कामूआत के तीन उद्देश्य हैं। 1) आयोजन, 2) समयबद्ध कार्य विभाजन, 3) नियंत्राण। वर्तमान मे ंपहली कामूआत का विकास 1958 में पोलारिस अस्त्र शस्त्र व्यवस्था के आयोजन तथा नियोजन हेतु संयुक्त राज्य अमेरिका की नेवी हेतु हुआ। इसके निम्नलिखित चरण हैं।

1) परियोजना-के उद्देश्य, पूर्ण कार्य का आकलन, कार्य को क्रिया एवं घटना में विभाजित करना। उद्देश्य-क्षमता, समय, लागत। 2) क्रियाओं तथा घटनाओं को जाल रूप में प्रदर्शित करना- इनके समयों का आकलन। 3) जाल का विश्लेषण – न्यूनतम समय पथ तथा झोल समय का पता लगाना। 4) पुनरायोजन। 5) कार्य-समय विभाजन। 6) पूर्णीकरण- नियन्त्राीकरण।

कामूआत में कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं काम में लाई जाती हैं, वे इस प्रकार हैं।

न्यूनतम आवश्यक समय पथ या क्रातिक पथ- वह क्रियाओं एवं घटनाओं का क्रमशः सातत्य पथ है जिस पर की कोई क्रिया विलम्बित होने से परियोजना विलम्बित हो जाएगी।

इसका सरल अर्थ यह है कि इस पथ पर की हर क्रिया-समय सम्बन्ध में कोई झोल की गुंजाइश नहीं हैं। आरम्भ से अन्त तक यह एक क्रिया घटना सातत्य पूर्ण दीर्घतम पथ है।

अन्त्य गुंजाइश समय- परियोजना की अवधि को बिना दुष्प्रभावित किए समय तक में यदि कोई क्रिया पूरी हो सकती है तो उसे अन्त्य गुंजाइश समय कहते हैं।

अपेक्षित समय- वह समय जिसमें एक क्रिया न्यूनतम समय में पूर्ण होना अपेक्षित है यह क्रातिक पथ क्रिया या अन्य क्रिया पर भी लागू होता है।

झोल- वह समय मात्राा है जिस तक कोई क्रिया परियोजना पूर्ण करने के समय को दुष्प्रभावित किए बिना पूर्ण की जा सकती है। झोल समाप्त होते ही वह क्रिया भी क्रातिक हो जाती है। नकारात्मक झोल किसी भी क्रिया को अतिक्रातिक कर देती है तथा इस अवस्था में वह क्रिया अतिरिक्त संसाधनो को झोंक करके भी पूरा करने का प्रयास किया जाता है।

क्रिया-एक घटना से दूसरी घटना तक पहुंचना एवं उसमें लगा समय क्रिया है।

घटना- वह समय बिन्दु जिसे एक भिन्न क्रिया की पूर्ति के रूप में पहचाना जाए।

सीढ़ी- क्रियाओं एवं घटनाओं का वह क्रम जिसके माध्यम से कार्य क्रमशः चढ़ता है या पूर्ण होता है।

वर्तमान काल में ब्रिटिश स्टील कन्सल्टेंट परियोजना प्रबंधन के विशेषज्ञ माने गए हैं। उनके अनुसार परियोजना के निम्न विभाजन हैं।

परियोजना जीवन चक्र

(1) अवधारणा, (2) रूप रेखा-उपयुक्तता एवं आयोजन, (3) अभिकल्पन, (4) खरीद या क्रय करना, (5) निर्माण तथा स्थापन, (6) आरम्भन, (7) सौंपना एवं चालन, (8) परियोजना पुनः अवलोकन।

हर चरण का पुनः पांच स्तरों में विभाजन है।

1) कार्य प्रकृति, 2) विभाग के उद्देश्य, 3) लोग तथा संगठन (सन्दर्भित), 4) हर विभाग पर आवश्यक सूचना, 5) उद्देश्य पूर्ति हेतु जांच व्यवस्थाएं। वर्तमान में सक्षेप में यह प्ररियोजना प्रबंधन का सार रूप है।

भारतीय सांस्कृतिक स्वरूप भी परियोजना प्रबंधन का उपलब्ध है। वह इस प्रकार है।

किसी अर्थ के निर्णय के लिए चर्चा-संप्रेषण को कथा कहते हैं। इस परिभाषा के अनुसार कामूआत या पर्ट- वह कथा है जो परियाजना प्रबंधन द्वारा परियोजना पूर्ण करने के हेतु की गई चर्चा या संप्रेषण है। भारतीय पर्ट का इतिहास वेद से उत्पन्न नाट्य शास्त्र भरत मुनि अनुमानतः ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व से आरम्भ होता है। भरत मुनि नाट्य शास्त्र आधारित धनंजय (974-995) रचित दशरूपकम् के आधार पर इसका प्रारूप यहां दिया जा रहा है। धनंजय के अनुसार यह विवरण मन्द बुद्धि लोगों जो भरत मुनि के उच्च विवरण को नहीं समझ सकते के लिए लिखा गया है। यहां हम परियोजना प्रबंधन दृष्टि से उपयोगी अंश जो पूरी पुस्तक का करीब पन्द्रह बीस प्रतिशत है संक्षेप में दे रहे हैं।

अनुबंध- जो हमारे किसी ज्ञान में प्रवृत्त होने की प्रवृत्ति के प्रयोजक ज्ञान का विषय है। अनुबंध के चार चरण हैं। 1) विषय, 2) अधिकारी, 3) सम्बन्ध, 4) प्रयोजन। परियोजना संदर्भ में विषय है परियोजना प्रबंधन। अधिकारी है परियोजना प्रबंधक। सम्बन्ध है परियोजना प्रबंधन और कामूआत। तथा प्रयोजन है सांस्कृतिक परियोजना प्रबंधन के स्वरूप का वर्तमान उद्योगों में अनुपालन एवं परियोजना पूर्ति का आह्लाद।

नाट्य-अवस्था के अनुकरण को नाट्य कहते है। कथा नाट्य होती है। यह श्रव्य दृष्य होता है। इसमें मुख्य वस्तु अधिकारिक कहलाती है तथा अंग रूप वस्तु प्रासंगिक कहलाती है।

अधिकाधिक- परिणाम पर स्वामित्व प्राप्त करना अधिकार है। इस परिणाम भोक्ता के द्वारा परिणाम प्राप्ति तक निर्वाहित क्रम या कथा अधिकारिक वस्तु कहलाती है। (क्रातिक पथ से तुलनीय)

प्रासंगिक- जो कथा या क्रम दूसरे (अधिकारिक) प्रयोजन के लिए होती है, किन्तु प्रसंग से जिसका स्वंय का फल भी सिद्ध हो जाता है वह प्रासंगिक वृत है। यह दो प्रकार है। 1) पताका, 2) प्रकरी।

पताका- जो प्रासंगिक कथा अनुबंध रहित होती है तथा परियोजना (रूपक) में दूर तक चलती रहती है। वह पताका कहलाती है।

प्रकरी- जो कथा केवल एक ही प्रदेश तक सीमित रहती है वह प्रकरी कहलाती है।

पताका स्थानक- जहां प्रस्तुत भावी (भविष्य) वस्तु की समान क्रम या समान विशेषण के द्वारा अन्योक्तिमय सूचना हो उसे पताका स्थानक कहते हैं। पताका स्थानक भी दो तरह के हैं।

1) तुल्येतिवृत्तरूप, 2) तुल्यविशेषण रूप।

पताका के उप पताका, सह पताका तथा प्रकरी के भी उप प्रकारी, सह प्रकरी भेद हो सकते हैं। इसी प्रकार उप पताका स्थानक, प्रकरी स्थानक आदि संकल्पनाएं भी हो सकती है। इनका सबका चित्रा इस प्रकार बनेगा।

नाट्य को यदि परियोजना प्रबंधन माना जाए तो यह चित्रा कामूआत ही कहलाएगा। कथा का नाम इतिवृत्त भी है। इतिवृत्त का सरलार्थ है।

इतिवृत्त- कामूआत के लक्षणों के अनुसार रचा गया या गढ़ा गया वृत या परियोजना। इतिवृत्त तीन प्रकार का है। प्रख्यात-पूर्व वर्तमान या पूर्व वर्णित से गृहीत। उत्पाद्य- कल्पनाजन्य या सर्वथा नवीन। मिश्र- दोनों का सम्मिलित रूप।

पताका, प्रकरी भी प्रख्यात, उत्पाद्य, मिश्र होते हैं। व्यवहार दृष्टि से इन परियोजनाओं के उदाहरण कोक ओव्हन बैटरी 10 निर्माण – प्रख्यात। वायर राड मिल आधुनिकीकरण – उत्पाद्य तथा धमनभट्ठी पुनर्निर्माण मिश्र गिने जाएंगे।

कामूआत के चित्रा में स्पष्टतः एक वक्र का भी भान होता है। ‘एस’ वक्र वह वक्र है जिसमें कार्य तथा प्रगति का चित्रा दिखाया जाता है। उसका प्रारूप इस प्रकार है।

इतिवृत्त के उपरोक्त व्यावहारिक रूपों से हटकर तीन और रूप दिव्य, मर्त्य तथा दिव्यादिव्य भी हैं।

इतिवृत्त कार्य (फल)- यह धर्म, अर्थ, काम त्रिावर्ग रूप है। कभी यह एक होता है, कभी दो और कभी तीन। मिश्रता के भिन्न अनुपात भी होते हैं।

बीज- आरम्भ में अल्प रूप में सांकेतिक वह तत्व जो परियोजना के फल का कारण है तथा इसमें अनेक रूप में पल्लवित होता है बीज कहलाता है। यह दो प्रकार का है। 1) महाकार्य का हेतु, (2) अवान्तर कार्य का हेतु।

अर्थ प्रकृति- प्रयोजन की सिद्धि के हेतुओं का नाम अर्थ प्रकृति है। 1) बीज, 2) बिन्दु, 3) पताका, 4) प्रकरी, 5) कार्य प्रकृतियां हैं।

अवस्थाएं- परिणाम की इच्छावाले प्रोजेक्ट मॅनेजर के द्वारा प्रारब्ध कार्य की पांच अवस्थाएं होती हैं। 1) आरम्भ, 2) यत्न, 3) प्राप्ताशा, 4) नियताप्ति, 5) फलागम। इन पांच अवस्थाओं को समय प्रगति वक्र में इस प्रकार दर्शाया जा सकता है।

यत्न एवं नियताप्ति अवस्थाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। यत्न अवस्था में कम प्रगति (समय) की अपेक्षा पर एक असन्तुष्टि के कारण निराशा होती है। इसके कारण कभी-कभी हताशा के कारण परियोजना या प्रकरी या पताका लड़खड़ा जाती है। कोई-कोई प्रबन्धक असन्तुष्टि और निराशा के कारण अधिक कार्य करते हैं। नियताप्ति अवस्थामें प्रगति समय की अपेक्षा अधिक होती है। परिणामतः कुछ प्रबन्धक परियोजना के प्रति आश्वस्त हो जाते हैं तथा इस कारण प्रगति धीमी हो जाती है। कुछ प्रबन्धक उत्साही हो जाते हैं। और परियाजना गति तीव्र हो जाती है।

यत्न एवं नियताप्ति अवस्था में चार नायक प्रकारों 1) धीर ललित, 2) धीर प्रशान्त, 3) धीरोदात्त, 4) धीरोद्धत में ये धीर प्रशान्त तथा धीरोदात्त उपयुक्त होते हैं। कतिपय निदेशक परियोजना के मध्य ही नायक परियोजना प्रगति के अनुसार परिवर्तित करते पाए गए हैं।

सामान्य बिन्दु- जहां किसी दूसरी कथा (अर्थ) के अर्थ से विच्छिन्न हो जाने पर इतिवृत्त को जोड़ने और आगे बढ़ने के लिए जो कारण होता है वह बिन्दु कहलाता है।

अच्छेद कारण बिन्दु- वह बिन्दु जो वृत्त में आगे जाकर ठीक वैसे ही प्रसारित होता है जैसे तेल की बून्द पानी में फैलती है।

प्रकृतियां एक भौतिक विभाजन है। अवस्थाएं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है।

आरम्भ- परिणाम की अत्यन्त उत्सुकता मात्रा ही आरम्भ कहलाती है।

प्रयत्न- फल की प्राप्ति न होने पर उसे पाने के लिए बड़ी तेजी के साथ जो उपाय योजनायुक्त व्यापार या चेष्टा होती है वह प्रयत्न है।

प्राप्ताशा- जहां उपाय तथा विघ्न की आशंका के कारण फल प्राप्ति के विषय में कोई ऐकान्तिक निश्चय नहीं हो पाता, फल प्राप्ति की संभावना उपाय व विघ्नाशंका दोनों में दोलायमान रहती है, वहां प्राप्ताशा नामक अवस्था होती है।

नियताप्ति- जब उपाय सफल एवं विघ्न के अभाव के कारण फल की प्राप्ति निश्चित हो जाती है तो नियताप्ति नामक अवस्था होती है।

फलयोग- समस्त फल की प्राप्ति हो जाने पर फलयोग (फलागम) कहलाता है।

सौ अभियंताओं, दस सौ मजदूरों, दस सौ वर्ग मीटर क्षेत्रा, दस मंजिलों, सौ करोड़ रुपयों, छोटे-बड़े सौ ठेकेदारों, दस बड़ी एजेन्सियों के सहयोग से धमनभट्ठी पुनर्निर्माण/नवनिर्माण की दस तथा कुछ अन्य सफल योजनाओं में सकारात्मक भूमिका निभाने का अनुभव दर्शाता है कि उपरोक्त सारी भारतीय ”कामूआत” परिभाषाएं इनमें लागू थीं। ये परियोजनाएं समयावधि में पूर्ण करना एक विश्व रेकार्ड है। यह सब भारतीयता की देन है। यदि भारतीय कामूआत सिद्धान्तों का पूर्ण पालन होता तो ये परियोजनाएं और कम समय में पूर्ण होतीं। तथा अन्य परियोजनाएं भी समय पर पूरी हाती। बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी, कार्य ये पांच अर्थ प्रकृतियां जब क्रमशः आरम्भ, यत्न, प्राप्ताशा, नियताप्ति, फलागम इन पांच अवस्थाओं से मिलती हैं तो क्रमशः मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण (उपसंहार) इन पांच सन्धियों की रचना होती है (इनके मिलने से सन्धि होने की धारणा पर कतिपय मतभेद हैं)। सन्धि की परिभाषा इस प्रकार है।

सन्धि- किसी एक प्रयोजन से परस्पर सम्बन्धित (अन्वित) कथांशों को जब किसी दूसरे प्रयोजन से सम्बद्ध किया जाए तो वह सम्बन्ध सन्धि कहलाता है।

मुखसन्धि- नाना प्रकार के रसों (कार्य, शौर्य क्षेत्रा) को उत्पन्न करने वाली बीजोत्पत्ति इसमें पाई जाती है वह मुखसन्धि है। इसके बारह अंग हैं। उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोभन, युक्ति प्राप्ति, समाधान, विधान, परिभावना, उद्भेद, भेद तथा करण।

उपक्षेप- बीज का न्यास आरम्भिक क्षेत्रा में उपक्षेप है। (इसे शिलान्यास कहा जा सकता है)।

परिकर या परिक्रिया- बीज न्यास के बाहुल्य को परिकर या परिक्रिया कहते हैं।

परिन्यास- बीज न्यास बाहुल्य की परिपक्वावस्था (निष्पत्ति) परिन्यास कहलाती है।

विलोभन- फल सम्बन्ध गुणों की विवेचना विलोभन है।

युक्ति- जहां अर्थों का (अभीष्ट तथ्यों का) अवधारणा या समर्थन किया जाए वहां युक्ति होती है।

प्राप्ति- जहां (फल की प्राप्ति की आशा में) सुख का आगम हो वह प्राप्ति है।

समाधान- बीज का उत्पादन, फिर से बीज का युक्ति के द्वारा व्यवस्थापन समाधान कहलाता है।

विधान- जहां सुख दुःख कृत हों वहां विधान है।

परिभावना- अद्भुत् आवेश (कार्यावेश) परिभावना है।

उद्भेद- गूढ़ का भेदन (अनिश्चित्तता हल) उद्भेद है।

करण- प्रकृत कार्य का आरम्भ करण है।

भेद- जहां प्रोत्साहन पाया जाए या प्रोत्साहित किया जाए वहां भेद होता है। मुख संधि तथा उसके भेद व्यवहार में काल्पनिक भेद नहीं है। एक व्यावहारिक उदाहरण द्वारा इसे स्पष्ट किया जा रहा है। हम धमनभट्ठी सात के नवीनीकरण की परियोजना को उदाहरण के रूप में लेते हैं। (1) धमनभट्ठी सात में मई माह में परिपक्व अवधि पूर्व शेल में दरार पड़ गई तथा पूरा कास्ट हाऊस के नीचे का क्षेत्रा तपते पिघले लोहे का समुन्दर बन गया। इसके सुधार/पुनर्निर्माण की योजना बनी। बीज न्यास आरम्भिक अवस्था में हुआ उपक्षेप सन्धि अंग। (2) कास्ट हाऊस के आधारखंबो, दरार भरने, कम ताप पर भट्ठी चालन, कास्ट हाऊस छत सामान्यीकरण विचार-बीज न्यास बाहुल्य परिकर या परिक्रिया मुख सन्धि अंग। (3) इन कार्यों के पूरा होते-होते शेल काटकर व्यास बढ़ाने की योजना, धमनभट्ठी उपरी भाग बीमों पर रखने की योजना, सेलेमेंडर की टॅपिंग की योजना बनाना मुख सन्धि का परिन्यास अंग। (4) इसके पश्चात उपरोक्त कार्यों का तकनीकी आर्थिक विश्लेषण फल सम्बन्धि गुणों की विवेचना विलोभन सन्धि अंग। (5) जापान, रूस, जर्मनी से कार्य निष्पादन सम्बन्ध, नव प्रौद्योगिकी स्थापन, तर्क अर्थों का अवधारण या समर्थन-युक्ति सन्धि अंग। (6) निष्कर्ष अगस्त से कार्यारम्भ निर्णय सन्तुष्टि-प्राप्ति सन्धि अंग। (7) कार्य का आरम्भ सेलेमेण्डर टॅपिंग प्रारम्भ समाधान सन्धि अंग। (8) धमनभट्ठी द्वारा स्व निर्देश मानने से इन्कार, टॅपिंग के वैकल्पिक तरीके- सुख-दुःख विधान सन्धि अंग। (9) एक हजार टन सेलेमेण्डर भट्ठी में रह जाना- इतना बड़ा अतिरिक्त कार्य एक अद्भुत आवेश परिभावना सन्धि अंग (10) अनिश्चित्तता जीतना तेरा नाम अभियंता नई चुनौतियां शेल का पच्चीस जगह सामान्य से विकृत होना, 120 अतिरिक्त कूलरों का विस्थापन, हार्थ कालम तोड़ने के कठिन कार्य, हजार टन सेलेमेण्डर को हटाने 35 ब्लास्टिंगों का विचारण गूढ़ का भेदन अनिश्चित्तताओं का हल उद्भेद सन्धि अंग। (11) नई योजना के अनुसार एकजुट हो कार्य का आरम्भ करण सन्धि अंग। (12) फ्ल्क्स कटिंग मशीन की व्यवस्था, शेल तीव्र कटिंग समस्या हल की उम्मीद, हिटैची गूज नेक ब्रेकर द्वारा हार्थ कालम तोड़क योजना द्वि कूलर फिक्सिंग मशीन द्वारा कूलर लगाने में गति वृद्धि संभावनाओं की आशाएं- भेद सन्धि अंग। इस प्रकार मुख सन्धि व्यावहारिक रूप में हर परियोजना में होती ही है पर इसके स्वरूप भिन्न हो सकते हैं। प्रतिमुख सन्धि- बीज (कार्य) का कुछ-कुछ दिखाई देना और कुछ दिखाई न देना तथा इस लक्ष्यालक्ष्य रूप में फूट पड़ना (उद्भिन्न होना) प्रतिमुख सन्धि का विषय है। इस सन्धि में बिन्दु नामक अर्थ प्रकृति तथा प्रयत्न नामक अवस्था का मिश्रण होता है। इसके तेरह अंग हैं। 1) विलास, 2) परिसर्प, 3) विधूत, 4) शर्म, 5) नर्म, 6) नर्मद्युति, 7) प्रगमन, 8) निरोधन, 9) पर्युपासन, 10) वज्र, 11) पुष्प, 12) उपन्यास, 13) वर्णसंहार।

(1) विलास- (कार्य) रति की इच्छा को विलास अंग कहते हैं।

(2) परिसर्प- जब बीज एक बार दृष्ट हो गया किन्तु फिर दिखाई देकर नष्ट हो जाए और उसकी खोज की जाए तो वह खोज परिसर्प कहलाती है।

(3) विधूत- जहां अरति (लक्ष्यालक्ष्य लगने से हताशा) हो वह विधूत है।

(4) शर्म- अरति की शान्ति शर्म है।

(5) नर्म- परिहास के वचन नर्म है।

(6) नर्मद्युति- धैर्य की स्थिति नर्मद्युति है।

(7) प्रगमन- परस्पर उत्तरोत्तर वचन प्रगमन है।

(8) निरोधन- हित में अवरोध निरोधन है।

(9) पर्युपासन- प्राप्तव्य के निरोध पर प्रबन्धक द्वारा सहाय का अनुनय पर्युपासन है।

(10) वज्र- प्रबंधक के प्रति कटु वचन वज्र है।

(11) पुष्प- कार्यविशेष के द्वारा बीजोद्घाटन पुष्प है।

(12) उपन्यास- उपाययुक्त या हेतु प्रदर्शक उपाय उपन्यास है।

(13) वर्ण संहार- सारा समुदाय जो कार्यरत है एक स्थल इकत्रिात हो वह वर्ण संहार प्रतिमुख सन्धि अंग है। विस्तार भय से हम परियोजना विवरण में ये अंग नहीं दे रहे हैं। परन्तु जिस किसी ने भी परियोजना के निर्माण में सक्रिय भाग लिया है वो इन अंगों को तथा आगे गर्भ सन्धि के अंगों को परियोजना में सहजतः पा सकता है।

गर्भ सन्धि- जब बीज के दिखने के बाद फिर से अस्पष्ट होने पर उसका बार-बार अन्वेषण किया जाता है तो गर्भ सन्धि होती है। गर्भ सन्धि के बारह अंग हैं। इसमें प्रायः पताका (अर्थ प्रकृति) तथा प्राप्ताशा का मिश्रण पाया जाता है। पताका होना अनिवार्य नहीं है पर प्राप्ताशा जरूरी है। पांच सन्धियों का रेखाचित्रा तथा उसमें गर्भ सन्धि की स्थिति का चित्रा यह है।

गर्भ सन्धि की विशिष्टता स्पष्ट है। सन्धियों के नामानुरूप परियोजना में उनका महत्व भी उपरोक्त सन्धि चित्रा से स्पष्ट है। गर्भ सन्धि में आकर जो बीज प्रतिमुख सन्धि में कभी पनपता और कभी मुरझाता (लक्ष्यालक्ष्य रूप में) देखा गया है वह बीज यहां आकर विशेष रूप से फूट पड़ता है। इसके बारह अंग हैं।

1) अमूताहरण, 2) मार्ग, 3) रूप, 4) उदाहरण, 5) क्रम, 6) संग्रह, 7) अनुमान, 8) तोटक,

9) अधिबल, 10) उद्वेग, 11) संभ्रम, 12) आक्षेप।

(1) अमूताहरण- साम, दाम, दण्ड, भेद (छद्म) का प्रयोग अमूताहरण गर्भ सन्धि अंग है।

(2) मार्ग- निश्चित तत्व का (अर्थ प्राप्ति रूप तत्व का) यथावत वर्णन (कीर्तन) मार्ग है।

(3) रूप- जहां प्राप्ति की प्रतीक्षा में तर्क-वितर्कमय वाक्यों का प्रयोग हो उसे रूप गर्भ सन्धि अंग कहते हैं।

(4) उदाहरण- उत्कर्ष या उन्नति हेतु प्रस्थापित व्रत प्रेरणा उदाहरण है।

(5) क्रम- जहां आप्ति (इष्ट वस्तु प्राप्ति) का क्रमिक संचयन होता जाए वह क्रम गर्भ सन्धि अंग है।

(6) संग्रह- अनुकूल आचरण करने वाले पात्राों द्वारा साम तथा दाम संग्रह है।

(7) अनुमान- हेतुओं के आधार पर प्रबंधक द्वारा दिए तर्क अनुमान है।

(8) तोटक- क्रोध/ओजयुक्त वचन तोटक हैं।

(9) अधिबल- जहां पात्राों द्वारा प्रबंधक का अभिप्राय समझ लिया जाता है अधिबल नामक गर्भ सन्धि अंग है।

(10) उद्वेग- अड़चनों से भय उद्वेग है।

(11) संभ्रम- कर्मचारियों (पात्राों) में सन्देह एवं भय संचार संभ्रम है।

(12) आक्षेप- गर्भ एवं बीज का उद्भेद हो या गर्भ के बीज का उद्भेद हो वहां आक्षेप गर्भ सन्धि अंग है।

गर्भ सन्धि के बारह अंगो में छः छः अंगों के जोड़े हैं या गर्भ सन्धि दो भागों में विभाजित सी प्रतीत होती है। इन्हें पूर्व गर्भ सन्धि तथा उत्तर गर्भ सन्धि नाम दिए जा रहे हैं।

विमर्श सन्धि या अविमर्श सन्धि- इसका अर्थ विचार, विवेचन या पर्यलोचन (आलोचना) है। ये समरूप क्रोध, व्यसन (आदत), विलोभन या भक्ति से हो सकता है।

‘यह चीज जरूर होगी’ इस प्रकार का फल प्राप्ति के निश्चय का निर्धारक पाया जाए तथा गर्भ सन्धि द्वारा प्रकटित बीज से जहां संबंध पाया जाए वह पर्यालोचना विमर्श या अवमर्श है। इस सन्धि के तेरह अंग हैं। 1) अपवाद, 2) संफेट, 3) विद्रव, 4) द्रव, 5) शक्ति, 6) द्युति, 7) प्रसंग, 8) छलन, 9) व्यवसाय, 10) विरोधन, 11) प्ररोचना, 12) विचलन, 13) आदान,

(1) अपवाद- कार्य या कार्यकारी के प्रख्यात दोष कथन (एवं उनमें सुधार) अपवाद है।

(2) संफेट- रोष से युक्त बातचीत संफेट है।
(3) विद्रव- समाप्ति या बन्ध जाना विद्रव है।

(4) द्रव- अनुभव या गुरु तिरस्कार द्रव है।

(5) शक्ति- विरोध या अविरोध शमन होना शक्ति विमर्श सन्धि अंग है।

(6) द्युति- तर्जन या उद्वेजन करना द्युति है।

(7) प्रसंग- श्रेष्ठों/पूज्यों/उच्चों का कीर्तन या जहां महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो वह प्रसंग है।

(8) छलन- एक दूसरे की अवज्ञा छलन है।

(9) व्यवसाय- स्वशक्ति की उक्ति व्यवसाय है।

(10) विरोधन- विभिन्न व्यक्तियों द्वारा परस्पर स्वशक्ति प्रकटीकरण विरोधन है।

(11) प्ररोचना- सिद्ध व्यक्ति द्वारा भावी घटना की सूचना देना प्ररोचना है।

(12) विचलन- आत्मश्लाघा या ड़ींग मारना विचलन है।

(13) आदान- समस्त कार्यों को क्रमशः समेटने का कार्य आदान है। इसका नाम कार्य संग्रह भी है। उपसंहार की ओर बढ़ने की कामना इसके साथ है।

निर्वहण सन्धि- परियोजना के कार्य की कथावस्तु के बीज से युक्त मुख आदि अर्थ जो अब तक इधर-उधर बिखरे पड़े हैं, तब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं या एकत्रिात किए जाते हैं तो वह निर्वहण या उपसंहृति सन्धि होती है। इसके चौदह अंग हैं। 1) सन्धि, 2) विबोध, 3) ग्रथन, 4) निर्णय, 5) परिभाषण, 6) आनन्द, 7) समय, 8) प्रसाद, 9) कृति, 10) भाषण, 11) उपगूहन, 12) पूर्वभाग, 13) काव्यसंहार, 14) प्रशस्ति।

(1) सन्धि- बीज की उद्भावना या उद्गमन सन्धि निर्वहण अंग है।

(2) विबोध- पूर्व किए (छिप गए) कार्य की दुबारा खोज खबर विबोध है।

(3) ग्रथन- कार्य का उपसंहार करना ग्रथन है।

(4) निर्णय- प्रबंधक जब अपने द्वारा संपादित कार्य का विवरण अनुभूति अनुसार- किए अनुसार करते हैं तो उसे निर्णय कहा जाता है।

(5) परिभाषण- किया कार्य जब मिथक रूप में कार्य करने वाले कहते हैं तो उसे परिभाषण कहते हैं।

(6) आनन्द- ईप्सित- वांछित वस्तु की प्राप्ति आनन्द है। (7) समय- पात्रों के दुःख नष्ट हो जाना समय है।

(8) प्रसाद- प्रसादन या पर्युपासन प्रसाद है।

(9) कृति- लब्ध अर्थ के शमन को कृति कहते हैं।

(10) भाषण- प्रबन्धक वर्ग को मान आदि की प्राप्त भाषण है।

(11) उपगूहन- प्रबन्धक वर्ग को अद्भुत् वस्तु की प्राप्ति उपगूहन है।

(12) पूर्वभाग- उपगूहन के साथ कार्यदर्शन पूर्वभाग है।

(13) काव्यसंहार- वर की प्राप्ति काव्यसंहार है।

(14) प्रशस्ति- शुभ (कल्याण) की आशंसा प्रशस्ति है।

इस प्रकार परियोजना प्रबंधन में पांच प्रकृतियों, पांच अवस्थाओं, पांच सन्धियों या कुल चौसठ सन्धि अंगों के प्रयोजन छः हैं। (1) इष्ट कार्य की रचना, (2) गुह्य का अभिज्ञातिकरण एवं विजय, (3) प्रकाशन, (4) परियोजना कार्य में लगन की वृद्धि, (5) चमत्कारिक ढ़ंग से कार्यपूर्ति, (6) परियोजना का उपक्षय या समाप्ति।

संक्षेप में दशरूपकम् में दी हुई ‘कामूआत’ योजना है। मूलतः यह योजना रूपक या कथा की साहित्य विधा के लेखन की योजना है। पर आश्चर्यजनक रूप से यह परियोजना प्रबंधक के वर्तमान स्वरूप से भी अधिक उन्नत स्वरूप परियोजना प्रबंधक का देती है। यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि धनंजय ने भरतमुनि द्वारा दिए आदर्श प्रारूप का अत्यन्त सरलीकृत रूप मन्दबुद्धि पाठकों के लिए दिया है। इससे उच्च कोटि के परियोजना प्रबंधन या आदर्श परियोजना प्रबंधन की कल्पना की जा सकती है।

इस कामूआत योजना के साथ ही साथ परियोजना प्रबंधन के कुछ और महत्वपूर्ण तत्व हैं जो इस प्रकार हैं।

(1)संगछध्वं संवदध्वम्- ऋग्वेद के संज्ञान सूक्त के अनुसार निष्ठापूर्ण ‘कार्य समूह’ के रूप में कार्य भीड़ नहीं समर्पित समूह कार्य करता है।

(2) शर्धं व्रातं गणम्- ऋग्वेद के मन्त्रा के अनुसार क्रियात्मक नेतृत्व के नियमों का अनुपालन।

(3) श्रमेण तपसा सृष्टा- अथर्ववेद 12/5/1-2 के अनुसार गुणवत्ता, नियम, श्रम, तप, ऋत, सत्य, ज्ञान, श्री, यश से आपूर्त कार्य।

(4) बोधश्च प्रतिबोधश्च- बोध, प्रतिबोध (सशक्त अवचेतन), दृढ़ता, अस्वप्नता, जागृति, चैतन्यता द्वारा सकारात्मक सुरक्षा योजना। अथर्ववेद 8/1/13

(5) अप्रत्नास आयवः – सामवेद के अनुसार ”लकीर के फकीर होने से पूर्व ही नया कदम बढ़ा नया सूर्य गढ़ना” की भावना से पूर्ण हो कार्य करना। ‘लकीर के फकीरों ने नया कदम बढ़ाया नया सूर्य गढ़ लिया’ यह परियोजना प्रबंधन का सारभूत तथ्य है। परियोजना की परिभाषा में ‘दुहराव का अभाव और मुकाबलापूर्ण चुनौतियां’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। परियोजना में कार्य करने वालों को इन चुनौतियों से टकराने इन्हें जीतने में एक अद्भुत् आनन्द आता है। यही तो नया सूर्य गढ़ना है। यह आनन्द ही परियोजना निर्माण के कठिन जटिल कार्य को करने का परियोजना वालों को बोनस है।

(6) ऋत्विजम्- ऋतु-ऋतु की सन्धि के ज्ञाता को ऋत्विज कहते हैं। ऋत्विजता परियोजना प्रबंधन का महत्वपूर्ण अंग है। परियोजना प्रबंधक को ऋत्विज होना चाहिए कि वह (अ) 64 सन्धि अंगों की महत्ता के अनुरूप कार्य कर सके। (ब) परियोजना काल के मध्य आनेवाले ऋतु परिवर्तनों का भी प्रबंधन में ध्यान रखे। (स) त्योहार/चुनाव/वी.आई.पी. आगमनों के लिए भी प्रावधान हो।

(7) सुमंगली, मधुरिमा- परियोजना निर्माण का यह तत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। परियोजना निर्माण में कार्य क्षेत्रा हर पल परिवर्तित होता है। सामान इधर, उधर, आना, जाना, कटना, लगना, चढ़ाना, उतारना, धरना फैंकना हर कार्य क्षेत्रा सतत जारी रहता है। गृहव्यवस्था परिवर्तनीय होती है। कुशल प्रबंधक सुमंगली-उत्तम मंगल करनेवाली, सुशेवा- उत्तम सेवा सहायक, अघोरचक्षुणी-प्रथम दृष्टि में चक्षुप्रिय-घोर दुर्घटना को दृष्टि से भी दूर रखनेवाली सुघटनापूर्ण, अपतिघ्नी-गृहव्यवस्था खराब करनेवाले को दण्ड देनेवाली आदि हो।

(8) ईशावास्यमिद ँ्सर्वम्- प्रमुख परियोजना प्रबंधक तथा क्षेत्रा प्रभारी परियोजना प्रबंधकों को कार्य क्षेत्रा में सर्वव्यापक होना चाहिए।

(9) तदेजति तन्नैजति- प्रबंधकों को पूरी श्रमिक फौज, उपस्कर गतियों, संरचना गतियों, ताप सह ईंट गतियों, सीमेंट, रेत, लौह, छड़ों, गिट्टी, मिट्टी आदि की गतियों का स्वयं अचालित नियामक होना चाहिए। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है।

इस प्रकार परियोजना प्रबंधन जो अत्यधिक आधुनिक विज्ञान है, और जो जन्म ले रहा है, जिसकी उम्र मात्रा तीस पैंतीस वर्ष है, भारतीय संस्कृति में हजारों वर्ष पूर्व से सुस्पष्ट उन्नत रूप में वर्तमान है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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