पंच निर्दोष प्रबन्धन

शून्य त्रुटि आदमी का हर कार्य शून्य त्रुटि होता है। शून्य त्रुटि मशीनों का कार्य सीमित समय शून्य त्रुटि होता है। मशीनें क्रमशः ह्रास को प्राप्त होती हैं। उनकी गुणवत्ता बदल जाती है। समय के साथ मशीनों की गुणवत्ता हमेशा घटती हैै। आदमी की गुणवत्ता घट भी सकती है बढ़ भी सकती है। शून्य त्रुटि मानव व्यवस्था शून्य त्रुटि मशीन व्यवस्था से बेहतर है। शून्य त्रुटि मानव तथा मशीन व्यवस्था सर्वोत्तम है।

त्रुटियों पर विजय पांच प्रकार की है-

1) निह अति, 2) स्त्रिध अति, 3) अचित्ति अति, 4) द्विष अति, 5) विश्वा दुरिता।

(1) निह अति:- यह हृदय या छिपी या गुप्त त्रुटि का नाम है। सामान्यतः इस त्रुटि का पता नहीं चलता है। ”दूर के ढोल सुहावने“कहावत इस त्रुटि को दर्शाती है। अपरिचय अवस्था में कई परिवार अति सुखी प्रतीत होते हैं। जब परिचय होता है तो उस परिवार की वास्तविक स्थिति पता चलती है। कई उद्योग चमक-दमक के साथ उभरते हैं परन्तु चमक-दमक का आधार ऋण त्रुटि होता है तो वे ढह जाते हैं। मशीनें जो सतत तनाव में स्थित रहती हैं सतत तनाव दोष ‘फटीग’से त्रस्त हो जाती हैं। कारखानों की छतों पर क्रमशः जमती धूल, लौह ढांचों का विभिन्न गैसों धूल आदि से क्रमशः क्षरण, पाईपलाईनों का आन्तरिक क्षरण, ग्राइंडिंग व्हीलों में हेयर क्रैक, कांक्रिट ढांचों का क्षरण इसी तरह के भौतिक दोष हैं। इनका नाम निह अति हैं। मानव क्षेत्र में निह अति वे दोष हैंजो सहसा स्फोटवत उदित होते हैं। अगर मानव ‘कडामकनि’कचरा डाल महा कचरा निकाल प्रवृत्ति का है तो उसमें भरा कचरा कब स्फोटवत उद्भासित हो बाहर निकलने लगेगा यह कोई नहीं जानता है। काफी लम्बे समय तक बचपन में तथा किशोरावस्था में गालियों के वातावरण में रहनेवाला एक व्यक्ति संभ्रान्त वर्ग में सामाजिक दबाव के कारण सुसभ्य जीने लगा। एक बार वह अति मतिभ्रमावस्था में पहुँचा। आवेग अवस्था गया और पूरा एक घंटा तरह-तरह की गालियाँ बकता रहा। निह अति त्रुटि जब आदत से संकृति में बदल जाती है तो आदमी के सारे तर्क छिछले सतही हो जाते हैं।

गहन समझ विकसित करने से, सतत सावधान रहने से, समयोचित कदम उठाने से, सतत जागरूक रहने से, ब्रडाब्रनि- ब्रह्म डाल ब्रह्म निकाल सिद्धान्त समझने से, संस्कारों से, न्याय दर्शन पुस्तक पढ़ने से, साधना द्वारा संवेदन कोशिकाओं के लयक परिवर्तन से निह अति दोषों को दूर किया जा सकता है।

(2) स्त्रिध अति:- शोषण एवं क्षीण करनेवाली त्रिएषणा त्रुटियाँ स्त्रिध हैं। इन पर विजय प्राप्त करना स्त्रिध अति है। श्रमशोषण उद्योग में एक आम बात है। प्रदूषण क्षेत्र में मानक घंटों से अधिक समय तक कार्य, ताप, धूम, आवाज, कम वायु प्रवहण, कम प्रकाश या वेल्डिंग की खुली चमक खेत्रों में लगातार मानक समय से अधिक समय तक कार्य, शिफ्टों में बिना विश्राम कार्य, ऊँचाई पर बिना सुरक्षित परिस्थितियों के अटक-लटक कर आड़ा-तिरछा हो वेल्डिंग आदि के कार्य स्त्रिध त्रुटियों को जन्म देते हैं जो कार्यों को अमानक तो करते ही हैं मानव के स्वास्थ्य में भी त्रुटियाँ पैदा करती हैं। ये समस्त कार्य शोषण एवं क्षीण कर्ता हैं।

त्रि-एषणा भी व्यापक शोषण एवं व्यवस्था क्षीणकरण का कारण है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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