नव ईश्वरी देवी

ईश्वरी :- ‘‘ईश ऐश्वर्ये’’ से ईश्वरी शब्द सिद्ध होता है। जिसमें सत्य विचारशील ज्ञान और अनन्त ऐश्वर्य है वह ईश्वरी है।

अदिति :- ‘‘दो अवखण्डने’’ धातु से अदिति शब्द सिद्ध है। अवखण्डन विनाश है। जिसमें नहीं लेशमात्र विनाश, अविनाशी हर दिशि व्याप्त अदिति है।

प्रज्ञा :- ‘‘ज्ञा अवबोधने’’ इसमें प्र पूर्वक प्रज्ञा शब्द सिद्ध है। जो देवी प्रकृष्टतम रूप में चराचर जगत् का ऋत स्वरूप यथावत जानती है इससे उसका नाम प्रज्ञा है। ऋत नियन्ता ऋता प्रज्ञा है।

देवी :- ‘‘दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु’’ धातु से देवी शब्द सिद्ध है। जो सर्व जगत् को क्रीड़ावत रचती, धर्मयुक्तों को जिताती, साधन-उपसाधन दात्री, स्वयं प्रकाशस्वरूप और सबकी प्रकाशिका, प्रशस्तियोग्य, आनन्दस्वरूपा-आनन्ददात्री, आल्हाद-दायिनी, उन्मत्तों को ताड़नहारी, सर्व शयनार्थ रात्रि तथा प्रलय व्यवस्थापिका, कामना योग्य तथा ज्ञानस्वरूपा है वह देवी है।

पृथिवी :- ‘‘पृथु विस्तारणे’’ इस धातु से पृथिवी शब्द सिद्ध होता है। जो सर्व विस्तृत होते चले जा रहे जगत् का सतत विस्तार करती चली जा रही तथा उसका आधार है वह पृथिवी है।
मुक्ता :- ‘‘मुच्लृ मोचने’’ धातु से मुक्ता शब्द सिद्ध है। जो सदा सर्वदा अशुद्धियों से अलग शून्य त्रुटि नियामिका है तथा सब मुमुक्षुओं अर्थात् उत्कट मोक्ष कामनायुक्तों को क्लेशमुक्त करती मुक्ता है।

शक्ति :- ‘‘शक्लृ शक्तौ’’ धातु से शक्ति शब्द सिद्ध है। जो सम्पूर्ण जगत् के निर्माण करने में सहज सशक्त है वह देवी शक्ति है।

लक्ष्मी :- ‘‘लक्ष दर्शनांकनयोः’’ इस धातु से लक्ष्मी शब्द सिद्ध है। जो समस्त चराचर जगत् को देखती है, चिह्नित करती या दृष्यरूप परिवर्तित करती जैसे शरीर के नेत्र, नासिका, कानादि, वृक्ष के फल, पत्र, पुष्प, मूलादि, पृथिवी जलादि के कृष्ण, रक्त, श्वेत, मृत्तिका, पाषाण, चन्द्र, सूर्यादि निह्न बनाती, सबको देखती, सब शोभाओं की शोभा और जो वेदादि शास्त्र स्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियों का लक्ष्य अर्थात् देखने याग्य है वह लक्ष्मी है।

श्री :- ‘‘श्रीञ् सेवायाम्’’ से श्री शब्द सिद्ध है। जिसका सेवन सब जगत् विद्वान और योगी करते हैं उसका नाम श्री है।

नवरात्रि पर सर्वत्र व्याप्त आत्म-निकटतम इन नौ परमात्मरूपा देवियों का चिन्तन, आराधन तथा साधना नवधा वैदिक भक्ति है।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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