दामोदर हरि चाफेकर

18 अप्रैल इतिहास प्रसिद्द चाफेकर बंधुओं में से एक दामोदर हरि चाफेकर का बलिदान दिवस है। पेशवाओं की राजधानी रहे पूना के पास चिंचवाड़ नामक गाँव में हरि विनायक चाफेकर और द्वारका चाफेकर के घर में 24 जून 1868 को दामोदर हरि चाफेकर का जन्म एक चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो मूलतः कोंकण के वेलानेश्वर से संबध रखता था। दामोदर बचपन से ही खेलकूद के शौक़ीन थे और अनवरत अभ्यास और प्रशिक्षण के बल पर उन्होंने अपने शरीर को फौलाद का सा बना लिया था। उनमें इतना जीवट था कि वह प्रतिदिन 1200 बार सूर्यनमस्कार लगाते थे और 1 घंटे में 11 मील की दौड़ लगा लेते थे। सैनिक अभ्यास में उनकी अत्यंत रूचि थी और वह कठिनतम कार्यों को करने से भी कभी पीछे नहीं हटते थे।

वह अपने हृदय की गहराइयों से राष्ट्रवादी थे और चाहते थे कि युवा पीढ़ी भारत को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाली बने। एक बार फर्ग्युसन कालेज पुणे के मैदान में युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि आवश्यकता है कि हम फुटबाल, क्रिकेट जैसे खेलों को तज चट्टानों पर चढ़ाई, अस्त्र-शस्त्र चलाना और अन्य वीरतापूर्ण कार्यों में पारंगत हों। उनके जोशीले भाषणों, प्रभावशाली व्यक्तित्व और उत्कट राष्ट्रप्रेम से प्रभावित कितने ही युवा उनके संपर्क में आकर शारीरिक प्रशिक्षण एवं सैनिक अभ्यास प्राप्त किया करते थे ताकि समय आने पर वो देश के लिए कुछ कर सकने में समर्थ हो सकें। इस हेतु दामोदर ने अपने भाइयों बालकृष्ण एवं वासुदेव के साथ मिलकर एक संस्था का भी गठन किया था जिसमें युवाओं को अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण दिया जाता था।

तिलक के विचारों के अनन्य भक्त चाफेकर बंधुओं में अंग्रेजी शासन के प्रति उनके मन में कितनी घृणा थी, इसका पिता एक घटना से चलता है। उनके कीर्तनकार पिता हर चातुर्मास में मुंबई जाते थे और ऐसे ही एक बार उनके साथ दामोदर और बालकृष्ण भी मुंबई गए, जहाँ रानी विक्टोरिया की मूर्ति पर इन दोनों ने तारकोल पोत दिया और उसे जूतों की माला पहना दी। उस दौर में जब कांग्रेस का प्रत्येक अधिवेशन रानी की स्तुति और अंग्रेजी सरकार की चापलूसी से शुरू होता था, इस तरह की बात करने वाले बिरले ही थे। उन्हीं दिनों पूना में प्लेग का जबरदस्त आतंक फ़ैल गया जिससे निपटने के लिए सरकार ने भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी डब्ल्यू . सी . रैंड को प्लेग कमिश्नर नियुक्त किया।

रैंड व उसकी टीम को प्लेग नियंत्रण के नाम पर किसी के भी घर की तलाशी लेने का अधिकार था जिसका ये लोग अत्यंत दुरूपयोग कर रहे थे और भारतीयों को हद दर्जे तक प्रताड़ित करते थे, उनके घर की स्त्रियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करते थे, पूजा स्थलों को भ्रष्ट करते थे, जिससे लोगों में रैंड के प्रति विद्रोह की भावना बलवती होने लगी। दामोदर ने रैंड के अत्याचारों का बदला लेने के लिए उसकी ह्त्या करने का निश्चय किया। इस हेतु दामोदर ने बारूद और रिवाल्वर की भी व्यवस्था कर ली और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। किस्मत से एक मंदिर का पुजारी प्लेग के भय से मंदिर को छोड़कर चला गया और दामोदर ने ख़ुशी ख़ुशी उसके स्थान पर पुजारी का कार्य करना स्वीकार कर लिया ताकि किसी को शक ना हो। मंदिर के बगल में तैनात 14वीं बोम्बे नेटिव इन्फैंट्री के गोदाम से रक्षकों की आँख बचाकर उन्होंने २ राइफल्स का भी इंतजाम कर लिया।

इसके बाद शुरू हुया रैंड की पहचान तय करने का काम जिसके लिए दामोदर या उनके साथियों में से कोई अनवरत तीन महीने तक विभिन्न स्थानों पर उसका पीछा करते रहे । दामोदर के सबसे छोटे भाई वासुदेव ने रैंड की आदतों और उसके आने जाने के स्थानों का गहन अध्ययन किया ताकि योजना में किसी की बाधा ना पड़े । रैंड की हत्या के लिए नियत तिथि के कुछ सप्ताह पहले दामोदर ने रैंड के गाड़ीवान, उस इलाके के पोस्टमैन तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों के साथ मित्रता कर रैंड के घर, आफिस, आने जाने के समय तथा अन्य आदतों के बारे में काफी सूचनाएँ एकत्रित कर लीं ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की कोई सम्भावना ना रहे । इस सबके बाद दामोदर ने अपने साथियों के साथ योजना को अंतिम रूप दिया और रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60वीं वर्षगाँठ के समारोह वाले दिन रैंड की ह्त्या करने का निश्चय किया।

22 जून 1897 को सबसे पहले दामोदर के समूह ने नगर के कौंसिल हाल में दोपहर को रैंड को तलाश किया पर उसे वहां ना पाकर सेंट मैरी चर्च में उसे ढूँढा गया पर भीड़ होने की वजह से वहां कुछ ना किया जा सका। तब रात के 11.30 हो चुके थे जब गणेश खिंड स्थित गवर्नमेंट हाउस के गेट पर दामोदर ने खुद को छुपा लिया, छोटा भाई बालकृष्ण सडक पर दूसरी तरफ था और अब बस इन्तजार था रैंड के लौटने का। कुछ समय ही बीता था कि रैंड की बग्घी आती दिखी, किसी साथी ने पहले से नियत कोडवर्ड बोला और बालकृष्ण ने एक बग्घी में बैठे रैंड के मिलेट्री एस्कार्ट लेफ्टिनेंट आयेर्स्ट को रैंड के धोखे में गोली से उड़ा दिया। पर तुरंत ही दामोदर को गलती का आभास हो गया और महादेव विनायक रानाडे के साथ उन्होंने रैंड पर हमला कर दिया जिसमें वह बुरी तरह से घायल हो गया और 3 जुलाई 1897 को उसकी मृत्यु हो गयी।

इस घटना से अंग्रेजी सरकार हिल गयी और अपने अपराधियों को पकड़ने के लिए उसने एक बड़ा अभियान चलाया। काफी दिन तक बचने के बाद द्रविड़ बंधुओं की गद्दारी के कारण अंततः 9 अगस्त को दामोदर गिरफ्तार कर लिए गए और पुलिस ने उनके खिलाफ आरोपों की एक लम्बी चौड़ी सूची तैयार की । 14 अक्टूबर 1897 को दामोदर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और उन पर कई संगीन धाराओं में मुक़दमे की कार्यवाही शुरू की गयी। 31 जनवरी 1898 को उनके मंझले भाई बालकृष्ण का मुकदमा भी उन्हीं के साथ सुनने के आदेश सरकार की तरफ से जारी किये गए। 3 फरवरी 1898 को ज्यूरी ने उन्हें ह्त्या का दोषी ना मानते हुए अपराध को बढ़ावा देने का दोषी करार दिया परन्तु एक अजीब घटनाक्रम में न्यायालय ने ज्यूरी का ही प्रतिपरीक्षण कर लिया ज्सिके बाद ज्यूरी ने दामोदर को हत्या का दोषी ठहराते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई, जिसे 2 मार्च 1898 को उच्च न्यायालय से भी मंजूरी मिल गयी ।

पर वाह रे दामोदर, उन्होंने पूछा कि क्या इससे भी अधिक कडा कोई दंड मौजूद है कानून में और यदि हाँ तो उन्हें वही दिया जाये। कारावास में रहने के दौरान अपने गुरु तिलक से प्राप्त भगवतगीता उनका संबल थी और इस पुस्तक को अपने साथ वो फांसी के तख्ते पर भी ले गए और कहा जाता है कि यरवदा जेल में 18 अप्रैल 1898 को फांसी लगने के बाद भी उनकी इस पवित्र ग्रन्थ से पकड़ ढीली नहीं हुयी । 12 मई 1899 को उनके भाई बालकृष्ण को भी फांसी दे दी गयी और अपने भाइयों के गद्दारों द्रविड़ बंधुओं को मार देने वाले उनके सबसे छोटे भाई वासुदेव भी 8 मई 1899 को उन्ही की राह पर चले गये। अपनी शहादत के समय दामोदर 27 वर्ष के, बालकृष्ण 24 वर्ष के और वासुदेव मात्र 18 वर्ष के थे। दुनिया के इतिहास की ये विरलतम घटना है जहाँ एक ही परिवार के सभी बेटों ने मातृभूमि की बलिवेदी पर अपने प्राण अर्पित कर दिए हों। इन बलिदानों ने देश में युवाओं में अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ने की प्रेरणा उत्पन्न की और वीर सावरकर जैसे क्रान्तिधर्मा को देश के लिए तैयार किया।

दुर्भाग्य गाँधी की बकरी, गाँधी के चरखे और नेहरु की चिट्ठियों और जैकटों तक की चर्चा करने वाला ये कृतघ्न देश इन बलिदानियों को भुला बैठा। सरकारी स्तर पर चाफेकर बंधुओं की स्मृति बनाये रखने हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया। उनकी स्मृतियों का साक्षी चिंचवाडा का उनका घर चाफेकर वाड़ा एक समय इस हालत में आ गया था कि शराबियों और जुआरियों को छोड़कर कोई भी वहां नहीं जाता था । संघ स्वयंसेवकों की निगाह जब इस पर गयी तो उन्हें बलिदानियों की इस स्मृति की दुर्दशा देख अतीव पीड़ा हुयी जिसके बाद उन्होंने इसका कायाकल्प कर इसे इसका पुराना स्वरूप देने का निश्चय किया। सबसे पहले वहां एक व्यायामशाला खोली गयी और फिर क्रांतिवीर चाफेकर विद्यालय जो आज कई स्थानों पर चल रहा है।

लोगों के सहयोग और स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम से धीरे धीरे चाफेकर वाड़ा अपने भव्य स्वरुप को प्राप्त कर सका और वह 11 अप्रैल 2005 का दिन था जब चाफेकर बंधुओं, वासुदेव बलवंत फडके, उमाजी नाइक, राजगुरु, अनंत कान्हेरे, विष्णु गणेश पिंगले और क्रान्तिसिंह नाना जी पाटिल जैसे बलिदानियों के वंशजों की उपस्थति में एक भव्य कार्यक्रम में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माननीय सुदर्शन जी ने इस पुनरुद्धार किये गए भवन एवं अन्य योजनाओं का लोकार्पण किया और सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किया। इस पूरे परिसर को क्रान्तितीर्थ नाम दिया गया है। संघ और उसके स्वयंसेवकों का ये प्रयास स्तुत्य है, जिसमें नगर पालिका और अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं के सहयोग को भी नकारा नहीं जा सकता। बलिदान दिवस पर दामोदर हरि चाफेकर को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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