दशरूपकम् ~ (शोले फिल्म की सफलता का सच)

क्या कोई सोच सकता है कि संसार की सारी सफल फिल्मों का सच भारतीय संस्कृति का ”दशरूपकम्“है? पर यह शत प्रतिशत सच है। पाश्चात्य फिल्मों में साऊंड ऑफ म्यूजिक, डॉ.जिवागो, सन ऑफ अरेबिया, सुपरमैन, जुरासिक पार्क आदि तथा भारतीय फिल्मों में नागिन, उड़न खटोला, शोले, नास्तिक, जय संतोषी मां, हम आपके हैं कौन, नदिया के पार, दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे, दीवार आदि फिल्मों के बॉक्स ऑफिस में सुपर डुपर हिट होने का एक मात्र कारण इनका धोके से ‘दशरूपतम्’के अनुरूप हो जाना है।

फिल्में दृश्य श्रव्य रूपक होती हैं। दशरूपकम् के अनुसार ये दस प्रकार की होती हैं। इन रूपकों की सफलता के आधारभूत तत्व इस प्रकार हैं-

(अ) अधिकारिक:- अधिकारिक वह कथा है जिसमें पूरी फिल्म प्रवाह में अधिकार रखना आवश्यक है। यह मुख्य कथा है। यह फिल्मों की रीढ़ है। इस रीढ़ पर अधिकार न रखने से फिल्मी रूपक फ्लॉप हो जाते हैं। यह कथा निश्चित स्पष्ट उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए और इस उद्देश्य की ओर ही गतित होनी चाहिए।

फिल्म शोले में अधिकारिक कथा है। ठाकूर बलदेव सिंह (संजीव कुमार) तथा डाकू गब्बरसिंह में प्रख्यात तथा कुख्यात का संघर्ष एवं उद्देश्य है प्रख्यात की विजय। पूरी फिल्म में अधिकारिक कहीं भी ओझल नहीं होती है। अधिकारिक सातत्य शोले में स्पष्ट है। यह प्रथम कारण है शोले की सफलता का कि फिल्म रूपक की रीढ़ मजबूत रही है। (ब) नायक अवस्थाएं, प्रकृतियां, संधियां:-रूपक में मुख्यतः एक नायक एक खलनायक तथा उपनायक होते हैं। नायक के चार प्रकार होते हैं धीर प्रशांत, धीर ललित, धीर उद्धत, धीरोदात्त। दशरूपकम् में नायक प्रख्यात खलनायक कुख्यात होता है। दशरूपकम् को अगर परियोजना प्रबंधन के रूप में लिया जाए तो इसमें नायक परिवर्तन क्रमशः धीर प्रशांत- धीर ललित- धीर उद्धत- धीरोदात्त (या धीर ललित-प्रशांत मिश्र)- ध्ाीर प्रशांत होता है। यह नायक परिवर्तन पांच अवस्थाओं यत्न आरम्भ प्राप्ताशा नियताप्ति फलागम के अनुरूप हैं। यत्न अवस्था में प्रगति समय से कम रहती है अतः धीर प्रशांत नायक जरूरी है। आरंभ अवस्था में शिल्पन की आवश्यकता होने के कारण धीर ललित नायक की आवश्यकता होती है। प्राप्ताशा अवस्था में प्रगति समय की तुलना में अधिक होती है अतः धीर उद्धत नायक की आवश्यकता है। नियताप्ति में पुनः शिल्पन तथा सामंजस्य की आवश्यकता होती है अतः धीर ललित (धीररोदात्त) नायक जरूरी है। अन्त में प्रगति फिर समय से कम होती है अतः धीर प्रशांत नायक जरूरी है (कृपया संलग्न चित्र देखें)। यह चक्र स्कूटर चालन चक्र भी है। शुरु में यत्न होने पर भी प्रगति समय से कम, फिर आरंभावस्था में दूसरा गियर, प्राप्ताशा में टॉप गियर- प्रगति समय से अधिक, नियताप्ति में पुनः प्रगति का समय की तुलना में कम होना एवं फलागम में और कम होना होता है। चालक भी इसमें क्रमशः धीर प्रशांत, धीर ललित, धीर उद्धत, धीरोदात्त, धीर प्रशांत रोल अदा करता है।

फिल्म शोले में नायक ठाकुर धीर प्रशांत प्रख्यात है। खलनायक गब्बरसिंह अप्रतिम बहादुर कुख्यात है। उपनायक जय धीर ललित है। उपनायक वीरू धीर उद्धत है। धीर प्रशांत नायक से फिल्म का प्रारंभ होता है। यत्नावस्था में ही प्रख्यात कुख्यात संघर्ष उपनायकों के प्रवेश से बीज प्रकृति का उद्भव तथा लक्ष्य दृष्टिगोचर होने लगता है। इस अवस्था में धन (खजाना) तथा ज्ञान की चुटकी तथा बाद में धन ज्ञान शौर्य की लिखना अवस्था का भी (धोखे से) पालन हो गया है। यत्नावस्था के बाद आरंभावस्था में धीर ललित नायक की भूमिका के साथ शौर्य तथा शिल्प का समावेश है। कुख्यात के रोल द्वारा बीज का तेलवत फैलाव बिन्दु के रूप में है। यह मुख संधि से प्रतिमुख संधि का विस्तार है। लक्ष्य यहां अति स्पष्ट होता है- ”मैं आ रहा हूं गब्बर“द्वारा यह अभिव्यक्त है। प्राप्ताशा अवस्था में धीर उद्धत नायक वीरू की प्रमुख भूमिका के साथ भीड़ तथा समस्त नायकों की इकट्ठी भूमिका है यह ताली बजाना अवस्था है या लड्डू बनाना अवस्था है। जय और वीरू के पराक्रम से प्राप्ताशा होती है लक्ष्य प्राप्ति की। ”कितने आदमी थे“द्वारा गब्बरसिंह की हताशा प्रप्ताशा में वृद्धि करती है।

चौथी अवस्था नियताप्ति अवस्था है। विमर्श संधि पताका प्रकरी अवस्था है। इस अवस्था में धीर ललित नायक के शिल्प की जय द्वारा आखरी गोली से स्वयं को (ओरिएंट कर) पहुंचा कर जख्मी स्थिति पल पर के बॉम्ब द्वारा बॉम्ब उड़ाना, करुणतम स्वर माऊथ ऑर्गन बजाना नायक के लालित्य की पराकाष्ठा है। दोस्ती में त्याग के ऊंचाइयों की पराकाष्ठा स्पष्टतः नियताप्ति- नियत लक्ष्य की प्राप्ति का उत्तम समावेश है। इसी अवस्था सिक्के के अद्भुत का भी प्रावधान है।

फलागम अवस्था में फिल्म शोले में धीर प्रशांत नायक के शौर्य की उदात्त भूमिका है। समस्त भूमिकाओं का इस अवस्था गिलास पकड़ने वत निर्वहण है। कार्य प्रकृति सम्पूर्णता में अभिव्यक्त है।

(स) पताका प्रकरी उपपताका उपप्रकरी:- पताका वह उपरूपक है जो अधिकारिक से प्रारंभ होकर लंबी दूरी तक अधिकारिक के समानांतर जाकर अधिकारिक से मिल जाता है। प्रकरी वह कथा है जो अधिकारिक से प्रारंभ होकर थोड़ी दूर समानांतर चलकर अधिकारिक से मिल जाती है। ये लक्ष्य प्राप्ति में सहायक होते हैं। फिल्म शोले में सिक्के को उछालने, चितपट करने को भी पताका के रूप में सफल तरीके से पताका समान प्रयुक्त किया गया है। माऊथ ऑर्गन बजाना, बसंती का टांगा, वीरू एवं जय पर आदमियों का आक्रमण, अस्त्र खरीदी, गब्बरसिंह की पिस्तौल में तीन गोलियां आदि प्रकरी पताका मूल उद्देश्य से सीधे जुड़े हैं।

(द) प्रकरी स्थानक पताका स्थानक:- स्थानक वह स्थल है जहां अधिकारिक से कोई भविष्यवाणी की जाती है तथा वह भविष्यवाणी बाद में सच होती है। प्रकरी स्थानक में भविष्यवाणी थोडे समय बाद सत्य होती है पर पताका स्थानक में लम्बे समय बाद सत्य होती है।

फिल्म शोले में आरंभ में ही प्रकरी स्थानक का प्रयोग है। गब्बरसिंह जेल जाते समय कहता है ठाकुर मैं तुम्हारे पूरे परिवार को तबाह कर दूंगा। और वह तबाह कर देता है। पताका स्थानक भी इस फिल्म में है। जब ठाकुर वीरू और जय को उद्देश्य बताते गब्बवसिंह से बदले की बात कहता है तो वीरू कहता है हम उसे कल ही मारकर ले आते हैं। इस पर ठाकुर बलदेवसिंह कहता है नहीं तुम उसे मारोगे नहीं वह मेरा शिकार है, उसे पकड़कर लाओगे जिन्दा! और अन्त में यह कथन सत्य होता है।

(इ) नायिका:- फिल्म में प्रगल्भ (बातूनी चंचल) तथा धीर गंभीर नायिकाओं का धीर उद्धत तथा धीर ललित नायकों से संबंध दर्शाना भी शोले के कलेवर को समुन्नत करना है।

(फ) अद्भुत समावेश:- सिक्के के अद्भुत के सिवाय फिल्म शोले में वीरू के टंकी पर चढकर नाटक, तथा देवता की आवाज में भविष्यवाणी, पिस्तौल के छ खानों में तीन गोलियां, बिना पहिए टांगा दौड़ाने के कौतुकों तथा अद्भुतों का सुसमावेश भी दशरूपकम् की मान्यता के अनुरूप हो गया है।

(य) सकारात्मक नेतृत्व:- वर्तमान में इसे एक्शन लीडरशिप कहते हैं। ऋग्वेद के अनुसार सकारात्मक नेतृत्व के छ गुण हैं। 1.शर्धम्- व्यक्तिगत शौर्य का आदर्श रूप, 2.शर्धम्- व्यवहार शौर्य का आदर्श रूप, 3.व्रातम्- लक्ष्य का आदर्श रूप, 4.व्रातम्- लक्ष्य का व्यवहार रूप, 5.गणम्- समूह का आदर्श रूप, 6.गणम्-समूह का व्यवहार रूप। इनका ऊंगलियों के क्रम अनुक्रम से प्रयोग सकारात्मक नेतृत्व है।

शोले सस्ती मारधाड़ फिल्म नहीं है। यह श्रेष्ठ सकारात्मक नेतृत्व फिल्म है। इसमें नायक बलदेवसिंह ठाकुर यथा नाम तथा गुण है। 1.वह कर्तव्यनिष्ठ अभय पुलिस अधिकारी है- शर्धम् आदर्श है। 2.वह बल-देव है व्यवहार शर्धम् रूप में दो घोडों को हाथ से लगाम पकड़ गिरा सकता है तथा गिराता भी है। 3.व्रातम् उसका आदर्श लक्ष्य है गब्बरसिंह से बदला। 4.इस आदर्श लक्ष्य के लिए व्यवहार धरातल पर वह जय तथा वीरू को चुनता है, जांचता, परखता, प्रयुक्त करता है व्रातम् व्यवहार रूप है। 5.ग्राम रामपुर के निवासियों को आतंकमुक्त फिरोति देने से आजाद करना आदर्श गणम् प्रारूप है। 6.नायक इसे सार्थक करने दो सशक्त संरक्षक नियुक्त करता है। सकारात्मक नेतृत्व के तत्वों 1.शर्धं शर्धम्, 2.व्रातं व्रातम्, 3.गणं गणम् का समुचित समावेश होना भी शोले की सफलता का राज है।

(र) कथास्वरूप:- दशरूपकम् के अनुसार कथा के तीन स्वरूप होते हैं। एक- ऐतिहासिक, दो- उत्पाद्य नवीन, तीन- मिश्र। कुछ अपवाद छोड़कर सारी फिल्में कथा क्षेत्र से आदि कवि वाल्मिकी के आदि श्लोक ”मा निषाद…“ से दपजी ऐतिहासिक (मूल आधार नर क्रौंच नारी क्रौंच पक्षी तथा निषाद शिकार) सार ही है। फिल्म शोले की कथा उत्पाद्य है। लकीर के फकीरों ने नया कदम उठाया नया सूर्य गढ़ लिया के नियमानुरूप शोले कथा क्षेत्र में भी नया सुर्य गढ़ती है।

(ल) शीर्षक:- फिल्मों में शीर्षक चयन प्रायः नढोल न नगाड़ा सिद्धान्त पर होता है। दशरूपकम् के अनुसार कथा के आरंभ में ही बीज रूप में होने पर ही शीर्षक आदि चुन लेना चाहिए। ”अथ…अनुशासनम्“न केवल शीर्षक वरन विषयवस्तु पाठक समूह अधिकारी आदि को भी नियत करता है। ‘शोले’शब्द फिल्म शोले की अधिकारिक कथा की आत्मा है। इसी प्रकार दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे या हम आपके हैं कौन या साऊंड ऑफ म्युजिक सटीक शीर्षक फिल्में हैं।

इस प्रकार फिल्म शोले में दशरूपकम् के शीर्षक, अधिकारिक, पताका, प्रकरी, पताका स्थानक, प्रकरी स्थानक, अद्भुत, नायक, प्रकृतियां, संधियां (मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, उपसंहृति- पाठक स्वयं चिंतन करें) आदि धोखे से सही तत्व आ गए हैं और यही कारण है कि फिल्म सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

विश्व की सारी फिल्मों में दशरूपकम् के आधारभूत ढांचे के आधार पर विश्लेषण से तनिक चिंतन से यह स्पष्ट होता है कि दशरूपकम् दृष्य श्रव्य फिल्मों की सफलता का राज है। एक प्रश्न क्या दशरूपकम् के शत प्रतिशत अनुरूप दृश्य श्रव्य रचना की जा सकती है? इसका उत्तर है हां! केवल की ही नहीं जा सकती अपितु पचनाएं   उपलब्ध हैं तथा इतिहास साक्षी है वे सर्वाधिक प्रसिद्ध अमर रचनाएं हैं। इस युग में सारी ट्रेनों को स्टेशनों पर रोक देने वाला, सारी संस्थाओं के कार्यक्रमों को बदल देने वाला एक सिरीयल था रामायण। रामायण, महाभारत दशरूपकम् के अनुरूप लिखी गई कथाएं हैं।

दशरूपकम् एक अन्य क्षेत्र में ”परियोजना प्रबंधन“का पर्ट (PERT) या कामूआत (कार्य मूल्यांकन आकलन तकनीक) है। अमेरिकन तथा विश्व के लोग समझते हैं कि PERT 1958 में अमेरिका ने निकाली खोजी है। पर धनंजय ने करीब हजार वर्ष पूर्व दशरूपकम् पर्ट दी है जो शाश्वत आधार पर विकसित हुई है यह भारतीय सिद्धान्त है।

यह दशरूपकम् विश्लेषण शोले फिल्म के आधार पर मैंने अति अल्पबुद्धि वालों के लिए सरल भाषा में लिखा है ताकि लोग शास्त्रीय तत्वों को मानक तत्वों को समझें। वैसे धनंजय ने दशरूपकम् अल्पबुद्धि वालों के लिए सरलीकृत किया था। मूल दशरूपकम् भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में है जो चार पांच वर्ष पुराना है और इस नाट्यशास्त्र का आधार वेद है। हम मानें या न मानें वेद आज भी हमारे जीवन की कसौटि अप्रत्यक्ष रूप में है। काश! हम इसे प्रत्यक्ष कर सकें। भारत सतयुग हो जाएगा।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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