त्रिविध दुःखों से मुक्ति

मंच पर आसीन आदरणीय महानुभावों एवं मान्यवर श्रोताओं तथा प्यारे मित्रों आज मैं आपको मानव जीवन में होनेवाले त्रिविध दुःखों के विषय में जो ज्ञान मैंने इस शिविर में प्राप्त किया है उसकी जानकारी दूंगा.

इस संसार में हमें दुःख तीन प्रकार के मिलते हैं- 1. आधिदैविक, 2. आधिभौतिक एवं 3. आध्यात्मिक दुःख। जड़ों से प्राप्त होनेवाले दुःख को आधिदैविक दुःख कहते हैं। जैसे अधिक सर्दी-गर्मी-वर्षा, प्राकृतिक आपदाएं जैसे भूकम्प-त्सुनामी-बाढ-अकाल आदि इसी प्रकार भूख-प्यास तथा मन की चंचलता या अशान्ति से होने वाले दुःख भी आधिदैविक ही कहलाते हैं।

चेतनों से प्राप्त होनेवाले दुःख को आधिभौतिक दुःख कहते हैं। जैसे अन्य मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, मक्खी-मच्छर, सांप इत्यादि से प्राप्त दुःख।

अपने स्वयं के अज्ञान वा गलतियों से प्राप्त दुःखों को आध्यात्मिक दुःख कहते हैं। जैसे अविद्या जनित राग-द्वेष, अंधविश्वास एवं गलत परम्पराओं से प्राप्त विभिन्न प्रकार के दुःख तथा शारीरिक रोग इत्यादि।

प्रायः कई व्यक्तियों को यह भ्रान्ति होती है कि हमें प्राप्त होने वाला हर सुख एवं दुःख हमारे कर्मों का ही फल होता है.. जबकि यह बात आधी सच है.. आधी झूठ इस पक्ष में कि अभी मैंने जो त्रिविध दुःखों को आप को बताया है उनमें से आधिदैविक एवं आधिभौतिक दुःख हमारे कर्मों का फल नहीं कहा जा सकता।

संसार में अनगिनत प्राणी हम देखते हैं पर उनमें केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो मैंने बताए हुए तीनों दुःखों से पूर्ण रूप में छुटकारा पा सकता है.. दुःखों से पार पाने पर ही मोक्ष सम्भव होता है। विशेष बात यह है कि विश्व में प्राचीन भारत की वैदिक विचारधारा को समर्पित आर्य समाज ही एक मात्र ऐसी संस्था है जो त्रिविध दुःखों से छूटने का सदियों से लाखों ऋषियों मुनियों द्वारा अनुभूत प्रामाणिक उपाय बताती है.. आइए उस अष्टांग योगपद्धति को जीवन में अपनाकर तीनों दुःखों से मुक्ति पाएं और जीवन सार्थक बनाएं..!!

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