“गायत्री साधना”

ओ३म् – ब्रह्म पंचेक है ब्रह्म – पंचिकत्वा – पंचेकवान – पंचेकवान – पंचेकथा – पंचेक दा – पंचेक पा – यह मैं – पंचेक भरा – सर्वत्र पवित्र।

भूः: ब्रह्म – भूत्वा – भूवान – भूः धा – भूःदा – भूःपा – यह मैं भूः भरा: – सत् पवित्रा – (अस्तित्व पवित्रा)

भुवः – भुवः ब्रह्म – भुवत्वा – भुवःवान – भुवःधा – भुवःदा – यह मैं भुवः भरा – चित्र पवित्रा (ज्योति पवित्रा)

भूःभुवःस्वः – सत् आनंद – सत्चित आनंद – सत्चित आनंद ।

तत-सवितृ – पूर्ण यह – पूर्ण वह – पूर्ण यह वह – पूर्णत्वा – पूर्णवान – पूर्णधा – पूर्ण दा – पूर्ण पा – यह मैं पूर्ण भरा – सविता पवित्रा ।

वरेण्यम् – वरण योग्य – उसके वरण योग्य मै ।

भर्गो: भर्गः ब्रह्म – भगवत्वा – भगवान – भगवा – भगदा – भगपा – यह मैं-भग भरा – भग पवित्रा ।

देवस्य: सर्वदेव हविष – अनुगणित तैतीसदेव ग अनुगुणित पंच – अनुगुणित पंच – पंचेक देव – एक देव (मन$बुद्धि)

धी मही: (मन+बुद्धि पार) धी मय अस्तित्व हमारे

धियो यो नः अर्चिताओं – इडनाओं से भरे अस्तित्व हमारे ।

प्रचोदयात्: परमआनन्द उत्प्रेरित रहें ।

ओउम भुभूर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धी महि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

ओउम है खम ब्रह्म, सर्वत्र पवित्र, अस्तित्व पवित्र, मनबुद्धि – धी मय अर्चिताओं – इडनाओं भरे अस्तित्व हमारे परम आनंद से उत्प्रेरित रहें ।

सर्वदेव हविष – अनुगुणित तैंतीस अनुगुणित पंचदेव – मन बुद्धि – धी ओउम सत्चित आनंद से पवित्र ही भक्ति भाव से ब्रह्म की सर्वोच्चावस्था से इडना करता है । उसे स्व समर्पण करता है । तब ब्रह्म ही भक्ति तथा उसकी परीक्षित योग्यतानुसार उसे अव्याहतावस्था देता है । इस साधना को दिन में कम से कम दो बार, कम से कम इक्कीस मिनट तक करने से चेतना शुद्धि करण – चेतना ब्रह्म विस्तरण द्वारा यह क्रमशः अस्तित्व परिशुद्ध करते साधक को गायत्री सिद्धि देती है ।

तनावमुक्ति, उच्च निम्न रक्त्दाब शमन, मनोविकार शमन तो पहले ही दिन से प्राप्त होने लगती है । साधना से ध्यान हृदय क्षेत्र में ही करना है मस्तिष्क क्षेत्र में नहीं । आरंभ में साधना एकाग्रचित पढ़ पढ़कर इक्कीस मिनट तक की जा सकती है । पढ़ने के साथ हर शब्द का भाव विचार साथ होना आवश्यक है । यह अति उच्च गहना साधना है । इसके कुछ पूर्वचरण तथ कुछ पश्चात चरण हैं । ये चरण आम आदमी के लिए आवश्यक हैं । उच्च कोटि के पंच पवित्र इसे इसी रूप में कर सकते हैं ।

साधना करने के इच्छुक कम से कम पांच के समूह में समूह परिवार भी हो सकता है में संपर्क करें।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय
पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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