कोविड 19 (कोरोना वायरस)

कोविड १९ (कोरोना वायरस) कोरोना वायरस के स्वरूप और प्रभाव को देखकर लगता है जैसे किसी ने इसे प्रयोगशाला में तैयार किया हो अथवा प्राणियों के करूण क्रन्दन से निकले हुए आसुओं के विषाक्त सूखे रसों के मिश्रण से बन गया हो। यह वायरस किटाणु, जीवाणु, रोगाणु अथवा कवक या फंगस से कुछ भिन्न मारक विषों के परमाणुओं का संग्रह प्रतीत होता है, जिसे विषाणु कहना भी पर्याप्त नहीं है। यह अत्यधिक प्राणघातक है। संस्पर्श से फैलनेवाली यह महामारी ग्लोबलाईजेशन के इस जमाने में एक देशीय न रहकर विश्वव्यापी बन गई है।

स्पर्शजन्य यह वायरस सामान्य रूप से औषधियों के द्वारा नियन्त्रण में आना कठिन है। इसकी शान्ति के लिए प्रार्थनात्मक कृत्य के साथ औषध प्रयोग उपयोगी हो सकता है। महर्षियों ने औषधि सेवन को जितनी प्रमुखता दी उससे अधिक भैषज्ञ यज्ञों को सार्थक माना है। पर्यावरण की विषाक्तता के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है यज्ञ। मन्त्रोच्चारण के साथ किए जानेवाने हवन से एक विशिष्ट प्रकार की धूम्रीकृत प्रचंड ऊर्जा से प्रयोक्ता के आस-पास रक्षा कवच का निर्माण हो जाता है। यज्ञ का एक प्रभाव निर्विषीकरण भी है।कोरोना प्रिवेंटिव हव्य जिन औषधियों में विषाणु-रोगाणु-सूक्ष्मजीवरोधी, कवकरोधी, मुक्त आक्सीजन मूलकों को रोकनेवाले तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानेवाले तत्व हों, उन्हें यज्ञाग्नि में दहन, असवन व ऑक्सीकरण विधि से भस्म कर तत्वों को फैलाने से वायु आदि मेडिकेटेड (औषधीय गुणयुक्त) हो जाते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम, मेटाबॉलिज्म आदि सक्रिय एवं प्रभावी हो जाते हैं।

‘अमृतहवि’

१. अमृतधारा (दिव्यधारा) {सत्व अजवायन + पिपरमिट + देशी कपूर} :- जिसमें थायमिन, क्युमिन, टर्पिन आदि एण्टिसेप्टिक, दुर्गन्धनाशक और विषाणुनाशक तत्व होते हैं।

२. इलायची तेल :- सीनिओल + टर्पिनिओल = विषाणुनाशक सुगन्धित।

३. लौंग तेल :- युजिनाल = सूक्ष्म जीवाणुरोधी तत्व।

४. दालचीनी तेल :- युजिनाल + सिन्नेमिक एल्डिहाइड = रक्तवर्धक + जीवाणुरोधी।

५. मालकंगनी तेल (ज्योतिष्मती) :- एमायरिन + सिटोस्टेराल + सेल्पेजिन + बेन्जोइक आदि अम्लें = बुद्धिस्मृतिप्रद, कृमिकुष्ठनाशक, मलेरियारोधी, सूक्ष्मजीवाणुनाशक।

६. बादामतेल = मिरिस्टिक + पामिटक + स्टियेरिक + ओलिक + लिनोलिक अम्लें = पित्तवातशामक, शिरोरोगनाशक, क्षयनाशक, अर्बुदनाशक आदि।

टीप :- इन सभी तेलों को दस-दस मिलिलिटर लेकर कुल ६० मिलिलिटर को आधा किलो गोघृत में मिलाकर हवन करें अथवा दीप जलाएँ।

‘‘कोविड १९ रक्षक हवन-सामग्री’’

१. अकरकरा मूल :- पाईरेथ्रीन, पेलीटोरीन, इन्युलिन, सीसेमिन तत्व = सूक्ष्मजीवाणुरोधी, कीटनाशक, टायफस ज्वरनाशक, उन्मादनाशक।

२. कालमेघ पंचांग (भूनिम्ब) :- एण्डोग्रेफोलाइड + कालमेघिन + एपिजेनिन + सिटोस्टेराल = कृमिकुष्ठनाशक, ज्वरनाशक, मधुमेहनाशक, आन्त्रकृमिनाशक, प्रतिविषाणुरोधी, ज्वरनाशक।

३. कुटकी (जड़) :- पिक्रोसाइड + कुटकिन + एल्केनॉल + सिटोस्टेराल = ज्वरनाशक, रक्तदोषशामक, विषप्रभावनाशक, कृमिघ्नविरोधक, विषाणुरोधी, अर्बुदनाशक।

४. कुश (पवित्र) :- आर्ग्रेनिक अम्ल, + लिग्निन + सेलुलोज = त्रिदोषशामक, विषनाशक, ज्वरनाशक।

५. कौंच (केवांच) बीज :- लेसिथिन + प्रुरिनिन + मिथिओनिन + अम्लें = कम्पवातरोधी, रक्तदोषनाशक, कवकरोधी, विषघ्न, कृमिनिस्सारक।

६. चित्रक (अग्नि) :- प्लमबेजिन + चित्रानान + जेलीनान + आर्गेनिक अम्ल = त्रिदोषहर, कृमिघ्न, रक्तशोधक, कवकरोधी, कर्कटार्बुदरोधी, सूक्ष्मजीवाणुरोधी।

७. तुलसीबर्बरी (वनतुलसी) {पंचांग} :- केरोटिन + क्यूमेरिक + क्लोरोजेनिक + कैम्फेराल + क्वर्सेटिन + लिमोनिन = रक्तविकारनाशक, कृमिघ्न, विषघ्न, ज्वरघ्न।

८. पाषाणभेद (पत्थरचूर) :- बर्जेनिन + सिटोस्टेराल + कैटेकिन + कार्वाक्रॉल + गैलिक टेनिक अम्लें = अश्मरीभेदक, त्रिदेषहर, जीवाणुरोधी, इन्फ्लुएन्जा वायरसनाशक।

९. पलाश (डाक, टेसू) पुष्प :- ब्युट्रिन + कारिओप्सिन = कुष्ठघ्न, ज्वरघ्न, कृमिघ्न, विषघ्न।

१०. बकुल (मौलसिरी) फल या छाल :- सेपोनीन + एमायरीन + ल्युपिलोल + अम्लें = ज्वरघ्न, विषघ्न, एच.आय.वी रिवर्स ट्रान्सक्रीप्टे प्रभावक।

११. मरूवक (दौना) पंचांग :- टेनीन + केफिक + क्लोरोजेनिक + लिनालूल + केरयोफेलिन + युजीनाल = कुष्ठघ्न, कृमिघ्न, विषघ्न, दुर्गन्धनाशक, ज्वरघ्न, रक्तकॅन्सर, एच.एल.६० एवं एन.बी.४ कोशिकाओं के प्रति कॅन्सररोधी।

१२. वनप्सा (पुष्प) :- सेपोनीन के कारण सूक्ष्मजीवीनाशक, कफनिस्सरक, कवकरोधी, निद्रल।

१३. सर्पगन्धा (मूल) :- केनेम्बिन + सेरेडीन + रेसीडीन + एरीसीन + रिर्पिक अम्ल + मिथाइल इस्टर + सर्पेन्टिन = विषघ्न, ज्वरघ्न, निद्रल, उन्मादनाशक।

१४. सत्यानाशी (स्वर्णक्षीरी) (पंचांग) :- बर्बेरीन + कोप्टीसीन + अमीनो अम्ल + मेक्सीकेनिक अम्ल आदि = शोथहर, रक्तशोधक, इस्नोफिलीया नाशक, विषघ्न, ज्वरघ्न, कृमिघ्न।

१५. सहदेवी (पंचांग) :- एमायरीन + केम्पेस्टेराल + ल्युटियोलीन + अरेचिडिक + बेहेनिक + ल्युपिओल = निद्रल, ज्वरघ्न, जीवाणुनाशक, विषाणुनाशक।

१६. सावां (श्यामक) बीज :- आर्जिनीन + लाइसिन + मेथिओनीन + थ्रीयोनीन + सिस्टिन = रक्तविकारनाशक, विषघ्न, कफपित्तशामक।टीप :- ये सभी औषधियाँ लगभग समान गुणधर्मवाली हैं। इसलिए सभी को एकत्र करना आवश्यक नहीं। जितनी मिल जाएँ उन्हें ५०-५० ग्राम लेकर छायाशुष्क कर आगे लिखे अनुसार :-

१७. गुग्गुलु (गोंद) ५० ग्राम :- क्वर्सेटिन + प्लेनोलिक + ओलिक आदि अम्लें + पाइनीन + लीमोनीन + सीटोस्टेराल = त्रिदोषनाशक, कृमिघ्न, सन्धिवातशामक, स्मृतिवर्द्धक, अर्बुदनाशक।

१८. जायफल या जावित्री ५० ग्राम :- सेबीन + केम्फिन + टरपिनीन + लिमोनीन + जिरेनिआल + सेफ्राल + युजीनाल + सेपोनीन = जीवाणुरोधी, आमवातशामक, पक्षाघातनाशक, दुर्गन्धनाशक, हृद्य, कृमिघ्न आदि।

१९. सूरजमुखी (बीज) ५० ग्राम :- एल्ब्युमिन + ग्लोब्युलिन + ग्लुटेलिन + कैरोटिन = कफनिस्सारक, विषघ्न, ज्वरघ्न, मूत्रल आदि (इसके १५ ग्राम बीजों को पीसकर पिलाने से सब प्रकार के विषों का शमन होता है। इसका पौधा वायुशोधक होता है तथा संक्रामक रोगों का नाशक है।) इन तीन औषधियों को उक्त १६ औषधियों में मिलाकर कुल ९५० ग्राम में २० ग्रामतिल + १० ग्राम चावल + ५० ग्राम जौ और १५ ग्राम शक्कर मिलाएं। कुछ मात्रा से हवन करें अथवा अंगारे पर धूनी देवें।

डॉ. कमलनारायण वेदाचार्य

२५/३/२०२० चैत्र शुक्ल प्रतिपदा २०७७

दूरभाष : ९४०७६९७६५७

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