कान्होजी आंग्रे

मराठा नौ सेना के सर्वाधिक प्रसिद्द सेनानायक, अठ्ठाहरवीं शताब्दी में ब्रिटिश, डच एवं पुर्तगाली नौ सेनाओं के छक्के छुड़ा देने वाले, भारत को प्रथम बार नौ सेना की महत्ता से अवगत कराने वाले एवं अपने अंत समय तक अपराजित रहे महान योद्धा कान्होजी आंग्रे उपाख्य सरखेल आंग्रे की आज पुण्यतिथि है|

1669 को कोकण के रत्नागिरी जिले में जन्में कान्हो जी के पिता तानोजी आंग्रे छत्रपति शिवाजी की सेना में नायक थे और इस कारण प्रारंभ से ही कान्होजी युद्ध कौशल में निपुण हो गए| युवावस्था प्राप्त करने पर उन्हें सतारा के प्रमुख द्वारा पश्चिमी तट का प्रशासक नियुक्त किया गया और यहीं से शुरू हुआ समुद्र के साथ उनका तारतम्य जो उनके जीवन के अंत तक रहा|

छत्रपति शाहू जी द्वारा उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें मराठा नौ सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया और अपने कौशल के बल पर उन्होंने इसे उस ऊँचाई पर पहुंचा दिया कि ब्रिटिश, डच और पुर्तगाली उनके नाम से भी भय खाते थे| ये कान्होजी आंग्रे ही हैं जिन्हें अंडमान द्वीप समूह को भारत से जोड़ने का श्रेय दिया जाता है क्योंकि उन्होंने ही पहली बार वहां अपना बेस स्थापित किया|

उनके युद्धकौशल और रणनीतिक चातुर्य का पता इसी बात से चलता है कि विदेशी ताकतों के मिले जुले अभियान भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके और वे अपने अंत समय तक अपराजित रहे| 4 जुलाई 1729 को ये महान नौसेनानायक इस संसार से विदा हो गया पर अपने पीछे एक सशक्त मराठा नौसेना छोड़ गया जिसकी धमक कई वर्षों तक विदेशियों के दिलों में बनी रही|

स्वतंत्रता पूर्व भारत के सबसे महान नौसेनानायक माने जाने वाले कान्होजी आंग्रे के सम्मान में भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान का नाम 15 सितम्बर 1951 से आई.एन.एस. आंग्रे कर दिया गया और दक्षिणी मुंबई के नेवल डाकयार्ड में उनकी प्रतिमा भी स्थापित की गयी| आज उनकी पुण्यतिथि पर कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

~ लेखक : विशाल अग्रवाल
~ चित्र : माधुरी

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