“उल्लूपन सवार ये संसार”

उल्लू सवार को लक्ष्मी कहते हैं। उल्लूपन सवार को लक्ष्मीपति कहते हैं। प्रजातन्त्री लक्ष्मीपति अरब-खरबपति होते हैं। प्रजातन्त्र में तीन तरह के अरबपति-खरबपति आम मिलते हैं। प्रथम श्रेणी के खरबपति फिल्मी, द्वितीय श्रेणी के खेल्ली, तृतीय श्रेणी के प्रजाल्ली होते हैं।

प्रथम श्रेणी को अभिनेता-अभिनेत्री या एक्टर-एक्ट्रेस, द्वितीय श्रेणी को किरकेटी-टेनिसी और तृतीय श्रेणी को नेता-नेत्री या प्रजानन-प्रजाननी कहते हैं। प्रजातन्त्री संसदें आजकल इन तीनों की तिकड़ी महाविकटी होती चली जा रही है। तीनों तरह के अरब-खरबपति उल्लूपनों पर सवार रहते हैं। जो जितना अधिक उल्लूपनों पर सवार रहता है वह उतना बड़ा अरबपति या खरबपति होता है।

हम प्रथम फिल्मी श्रेणी के सर्वोच्च स्तर से शुरु करें। ये मोम पुतले संघनीकृत लंदनी अमर हैं। कलकतिया लोगों ने इनकी मूर्ति गढ़ मन्दिर सजा इन्हें भगवान मान लिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया के एक उल्लू सर्वेक्षण के आधार पर इनके भविष्य में भारत के महामहिम राष्ट्रपति होने की संभावना है। प्रजातन्त्र में हर गप के सच होने की संभावना होती है। चौधरी चरणसिंह के जमाने का नेहरु जय, इन्दिरा जय, संजय-राजीव जय, उनके बेटे-बेटी जय का उस समय का महामजाक सारे सचों का करके कलेजाचाक आज दिखा रहा है नंगा नाच कि प्रजातन्त्र का कहीं कोई भी नहीं है माईबाप। लोगों का सच औसतः रोगी होता है। उच्चतम श्रेणी अभिनेता को भोग के कारण रोग हुआ। पेट रोग का इलाज दिल अस्पताल से न मिला। अंततः दक्ष प्रशिक्षित पेट डॉक्टरों ने कौशलपूर्वक सफल इलाज किया और श्रेय तिरुपति नौ करोड़ के ब्रेसलेट के साथ ले गया। तिरुपति भगवान के बाप-दादाओं ने कभी ब्रेसलेट शब्द भी न सुना था।

हजारों मूर्ख मुहूर्त-तिथि-वार-अंक मान्यताओं से फिल्म-फिल्म गुजरकर बेटे की शादी दहलीज पर ये आ पहुंचे। द्वि प्यार द्वार अटक-भटक वधू के मंगली होने पर प्रथम अस्वीकार बाद ये अंधविश्वास के चरम द्वार पहुंचे। मंगल दोष उपचार हजार कलाकार द्वय परिवार अरबपति तथा उनके खरबपति प्रजानन सांसद पार सब करते महा स्वीकार। आक्ख भारत गवाह-गवाह संसार 1. अन्दिरों-मन्दिरों भटकना, 2. अत्न-रत्न धारण, 3. उंभ-कुम्भ विवाह, 4. उत्तर भारत पीपल-पेड़ से वधू विवाह, 5. दक्षिण भारत मंदिर गाछ से विवाह, 6. अयोध्या में जड़ मूर्ति से विवाह और संभवतः 7. हनुमान के बांए पैर सरसौं तेल चढ़ाना, 8. हनुमान चालीसा पढ़ना और 9. गणेश मन्त्र पढ़ना। इतना उल्लूपन करना। उल्लूपन के महासागरों में सबका डूब मरना और फिर विश्व प्रसिद्ध विवाह करना। यह तो एक परिवार की अंधी व्यथा-कथा है। यहां तो हर फिल्मी हस्ती छोटी-बड़ी उल्लूपन अन्धविश्वासी मुहूर्तों-नम्बरों सनी है। नायकों की ड्रेस, नायकों के पिटने के दृष्य, नायक चयन, कहानी के ठूंस तत्व, फिल्म नाम आदि-आदि अन्धविश्वासों की भरमार है। जहां जितना उल्लूपन है वहां उतनी मनी-मनी, उतनी सफलता है।

अब किरकेटी दुनियां की बात करें तो विश्वकप जीती टीम में सर्वश्रेष्ठ होने का पुरस्कार जीता व्यक्ति लाल रुमाल गुलाम था। एक महादादा खिलाड़ी महापैसेबाज धनराज ज्योतिषी बताए नम्बरों को कमीज़ पर विशेषतः डलवाता था। इस विश्वकप की टीम के पिद्दीपन का राज हर खिलाड़ी द्वारा भीतर ज्योतिषी द्वारा बताया जीत नंबर ‘नौ’ पहनना था। नौ का फेर टीम को ले डूबा। हर पचासी-सौव्वी बनाने पर, चौका-छक्का मारने पर कोई मुंह उठा सूरज देखता है, कोई तावीज़ छूता है, कोई क्रॉस खींचता है, कोई लॉकेट चूमता है, कोई शायद जेब रखा जड़ देवता छूता है। जहां इतने अन्धविश्वास टुकड़े-टुकड़े अपने-अपने उल्लूपन खेलते हों वहां टीम का अलनटप्पू होना अर्थात् कभी भी जीतना कभी भी हारना तय है। और हर चुनौति का मौका आने पर ढह जाना स्वाभाविक है। इतने उल्लूपनों पर लक्ष्मी का तो न्योछावर होना ही था। मेरा छोटा बेटा भी अंशतः किरकेटी है। उसने भी कुछ दिन गले में ताविज़ जड़ मूर्ति धारण की। बुरा हो मेरी बीबी का उसने जबरन उसे उतरवा दिया। उसके अरबपति-खरबपति होने का चांस ही खतम हो गया। दोष किरकेटी खिलाड़ियों का नहीं किरकेटी खेल है जो स्वयं अलनटप्पू है। करेला और नीम चढ़ा- भारतीय क्रिकेट टीम शराब डूबी भी है। दूधो-पूतो फलने की कहावत यहां शराबों-अरबों फलों रूप में सार्थक है। हर जीत हर हार यहां शराब का नंगा नाच नही अपितु नंगा स्नान भी होता है। इन्होने कोच का कहना भी न माना कि शैम्पेन पीने की चीज़ होती है नहाने की नहीं, और पूर्ववत शैम्पेन नहाते-फलते रहे। एक कहावत है- मैच के दो घंटे पहले टीम शराब पी रही थी। किसी ने पूछ लिया- “इस समय शराब ?” राजबाग ने कहा- “बताओ हम जीतेंगे तो क्या करेंगे ?” व्यक्ति बोला- “शराब पी खुशियां मनाएंगे।” राजबाग बोला- “और हार जाएंगे तो क्या करेंगे ?” व्यक्ति बोला- “शराब पी गम गलत करेंगे।” राजबाग ने कहा- “जब हर हाल पीना है तो हम अभी ही क्यों न पीएं ? इसलिए पी रहे हैं।” काश कोई कोच समझ सोच पूर्वक भारतीय क्रिकेट टीम को भाग्यवाद और शराब के चंगुल से बचा पाए तो भारतीय टीम हर विश्वकप जीत जाए।

तृतीय खरबपति वर्ग है प्रजाननी। प्रजा हमेशा औसती होती है। औसती प्रजा आखिर है क्या ? जड़ पूजती, वृक्ष पूजती, गंडे-ताविजी, जय-सन्तोषी व्रती, तिरुपतियाई, साई-भाई, भगोड़ों को पूजती, गायत्री को मूर्खता बना अर्चती, चौथे-सातवें बिन्दु भगवानों को पूजती, अंध रामाई, अंध कृष्णाई, मैय्याई और लमलेट जिसकी बुद्धि जड़ ठेठ। और ऐसी प्रजा का आनन लगा लेनेवाला प्रजानन भी जड़त्व बुद्धि भरा मुहूर्ती, पूजाई, मंदिराई, मसजिदाई, गिरजाई, सब एक साथ नपुसक धर्माई आदि-आदि सर्व उल्लूपन सवार खरबपति होता है। यह त्रयी, तीन टिकटी महा विकटी, कहीं भव्य बाराती हो विदेशी मद्य प्याली, अजरारे-कजरारे नाचते-झूमते आवेग जाते मिडियाई प्रोपेगेंडा सवार बेड़ा पार धन अतिरिक्त सर्व बंठाधार होता है। यह त्रयी इसी स्थिति नाम रूप बदल विश्व अर्थ सम्मेलन, विश्व शान्ति सम्मेलन, विश्व उद्योग सम्मेलन, सर्वजन प्रिय कजरारे आदि गाते बहकते-बहकते विश्व प्रतिस्पर्धा में भारत के प्रथम ठहराते लगाता ठहाके अरबपति से आगे जाते नहीं अघाता है। मीडिया भौपूओंवत इनका डंका बजाते इन्हें छापते-आपते और इन्हीं के इर्द-गिर्द बिन बुलाए मेहमान उर्फ मक्खीवत झूमते-झामते इनका राग गा, इनके आधार टुकड़े कमा खूब धन मोटाता है। बे-लय-ताल, पूर्ण असार, यह उल्लूपन सवार संसार… हंसने की चीज़ है यार ! हंसो.. हंसो… हंसो…. त्रि-बार और बार-बार !!

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रियपी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (आठ विषय = दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

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