अष्टाध्यायी प्रवेश

जिस प्रकार सुदृढ़ आधार पर न बना हुआ पर्याप्त दीर्घ ऊँचा एवं सुन्दर भवन भी जीवन के लिए संशयात्मक ही रहता है। इसी प्रकार मूलभूत व्याकरण के तत्त्वों को पूर्व जाने बिना प्रथमावृत्ति से महाभाष्य तक का अध्ययन विद्यार्थी के लिए निराशाजनक ही रहता है। विद्यार्थियों की इस कठिनता को अनुभव करके ”अष्टाध्यायी“ प्रवेश पुस्तक लिखी है। पुस्तक कितनी लाभदायक है इसको स्वयं पाठक जान सकेंगे।
पुस्तक में निम्न बातों का ध्यान रखा गया है:-
1) प्रवेश सुन्दर हो। क्योंकि- ॅमसस इमहनद ींस िकवदमण् अर्थात् अच्छा आरम्भ होने से आधा कार्य समाप्त हो जाता है।
2) सरल भाषा में लिखने का यत्न किया गया है।
3) बीच-बीच में सरल उदाहरणों द्वारा भी समझाया गया है।
4) जिन शब्दों या सिद्धान्तों को पूर्व जनाया है उन्हीं को आगे लिखा है।
5) ऐसा यत्न किया है कि अध्यापक को कम परिश्रम करना पड़े एवं प्रवीण विद्यार्थी स्वयं भी समझ जाए।
6) यदि अध्यापक इसे पूर्व पढ़कर ”वृद्धिरादैच्“ सूत्र से पढ़ाना आरम्भ करेंगे तो शीघ्र गति तथा समय व शक्ति की बचत होगी।
7) ऐसा यत्न किया है कि प्रवीण विद्यार्थी स्वयं समझ सके अथवा अध्यापक के थोड़े से संकेत से समझ जाए।
विद्यार्थी निम्न बातों का ध्यान रखे:-
1) आरम्भ में विद्यार्थी शीघ्रता न करे।
2) समझकर तथा स्मरण करके ही आगे बढ़े।
3) अध्यापक के निर्देश में प्रतिदिन पठित पाठ को सुनाता रहे।
4) पूर्व अपनी स॰िचका में लिखे पुनः समझे या पढ़े।
बलदेव नैष्ठिक

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