अवसर प्रबन्धन

साक्षात्कार, परीक्षा, चुनौतिपूर्ण कार्य, अतिश्रेयस्कर कार्य मानव के लिए रुके नहीं रहते। तुम नहीं करोगे किसी और के माथे सफलता का टीका लग जाएगा। अवसर पीछे से गंजा होता है। निकल जाने पर पीछे से पकड़ नहीं सकते। अवसर रेतवत मुट्ठी से फिसल जाता है।

का बरखा जब कृषि सुखानी,

मन पछतै हे अवसर बीते,

सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया?

दिन में अगर चिराग जलाए तो क्या किया?

अवसर प्रबन्धन के ही उपरोक्त सारे तथ्य हैं। नवीन अवसर गुर है अवसर न होने पर अवसर पैदा करो।

भारतीय संस्कृति या सांस्कृतिक तकनीक अवधारणा उपरोक्त धारणाओं के साथ जीवन को ही अवसर मानती है। मानव जन्म ही उत्थान का महा अवसर है। आरोह इमं सुखं रथम्- सुख पूर्वक शरीर का आरोहण करो, मानव चोला दुर्लभ रे बन्दे, वृथा जन्म गंवायो, अतिदुर्लभ मानव तन पाए, झीनी रे बीनी चदरिया, आदि मानव जीवन को अवसर दर्शाते हैं।

भरथरी की नजर में युवावस्था स्वास्थ्य स्वस्थ शरीर ही एक महान अवसर है। इस अवसर को खोना नहीं चाहिए। यदि घर को आग लग गई है और उस समय कोई कूप खनन का अतिश्रम करता है तो उसका क्या लाभ? भरथरी का यह सन्देश महान अवसर प्रबन्धन सन्देश है।

सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः। अवसर को पकड़ने के लिए पूर्व तैयारी आवश्यक है। भरथरी के अनुसार संभावनाओं का ध्यान रखते हुए अवसर प्रबन्धन करना चाहिए। संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन का पूर्वाधार है। परियोजना प्रबन्धन की आत्मा संभावना प्रबन्धन को छोड़ देने के कारण कई कई परियोजनाएं पूर्णता के पथ से वर्षों दूर भटक गईं हैं।

मानव लक्ष्य है आत्म कल्याण। आत्म कल्याण प्राप्त होता है पुरुषार्थ से। पुरुषार्थ का आधार तथ्य है उत्तम स्वास्थ्य। उत्तम स्वास्थ्य का सम्बन्ध है उम्र तथा इन्द्रियों से। भरथरी कहता है-

जब तक ओजपूर्ण, स्वस्थ है यह षरीर और जरा दूर है, बुढापा दूर है, और इन्द्रियां हैं शक्ति आभर, और भरा हुआ है आयुष- आयु के प्रति उछाह, आयु के प्रति उत्साह, तथा क्षय ने नहीं घेरा है आयु को, तब तक मानव को जो बुद्धि भरा है आत्मकल्याण के लिए महान पुरुषार्थ कर लेना चाहिए। तन की अगर व्युत्पत्ति सामान्य भाषा में की जाए तो त + न बनती है। अर्थात तब नहीं है जो वही है तन। अर्थात अब स्वस्थ है जो वह है तन। अब जब यह है स्वस्थ तो है अवसर तो कर ले इसका श्रेष्ठ उपयोग, पाले इससे आत्मकल्याण, यह भरथरी अवसर प्रबन्धन है।

मेरा परिवार कमायु (कम आयु) रहा है। मेरे भतीजे की मृत्यु सत्ताइस वर्ष में हृदयाघात से, मेरे चचेरे भाइयों की मृत्यु 36 वर्ष और 52 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से, मेरे छोटे मामा की मृत्यु 52 वर्ष में पक्षाघात से, मेरे बडे मामा की मृत्यु 58 वर्ष में, मेरे माताजी की मृत्यु 56 वर्ष में (50 वर्ष में पक्षाघात एवं कैंसर पष्चात) हुई। मेरे पिताजी की मृत्यु 60 वर्ष में तथा भैया की मृत्यु भी साठ वर्ष में ही हुई। अर्थात मेरे परिवार की औसत आयु पचास वर्ष रही है। आज मैं करीब 62 वर्ष का हंू। लिखित उम्र 59 वर्ष है जो गलत है। मैं आज से सात-आठ वर्ष पूर्व ही सावधान हो गया था तथा अध्यात्म क्षेत्र मैंने द्रुत कार्य आरम्भ कर दिया था। उम्र सूत्र देखते ही गरीब बस्तियों में बच्चों के खेल रखने और लिखने के उद्देश्य से मैंने नौकरी से सेवानिवृत्ति ले ली है। फिर भी मुझे विलम्ब हो गया। काष मैंने भरथरी का संभावना प्रबन्धन अवसर प्रबन्धन सूत्र पहले पढ़ा होता।

अब है यह ‘तन’और तब न होगा। यह कब न होगा कोई न है जानता। तो करो न अब जब है तन आत्म कल्याणार्थ या लक्ष्यप्राप्ति अर्थ अत्यन्त प्रयास। अव्यक्त है बीता कल अव्यक्त है आनेवाला कल। व्यक्त है अब अतः इसमें सतत प्रयत्न है भरथरी अवसर प्रबन्धन।

यावत्स्वस्थमिदं शरीरमरुजं यावज्जरादूरतो।

यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुशः ।

आत्मश्रेयसितावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्।

सन्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृषः।।

स्व. डॉ. त्रिलोकीनाथ जी क्षत्रिय

पी.एच.डी. (दर्शन – वैदिक आचार मीमांसा का समालोचनात्मक अध्ययन), एम.ए. (दर्शन, संस्कृत, समाजशास्त्र, हिन्दी, राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा लोक प्रशासन), बी.ई. (सिविल), एल.एल.बी., डी.एच.बी., पी.जी.डी.एच.ई., एम.आई.ई., आर.एम.पी. (10752)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *